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राकेश कुमार मालवीय : पनीर नहीं चाहिए, लेकिन प्याज़ और दाल मेरी ज़रूरत है, रहम करो...

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राकेश कुमार मालवीय : पनीर नहीं चाहिए, लेकिन प्याज़ और दाल मेरी ज़रूरत है, रहम करो...

प्रतीकात्‍मक तस्‍वीर...

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...तो क्या संत कबीर बाज़ार में खड़े होकर इसलिए सबकी खैर मांग रहे थे...? क्या उन्हें पता था कि एक दिन ऐसा आएगा, जब बाज़ार में आम आदमी 'दाल' तक खरीदने के लिए तरस जाएगा। क्या वह जानते थे कि कांदा-रोटी खाने वाले समाज की थाली से कांदा ही मुंह मोड़ लेगा... और क्या उन्हें इल्म था कि बाज़ार की शक्तियां एक दिन गरीब का गला दबाने पर उतारू हो जाएंगी और यह सब कुछ उन दिनों में होगा, जिन्हें हम 'अच्छे दिनों' के रूप में निरूपित करेंगे।
 
आज जब हम कबीर के बाज़ार में खड़ा होने और सबकी खैर मांगने की उनकी कवायद पर विचार करते हैं तो हमें डिजिटल, स्मार्ट और वैश्विक परिदृश्य में तरक्की करते भारत का चेहरा लाचार नजर आता है, जिसकी प्राथमिकता में सब कुछ है, सिवाय दाल रोटी और कांदा के।
 
हम सोच भी नहीं सकते थे कि गरीबों के लिए प्रोटीन का सबसे बड़ा जरिया दाल एक दिन 200 रुपये किलो बिकेगी, प्याज का इतिहास हम देख ही चुके हैं। प्याज ने सरकारों की छवियों को बिगाड़ने में अपनी भूमिका निभाई है, इसलिए उसकी लगातार 'वक्री चाल' को हमने अब अपनी नियति मान लिया, लेकिन अब दाल...
 
दाल की महंगाई के संदर्भ में तमाम विश्लेषण आ चुके हैं। उसके उत्पादन से लेकर भंडारण तक की कहानियां और चुनावी राज्यों में आयातित दाल को चुनावी दंगल बचाने के लिए भेज दिए जाने की ख़बरें भी हम हर वाजिब एंगल से छाप चुके हैं, लेकिन बड़ा सवाल यह है कि आखिर आम लोगों की ज़रूरत की चीजों पर ही सबसे बड़ा सुनियोजित हमला क्यों हो रहा है...?
 
क्या यह हर साल की कहानी नहीं बन रही कि एक वक्त के बाद प्याज की कीमतें हमारे बस के बाहर की हो जाएंगी, क्या हमारे नीतिनियंता आम लोगों की ज़रूरत की चीजों का सही लेखाजोखा, उत्पाद, मांग और आपूर्ति के आंकड़े नहीं रख सकते, या ऐसी परिस्थितियों में एक त्वरित योजना बनाकर राहत नहीं दे सकते। क्या हमें देश पर संकट केवल इसी रूप में दिखाई देता है कि पड़ोसी राज्य हमारी सीमाओं पर हमला कर देते हैं, लेकिन बाज़ार की निरीह ताकतें जब इस रूप में लोगों का खून कर देती हैं कि वह बहते हुए दिखाई भी नहीं देता, तब क्या हमें उसका दर्द महसूस होता है। शायद नहीं, इसलिए हर साल हम कुछ खास खाद्य पदार्थों, सब्जियों, अनाजों के महंगा होते जाने को चुपचाप देखते हैं और निर्लज्ज भाव से बयान जारी कर देते हैं कि अब तो नई फसल आने पर ही कीमतें नियंत्रण में आएंगी।
 
दरअसल दाल के दर्द को वही महसूस कर सकता है, जिसने एक वक्त की दाल किसी परचून की दुकान से खरीदी हो या किसी और को खरीदते हुए देखा हो। हां, यह उसी समाज के लोग हैं, जो दिनभर का गुजारा 25 या 32 रुपये से नीचे में कर लेते हैं और यदि इनके घर में कभी गलती से भी मौजूदा दौर में दाल बन भी गई तो वे सीधे गरीबी रेखा से ऊपर उठ जाते हैं। नहीं उठते तो वे लोग, जो कांदा-दाल-सब्जी जैसी चीजें उगाने का दुस्साहस करते हैं।
 
भयंकर समाज है हमारा और अजीब इसकी परिस्थितियां हैं। एक ओर इसके उत्पादन में लगे कर्ज से लदे लोग साल-दर-साल मरते जाते हैं, दूसरी ओर कुछ लोग इनके अभाव में मर जाते हैं। क्या आपको यह सूचना चौंकाती नहीं कि जिस दौर में प्याज 60 रुपये किलो बिक रहा है, ठीक उसी समय में मंडी से प्याज बेचकर घर लौटा किसान इसलिए ज़हर पीकर जान दे देता है, क्योंकि उसे मंडी में सही दाम नहीं मिले, और उतने पैसों से वह कर्ज चुकाने में नाकाबिल है। क्या इस समय की यह एक त्रासदी नहीं है कि किसान और किसानी के सवाल हमारे विमर्श से गायब हैं, जो सीधे तौर पर ऐसी वस्तुओं के उत्पादन से जुड़े हैं। क्यों इस बाज़ार में किसान खुद अपने उत्पाद की कीमत तय नहीं करता, उसकी क्या मजबूरियां हैं या बनाई गई हैं।
 
गोया पेट्रोल-डीजल जैसे उत्पादों को जब बाज़ार के हवाले कर दिया जाता है और अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में जब उनकी कीमतें किन्हीं भी कारणों से कम हो जाती हैं, तब बाज़ार राहत देने का अपना वादा पूरा क्यों नहीं करता...? कबीर का बाज़ार ऐसे लोगों के लिए क्यों दूसरे मापदंड अख्तियार कर लेता है। आपको यह बातें थोड़ी पुरानी लग सकती हैं, मनोज कुमार की देशभक्ति फिल्म की तरह ही, लेकिन बार-बार की घटनाओं और परिस्थितियों से यह लगता है कि कालाबाज़ारी जैसे शब्द डिक्शनरी से विलोपित नहीं हुए हैं, बल्कि वे नए-नए पर्यायों के साथ हमारे सामने ललचाई नजरों से हाजिर हो रहे हैं, बाज़ार को अपने मनमुताबिक चलाने वाले उनके नए अर्थ और रचनाएं गढ़ रहे हैं। यह शक अब भरोसे में तब्दील होता जा रहा है। जैसे-जैसे दाल और उस जैसी चीजें और महंगी होंगी, यह वैसे-वैसे और बढ़ता जाएगा।
 
एक और बात साफ करना चाहता हूं और इस ब्लॉग को खत्म करते-करते एक सूचना देना चाहता हूं। पहला यह कि मैं बाज़ार के खिलाफ नहीं हूं। कबीर की तरह मैं भी बाज़ार में खड़ा होना चाहता हूं, लेकिन तब, जब वह क्रूर व्यवहार नहीं करे... कम से कम जीवन जीने के संसाधनों के साथ नहीं। ठीक है, मुझे पनीर नहीं चाहिए, मेरी तरह करोड़ों लोग भी उसके बिना जी लेंगे, लेकिन कांदा रोटी और दाल मेरी ज़रूरतें हैं, रहम करो।
 
...और सूचना यह है कि मध्य प्रदेश में आग लगने पर कुआं खोद लिया गया है। रातों-रात दाल नियंत्रण एक्ट बनाने की तैयारी हो गई है। चलो, सरकार ने माना तो कि कहीं कुछ गड़बड़ है। वह इसलिए नहीं कि उत्पादन घट गया है, बल्कि इसलिए कि पूरा उत्पादन कहीं एक जगह है। उम्मीद कर सकते हैं, 'अच्छे दिनों' में कुछ अच्छा ज़रूर होगा, क्योंकि यह तो अब साबित हो ही गया है कि हिन्दुस्तान दाल रोटी से ज़्यादा उम्मीद खाकर जी लेता है।

(राकेश कुमार मालवीय एनएफआई के फेलो हैं, और सामाजिक मुद्दों पर शोधरत हैं)

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण) : इस आलेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी विचार हैं। इस आलेख में दी गई किसी भी सूचना की सटीकता, संपूर्णता, व्यावहारिकता अथवा सच्चाई के प्रति एनडीटीवी उत्तरदायी नहीं है। इस आलेख में सभी सूचनाएं ज्यों की त्यों प्रस्तुत की गई हैं। इस आलेख में दी गई कोई भी सूचना अथवा तथ्य अथवा व्यक्त किए गए विचार एनडीटीवी के नहीं हैं, तथा एनडीटीवी उनके लिए किसी भी प्रकार से उत्तरदायी नहीं है।




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