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चम्पारण बनाम कोल्हान : किसे याद रखेंगे हम...?

अब न केवल आज़ाद, बल्कि आज़ादी के बाद विकसित होते भारत में मारने वाले ज़्यादा पैदा हो रहे हैं या बचाने वाले... या कोई तीसरा धड़ा भी है, जो मूकदर्शक है... वह चाहते हुए भी किसी को नहीं बचाता, क्योंकि वह तंत्र के पचड़े में पड़ना नहीं चाहता...

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चम्पारण बनाम कोल्हान : किसे याद रखेंगे हम...?

हाल ही में झारखंड में बच्चा चोरी की अफवाहों के बाद भीड़ ने कुछ लोगों को पीट-पीटकर मार डाला था...

यात्रा में अपने मोबाइल फोन की स्क्रीन को स्क्रॉल कर रहा हूं, तभी दोस्तों के एक समूह में एक मित्र का सवाल आता है...

...क्या यह सही है कि छह लोगों को भीड़ ने पीट-पीटकर मार डाला...?

संबंधित राज्य के पत्रकार मित्र इस जानकारी को संशोधित करते हुए बताते हैं...

छह नहीं, सात...! बच्चा चोरी की अफवाह में सात की हत्या...

पत्रकारों की आदत होती है, बार-बार पुष्टि कर ख़बर को एकदम पक्का कर लेने की... उन्होंने फिर पूछा - छह या सात...?

सात, कुल नौ...! 11 तारीख को भी दो की हत्या की गई थी...

पत्रकारों की आदत वैल्यू एडिशन की भी होती है... ऑनलाइन रहे एक अन्य दोस्त ने दो मिनट बाद ही 'दैनि‍क जागरण' अख़बार का पहला पेज भेज दिया... शीर्षक था - अफवाह पर नृशंसता...!

मैं जिस यात्रा में सब कुछ पढ़-सोच रहा हूं, उसका एक सिरा चम्पारण से जुड़ा है... इसी चम्‍पारण से तकरीबन 400 कि‍लोमीटर दूर बसे कोल्‍हान से घटना का दूसरा सिरा जुड़ा है... चम्पारण इसलि‍ए, क्योंकि यह उस ऐति‍हासि‍क सत्याग्रह का 100वां साल है... 100 साल बाद भी चम्‍पारण पर थोड़ी-बहुत बातचीत हो रही है, यह सुखद है... कोल्‍हान की बात इसलिए, क्‍योंकि वहां एक ऐसी घटना हो रही है, जो मानवीयता को तार-तार करती है...

वरिष्ठ पत्रकार अरविंद मोहन ने चम्‍पारण सत्‍याग्रह पर किताबें लिखी हैं... अरविंद इन्हीं किताबों के संदर्भ में चम्पारण से कई सौ किलोमीटर दूर इटारसी नामक छोटी-सी जगह पर बातचीत करने वाले हैं... यह बातचीत 40 डिग्री तापमान के बीच पत्रकार भवन के बगैर एसी वाले गरमागरम हॉल में होनी है... इसे आयोजित करने वाले सामाजिक और वैकल्पिक राजनीति की बात करने वाले कार्यकर्ता सुनील भाई और राजनारायण के वे साथी हैं, जो इसी इलाके में पिछले तीन दशक से लोगों के अधिकारों और जल-जंगल-ज़मीन, आजीविका की लड़ाई लड़ रहे हैं... राजनारायण बहुत पहले 1990 में चले गए, सुनील भाई भी इस लंबी लड़ाई को बीच में छोड़कर दो साल पहले गुज़र गए, उनके साथी उन्हें पूरे मन से याद कर रहे हैं...

अरविंद मोहन बिहार के उसी चम्पारण जिले से ताल्लुक रखते हैं, जहां महात्‍मा गांधी ने 15 अप्रैल, 1917 को किसानों के समर्थन में सत्‍याग्रह शुरू किया था... आज़ादी की लड़ाई में यह गांधी के सत्‍याग्रह का पहला मौका था, जो मील का पत्‍थर साबित हुआ... किताब के लेखक के पूर्वज और पिता भी गांधी की इस मुहिम में शामिल रहे, इसलिए उनका इससे गहरा जुड़ाव रहा है... एक ही दि‍न में चम्पारण में कि‍सानों का ऐतिहासिक सत्‍याग्रह और चम्‍पारण से कोई 400 किलोमीटर दूर भीड़ द्वारा मात्र अफवाह पर लोगों को पीट-पीटकर मार डाले जाने की घटना अंदर तक झकझोर देती है... दुनियाभर को अहिंसा का पाठ पढ़ाने वाले गांधी के देश में यह क्‍या हो रहा है... आखिर कैसे कोई समाज इतना हिंसक हो जाता है कि उसे अपनी आंखों से कुछ भी दिखाई देना बंद हो जाता है...

अरविंद मोहन बताते हैं कि गांधी चम्पारण में नहीं आते तो क्या होता... ऐसा भी नहीं होता कि भारत को आज़ादी नहीं मिलती... ऐसा भी नहीं होता कि इतना बड़ा आंदोलन खड़ा नहीं हो पाता... लेकिन वह यह भी कहते हैं कि ऐसा होता तो ज़रूर, लेकिन हो सकता था कि यह सब कुछ बहुत देर से होता... क्योंकि चम्पारण ने गांधी को गांधी बनाया... चम्पारण ने गांधी को विस्तार दिया... न केवल गांधी को, बल्कि चम्पारण की एक-एक कहानी ने लोगों के मन में आंदोलनों का हौसला दिया... चम्पारण ने अंग्रेजी सत्‍ता का खौफ दूर करना सिखाया...

सचमुच, अंग्रेजों का खौफ हिन्दुस्तान से चला गया, लेकिन हमारे-अपनों का जो खौफ देश के भिन्न-भिन्न इलाकों में नई दहशत पैदा कर रहा है, उसके लिए कौन गांधी आएगा और कौन सा दूसरा चम्पारण होगा... ऐसी घटनाएं यही सवाल उठाती हैं कि अब न केवल आज़ाद, बल्कि आज़ादी के बाद विकसित होते भारत में मारने वाले ज़्यादा पैदा हो रहे हैं या बचाने वाले... या कोई तीसरा धड़ा भी है, जो मूकदर्शक है... वह चाहते हुए भी किसी को नहीं बचाता, क्योंकि वह तंत्र के पचड़े में पड़ना नहीं चाहता... अब यह सोचने का वक्त है कि समाज से खौफ खत्म हो रहा है, या बढ़ रहा है...?

कोल्हान में अफवाह के आधार पर मार दिए जाने वाली घटनाएं यही सवाल पैदा करती हैं... सवाल केवल भीड़ का... चम्‍पारण की हज़ारों किसानों की भीड़ इतिहास रच देती है, कहानी तो कोल्हान की भीड़ भी रचती है, लेकिन उसे कोई याद नहीं करना चाहता...

सोचना होगा और उससे कहीं ज्यादा सचेत होना होगा... 'रोटी' और 'कमल' के ज़रिये देश में संचार का कमाल कर देने वाली हिन्दुस्तान की यह पीढ़ी अब उससे भी कई गुना ज्यादा संसाधनों से लैस होकर कौन सा इतिहास लिखेगी...? क्या वह उतनी ही तेजी से झूठ को इस तरह से वायरल कर देगी, जिससे समाज में हत्याएं तक होने लगें...

सोचना तो यह भी होगा कि इस देश में शांति की स्थापना के लिए युद्ध की वकालत करने वाले लोगों को क्या वास्तव में हिंसा में ही इसका रास्ता दिखता है...? यदि हिंसा में हल को खोजा जाएगा तो यह हल केवल देश की सीमाओं तक नहीं रह पाएगा, यह मानसिकता कब आपकी अपनी चौखट तक चली आएगी, इसका पता भी नहीं चलेगा, और तब कोल्हान जैसी घटनाएं आम होने लगें तो किसी और को दोष मत दीजिएगा... तब चम्पारण नहीं याद रखा जाएगा, तब स्मृति में कोल्हान ही होगा...!

राकेश कुमार मालवीय एनएफआई के पूर्व फेलो हैं, और सामाजिक सरोकार के मसलों पर शोधरत हैं...

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण) : इस आलेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी विचार हैं. इस आलेख में दी गई किसी भी सूचना की सटीकता, संपूर्णता, व्यावहारिकता अथवा सच्चाई के प्रति NDTV उत्तरदायी नहीं है. इस आलेख में सभी सूचनाएं ज्यों की त्यों प्रस्तुत की गई हैं. इस आलेख में दी गई कोई भी सूचना अथवा तथ्य अथवा व्यक्त किए गए विचार NDTV के नहीं हैं, तथा NDTV उनके लिए किसी भी प्रकार से उत्तरदायी नहीं है.



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