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गोरक्षा की तरह हिंदी रक्षा न करें..

हिंदी को सबसे ज़्यादा हिंदी प्रेमियों से बचाने की जरूरत है. हिंदी रक्षा का काम कुछ लोग उसी तरह करना चाहते हैं जैसे गोरक्षा का काम करते हैं. वे अचानक हिंदी से तमाम तद्भव, देशज-विदेशज शब्दों को हटाने की मांग करते हैं.

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गोरक्षा की तरह हिंदी रक्षा न करें..

प्रतीकात्‍मक फोटो

हिंदी दिवस परिपाटी, पाखंड, प्रहसन सब कुछ है- साथ में कुछ लोगों के लिए यह प्रायश्चित भी कि कैसे वे अपनी ही भाषा के साथ धोखा कर रहे हैं. इस प्रायश्चित की सीमा बस यही है कि वे सच्चे दिल से मानते हैं कि हिंदी आत्मीयता की भाषा है, कि हिंदी में काम हो सकता है, कि हिंदी में वे काम करना चाहते हैं, लेकिन अंततः रोटी-रोज़गार और सम्मान तीनों अंग्रेज़ी में हैं.

दरअसल हिंदी की असली मुश्किल यही है. इसका वास्ता उसकी भाषिक क्षमता से नहीं, उसकी राजनैतिक-आर्थिक हैसियत से है. दुनिया में सत्ताएं भाषाओं की हैसियत तय करती हैं. अंग्रेजी अगर दो सौ साल से विश्वभाषा है तो बस इसलिए कि एक दौर में वह इंग्लैंड की भाषा रही और अब अमेरिका की भी भाषा है. जब जर्मनी और फ्रांस की हैसियत बड़ी थी तो जर्मन और फ्रेंच बड़ी भाषाएं थीं- यूरोप के भीतर अब भी इन भाषाओं की सांस्कृतिक हैसियत बड़ी है. यही बात रूसी-चीनी जैसी भाषाओं के बारे में कही जा सकती है. सोवियत संघ के ज़माने में रूसी दुनिया की बड़ी भाषा थी, अब चीनी उभार के दौर में धीरे-धीरे चीनी सीखने पर ज़ोर है.

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लेकिन हिंदी की विडंबना इससे कहीं ज़्यादा बड़ी है. भारत की राजनीतिक हैसियत बड़ी होती है तो अंग्रेज़ी की हैसियत में इज़ाफ़ा होता है. क्योंकि चाहे-अनचाहे इस देश में शासन और रोज़गार की भाषा अंग्रेज़ी है. नीतियां अंग्रेज़ी में बनती हैं, फ़ैसले अंग्रेज़ी में लिए जाते हैं, मानक अंग्रेज़ी में तय होते हैं, विकास के मुहावरे भी अंग्रेज़ी में गढ़े जाते हैं. हिंदी और दूसरी भारतीय भाषाएं दूसरे दर्जे की नागरिक हैं. बेशक, इस विडंबना की एक वजह उस औपनिवेशिक अतीत में है जिसकी वजह से आधुनिक शिक्षा और जीवन के सारे उपकरण हमारे यहां अंग्रेज़ी की मार्फ़त आए हैं- लोकतंत्र भी, विज्ञान भी और समाज और इतिहास की समझ भी. लेकिन दूसरी विडंबना यह है कि जैसे हमने बहुत सारी चीज़ों का उचित देसीकरण किया, उस तरह अंग्रेज़ी की इस विरासत का नहीं किया. अनुसंधान और शोध की अपनी परंपरा हम विकसित नहीं कर पाए, ज्ञान-विज्ञान और मीडिया के भी अपने मुहावरे नहीं बना पाए. भारतीय राष्ट्र राज्य के जटिल भाषिक द्वंद्व में भी सही रास्ता निकाल न पाने की मजबूरी ने अंग्रेज़ी को ताक़त दी. उर्दू और दूसरी भारतीय भाषाओं के साथ हिंदी का पुल कमज़ोर पड़ता गया. सिर्फ हिंदी नहीं, दूसरी भारतीय भाषाएं भी इस प्रक्रिया की शिकार हुईं.

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सवाल है, इससे उबरने का रास्ता क्या है? इस सवाल का जवाब आसान नहीं है. पहली बात तो यह कि हिंदी और दूसरी भारतीय भाषाओं की परस्पर निर्भरता बढ़ानी होगी. इसका एक तरीक़ा स्कूलों में चलने वाला त्रिभाषा फार्मूले के तहत हिंदीभाषी क्षेत्रों में तीसरी भाषा के तौर पर तमिल, तेलुगू, कन्नड़, मराठी, बांग्ला जैसी क्षेत्रीय भाषाओं की पढ़ाई से निकलता है. इन तमाम स्कूलों में जब दूसरी भाषाओं के लोगों को रोज़गार मिलेगा तो उन भाषाओं के भीतर भी हिंदी की स्वीकार्यता बढ़ेगी. इस क्रम में हिंदी की परंपरा को भी पहचानना होगा जो सिर्फ संस्कृत से नहीं, प्राकृत, पाली, अपभ्रंश और उर्दू तक से बनती है. इस लिहाज से तुलसी और कबीर ही नहीं, ग़ालिब और मीर भी हिंदी की ही परंपरा के कवि हैं.

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लेकिन यह बस पहला क़दम है. दूसरे क़दम का वास्ता भाषिक नहीं, बड़े सामाजिक-राजनीतिक आंदोलन से है. धीरे-धीरे हिंदी का मध्यवर्ग अंग्रेज़ी में दाखिल हो चुका है. हिंदी अब दलितों और आदिवासियों की प्रतिनिधि भाषा के रूप में उभर रही है. यह वह समाज है जो नए बनते इंडिया के मुक़ाबले कहीं ज्यादा बड़े, विविध और वास्तविक भारत की नुमाइंदगी करता है. यह समाज जब अपने हक़ और हित की लड़ाई लड़ेगा तो वह अंग्रेज़ी में नहीं, हिंदी में लड़ी जाएगी और उसके साथ बाकी बदलाव लाने होंगे.

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वैसे ध्यान रखने की एक बात और है. हिंदी को सबसे ज़्यादा हिंदी प्रेमियों से बचाने की जरूरत है. हिंदी रक्षा का काम कुछ लोग उसी तरह करना चाहते हैं जैसे गोरक्षा का काम करते हैं. वे अचानक हिंदी से तमाम तद्भव, देशज-विदेशज शब्दों को हटाने की मांग करते हैं. कुछ अरसा पहले दीनानाथ बतरा के नेतृत्व में बनी एक कमेटी ने पाठ्य पुस्तकों से ऐसे शब्दों को हटाने की सिफ़ारिश की. यह सबसे ख़तरनाक मांग है. भाषाओं को सबसे ज़्यादा शुद्धतावाद मारता है. मनुष्यों की तरह भाषाएं भी खुली हवा में सांस लेती हैं तो फूलती-फलती हैं. बंद दायरे में वे सड़ने लगती हैं, शब्द मरने लगते हैं. अगर आप हिंदी से फ़ारसी शब्दों को हटाना चाहेंगे तो आपको तुलसी के राम चरित मानस को भी बदलना होगा- वहां भी कई शब्द फ़ारसी के मिलते हैं. इसी तरह अंग्रेज़ी विरोध हिंदी रक्षा का ज़रिया नहीं हो सकता. विरोध अंग्रेज़ी से नहीं, अंग्रेज़ी की विशेषाधिकार वाली हैसियत से है. हम इस हैसियत को बदलना चाहें तो इसके लिए स्वस्थ आंदोलन की जरूरत होगी. जबकि हिंदी दिवस के मौक़े पर बहुत सारे लोग हिंदी को भी अंग्रेज़ी की तरह विशेषाधिकार दिलाना चाहते हैं जिससे दूसरी भाषाएं चौकन्नी हो उठती हैं. यह समझना होगा कि हिंदी की दुनिया बहुत विपुल-विराट है, उसे धीरे-धीरे बोली में बदलने की प्रक्रिया से रोकना होगा. हिंदी को सिर्फ मनोरंजन, राजनीति और कविता-कहानी की भाषा से आगे ले जाकर एक बड़े समुदाय के वैचारिक और जीवंत राष्ट्रीय संवाद की भाषा में बदलने की लड़ाई लंबी होगी.

प्रियदर्शन एनडीटीवी इंडिया में सीनियर एडिटर हैं

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण) : इस आलेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी विचार हैं. इस आलेख में दी गई किसी भी सूचना की सटीकता, संपूर्णता, व्यावहारिकता अथवा सच्चाई के प्रति एनडीटीवी उत्तरदायी नहीं है. इस आलेख में सभी सूचनाएं ज्यों की त्यों प्रस्तुत की गई हैं. इस आलेख में दी गई कोई भी सूचना अथवा तथ्य अथवा व्यक्त किए गए विचार एनडीटीवी के नहीं हैं, तथा एनडीटीवी उनके लिए किसी भी प्रकार से उत्तरदायी नहीं है.


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