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राकेश कुमार मालवीय : प्रसव को बीमारी, गर्भवती 'मां' को मरीज बना दिया है व्यवस्था ने

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राकेश कुमार मालवीय : प्रसव को बीमारी, गर्भवती 'मां' को मरीज बना दिया है व्यवस्था ने

कुछ सूचनाएं आपके सामने रखना चाहता हूं। मध्य प्रदेश के देवास जिले की एक महिला का एक गैर-सरकारी अस्पताल में 17 लाख रुपये का बिल बना। उसे प्रसव के बाद की जटिलताओं के चलते अस्पताल में भर्ती रखा गया। जिस दिन उसकी मौत हुई, तब तक उसके इलाज का बिल इस डरावने आंकड़े तक पहुंच चुका था। इंदौर के स्वास्थ्य कार्यकर्ता अब कोर्ट में इस मामले की लड़ाई लड़ रहे हैं।

दूसरी सूचना फिर इंदौर से ही। यहां के एक बड़े और नामी अस्पताल ने अपने यहां होने वाले प्रसव के लिए एक ही पैकेज जारी कर दिया है। मसलन जब आप यहां प्रसव सुविधा लेना चाहें तो भले ही वह ऑपरेशन से हो अथवा सामान्य तरीके से, उसके लिए अस्पताल एक ही जैसा शुल्क लेगा।

अब सरकारी जरिये से कुछ आंकड़े प्रस्तुत हैं। मध्य प्रदेश स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण विभाग का साल 2014-15 का हेल्थ बुलेटिन कहता है कि मध्य प्रदेश में अब लगभग 90 प्रतिशत प्रसव सरकारी अथवा गैर-सरकारी अस्पतालों में हो रहे हैं। इसी बुलेटिन के मुताबिक सरकारी अस्पतालों में जाने वाली कुल महिलाओं में पांच प्रतिशत महिलाओं का ऑपरेशन के जरिये प्रसव हो रहा है, जबकि गैर-सरकारी अस्पतालों में जाने वाली महिलाओं में 40 प्रतिशत महिलाओं का प्रसव ऑपरेशन के जरिये हो रहा है। यह आंकड़े चौंकाते हैं, क्योंकि गैर-सरकारी और सरकारी अस्पतालों में सीजेरियन प्रसव का जो अंतर है, वह सात गुणा का है।


यह स्थिति उस लिहाज से चिंतनीय है कि गैर-सरकारी अस्पताल तथाकथित रूप से बेहतर होने की छवि बनाते हैं, और यहां जाने वाले लोग पहले सप्ताह से मां और शिशु की देखभाल में लग जाते हैं। आखिर क्या कारण है कि बेहतर सुविधाओं और संसाधनों का गाना गाने वाले ये अस्पताल सामान्य प्रसव के मोर्चे पर अपनी बदहाल व्यवस्थाओं के लिए बदनाम माने जाने वाले सरकारी अस्पतालों से इस कदर पिछड़ जाते हैं। आंकड़ों की रोशनी में यह सवाल बार-बार मन में आता है कि क्या वाकई मातृत्व निभाने की यह सामान्य प्रक्रिया इतनी जटिल है, थी अथवा बनाई जा रही है।

विश्व स्वास्थ्य संगठन कहता है कि कुल होने वाले प्रसवों में 10 प्रतिशत तक जटिलताओं को देखते हुए ऑपरेशन के जरिये हो सकते हैं। मध्य प्रदेश स्वास्थ्य विभाग के आंकड़े जो तस्वीर दिखाते हैं, वह इस मानक से तीन गुणा अधिक है। इस नजरिये से होना तो यह चाहिए कि स्वास्थ्य विभाग और सरकार इस स्थिति पर चेते, संज्ञान ले और इस बात की पड़ताल करे कि आखिर हो क्या रहा है। लेकिन हो तो यह रहा है कि प्रशासन ही इस बात के लिए सर्कुलर जारी करता है कि एक डॉक्टर एक दिन और एक माह में कितने सीजेरियन ऑपरेशन करेगा। इसे इस संदर्भ में देखें, जब सरकार सर्कुलर जारी कर टारगेट देती है, डॉक्टर अपने हिसाब से सीजेरियन ऑपरेशन तय कर लेते हैं और व्यक्ति खुद अपनी इच्छा से प्रसव के लिए कोई शुभ दिन, शुभ घड़ी या कैलेंडर की तारीखों में कोई दुर्लभ मौका मुकर्रर करने लग जाता है तो स्थिति कैसे ठीक हो सकती है।

दरअसल प्रसव की इन जटिल स्थितियों की पड़ताल करेंगे तो पाएंगे कि हम सभी का दोष है। वैश्विक बाजार में भले ही हम सस्ते इलाज का एक केंद्र बनकर उभर रहे हों, लेकिन असलियत यह है कि हमारे अपने देश में सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवाएं लगातार बदहाल हो रही हैं, अथवा की जा रही हैं, क्योंकि जहां कहीं भी सार्वजनिक सेवाएं अच्छी हालत में होती हैं, वहां मुनाफा कमाने को आतुर संस्थाओं के फलने-फूलने के अवसर उतने ही कम होते हैं। इसीलिए केवल स्वास्थ्य नहीं, शिक्षा के क्षेत्र में भी हमारी सरकारों ने सालाना बजट में कटौती की है। किसके दबाव में कम किया, यह तो सरकार ही जाने, लेकिन इस भरोसे को आज भी इस तथ्य से मजबूती से समझा जा सकता है कि कुल संस्थागत प्रसवों में लगभग 90 फीसदी हिस्सा सरकारी अस्पतालों में ही हो रहा है। इसका आशय यह है कि तमाम बजट कटौतियों, तमाम लापरवाहियों, बदहाल व्यवस्थाओं के बावजूद भारत सरीखे डिजिटल होते इंडिया में यही सरकारी स्कूल, सरकारी अस्पताल और सरकारी सेवाएं आम आदमी को ज़िन्दा रहने की ताकत दे रही हैं।

मैं फिर उस विषय पर लौटता हूं, जिसमें मैं यह स्थापित करने की कोशिश बार-बार कर रहा हूं कि सार्वजनिक सेवाएं आज भी बेहतर हैं और उन्हें और बेहतर किया जाना चाहिए। यह कतई असंभव नहीं है। हमारे अपने देश में कई राज्यों में इसकी अलग-अलग मिसालें मिलती हैं, लेकिन उसके एक बिन्दु के रूप में प्रसव की यह जो सामान्य प्रक्रिया आती है, जिसकी शुरुआत अस्पताल में पहुंचती ही गर्भवती महिला को मरीज कहने से होती है। दरअसल हमारे असामान्य व्यवहार ने इस सुंदर रचना को एक बीमारी में परिवर्तित कर दिया है और जिसे हमारी चिकित्सा व्यवस्था और तंत्र 'केयर' करने की बजाए 'कवर' करने में विश्वास रखता है। हम केवल इंश्योरेंस कंपनियों के सहारे मरीज होने की त्रासदी को स्वीकार कर लेते हैं और उससे लड़ने का माद्दा भी नहीं रख पाते। यह कैसी परिस्थितियां हैं, जहां परिवार ने इस बात को कमोबेश स्वीकार कर लिया है कि सीजेरियन होगा ही। ...और केवल स्वीकार ही नहीं किया, उससे एक कदम आगे दर्द सहने की ताकत को ही खत्म कर दिया। अब तो मजाक में सही, लेकिन यह भी कहा जाने लगा कि नॉर्मल होना एबनॉर्मल है, लेकिन यह सचमुच इतना जटिल है क्या...?

मध्य प्रदेश की सरकारी स्वास्थ्य सेवा से जुड़े एक व्यक्ति अपनी पहचान छिपाने के निवेदन के साथ (वह भी इसलिए कि उनकी सरकारी सेवा में अभी समय बचा हुआ है) कहते हैं, आखिर क्या कारण है कि सरकारी और गैर-सरकारी स्वास्थ्य सेवा में ऑपरेशन का एक जैसा ट्रेंड बन गया है। मसलन जहां सरकारी में सुबह आठ बजे से 12 बजे के आसपास तक ही सबसे ज्यादा सीजेरियन होते हैं और गैर-सरकारी में यह सुबह छह बजे से शुरू होकर रात को 9-10 बजे तक चलता है... आखिर क्यों...?

इसके पीछे के कारणों की पड़ताल करनी ही होगी। एक पक्ष तो साफ है कि इसका सीधा संबंध डॉक्टरों की उपलब्धता से जुड़ता है। लेकिन सवाल यही है कि यदि सचमुच यह जटिलता है तो वह रात या देर रात को क्यों नहीं होती।

दरअसल मामला इतना आसान नहीं है। व्यापमं की मार झेल रहे प्रदेश में तो और भी नहीं। यह जरूर है कि इस पूरे मेडिकल माफिया के पीछे केवल डॉक्टर ही नहीं हैं। लेकिन डॉक्टरों को भी पाक-साफ इसलिए नहीं कहा जा सकता, क्योंकि बकौल वरिष्ठ पत्रकार चिन्मय मिश्र जिसका घर गिरवी रखा हो, उससे ईमानदारी की उम्मीद करना बेमानी है। लेकिन जन स्वास्थ्य अधिकार अभियान के डॉक्टर अमित सेन गुप्ता यह कहते हैं कि जीवन के सबसे कठिन समय में व्यक्ति एक डॉक्टर के पास जाता है, जब वह सबसे ज्यादा दुखी होता है, ऐसे वक्त यदि आप उसका फायदा उठाते हैं तो निश्चित ही इससे बुरा कुछ नहीं हो सकता। दुनिया में डॉक्टर ही एक ऐसे शख्स हैं, जिसे व्यक्ति बिना कोई सवाल किए अपना जीवन सौंप देता है, इसीलिए डॉक्टरी एक नोबल प्रोफेशन है। यह तभी बरकरार रह सकता है, जब कम से कम स्वास्थ्य और शिक्षा जैसे क्षेत्रों में सफलता के मानकों में तीन गुणा, चार गुणा का अंतर न हो।

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राकेश कुमार मालवीय एनएफआई के फेलो हैं, और सामाजिक मुद्दों पर शोधरत हैं...

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण) : इस आलेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी विचार हैं। इस आलेख में दी गई किसी भी सूचना की सटीकता, संपूर्णता, व्यावहारिकता अथवा सच्चाई के प्रति एनडीटीवी उत्तरदायी नहीं है। इस आलेख में सभी सूचनाएं ज्यों की त्यों प्रस्तुत की गई हैं। इस आलेख में दी गई कोई भी सूचना अथवा तथ्य अथवा व्यक्त किए गए विचार एनडीटीवी के नहीं हैं, तथा एनडीटीवी उनके लिए किसी भी प्रकार से उत्तरदायी नहीं है।



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