क्या हम बिना नगदी के कुछ समय रह सकते हैं...?

क्या हम बिना नगदी के कुछ समय रह सकते हैं...?

इस दौर में, जब तमाम तरह की सर्जरी देश में चल रही हैं, यह बात करना कि 'क्या हम कुछ समय बिना नगदी के रह सकते हैं', अटपटी लग सकती है. हालांकि यह उतनी अटपटी है नहीं, जितनी आज के दौर में बना दी गई है. यह कोई नई बात नहीं है, हमारे समाज में पारंपरिक रूप से ऐसा होता चला आया है. आज जब 500 और 1000 रुपये के मौजूदा नोट बंद करने पर 'देश थमने' जैसा हंगामा खड़ा हो गया, तभी अचानक मुझे वे सब स्थितियां एक-एक कर याद आने लगीं, जहां बिना नगदी के काम चल जाया करता था.

ऐसी व्यवस्था में लेनदेन केवल नगदी और वस्तु-आधारित नहीं था, उसके पीछे के रिश्ते-नाते और एक दूसरे की खैर-खबर भी हुआ करती थी. विकास की मोटरबोट पर सवार जीडीपी के ज़माने में इसे आप पुरातनपंथी राग की संज्ञा भी दे सकते हैं, लेकिन यह भी सच है कि प्लास्टिक मनी से लेकर ऑनलाइन लेनदेन की एक पल में धराशायी हो सकने वाली व्यवस्थाओं (जैसा हमने पिछले दिनों एसबीआई कार्ड के संदर्भ में देख भी लिया) के पीछे अंधी दौड़ लगाते हुए हम समय से कुछ ज्यादा ही तेज भाग रहे हैं. इसमें हम यह भी नहीं देखते कि कौन दौड़ पा रहा है, कौन नहीं...? कौन पीछे छूट गया है, और कौन औंधे मुंह गिरा पड़ा है...!

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इसे आप बाजार-विरोधी (और कई लोग इसे विकास-विरोधी भी मानेंगे) सोच भी कह सकते हैं. यह सोच मार्केट को उतना ही फायदा पहुंचाती है, जिससे वह जीता रहे. इस सोच में हो सकता है कि चमचमाती ज़िन्दगी मयस्सर न हो, लेकिन यह ज़रूर है कि ज़िन्दगी बची रहती है, वह मशीन नहीं हो जाती. जैसी आजकल हो गई है.

पिछले दिनों ख्यात आलोचक विजय बहादुर सिंह की साहित्य साधना के 50 बरस पूरे होने पर उनके जीवन पर आधारित एक किताब हाथ लगी. उसमें शामिल एक चिट्ठी बहुत दिलचस्प लगी, इसके बाद यह सोच और भी आक्रांत हो गई. मन्ना यानी 'सतपुड़ा के घने जंगल' कविता वाले भवानीप्रसाद मिश्र ने एक चिट्ठी में विजय बहादुर सिंह को लिखा है कि 'हमें धनोपार्जन की स्पर्द्धा में नहीं पड़ना है... थोड़ी आर्थिक तंगी आदमी को आदमी बनाए रखने में मदद करती है... दारिद्र और संपन्नता मनुष्य को खा लेती हैं... इन दोनों से बचना-बचाना विचारवानों का सपना रहा है... हमारे सार्वजनिक प्रयत्न इस दिशा में होने चाहिए...'

हमारा समाज आज क्या ऐसा सोच पाता है...? आज अमीर बनने की बात सबसे अधिक होती है और मनुष्य बनने की सबसे कम. यह कुछ-कुछ ऐसा ही है, जैसे शिक्षा का अंतिम उद्देश्य नौकरी पाना और नौकरी पाकर अमीर बन जाना हो गया है. इस पूरे दौर के सारे एजेंडों में मनुष्यता का गायब होते जाना खतरनाक संकेत है. मैं इसे कोई साजिश नहीं कहूंगा, लेकिन आप ऐसा होता हुआ महसूस कर ही रहे होंगे. अब तो नई पीढ़ी को ऐसी समझ देने वाली पीढ़ी भी नहीं बची. समझ दे भी दें तो वैसा माहौल भी नहीं है. इसीलिए जब यह सवाल आता है कि 'क्या हम नगदी के बिना कुछ समय रह सकते हैं' तो बैचेनी की स्थिति बन जाती है.

समाज में ऐसी व्यवस्थाएं लगभग गायब हैं, जहां कुछ समय बिना नगदी के भी काम चल जाया करता था. इस पूरे सिस्टम ने बाजार को गुलामी में ऐसा जकड़ा है कि उसका छूटना लगभग मुश्किल है. आखिर क्यों कुछ कागजी मुद्राओं के एक-दो दिन बंद होने से इतना हल्ला मचना चाहिए...?

याद कीजिए उन व्यवस्थाओं को, जब कुछ दिन, कुछ महीने, पूरे साल भर एक तंत्र चल जाया करता था. वह बढ़ई, धोबी, नाई, लुहार, पंडित, किसान सब ज़रूरतों को पूरा कर दिया करते थे, हालांकि उसके अपने गुण-दोष प्रेमंचद की कहानियों की तरह सामने आते रहे हैं, लेकिन वहां की मनुष्यता का पैमाना और कथित रूप से विकसित-डिजिटल-स्मार्ट बसाहटों की मनुष्यता के पैमानों में जो अंतर दिखाई देता है, उसे आप इस दौर में साफ महसूस कर सकते हैं. बिल्कुल आप गांव में जाकर अपने बटुए को ताक पर रखकर सुकून से यहां-वहां घूम सकते हैं, लेकिन शहर का माहौल मुझे ऐसा करने की एक पल भी इजाज़त नहीं देता, लेकिन हुआ तो उल्टा है. गांव भी अब गांव कहां, शहर बनने पर आमादा हैं.

यह कहानी भी अब एक दुखद राग की तरह है, जिसे चाहे न चाहे, गाना ही पड़ेगा.

राकेश कुमार मालवीय एनएफआई के पूर्व फेलो हैं, और सामाजिक सरोकार के मसलों पर शोधरत हैं...

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