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सेमिनार में प्रोफेसरों की मौजूदगी से जुड़े सवाल और मीडिया की रिपोर्टिंग

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सेमिनार में प्रोफेसरों की मौजूदगी से जुड़े सवाल और मीडिया की रिपोर्टिंग

जोधपुर यूनिवर्सिटी में सेमिनार का आयोजन करने पर एबीवीपी ने जमकर हंगामा किया था....(फाइल फोटो)

जय नारायण व्यास जोधपुर विश्वविद्यालय की अंग्रेज़ी की प्रोफेसर डॉक्टर राजश्री राणावत के निलंबन पर राजस्थान उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति दिनेश मेहता की पीठ ने रोक लगा दी है. निलंबन के खिलाफ डॉक्टर राणावत की अर्जी सुनते हुए न्यायमूर्ति मेहता इससे हैरान थे कि विश्वविद्यालय किसी शिक्षक को किसी सेमिनार में किसी वक्ता को आमंत्रित करने भर के चलते कैसे निलंबित कर सकता है.

उम्मीद है कि जोधपुर विश्वविद्यालय अब डॉक्टर राणावत को बतौर अध्यापक उनका काम करने देगा. उच्च न्यायालय का यह आदेश सिर्फ डॉक्टर राणावत के लिए राहत नहीं है. हम सबके भी लिए है जो पिछले तीन वर्ष से इस तरह के हमलों को एक के बाद एक झेल रहे हैं और इनके शिकार सहकर्मियों के लिए समर्थन जुटाने के अभियान में लगे रहने को बाध्य हैं. लेकिन इस राहत के चलते चौकन्नापन छोड़ना इसलिए खतरनाक होगा कि अभी पूरी सुनवाई बाकी है. इसलिए यह राहत सचमुच सिर्फे एक राहत भर है, उससे ज्यादा कुछ नहीं.

डॉक्टर राणावत और प्रोफ़ेसर निवेदिता मेनन के खिलाफ पुलिस में शिकायतें पड़ी हुई हैं, जिन्हें अब तक एफआईआर में बदला नहीं जा सका है. ये शिकायतें भी विश्वविद्यालय ने की हैं. अलावा इसके कि उसकी सिंडिकेट ने राणावत को निलंबित किया. एक और समिति उनकी बर्खास्तगी पर काम करने के लिए बना दी गई. इससे समझा जा सकता है कि विश्वविद्यालय प्रशासन उनके खिलाफ कार्रवाई को लेकर कितना प्रतिबद्ध है! क्या उच्च न्यायालय के इस आदेश के बाद इस जोश में कुछ कमी आएगी?

इस प्रश्न पर विचार के साथ हमें यह देखना होगा कि इस न्यायालय के अलावा क्यों राणावत को कहीं और से राहत न मिल पाई, या उन्हें क्यों इस अन्याय के क्षण में किसी प्रकार के साथ का अनुभव न हुआ. आखिर उन्होंने बड़ी मेहनत से देश के नामी दिमागों को अपने परिसर में इकठ्ठा किया था अपने छात्रों और शिक्षकों के लिए. लेकिन उनमें से एक को बुलाने के जुर्म में जब उन पर हमला किया गया और उनका निलंबन हुआ, तो न तो छात्र उनके समर्थन में निकले और न उनके सहकर्मी ही उनके साथ खड़े हुए. अपने परिसर में इस अकेलेपन को झेलने के लिए बड़ी हिम्मत और धीरज और साथ ही क्षमाशीलता की ज़रूरत होती है. वह राणावत में है लेकिन इससे बाकी अपनी जिम्मेवारी से बरी तो नहीं हो जाते!

यह सिर्फ और सिर्फ राणावत का अपना मसला बन कर रहा गया. लेकिन जो एकाकीपन वे झेल रही हैं, कुछ वक्त पहले हरियाणा केंद्रीय विश्वविद्यालय की अंग्रेज़ी के अध्यापिका स्नेहसता मानव को उसका तीखा अनुभव है जब महाश्वेता देवी की कहानी का मंचन करने के बाद उन पर वही आरोप लगाकर हमला किया गया और विश्वविद्यालय ने उन्हें उसी तरह प्रताड़ित किया. यही तजुर्बा मोहनलाल सुखाड़िया विश्वविद्यालय की प्रोफेसर सुधा चौधरी का था.

इन सब पर हमला करने में हिंदी मीडिया अगुवाई कर रहा था. जिस कार्यक्रम में रिपोर्टर न हो, उसकी मनगढ़ंत रिपोर्टिंग करने के बाद जैसे स्थानीय अखबारों ने राणावत को भयानक अपराधी मानकर उनके खिलाफ अभियान छेड़ दिया. इसका ज़हरीलापन इससे समझा जा सकता है कि उनके निलंबन के बाद एक अखबार ने बाकायदा अपनी पीठ ठोंकी कि यह उसी के अभियान का नतीजा था! एक अखबार ने उनकी तस्वीर बलात्कारियों और गबन करके फरार मुजरिमों के साथ मुखपृष्ठ पर लगाई!

जोधपुर का स्थानीय समाज भी राणावत के समर्थन में सामने नहीं आया. आखिरकार वहां वकील, डॉक्टर, अध्यापक और दूसरे शिक्षित समुदाय के लोग होंगे ही.वे सब खामोश रहे. राजनीतिक दल भी चुप रहे.

राजस्थान में शिक्षा पर काम करने वाले संगठनों की कमी नहीं है. उन्हें यह अपना मसला नहीं लगा. इसका आशय यही है कि एक शिक्षक पूरी तरह से अकेला और अरक्षित है. दिल्ली जैसी जगह में तो ज़रा शोर शराबा हो जाता है लेकिन इस केंद्र के मुकाबले परिधि पर स्थित जगहों का अकेलापन दमघोंटू है. कस्बाईपन माहौल पर इस कदर हावी है कि अगर वहां राणावत जैसी कोई दुस्साहसी एक ‘महानगरीय’ संवेदना का स्पर्श भी ले आएं तो उसकी सज़ा उन्हें फौरन दे दी जाती है. यह माना जाता है कि उन्होंने सेमीनार, नाटक वगैरह करके बेकार ही आने लिए आफत मोल ली है. सरकारी आदेशों के पालन के लिए, मसलन, स्वच्छता अभियान या बिला नकद लेन-देन के लिए तो नुक्कड़ नाटक किए जा सकते हैं लेकिन बौद्धिक या सांस्कृतिक उद्देश्यों के लिए नहीं.

राणावत के लिए फिर राहत कहां है? न्यायालय पहली और अंतिम शरणस्थली की तरह सामने दिखता है. वह समाज के पूर्वग्रहों के प्रदूषण से मुक्त माना जाता है इसलिए लगता है कि वह निष्पक्ष ढंग से निर्णय कर पाएगा. लेकिन यह प्रक्रिया इतनी लंबी और थकाने वाली हो सकती है कि शिक्षक हार जाए!

अदालत के आदेश के बाद निश्चय ही राणावत को अपनी संस्था से गुपचुप फोन आ रहे होंगे. लोग कह रहे होंगे कि उनके साथ बहुत गलत हुआ था. क्या इससे राणावत को गुस्सा आ रहा होगा? या वे मुस्कुराकर रह जाएंगी क्योंकि वे यह समझती हैं कि हम सब एक औसतपन के शिकार हो गए है और वह औसतपन या मीडियोकृटी कायरता के अलावा और कुछ पैदा नहीं कर सकती.


अपूर्वानंद दिल्‍ली यूनिवर्सिटी में प्रोफेसर और टिप्‍पणीकार हैं...

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