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मोदी का विकल्प कैसे बनेंगे राहुल?

यह सच है कि मोदी का विकल्प बनना न आसान है न उचित, लेकिन एक वैकल्पिक राजनीति का रास्ता खोजना संभव भी है और जरूरी भी

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मोदी का विकल्प कैसे बनेंगे राहुल?

पांच राज्यों के चुनावी नतीजों के बाद राहुल गांधी ने जो वक्तव्य दिया, वह लगातार आक्रामक होती जा रही राजनीतिक संस्कृति में बहुत शिष्ट हस्तक्षेप कहा जा सकता है. अमूमन पिछली सरकारों की विफलताओं का ढोल बजाने की रिवायत छोड़कर उन्होंने माना कि पहले से चले आ रहे अच्छे कामों को वे आगे बढ़ाएंगे. उनके पूरे वक्तव्य में अहंकार की जगह विचार झांक रहा था- इस सवाल से जुड़ा हुआ कि आगे क्या करना है और कैसे करना है?

लेकिन क्या शिष्ट भाषा बोलकर ही राहुल गांधी नरेंद्र मोदी का विकल्प बन जाएंगे? शिष्ट भाषा वे पहले भी बोलते रहे हैं. 2014 के चुनावों के बाद उन्होंने बहुत सहजता से माना कि पार्टी के भीतर अहंकार चला आया था. इन तमाम वर्षों में अपनी राजनीति का जो मुहावरा उन्होंने विकसित किया है, उसमें एक तरह की सज्जनता है- कुछ इस हद तक कि शायद इसी बिना पर सयाने और चालाक लोग उनको बुद्धू समझते आए हैं.

लेकिन यह पहली बार नहीं है जब कहा जा रहा है कि राहुल गांधी का कद बढ़ा है. जब नरेंद्र मोदी राष्ट्रीय राजनीति में नहीं थे, तब 2009 के चुनावों के बाद भी यह बात कही गई कि इस जीत ने राहुल का कद बढ़ाया है. उन दिनों भी राहुल के उत्साही समर्थकों ने उनको प्रधानमंत्री बनाने की मांग शुरू कर दी थी. बेशक, वे चाहते तो तभी यह ओहदा ले सकते थे. आखिर 1984 में उनके पिता राजीव गांधी ने सिर्फ दो साल के राजनीतिक अनुभव के बावजूद प्रधानमंत्री का पद संभाला ही था. लेकिन राहुल इस मामले में अपने पिता से आगे और मां के करीब दिखे. जिस तरह 2004 में सोनिया गांधी ने प्रधानमंत्री पद ठुकराया था, उसी तरह 2009 में राहुल गांधी ने खुद को इससे अलग किया और मनमोहन सिंह को पूरे सम्मान के साथ यह जगह दी.


लेकिन दरअसल कद मकसद से नहीं, कामयाबी से तय होते हैं. इसलिए 2009 की सफलता पीछे छूटती गई और कई असफलताएं राहुल गांधी की राजनीति का पीछा करती रहीं. 2014 का लोकसभा चुनाव और उसके बाद 2017 का यूपी चुनाव राहुल की राजनीति में जैसे आखिरी कीलों की तरह देखे जाने लगे. सोशल मीडिया के इस दौर में क्षणिकताओं से निर्मित और आक्रांत राजनीति ने राहुल को लगभग चुटकुला बना डाला- निस्संदेह इसमें बीजेपी की बहुत प्रचार नीति का भी हाथ रहा.

लेकिन 2018 के नतीजों ने नए सिरे से याद दिलाया कि प्रचार के गुब्बारे एक हद के बाद नहीं टिकते. ठोस मुद्दों की राजनीति ही अंततः  नतीजे तय करती है. 2004 में अटल-आडवाणी की अजेय लगने वाली जोड़ी शाइनिंग इंडिया और फील गुड के प्रचार के बावजूद हार गई और 2009 में कुछ अनिश्चित सी दिखती कांग्रेस मनरेगा जैसे फैसले के जादू की वजह से कुछ और मजबूत हो गई. 2014 आते-आते लेकिन कोल ब्लॉक और टू जी जैसे मामलों ने मनमोहन सरकार के खिलाफ माहौल बनाया और लोगों ने नरेंद्र मोदी से यह उम्मीद बांधी कि वे विकास भी करेंगे और भ्रष्टाचार भी रोकेंगे. मंदिर बनाने और हिंदुत्व को मजबूत करने का भरोसा उनके पुराने समर्थकों को था ही.

मगर इन चार वर्षों में प्रधानमंत्री मोदी न अपने पुराने समर्थकों को संतुष्ट रख पाए न अपने से जुड़ी नई उम्मीदें पूरी कर पाए. जिस जीएसटी को पांच साल उन्होंने रोका, उस पर बड़ी हड़बड़ी में अमल कर कारोबारियों का गुस्सा झेला. नोटबंदी के बेतुके फैसले को डिजिटल इंडिया के नारे से ढंकने की उनकी कोशिश कामयाब नहीं रही और इसकी कसक दूर-दूर तक गई. कुछ उद्योगपतियों की बढ़ी हुई हैसियत और राफेल जैसे सौदों ने उनके भ्रष्टाचार विरोधी होने पर भी सवाल खड़े कर दिए. किसानों के पक्ष में बनाए गए ऐतिहासिक भूमि अधिग्रहण कानून को पलटने की उनकी कोशिशें मार खाती गईं और किसानों के बढ़ते संकट के बीच उनकी सरकार की किसान विरोधी छवि मजबूत होती गई. अब वे बस उन भक्तों के अतिप्रिय नेता हैं जिनकी पूरी वैचारिक दीक्षा मुसलमानों से नफरत और पिछड़ों से हिकारत की शब्दावली में विकसित हुई है. उन्हें अब भी लगता है कि यही आदमी उनके हिस्से का मंदिर बनाएगा और अगर मंदिर नहीं भी बनाएगा तो भी अल्पसंख्यकों को काबू में रखेगा.

यह सवाल उठता है कि तीन राज्यों के चुनावी नतीजों के लिए उनके मुख्यमंत्रियों की जगह सीधे प्रधानमंत्री को ज़िम्मेदार क्यों माना जाए? इसलिए कि इन तमाम वर्षों में बीजेपी सारे चुनाव उनके नेतृत्व में, उनके नाम पर लड़ती रही और अपने कामकाज से एक दिन की भी छुट्टी लिए बिना प्रधानमंत्री पार्टी के लिए तमाम मंचों पर प्रचार के लिए सुलभ रहे. वे सारे चुनाव जैसे अपनी शख्सियत के दम पर जीत लेने पर आमादा रहे. बीजेपी के भीतर अगर इस शख्सियत के सामने कोई दूसरी शख्सियत खड़ी हो पाई तो वे योगी आदित्यनाथ ही हैं जो बीजेपी की सांप्रदायिक राजनीति के घृणा तत्व को गहरा करते रहे. तो कुल मिलाकर इन वर्षों में बीजेपी विकास से ज्यादा राम मंदिर, गोरक्षा, लव जेहाद जैसे उन मुद्दों के लिए जानी जाने लगी जो इस देश को सांप्रदायिक और जातिगत आधारों पर बांटते हैं. हालांकि आधिकारिक तौर पर उसने बार-बार अंबेडकर का नाम लिया, एससी-एसटी कानून में जो ढील दी गई थी, उसको खत्म किया और खुद को सामाजिक न्याय का पैरोकार बताती रही, लेकिन इसके बावजूद वह अपने मूल वैचारिक आधार और अपनी नेतृत्व पंक्ति की वजह से इन तबकों का भरोसा हासिल नहीं कर पाई. उल्टे जो अगड़ी जातियां यह भरोसा पाले बैठी थीं कि बीजेपी आरक्षण खत्म करेगी, उनके लिए नौकरियां जुटाएगी और उनका मंदिर बनाएगी, वे उनसे निराश और दूर होती चली गईं.

इस अंतर्विरोध ने दरअसल 2018 की वह जमीन तैयार की, जिसमें अचानक सबको राहुल का उभार दिख रहा है. लेकिन सच्चाई यह है कि राहुल कम से कम राजनीतिक तौर पर एक स्पष्ट वैचारिकी के तहत काम करते रहे. अपनी ही सरकार के समय मिर्चपुर के दलितों पर हुई हिंसा को लेकर उन्होंने जो रुख अख्तियार किया, उससे उनके अपने दुखी हुए, नियामगिरि में जाकर वे खुद को आदिवासियों का सिपाही बता आए और आने वाले तमाम दिनों में किसान और रोजगार के मुद्दे उठाते रहे.

तो राहुल नए नहीं हैं, उनसे उम्मीद नई है. लेकिन यही उम्मीद असली चुनौती भी है. सत्ता और राजनीति को लेकर एक अनमनापन राहुल शायद अपनी विरासत की वजह से अरसे तक दिखाते रहे. उन्होंने इसी राजनीति की सेज पर अपनी दादी और अपने पिता के क्षत-विक्षत शव देखे हैं. अपनी मां को लेकर तमाम तरह की फूहड़ बातें सुनी हैं जिनमें आखिरी बात दुर्योग से सीधे प्रधानमंत्री के मुंह से निकली है- कांग्रेस की विधवा. जब कांग्रेस उनके सत्तारोहण की तैयारी में थी तो बाहर आकर उन्होंने मां की दी हुई सीख बताई कि सत्ता जहर है.

लेकिन जब वे इस राजनीति में हैं तो यह लड़ाई उन्हें पूरे मन और पूरी ताकत से लड़नी होगी. आधी-अधूरी तैयारियों से युद्ध नहीं जीते जाते- चाहे उनके पीछे जितनी भी अच्छी नीयत हो. युद्ध युयुत्सा से जीते जाते हैं, लगातार लड़ने के जज़्बे से जीते जाते हैं, लगभग बेरहमी की छूती रणनीतिक आक्रामकता से जीते जाते हैं. अमित शाह और नरेंद्र मोदी इस आक्रामकता के सटीक उदाहरण हैं. चार साल में प्रधानमंत्री लगातार जैसे एक चुनावी युद्ध लड़ते रहे. वे हमेशा प्रचाररत रहे.

यह जज़्बा राहुल को भी दिखाना होगा. कांग्रेस जैसे शिथिल, जंग खाए और जर्जर संगठन को अगर फिर से चुस्त-दुरुस्त बनाना है तो उसकी निर्मम ओवरहॉलिंग करनी होगी. इसके अलावा उन्हें अपने मुद्दे भी साफ करने होंगे. किसानों की कर्ज माफी एक लोकप्रिय कदम तो है, लेकिन यह किसानों के संकट का स्थायी हल नहीं है. इसी तरह हर साल कुछ करोड़ रोजगार देने जैसे हवाई वादों से बचते हुए भी उन्हें रोटी और रोजगार के सवाल से सीधा जूझना होगा. बेशक, इस काम में बड़े औद्योगिक घरानों से ज्यादा छोटी उद्यमशीलता उनकी मददगार होगी. दरअसल यह अपनी अर्थव्यवस्था की प्राथमिकताओं को नए सिरे से तय करने का मसला है. यह काम इस लिहाज से ज्यादा चुनौती भरा है कि कांग्रेस के भीतर भी एक बहुत ताकतवर लॉबी है जो अर्थव्यवस्था के इस ढर्रे की न सिर्फ वकालत करती रही है, बल्कि उसी ने उसका सूत्रपात किया है.

राहुल की दूसरी चुनौती नफरत की वह राजनीति है जो इन वर्षों में बहुत गाढ़ी हुई है. इस नफरत के दायरे में उनका अपना परिवार भी है, एक पूरा समुदाय भी है, तमाम पिछड़ी जातियां भी हैं और विकास या हिंदुत्व के नाम पर चल रही मौजूदा राजनीति का प्रतिरोध करने वाली वे ताकतें भी हैं जिन्हें कभी देशद्रोही बताया जाता है कभी धर्मविरोधी.

संस्थाओं का संरक्षण राहुल के सामने तीसरी चुनौती है. बेशक, हाल के वर्षों में मोदी सरकार के समय इनके क्षरण की प्रक्रिया कुछ ज्यादा तेज हुई- संस्थाओं को अविश्वसनीय बनाया गया, वहां बैठे शीर्षस्थ लोगों ने इस्तीफे दिए, उनके भीतर झगड़े हुए- लेकिन पुरानी कांग्रेस के समय भी संस्थाओं के अवमूल्यन का काम खासा हुआ. दरअसल यह अवमूल्यन और कई दूसरी तरह के अवमूल्यन बीजेपी ने कांग्रेस से ही सीखे हैं- बेशक, कुछ ज्यादा तेजी से सीख लिए.

अब कांग्रेस को जल्दी से जल्दी बीजेपी होने के मोह से बचना होगा. इस काम में बेशक उनके सहयोगी भी उनके मददगार होंगे. भारतीय लोकतंत्र ने जाने-अनजाने तरह-तरह की क्षेत्रीय और सामुदायिक इच्छाओं का जो रसायन तैयार किया है, वह अपनी तमाम दुर्बलताओं के बावजूद एक सार्वदेशिक संतुलन बनाता है. वह सरकारों को मजबूती नहीं देता, मजबूर बनाए रखता है और यह वह चीज है तो लोक को तंत्र के ऊपर रखती है. लेकिन इन तमाम सहयोगियों को साथ लेने के लिए पहले राहुल गांधी को यह भरोसा पैदा करना होगा कि वे अपनी पूरी ताकत से एक युद्ध लड़ रहे हैं और वह साझा युद्ध है. यह सच है कि मोदी का विकल्प बनना न आसान है न उचित, लेकिन एक वैकल्पिक राजनीति का रास्ता खोजना संभव भी है और जरूरी भी.

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(प्रियदर्शन NDTV इंडिया में सीनियर एडिटर हैं...)

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