राजीव रंजन की कलम से : सवाल एक मंदिर का नहीं है…

नई दिल्ली:

राजधानी दिल्ली के पटपड़गंज में एक मंदिर बन रहा है। बात इतनी सी होती तो न तो लिखने की जरूरत ही नहीं पड़ती, क्योंकि देशभर में मंदिर तो बनते ही रहते है। मगर ये मंदिर सरकारी ज़मीन पर बन रहा है। हर जगह ज्यादातर जगहों पर मंदिर या फिर मस्जिद सरकारी जमीन पर ही बनते नजर आते हैं। कुछ लोग पक्ष में होते हैं और कुछ विपक्ष में विरोध करने वालों की आवाज अक्सर अनसुनी कर दी जाती है।

मुद्दे की बात तो ये है कि पटपड़गंज के प्लॉट नंबर 44 के पास कृपाल सोसाइटी के लोग उस जमीन पर मंदिर बना रहे है जो उनकी है ही नहीं। हालांकि उनका दावा है ये कि उनकी जमीन है और वह इस पर जो चाहे कर सकते हैं। मगर इसे लेकर सोसायटी के बाहर के लोग इस आशंका में सतर्क हो गए हैं कि कहीं अवैध रूप से बन रहा यह मंदिर तनाव का कारण न बन जाए।

पिछले कुछ दिनों से ये मंदिर अचानक कृपाल सोसायटी से लगी सरकारी ज़मीन पर बनने लगा है। जब पूर्वी दिल्ली के पटपड़गंज की इस सोसायटी में हम पहुंचे तो कई तरह के सवाल हमीं से पूछे जाने लगे कि हमें किसने बताया कि यहां कोई मंदिर बन रहा है। उनका कहना है कि यहां पुराना मंदिर था और वे उसे फिर से बनवा रहे हैं। वे इस बात से भी इनकार कर रहे थे कि यह डीडीए यानि दिल्ली विकास प्राधिकरण की जमीन है। उनका कहना था तीस साल से वह जमीन उनकी कस्टडी में है और तब तो डीडीए ने इस पर कोई आवाज नहीं उठाई और अब हम जो चाहें सो करें।

लोग हमसे यहां तक कह रहे थे कि आप यहां आ कैसे गए और किससे पूछ कर आए। फिलहाल यहां तक पहुंचने का बस एक ही रास्ता है जो सोसाइटी के गेट से होकर ही जाता है। बाद में पता चला कि यहां तक पहुंचने का एक और रास्ता था, जिसे सोसायटी वालों ने बंद करवा दिया।

जब हम सोसायटी से बाहर के लोगों से मिले तो उनका कहना है कि यह ज़मीन सरकारी है। कृपाल सोसाइटी ने गलत तरीके से इस पर कब्जा कर रखा है।
 
इन लोगों को मंदिर के बनने से एतराज़ नहीं है। सरकारी ज़मीन पर कब्ज़े को लेकर शिकायत है। इस बात से भी कि यहां आने जाने के रास्ते को सोसाइटी वालों ने क्यों बंद करवाया।

इस संबंध में जब डीडीए के अधिकारियों से बात की गई तो उन्होंने भी माना कि सरकारी जमीन पर गैरकानूनी ढंग से मंदिर बन रहा है और इसका निर्माण रुकवाने के लिए दिल्ली पुलिस से शिकायत भी की गई है, लेकिन अभी तक कोई ठोस कार्रवाई नही हुई दिखती है। वहीं पुलिस का तर्क है कि अभी वह त्रिलोकपुरी में हुए दंगों को रोकने लगी है, बाद में इसे देखेगी।

इस बीच मंदिर का निर्माण कार्य ज़ोर शोर से चल रहा है। इससे सटे इलाके में झुग्गी भी है, जहां हर समुदाय के लोग रहते हैं। लोगों से बातचीत में वैसी कहानियां सामने आईं जो अक्सर तनावों के वक्त खुराक बन जाती हैं।

एक रिपोर्टर के तौर पर मुझे लगा कि आखिर दिल्ली में त्रिलोकपुरी या दूसरे राज्यों में तनाव तो छोटी ही बात से शुरू हुआ और बाद में जब आग भड़की तो उस पर काबू पाना काफी मुश्किल हो गया। वैसे ये जगह त्रिलोकपुरी से महज डेढ़ दो किलोमीटर पर है और चिंगारी फैलने में वक्त नहीं लगता।

पिछले साल सड़कों पर धार्मिक स्थलों के निर्माण पर रोक लगते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि सार्वजनिक सड़क किसी की संपत्ति नहीं है। हर किसी को सड़क से गुज़रने का हक़ है और इसे कोई मंदिर, मस्जिद, चर्च या गुरुद्वारा बनाकर या किसी बड़ी शख्सियत की प्रतिमा बनाकर रोका या बाधित नहीं किया जा सकता।

साल 2008 में मौजूदा प्रधानमंत्री और तब गुजरात के मुख्यमंत्री रहे नरेंद्र मोदी ने अहमदाबाद में सड़क में पड़ने वाले 90 ऐसे धार्मिक स्थल हटवा दिए थे, जिनमें ज्यादातर मंदिर थे। सवाल है क्या उनकी सरकार दिल्ली में भी सड़क या सरकारी जगहों पर बनने वाले धार्मिक स्थलों पर रोक लगाएगी।

 
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