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लेफ्ट-लिबरलों को छोड़ना ही होगा विषैला आरएसएस विरोध...

दक्षिणपंथी और वामपंथी बुद्धिजीवियों के बीच संवाद का सर्वथा अभाव है, और इसका दोष वामपंथियों के हिस्से में जाता है. वे आरएसएस को अवैध मानकर चलते हैं, और उसे जानने की कोई कोशिश नहीं करते, क्योंकि वे पहले ही निष्कर्ष निकाले बैठे हैं कि वे फासीवादी और सांप्रदायिक हैं.

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लेफ्ट-लिबरलों को छोड़ना ही होगा विषैला आरएसएस विरोध...

गोरक्षा की आड़ में भीड़ द्वारा इंसानों को मार डाले जाने की घटनाओं के खिलाफ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की कड़ी चेतावनी - नैतिक तथा राजनैतिक - दोनों ही लिहाज़ से महत्वपूर्ण है. एक ओर जहां चेतावनी में स्पष्ट रूप से बताया गया है कि सरकार का हिंसा करने वाले इन लोगों से कोई लेना-देना नहीं है, वहीं राज्य सरकारों को भी निर्देश दिए गए हैं कि भविष्य में इन घटनाओं को रोका जाए. इससे पहले, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के प्रमुख मोहन भागवत भी हिंसा की इन घटनाओं की कड़ी निंदा कर चुके हैं, जिनसे गोरक्षा के मूल उद्देश्य को हानि पहुंचती है.

गोरक्षा कतई अहिंसक तथा सांस्कृतिक मुद्दा है, और इसकी अहमियत को मध्यकालीन युग में कई मुस्लिम शासकों ने भी स्वीकार किया है. बहरहाल, प्रबुद्ध भारतीयों का एक हिस्सा, जिनमें अधिकतर लेफ्ट-लिबरल (वाम-उदारवादी) हैं, जो पश्चिम में हिन्दू-विरोधी बुद्धिजीवियों के एक हिस्से का अनुसरण करते हुए, इसे एक ओर हिन्दुत्व, पीएम मोदी और आरएसएस पर हमला करने के अवसर के रूप में इस्तेमाल करने की कोशिश करते रहे हैं, वहीं दूसरी ओर गोहत्या पर प्रतिबंध की मांग को दबाने के लिए भी इसका इस्तेमाल करते हैं. वे लोग प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से भीड़ द्वारा हिंसा के लिए दोषी ठहराकर गाय को हमारी संस्कृति का प्रतीक मानने वालों के दिलों में 'अपराधबोध' भी भर देने की कोशिश कर रहे हैं, हालांकि उनकी कोशिशें व्यर्थ जा रही हैं.

इससे बड़ी विडम्बना क्या हो सकती है...? जयप्रकाश नारायण तथा विनोबा भावे जैसे राष्ट्रीय नेता, जिनका ज़िक्र गाहे-बगाहे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी अपने भाषणों में करते रहे हैं, गोहत्या पर प्रतिबंध के ज़ोरदार समर्थक थे. इसमें कोई संदेह नहीं कि भले ही कारण कोई भी हो, भीड़ द्वारा की गई हिंसा एक तरह का आतंकवाद ही है, जिसमें असहाय को यातना दी जाती है...


यह भी सच है कि कोई भी समाज अपराधों से पूरी तरह मुक्त नहीं होता है, और इसमें भीड़ द्वारा हिंसा भी शामिल है. लेकिन देशभर के लोगों में भीड़ द्वारा हिंसा के खिलाफ मतैक्य है. अमेरिका में जहां गोरों द्वारा किए जाने वाले रंगभेदी अत्याचार के तहत भीड़ द्वारा हिंसा की कभी कम न होने वाली घटनाओं को समाज से भी पूरा-पूरा समर्थन मिलता है, वहीं उसके विपरीत हमारे देश में किसी गैर-ज़िम्मेदार व्यक्ति ने भी हिंसा को जायज़ नहीं ठहराया है. ब्रिटिश समाचारपत्र 'द गार्जियन' के अनुसार वर्ष 2016 के दौरान अमेरिका में गोरे रंगभेदी लोगों द्वारा 258 कालों की हत्या की गई, जबकि ब्राज़ील में भी भीड़ द्वारा हिंसा की कम से कम 173 वारदात हुईं. इतना ही नहीं, मिसीसिपी के सांसद कार्ल ओलिवर ने संघ की प्रतिमा को नष्ट कर डालने की धमकियों के जवाब में मई, 2017 में फेसबुक पर उन लोगों को मार डालने का आह्वान किया, जो 'किताबें जलाते हैं, और ऐतिहासिक स्मारकों को नष्ट करते हैं...'

पश्चिमी मीडिया बेशक रंगभेद के खिलाफ खड़ा रहा है, लेकिन भारत में हुई भीड़ द्वारा हिंसा की घटनाओं पर जिस तरह 'वाशिंगटन पोस्ट' जैसे समाचारपत्रों ने बढ़ा-चढ़ाकर छापा, उससे साफ ज़ाहिर है कि वे जानते-बूझते बहुत-सी बातों को भुलाए बैठे हैं, या अनदेखा कर रहे हैं.

लेकिन यह संकट कहीं गहरा है और उथले तौर पर इसका विश्लेषण करने से हम किसी ठोस नतीजे पर नहीं पहुंच सकते. इसके दो अहम पहलू हैं, जिन्हें समझा जाना बेहद ज़रूरी है. एक, भारतीय समाज से सामंतवाद और रूढ़िवाद अब तक पूरी तरह नहीं निकल पाया है, तथा आधुनिकता और पूंजीवादी विकास के तमाम दावों के बावजूद ये दो बुराइयां अब भी जड़ें बनाए हुए हैं. राजनैतिक तथा कानूनी दावों के अलावा सामाजिक प्रयास भी ज़रूरी हैं. झारखंड और ओडिशा में हुई 'डायनों को मार डालने' की वारदात न सिर्फ असंवेदनशीलता दिखाती हैं, बल्कि यह भी ज़ाहिर करती हैं कि हमारा समाज रूढ़िवादी ताकतों से इंसानी ज़िन्दगी को बचाने में नाकाम रहा है. बिल्कुल इसी तरह, दलितों के खिलाफ होने वाली हिंसा की ज़्यादातर वारदात के पीछे 'बड़ी जाति वाली पहचान' का भ्रम बनाए रखने वाले सामंतवाद के बचे-खुचे अवशेष ही हैं, और इसमें इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता कि सत्ता में कौन-सा राजनैतिक दल बैठा है. पिछले दशकों में होने वाली संगठित सांप्रदायिक हिंसा अब इतिहास की बात बन चुकी है, लेकिन ऐसी घटनाओं से इंकार नहीं किया जा सकता, जो सांप्रदायिक रंग लिए हुए हों. यहीं आकर लेफ्ट-लिबरल अपने प्रभावशाली प्रचार कौशल का बखूबी इस्तेमाल करते हैं, और सभी षडयंत्रकारियों को अपनी कल्पनाओं में बसे 'हिन्दू दक्षिणपंथ', जिससे उनका आशय आरएसएस, बीजेपी तथा कुछ अन्य हिन्दू संगठन हैं, से जोड़ देते हैं, ताकि हिन्दुत्व को बदनाम किया जा सके. यहीं आकर एक और कारण भी बेहद अहम हो जाता है - जो है, लेफ्ट-लिबरल बुद्धिजीवियों की भूमिका...

भारतीय परिप्रेक्ष्य में प्रगतिशीलता तथा लेफ्ट-लिबरल का अर्थ होता है आरएसएस-विरोध की विषैली मानसिकता, और इन बुद्धिजीवियों की आज की पीढ़ी की इस मानसिकता के पीछे उनसे पहले मौजूद बुद्धिजीवी ही ज़िम्मेदार हैं, हालांकि तब और अब के विरोधियों में एक बहुत बड़ा अंतर है... अतीत में, लेफ्ट-लिबरलों के बीच भी ऐसे लोग मौजूद रहे हैं, जो स्व-समालोचना का अर्थ समझते थे. अब ऐसा कोई नहीं है. एक बेहद दिलचस्प उदाहरण है, जब वर्ष 1968 में वाम विचारधारा से प्रभावित कांग्रेसी नेता सुभद्रा जोशी के नेतृत्व वाली सांप्रदायिकता विरोधी समिति द्वारा आयोजित सांप्रदायिकता के विरुद्ध पहले सम्मेलन में मुख्य अतिथि जयप्रकाश नारायण ने सांप्रदायिकता को आरएसएस का पर्याय मानने वाले वक्ताओं द्वारा आरएसएस-विरोधी ज़हर उगलने पर आपत्ति दर्ज करते हुए बीच में दखल दिया था. 'आरएसएस के चरित्र' विषय पर इसी समिति द्वारा जनवरी, 1978 में आयोजित ऐसे ही एक अन्य सम्मेलन में किसी और ने नहीं, मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के सदस्य जहूर सिद्दीकी ने समाजवादी नेता रघु ठाकुर, जिन्होंने अल्पसंख्यकों के उत्पीड़न का आरोप लगाया था, द्वारा आरएसएस के खिलाफ लगाए ऊटपटांग आरोपों का विरोध किया था. जहूर सिद्दीकी ने दखल देते हुए कहा था, "एमरजेंसी के दौरान मुज़फ़्फ़रनगर, पीपली और तुर्कमान गेट पर कोई गोलवलकर नहीं था..."

बुद्धिजीवियों के बीच ईमानदारी का खात्मा होने के चलते दोहरे मानदंड मानसिकता में गहरे पैठते चले गए हैं. यही कारण है कि केरल में बूढ़े अभिभावक के सामने 26-वर्षीय सुजीत को पीट-पीटकर मार डालने, माल्दा में फैला सांप्रदायिक उन्माद, या बेंगलुरू में प्रशांत पुजारी की हत्या को लेकर समूचे लेफ्ट-लिबरल की अंतरात्मा नहीं जागी, क्योंकि सुजीत और प्रशांत का ताल्लुक आरएसएस से था, और माल्दा में पीड़ित हिन्दू थे. प्रत्येक समाज में धुर-दक्षिणपंथी और धुर-वामपंथी रहे हैं, लेकिन उन्हें मुख्यधारा के बुद्धिजीवियों से मान्यता नहीं मिला करती, लेकिन भारत इसका अपवाद है. यहां लेफ्ट-लिबरल धुर-वामपंथियों के प्रतीक नक्सलियों के पक्ष में खड़े होते हैं, और अपने प्रचार की ताकत से धुर-दक्षिणपंथियों को मुख्यधारा के बुद्धिजीवी के रूप में प्रस्तुत कर उन्हें मान्यता दिलवा देते हैं.

चाहे दक्षिणपंथी हों या वामपंथी, लैटिन अमेरिकी बुद्धिजीवियों के विपरीत भारतीय बुद्धिजीवी शांतिकाल में जनसाधारण और चुनाव काल में मतदाताओं को प्रभावित करने में नाकाम रहते हैं. हाल ही में, लेफ्ट-लिबरलों का भीड़ द्वारा हिंसा का विरोध करने वाला अभियान लंदन से लाहौर तक शहरों में पहुंचा. भारतीय राष्ट्रवादियों के खिलाफ खड़ी ताकतों से उनकी मेल-मुलाकात छिपी नहीं है. वर्ष 2014 के लोकसभा चुनाव के दौरान 'द न्यूयार्क टाइम्स' की संपादकीय टीम ने भारतीय मतदाताओं से नरेंद्र मोदी को खारिज करने की अपील की थी, और 'द गार्जियन' ने भारतीय तथा पश्चिमी लेफ्ट-लिबरलों की बीजेपी के खिलाफ संयुक्त अपील प्रकाशित की थी. क्षेत्रीय राष्ट्रवाद की वकालत करने वालों और सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के अस्तित्व को नकारने वालों ने अपने ही दावों को भी झूठा साबित कर दिया. वर्ष 2002 में तीस्ता सीतलवाड़ ने संयुक्त राष्ट्र में पाकिस्तानी शिष्टमंडल सदस्यों के साथ मिलकर विश्व हिन्दू परिषद के उस आवेदन का विरोध किया था, जिसमें उन्होंने उन्हें एनजीओ का दर्जा दिए जाने की मांग की थी.

दक्षिणपंथी और वामपंथी बुद्धिजीवियों के बीच संवाद का सर्वथा अभाव है, और इसका दोष वामपंथियों के हिस्से में जाता है. वे आरएसएस को अवैध मानकर चलते हैं, और उसे जानने की कोई कोशिश नहीं करते, क्योंकि वे पहले ही निष्कर्ष निकाले बैठे हैं कि वे फासीवादी और सांप्रदायिक हैं. अलग-अलग किस्म का पागलपन पैदा करने के लिए यह बहुत सुविधाजनक उपाय है, जैसा हम देखते भी आ रहे हैं. इसीलिए, टीवी चैनलों पर होने वाला संवाद कहीं भीतर असर नहीं करता, और साथ-साथ बैठे लोग भी एक-दूसरे से कतई अनजान ही रह जाते हैं. एक उदाहरण से समझा जा सकता है कि भारत में लेफ्ट-लिबरल कहां हैं. लैटिन अमेरिका में दक्षिणपंथ-वामपंथ के बीच की खाई ने वैचारिक अस्पृश्यता पैदा नहीं की थी. '80 के दशक में गार्सिया मार्केज़ और ऑक्टावियो पेज़ क्रमशः नए उभरते वाम तथा दक्षिणपंथी विचारों के संवाहक थे. दोनों एक दूसरे से कुल सात मील की दूरी पर रहा करते थे, और एक दूसरे के विरोधी थे, लेकिन दोनों ही एक दूसरे की बेहद प्रशंसा किया करते थे. बस, भारतीय बुद्धिजीवी वर्ग की वास्तविक चुनौती यही है...

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प्रोफेसर राकेश सिन्हा दिल्ली विश्वविद्यालय में एसोसिएट प्रोफेसर, तथा इंडिया पॉलिसी फाउंडेशन के मानद निदेशक (ऑनरेरी डायरेक्टर) हैं...

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण) : इस आलेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी विचार हैं. इस आलेख में दी गई किसी भी सूचना की सटीकता, संपूर्णता, व्यावहारिकता अथवा सच्चाई के प्रति NDTV उत्तरदायी नहीं है. इस आलेख में सभी सूचनाएं ज्यों की त्यों प्रस्तुत की गई हैं. इस आलेख में दी गई कोई भी सूचना अथवा तथ्य अथवा व्यक्त किए गए विचार NDTV के नहीं हैं, तथा NDTV उनके लिए किसी भी प्रकार से उत्तरदायी नहीं है.



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