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क्या साहूकार के चंगुल में है भारत ?

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क्या साहूकार के चंगुल में है भारत ?

आरबीआई गर्वनर रघुराम राजन (फाइल फोटो)

इस बात की तारीफ की जानी चाहिए कि रिजर्व बैंक के गवर्नर रघुराम राजन ने मध्यप्रदेश के रायसेन जिले के एक गांव में लोगों से मिलकर एक नयी परिपाटी का निर्माण किया। हम तो अक्सर इतने बड़े ओहदे पर बैठे पूरे देश की आर्थिक चक्की चलाने वाले व्यक्ति को या तो अखबारों में देखते पढ़ते रहे हैं या उनके हस्ताक्षरों को केवल कागज़ी मुद्राओं में देखना का मौका मिला है। लोगों के बीच जाकर उनके मुद्दों पर बातचीत का ऐसा मसला संभवत: पहला ही है।

यहां रिजर्व बैंक के गवर्नर साहब ने लोगों से जो एक सवाल पूछा वह यह कि क्या देश को साहूकारों के चंगुल से मुक्ति मिल गयी है? वह कर्ज लेने के लिए कहां जाते हैं ? सवाल वाजिब था। यदि राजनीतिक समीकरणों को थोड़ी देर के लिए खूंटी पर टांगकर इस मुद्दे को देखा जाये तो साफ समझ में आता है कि परिस्थितियां कहां बदली हैं? पैसे वाले और अधिक पैसे वाले होते चले गए और गरीब लोगों का जीना और मुश्किल हुआ जा रहा है। यही कारण है कि 'दाल-रोटी' करने वाले समाजों में आत्महत्याओं के मामले कहीं अधिक भयावह हैं। यह हाल हम बुंदेलखंड से लेकर विदर्भ तक में देख ही चुके हैं, सभी सरकारों में देख चुके हैं। बावजूद इसके इस बयान के संदर्भ में भी सियासी पार्टियां एक दूसरे को घेर रही हैं, हास्यास्पद है कि थूक तो दोनों के चेहरे पर ही उलटकर आ रहा है।  

गवर्नर का सवाल एक गांव विशेष की स्थिति पर हो सकता है, जिस सलामतपुर गांव में वह लोगों से मिल रहे थे, वहां के लोगों ने पहल करके परिस्थिति को सुधारा हो, यह गांव बाकियों के लिए एक रोशनी का काम कर सकता है, रिवर्स माइग्रेशन की मिसाल बना यह गांव इस सच को भी बताता है कि हां, रोजी-रोटी के लिए लोगों का पलायन बदस्तूर जारी है, लेकिन हमारी सरकारें न तो इसे रोकने के लिए प्राथमिकता के साथ कोई कदम उठाती हैं और न ही लोगों को उनकी परिस्थितियों में लड़ने की पर्याप्त ताकत देती हैं।


ऐसे में यह सोचना होगा कि सरकार ने ऐसा क्या किया जिससे गांव साहूकार के चंगुल से मुक्त हो सके? क्या हमारी नीतियां ऐसी रहीं जिससे आम आदमी की जिंदगी कुछ आसान हो? अभी हाल ही में बंधुआ मुक्ति मोर्चा ने अकेले गुना जिले में चार सौ से ज्यादा बंधुआ मजदूरों का पता लगाया था जिसके बाद वे लोग भोपाल आये जहां उन्होंने धरना दिया, वे मुख्यमंत्री से मिले। ये सब वे लोग थे जिन्होंने अपनी छोटी-मोटी जरूरतों के लिए कभी उधार लिया था जिसे वह अभी तक चुका पाए हैं।

गौर कीजिये कि बड़ी कंपनियों को हजारों करोड़ रुपये की सीधी राहत देने वाले, मात्र एक रुपये स्क्वॉयर फिट पर कंपनियों को ज़मीन मुहैया करने वाले देश में किसानों को ट्रेक्टर पर लोन का ब्याज सबसे ज्यादा महंगा मिलता है। आखिर ऐसी कौन सी नीति है जो कार के लिए तो सस्ती ब्याज दरों पर लोन देती हैं लेकिन ट्रेक्टर पर यह उगाही ज्यादा होती है। यहां तक कि जब दूसरे प्रकार के लोन में प्री पेमेंट फीस नहीं ली जा रही है तब ट्रेक्टर पर इसका चार्ज जारी रखा गया है यानी किसान तो किसी भी तरह कर्जदार बना रहे। ऐसे में सबसे बड़े सूदखोर तो वे बैंक भी हुए जिन्हें लोन लेने के लिए आदर्श बताया जा रहा है।

प्रक्रिया की बात तो छोड़ दीजिए, लोन लेने के लिए लोगों को क्या—क्या ज़हमत उठानी पड़ती है, उसके लिए केवल आप किसान क्रेडिट कार्ड बनवाने वाले लोगों से पूछ लीजिए! एक कार्ड बनवाने के लिए उन्हें कितना कमीशन टेबल के नीचे से देना पड़ता है यह पूछ लीजिए और जो कमीशन नहीं देना चाहते उन्हें गवर्नर साहब के अपने बैंक कितने चक्कर लगवाते हैं यह भी पूछ लीजिए। यह जरूर है कि किसान क्रेडिट कार्ड की योजना के बाद किसानों के लिए लोन लेने का एक रास्ता खुला है लेकिन हमारी प्रक्रियागत मुश्किलों के चलते यह उसे बेहद पेंचीदा बना देता है। यही कारण है कि गांव-गांव में अब एक या दो व्यक्ति इस नए धंधे से जुड़ गए हैं जो बैंक और किसानों के बीच एजेंट यानी ‘दलाली’ का काम करते हैं।

लोन की तो बात छोड़ दीजिए, सहकारी बैंकों के जरिए अपना अनाज बेचने वाले किसानों से जाकर पूछ लीजिए। इसी रबी के मौसम में गेहूं का भुगतान महीने भर बाद अब तक भी शुरू नहीं हुआ है। पहले बेचने के लिए कई-कई दिन का इंतजार, फिर भुगतान के लिए इंतजार, आखिर ऐसा और कौन सा धंधा है जहां के दुकानदार अपने उत्पाद को बेचने के बाद भुगतान के लिए हाथ जोड़े बैठा रहता है। चलिए किसानों की बात छोड़ दीजिए, महात्मा गांधी रोजगार गारंटी योजना की मजदूरी के भुगतान का मामला ले लीजिए। मजदूरी के बाद लोगों के पेमेंट कई-कई महीनों से रूके हुए हैं। पूरे देश में तकरीबन तीन सौ करोड़ रुपए का भुगतान बाकी है।

ऐसे में यदि कोई साहूकार सिर्फ एक कोशिश पर लोन दे देता है तो लोगों की मजबूरी है उसे ले लेना। इसलिए लोन छोड़िये, हमारे यहां तो जो पसीने की कमाई है, उसे पाना भी मुश्किल हुआ जा रहा है, उनके लिए जो संपन्न नहीं हैं। संपन्न लोग या तो हवाई जहाज में बैठकर विदेश भाग जाते हैं याकि जेल में भी उनके लिए वह सब सुविधाएं नसीब हो जाती हैं जिसकी कल्पना आम आदमी अपनी सामान्य जिंदगी में भी नहीं कर सकता।

वैसे तो हमारे बुजुर्गों ने लोन लेने को ही सबसे बुरा माना है लेकिन परिस्थितियां ऐसी हैं कि बिना लोन के तो कोई भी खुशी खरीदी ही नहीं जाती। पता नहीं इससे खुशी आती है या तनाव लेकिन बहुत बार यह भी होता है कि मजबूरी में लोन लेना पड़ता है। बीमारी में सबसे ज्यादा रुपए की जरूरत होती है, लेकिन वहां तो हमें उधार ही लेना होता है, ऐसी परिस्थितियों में बैंक कहां लोन देते हैं ?
 
सोचना यह भी होगा कि जब हम सलामतपुर के बांशिदों की रिवर्स माइग्रेशन की तारीफ कर रहे होते हैं तो दूसरी ओर हमारी नीतियों में व्यापक रूप से क्या यह मॉडल आ पाता है। यदि आ पाता है तो हम उम्मीद करते हैं कि सरकार सार्वजनिक सेवाओं जैसे शिक्षा, स्वास्थ्य और ऐसी ही आधारभूत जरूरतों पर अपने निवेश को बढ़ाएगी ताकि सबसे जरूरतमंद लोगों को सीधे तौर पर राहत मिल सके।

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राकेश कुमार मालवीय एनएफआई के फेलो हैं, और सामाजिक मुद्दों पर शोधरत हैं...

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण) : इस आलेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी विचार हैं। इस आलेख में दी गई किसी भी सूचना की सटीकता, संपूर्णता, व्यावहारिकता अथवा सच्चाई के प्रति एनडीटीवी उत्तरदायी नहीं है। इस आलेख में सभी सूचनाएं ज्यों की त्यों प्रस्तुत की गई हैं। इस आलेख में दी गई कोई भी सूचना अथवा तथ्य अथवा व्यक्त किए गए विचार एनडीटीवी के नहीं हैं, तथा एनडीटीवी उनके लिए किसी भी प्रकार से उत्तरदायी नहीं है।



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