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क्या आजकल मुख्यमंत्री के गांव में रात बिताने का भी नहीं होता असर...?

जिस गांव ने मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान की मेज़बानी की, उस गांव की तस्वीर भी नहीं बदल सकी. प्रधानमंत्री आवास योजना इसका एक उदाहरण मात्र है.

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क्या आजकल मुख्यमंत्री के गांव में रात बिताने का भी नहीं होता असर...?

मध्य प्रदेश का यही है वह गांव, जहां रात में रुके थे मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान.

नेताजी के आने से उस जगह की तस्वीर बदल जाती है. रातों-रात सड़कें बन जाती हैं. साफ-सफाई कर जगह चमका दी जाती है. अधूरे काम रातोंरात पूरे कर दिए जाते हैं. सोया सिस्टम जाग जाता है. रात-रातभर काम करता है. लाखों की लागत वाले शामियाने तान दिए जाते हैं. नेता यदि मुख्यमंत्री या प्रधानमंत्री हो, तो इन कामों का हो जाना कोई आश्चर्य की बात नहीं. चाहे सरकार किसी भी पार्टी की हो, सत्ता का यह चरित्र पुराने ज़माने से ऐसा ही चला आ रहा है, फर्क सिर्फ इतना है कि अब बेशर्मी अपनी हदों से निकलकर बहुत आगे आ गई है. इसके लिए चाहें तो आप व्यवस्था को कुसूरवार ठहरा सकते हैं या नेताओं की नौकरशाही पर कम होती पकड़ भी मान सकते हैं.
 
यह मामला एक ऐसे गांव से जुड़ा है, जहां खुद मध्य प्रदेश के मुखिया शिवराज सिंह चौहान रात बिताकर आए थे. सतना जिले के मझगवां ब्लॉक में आने वाली तुर्रा ग्राम पंचायत अब मध्य प्रदेश में विकास का मज़ाक उड़ाती दिख रही है. कहने को पिछले साल मुख्यमंत्री चित्रकूट उपचुनाव के दौरान इस गांव में एक आदिवासी के घर रात बिताकर आए थे, लेकिन इससे भी गांव की किस्मत न बदली, और गांव का हाल अब भी वैसा ही है.
 
गांव वालों की मानें, तो इस गांव में प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत एक भी घर नहीं बन पाया है. ऐसा नहीं कि इसके लिए ग्राम पंचायत की ओर से प्रयास नहीं किए गए या इस गांव में कोई गरीब परिवार नहीं रहता, जिसका प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत चयन करके आवास बनाया जा सके. कोशिश की गई, लेकिन लोगों की अपेक्षाएं कागज़ों के ढेर में किसी फाइल तले ही दबी रही होंगी, तभी तो मुख्यमंत्री के इस गांव को ऐतिहासिक महत्व का बना दिए जाने के बाद भी नौकरशाही ने शायद ही तवज्जो दी. गांव के लोग बड़ी उम्मीद से अब भी विकास की बाट जोह रहे हैं.
 
लेकिन क्या वाकई ऐसा ही है, यह जानने के लिए हम प्रधानमंत्री आवास योजना की वेबसाइट पर गए. अच्छी बात है कि मोदी जी के डिजिटल इंडिया में हम यह देख पा रहे हैं कि किस ग्राम पंचायत में कितने घर बना दिए गए हैं, कितने अधूरे हैं और कितनी राशि उन्हें आवंटित कर जारी कर दी गई है.
 
हम चाहें, तो एक-एक आदमी के घर जाकर पूछ सकते हैं कि पोर्टल जो राशि दिखा रहा है, क्या वास्तव में उन्हें मिली है. प्रधानमंत्री जी, यह बहुत अच्छी बात है कि लोगों के हाथ में आपने डिजिटल ताकत दी है, अब डिजिटल टेक्नोलॉजी के साथ नॉलेज या डिजिटल साक्षरता पर भी बड़े पैमाने पर काम किया जाना चाहिए, हर गांव में एक-दो ऐसे युवा ई-वॉलंटियर ज़रूर तैयार होने चाहिए, जो गांव में मिल रही योजनाओं का रियलिटी चेक कर आपको ट्विटर के ज़रिये बता सकें कि वास्तव में आप जो दिल्ली में बैठकर करते हैं, वह ज़मीन तक पहुंच पाता है या नहीं. हमने इसी राज्य में देखा है कि बने-बनाए घरों के सामने दीवार खड़ी कर उस पर प्रधानमंत्री आवास योजना लिख दिया गया और पूरा पैसा निकाल लिया गया है. तकनीक जानकारी तो दे रही है, लेकिन भ्रष्ट आचरण को रोकने के लिए कोई तरीका कारगर होता नहीं दिख रहा है, बल्कि नए-नए तरीके निकाल लिए जा रहे हैं.
 
खैर, तुर्रा ग्राम पंचायत में आवास के लिए पैसा जारी हुआ ही नहीं. हमने वेबसाइट पर इस बात को जांचा, तो वहां प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत केवल दो घर बनना दिखाई दे रहा है, और उनमें भी एक मकान अधूरा है.
 
मुख्यमंत्री ने इस गांव में रात बिताने के बाद माना था कि इस इलाके में भयंकर गरीबी है. उन्होंने कहा था कि वह चुनाव होने के कारण उस वक्त कोई घोषणा नहीं कर सकते, लेकिन चुनाव के बाद पूरी सरकार लेकर जाएंगे और इलाके की तस्वीर बदल देंगे. इलाके की जनता ने इस वादे के बाद भी यहां भारतीय जनता पार्टी (BJP) को नहीं जिताया. जिस गांव ने मुख्यमंत्री की मेज़बानी की, उस गांव की तस्वीर भी नहीं बदल सकी. प्रधानमंत्री आवास योजना इसका एक उदाहरण मात्र है, और यह गांव कई और योजनाओं से भी अछूता है.
 
डिजिटल तकनीक में एक और सुविधा है कि डेटा में परिवर्तन करने की गुंजाइश बनी रहती है. हम ऑनलाइन पत्रकारिता करने वालों के लिए यह सुविधा भूलवश या लापरवाही के चलते गलत तथ्य लिख जाने पर संपादन के काम आती है. लेकिन लोग चालाक हैं और गलतियों का स्क्रीनशॉट लेकर उसे भरे बाज़ार वायरल कर देते हैं. हमने भी वेबसाइट की रिपोर्ट का स्क्रीनशॉट लेकर रख लिया है.
 
इसी गांव में लगे कई फुट उंचे टॉवर पर चढ़कर गांव का एक फोटो लेने की हिम्मत हम नहीं कर पाए, कोई प्रोफेशनल फोटोग्राफर होता, तो शायद अपने हौसले से यह काम कर जाता. आश्चर्य होता है कि दूर आदिवासी गांवों में भी जहां भूख, गरीबी, कुपोषण, रोज़गार, पलायन जैसी समस्याएं जस की तस हैं, वहां इतने बड़े-बड़े टॉवर महज कुछ सालों में कैसे पहुंच गए. कैसे आटा की समस्या से जूझने वाले इलाकों में लोगों के हाथ में डाटा पहुंच गया.
 
देश में नरेंद्र मोदी सरकार के आने के बाद बड़े पैमाने पर घर बनाने का काम शुरू हुआ है. मोदी सरकार का संकल्प है कि वह 2022 तक सभी आवासहीनों को घर बनाकर दे देगी. तीन साल में तकरीबन एक करोड़ आवास तैयार कर लोगों को छत देने का वादा सरकार ने किया है. यह सहायता उन लोगों को दी जाएगी, जो या तो आवासहीन हैं या जिनके घर जीर्ण-शीर्ण होकर रहने लायक नहीं बचे हैं.
 
रोटी-कपड़ा और मकान की मूलभूत ज़रूरतों का यह सपना आज़ादी के इतने साल बाद भी दोहराया जा रहा हो, तो सोचिए कि सरकारों ने अब तक आम लोगों के लिए क्या किया धरा. क्या वास्तव में हम पिछड़े थे, जिसके ज़ख्म सालोंसाल भी नहीं भरे जा सके, या वास्तव में गरीब आवासहीन आदमी सरकारों की प्राथमिकता में नहीं रहा. सरकार के ग्रामीण विकास विभाग की वेबसाइट बताती है कि देश में तकरीबन 52 लाख मकान बना दिए गए हैं, जिनमें अकेले मध्य प्रदेश में 10 लाख घर बनाए जा चुके हैं, सवाल यह है कि आखिर क्यों एक गांव में प्रधानमंत्री योजना का एक भी आवास नहीं है, जहां मुख्यमंत्री स्वयं लोगों से वादे करके आए थे.
 
राकेश कुमार मालवीय एनएफआई के पूर्व फेलो हैं, और सामाजिक सरोकार के मसलों पर शोधरत हैं...
 
डिस्क्लेमर (अस्वीकरण) : इस आलेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी विचार हैं. इस आलेख में दी गई किसी भी सूचना की सटीकता, संपूर्णता, व्यावहारिकता अथवा सच्चाई के प्रति NDTV उत्तरदायी नहीं है. इस आलेख में सभी सूचनाएं ज्यों की त्यों प्रस्तुत की गई हैं. इस आलेख में दी गई कोई भी सूचना अथवा तथ्य अथवा व्यक्त किए गए विचार NDTV के नहीं हैं, तथा NDTV उनके लिए किसी भी प्रकार से उत्तरदायी नहीं है.
 

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