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ट्विटर के बिना जो देश है, उसकी समस्याओं का क्या होगा...?

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ट्विटर के बिना जो देश है, उसकी समस्याओं का क्या होगा...?
पिछले दिनों देश में एक नया चलन आया है - माइक्रो-ब्लॉगिंग वेबसाइट ट्विटर की मदद लेने का। रेलयात्री ट्वीट करते हैं, "उन्हें भूख लगी है,"... ट्वीट मंत्रीजी तक पहुंचता है और वह तुरंत ही खाना पहुंचवा देते हैं। रेलगाड़ी में सफर के दौरान एक बच्चा गीली पेंट से परेशान है। बच्चे के माता-पिता इस अदना-सी समस्या से भी ट्वीट के जरिये रेलमंत्री को अवगत कराते हैं और तुरंत उन्हें डायपर पहुंचा दिया जाता है। रेलगाड़ियों में महिलाओं के साथ छेड़छाड़ जैसे संगीन मामलों पर भी रेलगाड़ी में मदद पहुंचाने की बड़ी अच्छी ख़बरें आई हैं। क्या यह बात देश के लिए शुभ संकेत है...? दशकों से कई जीवन-मरण के सवालों वाली मांगों के लिए धरने, प्रदर्शन, आंदोलन करने के बावजूद सरकारों के कानों पर जूं तक न रेंगने वाली परंपराओं के इस देश में अब 'ट्विटर' या ऐसे ही प्लेटफार्म अब एक जादुई जरिया बन गए हैं...

क्या हम यह मानें कि जनता के दुख-दर्द की कोई भी आवाज़ अब सीधे हमारे किन्हीं भी माननीय मंत्री जी (जिन्हें हम अब तक अपना वोट देकर पहुंचाते रहे हैं, और उसके बाद वह सीधे हमसे पांच साल बाद ही मिलने के जैसे चुटकुलों और व्यंग्यों में समाहित रहे हैं) अब इस नए ट्विटर-फेसबुक और सोशल मीडिया के दौर में बस हमसे कुछ ही दूरी पर हैं। हम अपने स्मार्टफोन से टिक-टिक कर फटाक से अपने दुख-दर्द उन तक पहुंचा सकते हैं, बिना किसी बाधा, बिना किसी व्यवधान के।

लेकिन सोचना होगा कि क्या यह वाकई अच्छा उपक्रम है अथवा अपने स्मार्ट होते इंडिया में छवि चमकाने का एक और सस्ता सरल तरीका है, जिससे एक फौरी ख़बर बन जाती है, फौरी लोकप्रियता हासिल हो जाती है। देखना यह भी होगा कि हमारे देश में ट्विटर अकाउंट के जरिये समस्या वाकई एक जादू के डंडे के घूमने की तरह ही हल हो रही है, लेकिन दरअसल ज़मीनी हकीकत नहीं बदली। अब भी कलेक्टर और तहसील आफिस में वैसी ही लंबी-लंबी लाइनें लगी हैं, बिना किसी दलाल के अब भी ड्राइविंग लाइसेंस बनवा लेने का काम कोई-कोई 'माई का लाल' ही कर पाता है, शहर से दूर गांव-खेड़ों में स्कूल के मास्टरजी के आने का समय अब भी नहीं बदला है, सरकारी राशन 'भूतों', यानी मर चुके लोगों के नाम अब भी आवंटित हो रहा है, किसानों को अपनी ज़रूरत का खाद अब भी 'काले बाज़ार' से खरीदना पड़ रहा है, कांदा-रोटी-दाल दिनोंदिन और मुश्किल होती जा रही है।

ध्यान दीजिए, इन शाश्वत तस्वीरों को अब तक कोई नहीं बदल पाया है, लेकिन यह ट्विटर, आशा की गजब रोशनी लेकर आया है, जो किसी 'बच्चे के डायपर' जैसी छोटी-सी चीज पर भी रिएक्ट करवा देता है, जो किसी के जीवन-मरण से तो बहुत ही छोटा सवाल है।

दुखद यह भी है कि इस शाश्वत तस्वीर वालों में किसी के पास ट्विटर अकाउंट नहीं है। अकाउंट क्या, स्मार्टफोन ही नहीं है। हिम्मत करके कोई नया-पुराना सेकंडहैंड स्मार्टफोन खरीद भी ले तो इतने पैसे नहीं है कि उसमें रेगुलर इंटरनेट डाटा पैकेज डलवा सके। यदि आपको देश में गरीबों की स्थिति का ठीक-ठीक अंदाजा हो तो आप समझ सकेंगे कि देश की शताब्दियों-राजधानियों में सफर करने वाले मुसाफिरों की तो 'डायपर' जैसी समस्या का भी फौरी हल मिल जाएगा, लेकिन पैसेंजर जैसी गाड़ियों के मुसाफिर उसी फ़िज़ां में सड़ते रहेंगे, उनकी 'दाल-रोटी' किसी सोशल प्लेटफार्म पर मयस्सर नहीं होगी। केवल रेलगाड़ियों की बात छोड़ दीजिए, यह केवल एक मिसाल है, जिसमें भारी संवेदनशीलता का परिचय दिया जा रहा है, और उसका कोई विरोध भी नहीं है, उसका दिल से स्वागत ही होना चाहिए, क्योंकि लोग तो वे भी हैं और उनकी अपनी समस्याएं भी वाजिब हैं, लेकिन देखना यह भी होगा कि ट्विटर अकाउंट के बिना जो देश है, उसकी समस्याओं का क्या होगा...?

राकेश कुमार मालवीय एनएफआई के फेलो हैं, और सामाजिक मुद्दों पर शोधरत हैं...

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण) : इस आलेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी विचार हैं। इस आलेख में दी गई किसी भी सूचना की सटीकता, संपूर्णता, व्यावहारिकता अथवा सच्चाई के प्रति एनडीटीवी उत्तरदायी नहीं है। इस आलेख में सभी सूचनाएं ज्यों की त्यों प्रस्तुत की गई हैं। इस आलेख में दी गई कोई भी सूचना अथवा तथ्य अथवा व्यक्त किए गए विचार एनडीटीवी के नहीं हैं, तथा एनडीटीवी उनके लिए किसी भी प्रकार से उत्तरदायी नहीं है।


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