राजीव रंजन की कलम से : जम्मू-कश्मीर में आतंकियों ने बदली फिदायीन हमलों की रणनीति

राजीव रंजन की कलम से : जम्मू-कश्मीर में आतंकियों ने बदली फिदायीन हमलों की रणनीति

नई दिल्ली:

करगिल युद्ध के बाद जम्मू-कश्मीर में शुरू हुए फिदायीन हमलों का रूप अब बदल गया है। यहां शुरुआत के फिदायीन हमलों में एक से दो आतंकी शामिल हुआ करते थे, अब उनकी संख्या बढ़ कर 4 से 6 तक हो गई है।

फिदायीन हमला करने वालों ने अब अपनी रणनीति को भी पूरी तरह से बदल लिया है। अब उनका मकसद सुरक्षाबलों को अधिक से अधिक नुकसान पहुंचाने के साथ ही ऐसा कुछ करने का है जो हमेशा पहली बार हो। यह उरी में आज हुए फिदायीन हमले तथा पिछले सप्ताह जम्मू के अरनिया में हुए हमलों से साबित होता है।

वैसे जुलाई 1999 में जब करगिल युद्ध समाप्त हुआ तो 6 अगस्त, 1999 को पहला फिदायीन हमला श्रीनगर के बदामीबाग़ आर्मी कैंप पर हुआ था। एक मात्र आतंकी ने फिदायीन की भूमिका निभाते हुए सैनिक शिविर के भीतर घुस कर हमला किया तो एक मेजर समेत तीन सैनिकों की मौत हो गई थी।

पहले फिदायीन हमले के 15 वर्षों के बाद फिदायीन हमलों में शामिल होने वालों की संख्या अब एक से बढ़ कर 6 तक पहुंच गई है। जबकि पिछले सप्ताह अरनिया में हुए फिदायीन हमले में चार आतंकी शामिल थे।

फिदायीन हमलों में सिर्फ फिदायीनों की संख्या ही नहीं बढ़ी है, बल्कि उनकी रणनीति भी बदल गई है। खास बात ये भी है कि फिदायीन में शामिल आतंकी कश्मीर के नहीं ज्यादातर विदेशी ही होते हैं।

पिछले 15 वर्षों के दौरान होने वाले सैकड़ों फिदायीन हमलों में अभी तक यही होता रहा था कि तीन से चार आतंकी सैनिक शिविर में अंधाधुंध गोलीबारी करते हुए घुसने की कोशिश करते थे और जितने लोग सामने आते थे, उन्हें ढेर कर देते थे।

उरी में हुए फिदायीन हमले में आतंकियों ने जो रणनीति अपनाई उसने सभी को चौंका दिया। उन्होंने दो ग्रुप में बंट कर हमला बोला। एक ग्रुप कैम्प में घुस गया और दूसरे ने उन सैनिकों को कैम्प के भीतर आने से रोके रखा जो दूसरे गुट को हमला करने से रोकना चाहते थे।

यही नहीं उरी में हुए फिदायीन हमले में पहली बार आतंकियों ने सैनिकों की बैरकों को भी आग लगा दी थी। आग लगने के कारण चार सैनिक जल कर मारे गए। यह पहला अवसर था कि फिदायीनों ने सोए हुए सैनिकों को जिन्दा जला दिया था। और तो और एक ने तो अपने शरीर में बम लगाकर खुद को उड़ा लिया।

एक हफ्ते में हुए दो बड़े फिदायीन हमलों का खास पहलू यह था कि दोनों ही हमलों में शामिल आतंकी अपने साथ रॉकेट लॉन्चर और मोर्टार जैसे हथियार लेकर आए थे और अपने साथ वे इतना गोला-बारूद लेकर आए थे, जो मुठभेड़ों को कई दिनों तक जारी रखने के लिए काफी थे।

यही नहीं इन दोनों फिदायीन हमलों से एक और बात सामने आई कि दोनों ही हमले सरहद के दो से चार किलोमीटर भीतर आकर हुए हैं। जबकि दोनों ही हमलों में शामिल फिदायीनों ने ताजा घुसपैठ की थी और फिर सुरक्षाबलों पर हमले कर सभी को चौंकाया था। आशंका है कि आने वाले दिनों में और कई ऐसे फिदायीन हमले हो सकते है।

 
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