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झूठ के दौर में दुनिया को आईना दिखाती है सुनयना की आवाज

जब झूठ मानवीय व्यवहार के हिस्से से आगे निकलकर व्यवस्थित और संगठित हो रहा हो तो ऐसे वक्त में केवल बच्चों से उम्मीद की जा सकती है कि उनका सच बाकी जमाने से ज्यादा खरा होगा

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झूठ के दौर में दुनिया को आईना दिखाती है सुनयना की आवाज

ऐसे दौर में जब टीवी स्क्रीन पर न्यूज चैनल से दिनरात आती ‘तू,तू—मैं,मैं' की डरावनी आवाजों से लोग आजिज आ चुके हों, सातवी कक्षा में पढ़ने वाली एक बच्ची सुनयना के मार्फत कही गई कहानी नजीर बनकर आती है. यदि आप इस कहानी में को यूं न भी मानें कि इसे बतौर एंकर एनडीटीवी के प्रमुख प्रणय रॉय अंजाम दे रहे हैं तो ही इसका महत्व कम नहीं हो जाता! आप केवल यह देखिए कि वह किस धैर्य से बातें करके जीवन के तमाम सवालों को सामने ला रहे हैं, इसलिए आलोचना के खतरे को समझते हुए भी मैं कह रहा हूं कि यह हालिया समय की सबसे बेहतरीन टीवी रिपोर्ट है.

चुनावी काल में राजनीति जब अपने चरम पर हो और रोज—ब—रोज संचार माध्यमों से आपके कानों तक हजारों सूचनाएं पहुंच रही हों, तो ऐसे में तय कर पाना ही मुश्किल हो रहा है कि आखिर सच क्या है. आश्चर्य तो यह भी है कि महात्मा गांधी के माध्यम से दुनिया में सच को जानने—समझने और प्रयोग करने की सबसे बड़ी प्रयोगशाला में गांधी के जाने के इतने कम समय में सच सबसे बड़े खतरे में लगता है. बड़ा फर्क और बुनियादी फर्क तो यह कि झूठ मानवीय व्यवहार के हिस्से से आगे निकलकर व्यवस्थित और संगठित होकर अपना आकार दिनों—दिन बड़ा कर रहा हो, ऐसे वक्त में केवल बच्चों से उम्मीद की जा सकती है कि उनका सच बाकी जमाने से ज्यादा खरा होगा. यकीनन सुनयना के हर जवाब में आपको सच सुनाई देता है.

मुश्किल बात यह है कि हम बच्चों की आवाज तो सुनना ही नहीं चाहते हैं, क्योंकि हमने मान लिया है कि इस दुनिया के नीति—नियंता तो बड़े ही हैं, बच्चे इस दुनिया के हितग्राही भर हैं, उनकी राय का, उनकी आवाज का इस दुनिया का बनाने में कोई महत्व नहीं है, इसलिए समाज का हर तबका बच्चों से बात करने से तकरीबन बचता ही रहा है. पर आप बच्चों के पास जाईए, उनसे दोस्ती कीजिए, उन्हें मौका दीजिए और उनकी बातें सुनिए, सुनयना की तरह वह आपको जीवन के तमाम उबड़—खाबड़ रास्तों से वाकिफ कराएंगे, जिन पर आप चलेंगे तो वहां पहुंचेंगे जहां से आपको सच समझने का रास्ता मिलेगा, क्योंकि उनकी दुनिया सिर्फ स्वार्थ पर टिकी दुनिया नहीं हैं. उनकी चिंता में गांव के जानवरों से लेकर हर बारीक मसला है. उनको पता है कि शहर की सब्जी में ज्यादा मसाले पड़ते हैं और उन्हें हल्दी—मिर्च से काम चलाना पड़ रहा है, इसके बावजूद वह खाना बनाने का हौसला रख रही हैं. उन्हें शराब की समस्या भी पता है और यह भी पता है कि उज्जवला का सिलेंडर क्यों नहीं बन पा रहा है? वह बड़े लोगों के बच्चों का घमंड भी महसूस कर पा रही है और यह भी उम्मीद कर रही है कि उसके रिटायर्ड बड़े गुरुजी अब भी उसके स्कूल में आएं.


खेती और घर की अर्थव्यवस्था पर भी सुनयना की समझ क्या किसी वयस्क से कम है. इन परिस्थितियों के बीच भी वह डॉक्टर बनने का ख्वाब पाले है, वह भी खुद के कैरियर से ज्यादा इसलिए कि गांव में लोग बीमार हैं, इसलिए डॉक्टर बनकर अस्पताल भी गांव में ही खोलना है, खोज लीजिए कि डॉक्टरी पढ़ने के बाद डॉक्टर गांव की तरफ के अस्पताल की ओर अपना मुंह भी नहीं करते. इसलिए सुनयना जब बात करती है तो उसके विकास की, उसके सपने के गांव की, उसके सपने के भारत का रास्ता ठीक वैसा ही जाता दिखाई देता है, जैसे कि जाना चाहिए, अलबत्ता हमारा समाज ऐसी किसी भी आवाज पर तवज्जो देता दिखाई नहीं देता है.
 
पिछले साल जब मध्यप्रदेश के तकरीबन दस जिलों में हमने बहुत व्यवस्थित तरीके से ढाई हजार बच्चों की आवाजें लेने का एक प्रयोग किया था तो उसमें भी तकरीबन हर विषय पर उनकी गंभीर सोच सामने आई थी. उसके बाद विधानसभा चुनाव के लिए बच्चों की ओर से एक घोषणा-पत्र बनवाने की बात आई तब भी बच्चों ने उसको केवल अपने मुद्दों तक सीमित न रखकर खेती—किसानी—रोजगार तक की बात गहराई से की. बच्चों की बातें हैरान करने वाली लगती हैं कि कैसे वह बाल सगाई की त्रासदी को भी समझते हैं जबकि हमारा पूरा विमर्श केवल बाल विवाह तक ही सीमित है, और देश ने नियम—कानून भी केवल उसी को मान्यता देते हुए बनाए हैं.

प्रणय की यह रिपोर्ट बच्चों की आवाज सुने जाने और बेहतरीन ढंग से सामने रखे जाने का एक रास्ता दिखाती है.

राकेश कुमार मालवीय NFI के पूर्व फेलो हैं, और सामाजिक सरोकार के मसलों पर शोधरत हैं...

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