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अब भी अधूरा है एक शि‍क्षक का 'दिवास्वप्न'... जानते हैं यह क्या है?

इस दौर में सवाल पूछने का सबसे बड़ा संकट है, इसकी बुनि‍याद में ही हमारी शि‍क्षा प्रणाली है, जि‍सके बारे में बात करते-करते प्रोफेसर यशपाल हाल ही में गुजर गए.

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अब भी अधूरा है एक शि‍क्षक का 'दिवास्वप्न'... जानते हैं यह क्या है?

प्रतीकात्मक फोटो

आज हमारी पाठशाला का सम्मेलन था. परीक्षा के बाद हर साल ऐसा सम्मेलन होता है जिसमें जो विद्यार्थी अच्छे नंबरों से पास होते हैं, उन्हें आज के दिन इनाम दिए जाते हैं. सम्मेलन में पूरा गांव शामिल होता है. साहब ने यह कार्यक्रम बनाने का काम मुझे सौंपा, मैंने यह काम अपने विद्यार्थियों को सौंप दिया. जो कुछ किया था, मेरी सूचना और सलाह से उन्होंने किया था.. 

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पहले डंडों की ताल पर रास क्रीड़ा हुई. आधा घंटे तक उन्होंने समा बांध दिया. फिर शर्तों के खेल चले, दौड़ाने की शर्त, तीन पैर की शर्त, कुर्सी की शर्त, लंगड़ी चाल की शर्त. लोग एकटक खेल देखते रहे. खेल खत्म होने पर मूक अनुकरण का अभिनय हुआ. कोई गांव के सेठजी, शिक्षाधिकारी, फौजदार, देश के नेताओं की सुंदर नकल करके दिखा गया. इसके बाद विद्यार्थी अपने बनाए हुए चित्र ले आए, और झुक-झुक कर हर एक सज्जन को बारी-बारी से दिखाने लगे. सारा भवन विद्यार्थियों के चित्रों को देखने में तल्लीन हो गया. अंतिम कार्य विद्यार्थियों को पारितोषिक वितरण का था. इसे भी गिजुभाई बधेका अपने दिवास्वप्न के अनुरूप स्कूल में पुस्तकालय के लिए खर्च करने में सफल रहे.

शिक्षक दिवस के मौके पर आप 85 पेज की एक छोटी सी किताब को पढ़कर इतना सब कुछ हासिल कर सकते हैं जो न केवल आपकी कक्षाओं में अपितु जीवन में बड़े रूप में काम आ सकता है क्योंकि दिवास्वप्न नाम की यह किताब केवल शिक्षा ही नहीं बच्चों की एक ऐसी दुनिया का सपना दिखाती है, जहां बच्चे पूरी स्वतंत्रता से, पूरी रचनात्मकता से, पूरे मजे से, उनके अपने तरीके से जीते हैं. इस कि‍ताब को लि‍खे हुए 85 साल का लंबा वक्‍त गुजर गया, पर हम ऐसे क्‍लासरूम नहीं गढ़ पाए जि‍सकी कोशि‍श को उन्‍होंने साकार करके दि‍खाया था. वह दुनि‍या अब भी बच्‍चों की दुनि‍या नहीं है जो बच्‍चों की स्‍वाभावि‍क अभि‍व्‍यि‍क्‍त को सामने लाती थी जि‍समें बच्‍चे नि‍संकोच सवाल पूछ पाते थे. इस दौर में सवाल पूछने का सबसे बड़ा संकट है, इसकी बुनि‍याद में ही हमारी शि‍क्षा प्रणाली है, जि‍सके बारे में बात करते-करते प्रोफेसर यशपाल हाल ही में गुजर गए. यह संकट नया नहीं है, पुराना है, गिजुभाई की ही एक रचना में देखिए.


जब तक बालक घरों में मार खाते हैं,
और विद्यालयों में गालियां खाते हैं, 
तब तक मुझे चैन कैसे पड़े?
जब तक बालकों के लिए पाठशालाएं, वाचनालय, 
बाग-बगीच और क्रीडांगन न बने, 
तब तक मुझे चैन कैसे पड़े?
जब तक बालकों को प्रेम और सम्मान नहीं मिलता 
तब तक मुझे चैन कैसे पड़े?
आखिर बच्चों के लिए बेचैन होने वाला यह शख्स गिजुभाई है कौन, और क्या है उसका दिवास्वप्न?

गिजुभाई पेशे से वकील थे. 1885 में जन्मे. महात्मा गांधी की तरह ही दक्षिण अफ्रीका गए, लौटे, फि‍र वकालत शुरू की. बेटे की पढ़ाई का जि‍म्‍मा मि‍ला तो उस जमाने की शिक्षा पद्धति का अध्ययन किया, जोकि आज की रट्टामार और छड़ीमार पद्धति से कोई जुदा नहीं रही. तब भी गुरूजी मारे धम-धम, विद्या आए छम-छम का सिद्धांत चला करता होगा. देश में शि‍क्षा का अधि‍कार कानून आने के बाद अब इसकी मनाही है, पर कौन यह दावा करेगा कि बिना मारे अब भी क्लासरूम चलते हैं, हां तौर-तरीका जरूर बदल गया.

गिजुभाई बधेका ने इसी तौर-तरीके को बदलने की कोशिश की. इस लेख का पहला पैरा उनकी इसी कोशिश की सफलता को बताता है, कैसे उन्‍होंने एक ही स्‍कूल में एक कक्षा को अपने नवाचारों से बदलने का काम सहज रूप से कर लि‍या। कैसे अपने बच्‍चों के दि‍लों मे जगह बनाकर सबसे अच्‍छे शि‍क्षक बन गए.

तो बच्चे कैसे शिक्षकों को पसंद करते हैं, याद कीजिए, आपके जीवन में जो शिक्षक आए, उनमें सबसे अच्छे शिक्षक कौन थे?

यह दिन निश्चित रूप से सभी शिक्षकों के सम्मान का है, उनका सम्मान समाज ने सदैव किया ही, है और होता रहेगा, लेकिन यह भी उतना ही सत्य है कि बच्चों की दुनिया गढ़ने में माता—पिता के साथ शिक्षकों की भूमिका सबसे अधि‍क महत्वपूर्ण है, पर वह अब भी वैसी नहीं बन पाई है, जैसी होनी चाहिए। आखिर क्यों बच्चों का शिक्षकों और क्लासरूम के चेहरे अब भी भयभीत करने वाले लगते हैं?

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क्यों गिजुभाई की तरह हिम्मत करने वाले शिक्षक स्कूल-स्कूल नहीं मिलते? क्यों कहानियां सुनाने के लिए सरकारों को विशेष आयोजन करने पढ़ते हैं,  यह तो स्कूली शिक्षा का एक सामान्य भाग होना चाहिए. क्यों खेल-खिलौनों को सीखने-सिखाने का माध्यम नहीं बनाया जा सका है? क्यों वही पुस्तकें पढ़ने को बच्चे मजबूर हैं, और क्यों नहीं पुस्तकालयों के माध्यम से पूरे संसार को बच्चों के लिए खोल दिया जाता? रंगमंच आखिर क्यों एक बेहतर नागरिक बनाने का मंच नहीं हो सकता, क्यों देश के हर स्कूल में एक ही कविता रटाई जाती है, बच्‍चे अपने आसपास के लोकगीत-परंपराओं से क्‍यों कट चुके हैं?

यह सवाल हमसे किसलिए, यह तो शिक्षा नीति बनाने वालों का काम होना चाहिए.

गिजुभाई शिक्षा नीति के कोई निर्माता नहीं थे, वह एक सामान्य शिक्षक के रूप में यह सब प्रयोग केवल एक सत्र में बेहद आसानी से कर जाते हैं, तो यह प्रयोग बढ़कर लाखों में क्यों नहीं हो जाते. इस वक्त में यह तय हो जाना चाहिए कि हम कैसे स्कूल और कैसे शिक्षक चाहते हैं, इसलिए कि बच्चों की दुनिया तो अब और भी नाजुक हो चली है, जो मोबाइल गेम्स की तकनीक में अपनी जिंदगी को दांव पर लगा देती है, ऐसे में उनको तर्क करना सिखाना, अपना अच्छा बुरा-समझना, अपने आसपास की दुनिया को बेहतर तरीके से जानना बेहद जरूरी है, और यह सब काम केवल एक शिक्षक ही कर सकता है. शिक्षकों की जिम्मेदारी अब पहले से बहुत बढ़ गई है.
 
देश का हर शिक्षक अपने विद्यार्थी को बेहतर देने की कोशि‍श करता है, लेकिन चुनौतियों भरी इस दुनिया को और बेहतर चाहिए.
  
अब सवाल यह है कि अच्‍छे शि‍क्षकों के लि‍ए और उनको अपने मन का काम करने के लि‍ए सि‍स्‍टम उनको कि‍तनी छूट देता है गि‍जुभाई यह सब नहीं कर पाते, यदि उनको सि‍स्‍टम का सहयोग नहीं मि‍ल पाता. अब जबकि पूरा ध्‍यान भी बेहतर नागरि‍क बनाने की बजाय पढ़-लि‍ख कर अंति‍म रूप से नौकरी पाने पर धर दि‍या जाए, तो शि‍क्षक भी क्‍या करें. ति‍सपर सरकारी बढ़ी बेशर्मी से शि‍क्षक दि‍वस से महीना भर पहले लोकसभा में यह आंकड़ा पेश कर दे कि देश के प्राथमि‍क स्‍कूलों में इस स्‍वीक़त में से 9 लाख पद रि‍क्‍त ही पड़े हैं, तब तो यह दुनि‍या बनने से रही.

इस नि‍राशा भरे माहौल में भी गि‍जुभाई की यह लाइनें उम्‍मीद की नयी कि‍रणें जगाती हैं, गौर कीजि‍एगा. भाईयों, हम अपनी पाठशाला में इससे भी अधिक काम कर सकते हैं. इतना काम कर सकते हैं कि वर्तमान शिक्षा प्रणाली रूप ही बदल जाए, कायापलट ही हो जाए लेकिन बात यह है कि इसके लिए काम करने वालों की जरूरत है. दुनिया की आज जो सूरत है, वह पहले नहीं थी. सूरत बदलने का यह काम मनुष्यों ने ही तो किया है न.

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राकेश कुमार मालवीय एनएफआई के पूर्व फेलो हैं, और सामाजिक सरोकार के मसलों पर शोधरत हैं...

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