संकट में भी अपराजेय सरकारी डॉक्टर और निजी अस्पतालों की खुलती पोल

कोरोना से आज दुनियाभर में सरकारी एजेंसियां ही मुकाबला कर रही हैं, कहीं भी कोई भी निजी संगठन योगदान देता नज़र नहीं आ रहा है. यही हाल अपने देश में भी है. कोरोना संक्रमण की पहचान से लेकर उपचार की बात हो या संदिग्ध मरीजों को अलग-थलग रखने की, हमेशा सेना और अर्द्धसैनिक बल ही सामने आए.

संकट में भी अपराजेय सरकारी डॉक्टर और निजी अस्पतालों की खुलती पोल

जैसे-जैसे कोरोना का कहर बढ़ता जा रहा है, कोरोना से लड़ने के लिए हमारी तैयारियों की कलई खुलती जा रही है. गनीमत है कि गिरते-पड़ते ही सही, पर सरकारी अमला इससे मुकाबला करता दिख रहा है, लेकिन हम मौजूदा बुनियादी ढांचे के दम पर इस महामारी का मुकाबला ज्यादा समय तक कैसे कर सकते हैं. निश्चित ही आने वाले दिनों के लिए इस तरह की महामारियों से जूझने के लिए कोई ठोस इंतजाम करना होगा. सबसे अहम तरीका यह है कि स्वास्थ्य्य सेवा की कमान पूरी तरह सरकार के जिम्मे हो. साफ है, हम स्वास्थ्य्य सेवा के लिए अमेंरिकी मॉडल के बजाय ब्रिटिश मॉडल अपनाएं, तभी लोगों को स्वास्थ्य्य सेवाएं मुहैया करवा पाएंगे और किसी भी महामारी का डटकर मुकाबला कर पाएंगे.

कोरोना से आज दुनियाभर में सरकारी एजेंसियां ही मुकाबला कर रही हैं, कहीं भी कोई भी निजी संगठन योगदान देता नज़र नहीं आ रहा है. यही हाल अपने देश में भी है. कोरोना संक्रमण की पहचान से लेकर उपचार की बात हो या संदिग्ध मरीजों को अलग-थलग रखने की, हमेशा सेना और अर्द्धसैनिक बल ही सामने आए. वैसे कोरोना को लेकर सरकारी अस्पतालों में जांच से लेकर इलाज तक मुफ्त हो रहा है, लेकिन जब निजी अस्पतालों को जांच का जिम्मा सौपा गया, तो वे 4,500 रुपये वसूलने लगे, जबकि कई डॉक्टरों की ओर से साफ तौर पर कहा गया था कि सबको जांच की ज़रूरत नहीं है. इसके बावजूद घबराहट में हर कोई जांच कराकर निश्चित हो जाना चाह रहा है. यहां जनसाधारण में बीमारी को लेकर डर इस कदर फैला हुआ है कि अगर रात में किसी को कोई परेशानी हो जाए और उसके पास जमापूंजी के नाम पर 10 लाख रुपये हो, तो वह रातभर में अस्पताल को दो-चार लाख रुपये देने में आनाकानी नहीं करेगा.

सेना की चिकित्सा सेवा के पूर्व प्रमुख लेफ्टिनेंट जनरल वेद चतुर्वेदी कहते हैं कि देश में छोटे-मोटे या फिर मोहल्ला क्लिनिक को निजी कंपनियों के हाथों में रहना चाहिए, लेकिन जहां तक बड़े अस्पतालों की बात है, तो वे सरकार की देखरेख में ही चलने चाहिए. उनका यह भी कहना है कि 'आयुष्मान भारत' जैसी स्वास्थ्य योजनाओं का ज्यादातर लाभ आम लोगों के बजाय निजी अस्पतालों को ही चला जाता है. सरकारी योजना के चक्कर में हर निजी अस्पताल टेस्ट की फीस दोगुना कर देते हैं और संबधित विभाग और अस्पताल की मिलीभगत से यह धंधा खूब फल-फूल रहा है. यही बात मेडिकल इंश्योरेंस में भी लागू होती है. आप किसी भी प्राइवेट अस्पताल में चले जाएं और एक ही बीमारी का कैश पेमेंट के ज़रिये इलाज कराएं या इंश्योरेंस के ज़रिये कराएं, आपको अंतर खुद पता चल जाएगा.

वैसे भी प्राइवेट कंपनी का मतलब मुनाफा या फायदा कमाना ही तो होता है. इसमें सेवाभाव या जिम्मेदारी वाली बात कहां से आएगी. बड़ी-बड़ी कंपनियां भी शायद ही अपने फायदे से आगे कुछ सोच पाएं. कल्पना कीजिए, अगर रेलवे निजी हाथों में होती, तो क्या रेलवे को 21 दिनों के लिए बंद करतीं या लोगों के मदद के लिए विशेष ट्रेन चलातीं. इतना ही नहीं, सरकारी अस्पताल के डॉक्टर अपनी जान की परवाह न कर मरीजों को ठीक करने में लगे है. ईरान के सरकारी अस्पतालों में मरीजों का इलाज करने के दौरान 20 से अधिक डॉक्टरों की मौत हो गई.

इतना ही नही, निजी कंपनियों को जहां कहीं भी धंधे में परेशानी नजर आती है, वे उसे छोड़कर आगे निकल जाती हैं. बिना वजह मुकदमेबाजी भी बहुत होती है. शायद यही वजह है कि फोर्टिस और मैक्स के मालिक अपने अस्पतालों को बेचकर आगे निकल गए. इससे बचने के लिए जनरल चतुर्वेदी कहते हैं कि यहां भी सेना की तरह मेंडिकल ट्रिब्युनल होना चाहिए, जो किसी सेवानिवृत्त न्यायाधीश की देखरेख में संचालित हो और बाकी मेडिकल प्रोफेशन से जुड़े डॉक्टर उसमें शामिल हों, तभी इस पेशे में सही बिजनेसमेन टिक पाएंगे.

भारत स्वास्थ्य सेवा के क्षेत्र में बांग्लादेश, चीन, भूटान और श्रीलंका समेत अपने कई पड़ोसी देशों से पीछे है. इसका खुलासा शोध एजेंसी 'लैंसेट' ने अपने 'ग्लोबल बर्डेन ऑफ डिज़ीज़' नामक अध्ययन में किया है. इसके अनुसार, भारत स्वास्थ्य देखभाल, गुणवत्ता व पहुंच के मामले में 195 देशों की सूची में 145वें स्थान पर है. विडम्बना है कि आजादी के सात दशक बाद भी हमारे देश में स्वास्थ्य सेवाओं में सुधार नहीं हो सका है.

दूसरी बात, हमारे देश में स्वास्थ्य सेवाएं अत्यधिक महंगी हैं, जो गरीबों की पहुंच से काफी दूर हो गई हैं. स्वास्थ्य, शिक्षा, भोजन व आवास जीवन की मूलभूत आवश्यकताएं हैं. गौरतलब है कि हमारे संविधान में इस बात का प्रावधान होते हुए भी कि नागरिकों को स्वास्थ्य व शिक्षा प्रदान करना हमारी प्राथमिकता है, हम एक राष्ट्र के रूप में इस लक्ष्य की प्राप्ति में असफल रहे हैं. स्वास्थ्य सेवाओं का निजीकरण जारी है, जिससे आम लोगों को परेशानी का सामना करना पड़ सकता है.

अब देश में किसी भी महामारी से निपटने के लिए एक ठोस तंत्र बनाने की ज़रूरत है. इसके लिए सेना से सीखने की ज़रूरत है. मसलन, अगर अचानक 10,000 लोग बीमार हो जाएं, तो सबके हाथ-पांव फूल जाएंगे, लेकिन सेना के सामने ऐसी चुनौती आ जाए, तो वह इसे आसानी से मैनेज कर लेगी.

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(राजीव रंजन TV इंडिया में एसोसिएट एडिटर (डिफेंस) हैं...)

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