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राकेश मालवीय : हमारे 'देश के बच्चों' का खत 'देश के बड़ों' के नाम...

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राकेश मालवीय : हमारे 'देश के बच्चों' का खत 'देश के बड़ों' के नाम...

वर्ष 2012 के दिल्ली गैंगरेप कांड के बाद सड़कों पर आक्रोश व्यक्त करते नागरिक (फाइल फोटो)

हम 16 से 18 साल के बच्चे आप देशवासियों को यह खत लिख रहे हैं। समय निकालकर पढ़िएगा, क्योंकि इसमें हम कुछ बुनियाद सवाल उठाने की कोशिश कर रहे हैं। आपने हमें बलात्कार और अन्य संगीन अपराधों के लिए बड़ों जैसा व्यवहार करने के लायक मान ही लिया है। ठीक है, संसद के इस निर्णय से निर्भया मामले के बाद उबाल खाते देश को तसल्ली मिली होगी। बलात्कार तो उससे पहले भी होते रहे हैं, और निर्भया के बाद भी हुए हैं। हम बच्चों के साथ भी यौन अपराध हुए हैं, लेकिन उन पर तो आप चुप ही रहे। खैर, अब आगे से ऐसे जघन्य अपराधियों को सजा भी मिल जाया करेगी। एक काम और कर दीजिए। अब, आप हमें वोट देने का अधिकार भी दे ही दीजिए। शादी करने की उम्र भी घटा दीजिए। बच्चा शब्द की परिभाषा भी बदल दीजिए या ठीक-ठीक तय कर दीजिए।

ठीक है, आपने कानून बदल दिया, लेकिन हम 16 से 18 साल की उम्र के बच्चे पूछ रहे हैं कि देश को चलाने में हमारी भी कोई भूमिका है या नहीं...? हम तो वोट भी नहीं देते न...! हमारे पास यह अधिकार भी नहीं है कि अपना वोट देकर किसी की सरकार गिरा सकें या अपनी सरकार बना सकें। अब तक ऐसा ही होता आया है कि आप उम्र में बड़े लोग देश के फैसले खुद ही तय कर लेते हैं, नीतियां बना लेते हैं। कानून और संविधान में संशोधन भी कर लेते हैं। हम बच्चे पूछना चाहते हैं कि आखिर यह देश हमारा है या नहीं...? इस देश में हमारी हैसियत क्या है...? कब तक आप हमें बच्चा ही समझते रहेंगे...? क्या एक बार भी आपने हम लोगों से इस बारे में पूछा कि इस मामले पर हमारी राय क्या है।


यदि आप हमें बच्चा ही मानते हैं तो ठीक है, लेकिन आपने तो दिखा दिया कि आप हमें बच्चा नहीं मान रहे। तो जब आप ऐसा मान ही नहीं रहे हैं तो हम आपसे कुछ और अधिकार भी मांग रहे हैं। क्या अब सरकार बच्चे शब्द की परिभाषा को भी बदलेगी, जो अब तक 18 साल तक मानती आई है। वैसे तो आप आज तक यह तय ही नहीं कर पाए हैं कि बच्चा आखिर किस उम्र तक बच्चा है। संयुक्त राष्ट्र का बच्चों के अधिकार कन्वेंशन के बाद हमारा देश भी यह मानता रहा है कि बच्चा मतलब 18 साल तक की उम्र वाला नागरिक। शिक्षा के अधिकार कानून में आपने छह से 14 साल तक के व्यक्ति को ही यह अधिकार दिया। देश के श्रम कानून में आप कहते हो कि 14 साल तक की उम्र वाला ही बाल मजदूर होता है। आप ही बता दीजिए, हम अपने आप को बच्चा कब तक मानें...?

जब आपने उम्र घटा ही दी है तो क्या अब यह नहीं किया जाना चाहिए कि शादी की उम्र में परिवर्तन कर दिया जाए, क्योंकि हमने मान ही लिया है कि देश में अब 16 साल की उम्र वाले एक किशोर में सोचने-समझने और परिपक्व निर्णय लेने की क्षमता का विकास हो गया है।

आपको समझना चाहिए, किशोर न्याय कानून की बुनियाद ही एक ऐसी आशा के साथ थी, जहां बच्चों में विधि-विरुद्ध कार्यों के प्रति प्रायश्चित्त करने और सुधार की गुंजाइश दिखाई देती थी, इसलिए व्यवस्था ने समाज में बच्चों के लिए कुछ ऐसे मापदंड निर्धारित किए थे, जहां ऐसे बच्चों में सुधार हो सके। उनके लिए जेल नहीं, सुधार गृह का रास्ता दिखाया गया था। उनके साथ पुलिस वैसा सुलूक नहीं कर सकती, जैसा अन्य अपराधियों के लिए वह करती आई है। उनके लिए किशोर न्याय बोर्ड के रूप में एक अलग व्यवस्था बनाई गई, जहां अधिक संवेदनशीलता के साथ उनके मामलों को देखा-समझा जा सके। निश्चित रूप से यह बच्चों के लिए एक बेहतर दुनिया बना सकने, बनाए रखने की दिशा में एक सैद्धांतिक कोशिश थी। इसे व्यवहार में कितना हम बदल सके, उसके सवाल अलग हैं।

हम पूछना चाहते हैं कि आपने बड़े लोगों के लिए कठोर कानून बनाए हैं; उनसे देश में अपराध की दर में क्या कोई कमी आई है...? हम पूछना चाहते हैं कि दुनिया के किसी भी समाज में कड़ी से कड़ी सजा के प्रावधानों के बीच अपराधों की स्थितियां क्या हैं...? क्या हम तालिबान होना चाहते हैं...? यदि ऐसा है तो हम बच्चे आज निश्चित ही इस बात को मान लेंगे कि देश असहिष्णुता की स्थिति में जा पहुंचा है। सुधार की सारी संभावनाओं को खारिज कर दिया गया है। क्या किसी एक नाबालिग की सजा देश के पूरे भविष्य को दी जा सकती है। क्या हम अपने बच्चों और किशोरों को सुधार के कुछ मौके देना चाहते हैं या नहीं...?

हम पूछना चाहते हैं कि हम बच्चों के प्रति जो अपराध हो रहे हैं, उनसे आपकी भावनाएं क्यों नहीं खौलती हैं...? उनके प्रति आपकी संसद क्या करती है...? कुछ आंकड़े पेश करते हैं हम। राष्ट्रीय अपराध अनुसंधान ब्यूरो के सालाना प्रतिवेदनों के मुताबिक भारत में वर्ष 2005 से 2014 के बीच की 10 वर्ष की अवधि में बच्चों के साथ बलात्कार के 71,872 प्रकरण दर्ज हुए। इन 10 सालों में ऐसे मामलों में 341 प्रतिशत की बढ़ोतरी दिखाई देती है। साल 2005 में 4,026 प्रकरण दर्ज हुए थे, जो वर्ष 2014 में बढ़कर 13,766 हो गए। क्या जवाब है इन आंकड़ों का आपके पास। यह आंकड़े, जो खुद आपके हैं, दरअसल सवाल हैं।

यह समाज और सरकार इन आंकड़ों पर क्यों सक्रिय नहीं होते...? क्या यही समाज देश में 1 करोड़ 21 लाख बच्चों की शादियां नहीं करवा देता। जी हां, 2011 की जनगणना बताती है कि देश में 18 साल से कम उम्र की लड़कियों और 21 साल से कम उम्र के लड़कों की तयशुदा से कम उम्र में आज भी शादियां करवाई जा रही हैं। और तो और, कम उम्र में मां बनने का दंश भी बच्चियां झेल रही हैं। ऐसा समाज जब बच्चों के प्रति सहिष्णुता से नहीं सोच सकता तो उससे कोई उम्मीद भी नहीं की जानी चाहिए।

हम बिल्कुल भी एक गुनहगार को छोड़ देने के पक्ष में नहीं हैं, किसी भी अपराध के लिए एक अपराधी को सजा मिलनी चाहिए, लेकिन सजा का मकसद सुधार हो। अभी दिक्कत यही है कि पूरा समाज सजा दिलवाकर तसल्ली करना चाहता है। सुधार के लिए कितने लोग आगे आते हैं...? यह बात केवल एक बलात्कारी भर के लिए नहीं है। यह हर उस अपराधी के लिए है, क्योंकि हमारे देश की ऐसी ही परंपरा रही है। इस बात को केवल तब महसूस किया जा सकेगा, जब आपके परिवार का कोई बच्चा ऐसे गंभीर अपराध में जाने-अनजाने फंसेगा और तब समाज उसे कठोर सजा देने पर आमादा हो जाएगा।

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राकेश कुमार मालवीय एनएफआई के फेलो हैं, और सामाजिक मुद्दों पर शोधरत हैं...

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण) : इस आलेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी विचार हैं। इस आलेख में दी गई किसी भी सूचना की सटीकता, संपूर्णता, व्यावहारिकता अथवा सच्चाई के प्रति एनडीटीवी उत्तरदायी नहीं है। इस आलेख में सभी सूचनाएं ज्यों की त्यों प्रस्तुत की गई हैं। इस आलेख में दी गई कोई भी सूचना अथवा तथ्य अथवा व्यक्त किए गए विचार एनडीटीवी के नहीं हैं, तथा एनडीटीवी उनके लिए किसी भी प्रकार से उत्तरदायी नहीं है।



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