NDTV Khabar

कर्नाटक के राज्‍यपाल के फैसले पर उठे सवाल

कांग्रेस का तर्क है कि सीधा नियम है कि जिसका बहुमत हो उसे बुलाया जाए. इसके बाद प्री पोल गठबंधन को और वो बहुमत साबित न कर पाए तो चुनाव बाद गठबंधन को.

 Share
ईमेल करें
टिप्पणियां
कर्नाटक के राज्‍यपाल के फैसले पर उठे सवाल

कर्नाटक के राज्‍यपाल वजुभाई वाला (फाइल फोटो)

सुप्रीम कोर्ट के रात भर जाग जाने से जो दिन दहाड़े हो रहा था उसके होने पर कोई आंच नहीं आई. पर यह क्या कम है कि सुप्रीम कोर्ट के जज साहिबान रात भर सरकार और विपक्ष का पक्ष सुनते रहे. ऐसे वक्त में जब कोई सुन ले इसकी तलाश में नेता नहीं जनता भी मारी मारी फिर रही है, देश की सर्वोच्च अदालत के सुन लेने से ही करार आ जाना चाहिए.

यह बड़ी बात है कि हमारी अदालतें रात भर जागती हैं. रात एक बजे तीन जजों की बेंच बनती है और 2 बज कर 10 मिनट पर सुनवाई शुरू होती है, साढ़े पांच बजे तक चलती रही. हमारे सहयोगी आशीष भार्गव और मनोरंजन भारती, उमाशंकर सिंह रात भर कवर करते रहे. कांग्रेस और जेडीएस की तरफ से अभिषेक मनु सिंघवी बहस कर रहे थे, सरकार की तरफ से एडिशनल सोलिसिटर जनरल तुषार मेहता और पूर्व अटॉर्नी जनरल मुकुल रोहतगी ने बहस की.

कांग्रेस का तर्क है कि सीधा नियम है कि जिसका बहुमत हो उसे बुलाया जाए. इसके बाद प्री पोल गठबंधन को और वो बहुमत साबित न कर पाए तो चुनाव बाद गठबंधन को. फिर चुनाव बाद के पास बहुमत न हो तब जाकर सबसे बड़ी पार्टी या समूह को बुलाया जाए न कि अकेली सबसे बड़ी पार्टी को. रामेश्वर प्रसाद जजमेंट और सरकारिया कमिशन ने यही व्यवस्था दी गई है. सुप्रीम कोर्ट ने भी इसे 2017 के फैसले में सही ठहराया है.

कोर्ट ने कहा है कि सरकारिया रिपोर्ट में भी बहुमत वाली एकल पार्टी को बुलाने की बात कही गई है जिसके पास सरकार बनाने के लिए बहुमत हो. बीजेपी लार्जेस्ट पार्टी है मगर बहुमत नहीं है. अदालत यह जानना चाहती थी कि बीजेपी ने किस तरीके से बहुमत साबित करने की बात की है. इसलिए वह चिट्ठी देखना चाहती है. सिंघवी गोवा, मणिपुर का उदाहरण देते रहे जहां चुनाव बाद के गठबंधन को सरकार बनाने का मौका मिला था, सिंगल लार्जेस्ट पार्टी को नहीं. सिंघवी चाहते थे कि अदालत दखल दे और शपथ ग्रहण रोक दे. लेकिन बीजेपी के दो विधायकों के वकील ने कहा कि अदालत जांच नहीं कर सकती कि स्थायी सरकार बनाने को लेकर राज्यपाल किस पार्टी को लेकर संतुष्ट हैं. मुकुल रोहतगी ने कहा कि शपथ ले लेने से आसमान नहीं टूट पड़ेगा. रात के वक्त याचिका पर सुनवाई ठीक नहीं है. जस्टिस बोर्डे ने पूछा कि क्या मंत्रिमंडल से पहले विधायकों को शपथ दिलाई जा सकती है. तब अटॉर्नी जनरल का जवाब था कि ऐसी कोई परंपरा नहीं है. पहले मुख्यमंत्री और मंत्रिमंडल शपथ लेते हैं. जज ने पूछा कि अगर कोई विधायक शपथ के पहले दल बदल ले तो उस पर दलबदल कानून लागू होगा? एजी ने कहा कि शपथ से पहले दलबदल करने पर दलबदल विरोधी कानून लागू नहीं होगा.

तो शपथ की बेताबी इसलिए थी कि शपथ से पहले विधायकों से पाला बदलवा लिया जाए. कोर्ट ने पूछा कि कांग्रेस-जेडीएस ने 116 दस्तखत के साथ पत्र भेजे हैं तो एजी ने साफ कह दिया कि कई साइन फर्जी हैं. तो कोर्ट ने कहा कि राज्यपाल को वेरिफाई करना था फिर एजी ने कहा कि सदन में पता चल जाएगा. क्या राज्यपाल ने फर्जी दस्तखत की जांच की इस सवाल का क्या जवाब दिया गया. शायद नहीं. सरकार की दलील थी कि राज्यपाल के फैसलों को कोर्ट रिव्यू नहीं कर सकता है. जबकि तमाम अदालती फैसलों में राज्यपाल से लेकर राष्ट्रपित के फैसलों का अदालत ने समीक्षा की है, पलट भी दिया है और सही भी ठहराया है. उत्तराखंड में राष्ट्रपति शासन लगाने के मामले में नैनिताल हाईकोर्ट ने कहा था राष्ट्रपति राजा नहीं होता है. 20 अप्रैल, 2016 को चीफ जस्टिस के एम जोसेफ और जस्टिस बी के बिष्ट ने सुनवाई के दौरान टिप्पणी की थी कि 'लोग ग़लत फ़ैसले ले सकते हैं चाहे वो राष्ट्रपति हों या जज... ये कोई राजा का फ़ैसला नहीं है जिसकी न्यायिक समीक्षा ना हो सकती हो.'

जब राष्ट्रपति राजा नहीं हैं, उनके फैसले की न्यायिक समीक्षा नहीं हो सकती है और इस फैसले को सुप्रीम कोर्ट ने भी सही माना. प्रणब मुखर्जी के इस फैसले की समीक्षा हुई, राष्ट्रति शासन हटा और हरीश रावत ने सदन के पटल पर बहुमत साबित किया. जबकि इस बहस के दौरान अरुण जेटली ने एक ब्लॉग लिखा था जिसे लेकर बीजेपी का हर नेता राष्ट्रपति शासन का बचाव करता था. जेटली ने लिखा था कि 'राष्ट्रपति शासन लगाने का फ़ैसला राष्ट्रपति ने अपनी राजनीतिक समझदारी और अपने सारे रखे गए दस्तावेज़ों के आधार पर लिया.'

अरुणाचल प्रदेश और उत्तराखंड में राष्ट्रपति शासन के बचाव में बीजेपी के तमाम कानूनविदों ने जितने भी तर्क दिए थे, सुप्रीम कोर्ट में एक भी नहीं टिके. फिर भी सुप्रीम कोर्ट मे बीजेपी के दो विधायकों की तरफ से वकील नए सिरे से बचाव करते रहे. रोहतगी बीजेपी के तीन विधायकों की तरफ से बहस कर रहे थे. रोहतगी ने दलील दी कि राज्यपाल को उनके संवैधानिक दायित्व का पालन करने से नहीं रोका जा सकता है. राष्ट्रपति को जजों की नियुक्ति के वारंट जारी करने से नहीं रोका जा सकता है. राज्यपाल का काम है शपथ दिलाना, सही या ग़लत.

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि हम शपथ लेने से नहीं रोक सकते हैं लेकिन ये कोर्ट के फैसले के अधीन होगा. अब सुनवाई शुक्रवार को सुबह साढ़े दस बजे होगी. सारी नज़रें सुप्रीम कोर्ट पर होंगी.

बी एस येदियुरप्पा ने सुबह नौ बजे के करीब शपथ ले ली. जिस जीत को प्रधानमंत्री और अमित शाह ऐतिहासिक बता रहे थे वो इस इतिहास के फ्रेम में नहीं थे. येदियुरप्‍पा अकेले शपथ ले रहे थे. बीजेपी के नेता जोश से भरे हुए ज़रूर थे मगर वो बात नहीं थी जब पहली बार कर्नाटक में बीजेपी की सरकार बनी थी तब पार्टी के बड़े बड़े नेता सभी दिशाओं से वहां पहुंचे थे. बीजेपी के नेता श्रीरामुलु ने कहा कि बहुमत साबित कर दें, समान विचारधारा वालों से बात करेंगे और मैजिक नंबर साबित कर दें. दिन भर बीजेपी के नेताओं की तरफ से प्रेस कांफ्रेंस होती रही. सरकार बनते ही कर्नाटक खुफिया विभाग के मुखिया को बदल दिया गया है. चार आईपीएस का तबादला भी किया गया है.

कर्नाटक में येदियुरप्‍पा शपथ ले रहे थे दूसरी तरफ कांग्रेस और जेडीएस के नेता विधानसभा के बाहर गांधी की प्रतिमा के सामने धरने पर बैठने की तैयारी कर रहे थे. क्या कांग्रेस और जेडीएस अपने खेमे के 8 विधायकों को शपथ से पहले बीजेपी की तरफ जाने या बहुमत परीक्षण के समय गैर हाज़िर होने से रोक पाएंगे, यह खेल कैसे खेला जाएगा, बताने की ज़रूरत नहीं है.

गुलाम नबी आज़ाद, मल्लिकार्जुन खड़गे, सिद्धारमैया, जी परमेश्वरन धरने पर बैठ गए. बाद में कुमारस्वामी और एच डी देवेगौड़ा भी धरने में शामिल हो गए. दो घंटे तक इनका प्रदर्शन चला और उसके बाद कांग्रेस विधायकों को रिसॉर्ट में और जेडीएस विधायकों को होटल में ले जाया गया. एक निर्दलीय विधायक आर शंकर कांग्रेस खेमे आ गए जिनके बारे में बीजेपी ने दावा किया था कि शंकर उनके साथ हैं. खबर है कि कांग्रेस दो विधायक लापता हैं. मीडिया में इनके बारे में तरह तरह की खबरे हैं.

आज के दिन अतीत के सभी दलों के हुए उन सभी राज्यपालों को याद कीजिए जिन्होंने संविधान की धज्जियां न उड़ाईं होती तो आज कोई भी पक्ष खुद का बचाव नहीं कर सकता. इसीलिए बुधवार रात जब रविशंकर प्रसाद प्रेस कांफ्रेंस करने आए तो सबसे पहले उन्होंने अतीत के राज्यपालों को याद किया. बेशक वे कांग्रेस के दौर के रहे होंगे मगर रिकॉर्ड हर दल की सरकारों का ऐसा ही रहा है.

उधर इस घटना ने विपक्ष को भी सक्रिय कर दिया है. बिहार से तेजस्वी यादव काफी सक्रिय हैं. तेजस्वी ने विपक्ष को एकजुट होने का आह्वान किया और कहा कि उनकी पार्टी बिहार में शुक्रवार को एक दिन का धरना करेगी और विपक्ष के सारे नेता बंगलुरू पहुंचें और वहां सड़क पर उतरें. तेजस्वी यादव इसके अलावा बिहार का भी मसला उठा रहे हैं कि उनके पास सबसे अधिक विधायक थे और हैं तब क्यों नहीं मौका मिला और अब उन्हें भी मौका मिलना चाहिए.

गोवा से भी खबरें आ रही हैं कि कांग्रसे सबसे बड़ी पाटच् होने के नेता राज्यपाल से मिलकर दावा करने जा रही है. अगर यही तर्क सुप्रीम है कि सबसे बड़ी पार्टी को पहले मौका मिलना चाहिए तो वहां सरकार बन जाने के कई महीने बाद कांग्रेस वही कर रही है जो आज कर्नाटक में बीजेपी कर रही है.

इस मुद्दे पर दिल्ली के विजय चौक पर यशवंत सिन्हा भी धरने पर बैठ गए. यशवन्त सिन्हा ने 16 मई को ट्वीट कर दिया था कि कर्नाटक में जो हुआ है उससे देखकर यही लगता है कि अच्छा हुआ वे अब बीजेपी में नहीं हैं. यशंवत सिन्हा के साथ राजद सांसद मनोझ झा भी हैं. दिल्ली के तिमारपुर से विधायक और स्वराज अभियान के संस्थापक सदस्य पंकज पुष्कर सहित कई लोग यहां धरने पर बैठे.

टिप्पणियां
गोवा में कांग्रेस सबसे बड़ी पार्टी थी मगर वहां सरकार बीजेपी की बनी. वहां बीजेपी के मुख्यमंत्री दो-दो चुनाव क्षेत्र से हार गए. छह मंत्री हार गए थे. इस हिसाब से जनादेश बीजेपी के खिलाफ हुआ. तब बीजेपी ने उस गोवा फार्वर्ड पार्टी के विजय सरदेसाई को मिला लिया जो बीजेपी मुक्त गोवा का नारा देकर चुनाव लड़ रहे थे. नतीजा आते ही वे बीजेपी से मिल गए और उनके तीनों विधायक मंत्री बन गए. सौ फीसदी दलबदल, सौ फीसदी मंत्रिलमंडल. राजनीति में अपना नहीं दूसरे का कहा जाता है इसलिए कर्नाटक में बीजेपी कह रही है कि कांग्रेस ने जेडीएस के खिलाफ चुनाव लड़ा तो उसका गठबंधन अनैतिक है. इस पर गोवा के दौरान अरुण जेटली का ट्विट और ब्लाग काफी चर्चा में है. तब जेटली ने लिखा था कि कांग्रेस ने बीजेपी पर गोवा के जनादेश को चोरी करने का आरोप लगाया है. सुप्रीम कोर्ट में उसकी याचिका नाकाम रही... कांग्रेस ने लोकसभा में भी मुद्दे उठाने की कोशिश की. लेकिन तथ्य क्या कहते हैं? गोवा विधानसभा चुनावों में बेनतीजा जनादेश आया. एक त्रिशंकु विधानसभा बनी. ऐसी स्थिति में पोस्ट पोल एलायंस होंगे ही. बीजेपी एक गठबंधन बनाने में कामयाब रही और राज्यपाल के सामने 40 में से 21 विधायकों का समर्थन पेश किया.

तेजस्वी यादव भी अड़ गए हैं कि अगर सिंगल लार्जेस्ट वाली बात सही है तो उन्हें राज्यपाल सरकार बनाने का मौका दें. राजद ने बिहार के राज्यपाल और गोवा में कांग्रेस ने राज्यपाल से मिलने का समय मांगा है.


Hindi News से जुड़े अन्य अपडेट लगातार हासिल करने के लिए हमें फेसबुक और गूगल प्लस पर ज्वॉइन करें, ट्विटर पर फॉलो करे...

Advertisement