रबीन्द्रनाथ टैगोर का राष्ट्रवाद और आज का समय

7 अगस्त 1941 को रबिन्द्रनाथ टैगोर का निधन हुआ था. इन 80 सालों में टैगोर का रचना संसार फैला ही है. उन रचनाओं में जिस संसार की कल्पना है वो शायद नज़र नहीं आता.

रबीन्द्रनाथ टैगोर का राष्ट्रवाद और आज का समय

7 अगस्त 1941 को रबिन्द्रनाथ टैगोर का निधन हुआ था. इन 80 सालों में टैगोर का रचना संसार फैला ही है. उन रचनाओं में जिस संसार की कल्पना है वो शायद नज़र नहीं आता. 120 साल पहले 5 अगस्त के ही दिन लिखी उनकी रचना टैगोर के पाठक संसार में घूमने लगी जिसमें टैगोर लिखते हैं कि मंदिर में कोई भगवान नहीं है. संत के मुख से सुनकर राजा क्रोधित हो जाता है. कहता है मंदिर निर्माण के सभी कर्मकांड पूरे करने के बाद हमने 2 लाख स्वर्ण मुद्राएं लुटा दीं और आप कहते हैं मंदिर में भगवान नहीं है. संत कहते हैं कि जिस साल आपकी बीस लाख प्रजा भयंकर सूखे से त्रस्त हो, लोगों के पास खाने के लिए अनाज न हो, आपके दरवाज़े पर भीख के लिए आते हैं तो लौटा दिया जाता है, जो जंगलों, खंडहर हो चुके मंदिरों में शरण लिए हुए हैं. उस साल में आपने 2 लाख स्वर्ण मुद्रा खर्च कर भव्य मंदिर का निर्माण किया, उस दिन भगवान ने कहा कि मेरे घर की बुनियाद मूल्यों पर है. सत्य, शांति, करुणा और प्यार से बना है मेरा घर. जो राजा अपनी गरीब जनता को ठिकाना नहीं दे सकता वो मुझे क्या घर देगा. राजन तुमने जो मंदिर बनाया है वो खोखला है. वह दौलत और गौरव का बुलबुला है.

ऐसे अनेक प्रसंग मिल जाएंगे जो वैभव और गौरव की व्यर्थता को बताते हैं. टैगोर से पहले के भी और टैगोर से बाद के भी. बंगाल में ही राष्ट्रवाद, संस्कृति और धर्म की व्याख्या के कई छोर मिल जाएंगे. विवेकानंद हों या बंकिमचंद्र या फिर खुद रबिन्द्रनाथ टैगोर. और भी कई विचारक हैं. वहां के रचनाकारों ने राष्ट्र को अनेक रूपों में परिभाषित किया. उसकी बुराइयां देखीं, उसकी ख़ूबियां देखीं और उन ख़ूबियों के लिए जान दिया. सांस्कृतिक क्षेत्र में टैगोर की मौजूदगी जिस तरह से है, राष्ट्रवाद के क्षेत्र में क्या उनके विचारों का प्रभाव वैसा है? वैसा प्रभाव क्यों नहीं बन पाया? हम रोज़ राष्ट्रवाद के बेतुकेपन को देखते हैं और रोज इसे और मज़बूत होते हुए भी देखते हैं.

पूर्वी लद्दाख में जब चीन के भारतीय सीमा में घुसपैठ की खबर आई तब एक जन आक्रोश पैदा किया गया. टिक टॉक जैसे ऐप बैन कर. चीन की कंपनी को बंद कर चीन को सबक सीखाने का जश्न मना. फिर कहा गया कि चीन ने भारतीय सीमा में प्रवेश ही नहीं किया है. तब समझ नहीं आया कि टिक टॉक क्यों बैन किया. फिर खबर आई की इंडियन प्रीमियर लीग का आयोजन होगा और उसका स्पांसर चीन की कंपनी वीवो करेगी. क्रिकेट प्रेमी देश प्रेमी भी होते हैं. डुएल सिम की तरह. उनका आक्रोश ही नज़र नहीं आया. वीवो ने अपनी तरफ से स्पांसरशिप से हटने का एलान कर दिया. BCCI ने कहा कि 2020 के लिए ये साझीदारी स्थगित करते हैं. यह नहीं कहा कि चीन की कंपनी का नमक लेकर कभी यह मैच नहीं कराएंगे. भविष्य के लिए हर कोई दुकान खोले रखना चाहता है.

बहरहाल इन खबरों के बीच एक खबर और आ गई 6 अगस्त को, कि भारत के रक्षा मंत्रालयन ने अपनी वेबसाइट पर यह जानकारी दी है कि चीन ने भारत की सीमा में प्रवेश किया था. जब सवाल उठे तो रक्षा मंत्रालय ने वो जानकारी हटा ली. वेबसाइट से जानकारी हटा लेने से क्या अपनी ज़मीन से चीन भी चला गया होगा? रक्षा मंत्रालय ने अपनी मासिक रिपोर्ट में लिखा है कि 5 मई के बाद से चीनी आक्रामकता में तेज़ी आई है. चीन ने 17-18 मई के बीच कुरांग नाला, गोगरा और पैंगांग के उत्तरी किनारे का अतिक्रमण किया है. एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार रक्षा मंत्रालय ने नहीं बताया कि किस कारण से वेबसाइट से यह जानकारी हटाई गई. यह एक नए किस्म का डिलिट नेशनलिज्म है. झूठ से बचने के लिए डिलिट तो सच छिपाने के लिए डिलिट.

5 अगस्त को नए भारत के उदय की आधिकारिक घोषणा हो चुकी है. बेस्ट बात ये है कि नए भारत के पहले के भारत में झांक कर देखने पर अभी रोक नहीं लगी है. उसी छूट का लाभ उठाते हुए टैगोर के राष्ट्रवाद को समझने का प्रयास फिर से करना चाहता हूं. फिर से इसलिए कि दिसंबर 2016 में भी एक बार ऐसी चर्चा की थी. टि‍क टॉक और वीवो जैसी कंपनियों के आगे राष्ट्रवाद कितना आत्मनिर्भर हो रहा है क्या हम उसकी सार्थकता या व्यर्थता को टैगोर के बहाने समझ सकते हैं? एक वेबसाइट है टैगोर वेब डॉट इन. इस पर टैगोर का एक कथन है जो उन्होंने 1908 में कहा था.

"देशप्रेम हमारा आख़िरी आध्यात्मिक सहारा नहीं बन सकता. मेरा आश्रय मानवता है. मैं हीरे के दाम में ग्लास नहीं ख़रीदूंगा और जब तक मैं ज़िदा हूं मानवता के ऊपर देशप्रेम की जीत नहीं होने दूंगा"

1882 में बंकिम बंदे मातरम लिख चुके थे. 1911 तक टैगोर जन गण मन लिख चुके थे. दोनों की रचनाओं के बग़ैर राष्ट्रवाद की कोई अभिव्यक्ति पूरी नहीं होती. ऐसा कोई वक्त नहीं होता जब इस धरती पर इन्हें कोई गा नहीं रहा होता है. इकोनोमिक टाइम्स में दिवंगत पत्रकार अभीक बर्मन ने लिखा था कि टैगोर के बारे में यह झूठ फैलाया जाता है कि उन्होंने जन गण मन ब्रिटिश सम्राट जॉर्ज पंचम की शान में लिखा. रवींद्रनाथ टैगोर ने एक पत्र में लिखा था कि मैं कभी किसी जॉर्ज पांच छह या किसी अन्य जॉर्ज के लिए गीत नहीं लिख सकता. टैगोर को लगता था कि राष्ट्रवाद के नाम पर आवाज़ दबाई जाएगी. रचनात्मकता पर पहरा लगेगा कि आप ये सीन नहीं दिखा सकते. ये कविता नहीं सुना सकते.

टैगोर के राष्ट्रवाद से हम आज या अतीत के राष्ट्रवाद की आलोचना तो कर सकते हैं लेकिन आलोचनाओं का यह सिलसिला न तो वहां से शुरू होता है और न आज तक ख़त्म हुआ है. इसके बाद भी राष्ट्रवाद की राजनीति और जनमानस में अनिवार्य उपस्थिति है. बंगाल में ही टैगोर की सांस्कृतिक मौजूदगी पहचान की एक समानांतर रेखा की तरह है. वहां के अनेक विचारों के साथ टैगोर के विचार समानांतर रेखा की तरह चलते रहते हैं. कोई एक को दूसरे से नहीं काटता. मौसम के हिसाब से बंगाल की फिज़ा में सब हैं. बंकिम हों या विवेकानंद या क्रांतिकारियों की धारा. मानवता पर ज़ोर देने के बाद भी बंगाल ने सांप्रदायिकता की विनाशलीला खूब देखी है.

टैगोर सिर्फ आकृति नहीं हैं. कि कोई उनकी तरह का हुलिया बनाकर बंगाल में घूमने लगेगा. बंगाल के स्कूलों में और दुर्गा पूजा के नाटकों में फैन्सी ड्रेस वाले टैगोर से लेकर बोस तक बन कर घूमते रहते हैं. इन दिनों व्हाट्सएप यूनिवर्सिटी में चर्चा आम है कि कोई टैगोर बनने के लिए केश और दाढ़ी बढ़ा रहा है. इसकी जगह ये लोग टैगोर की किसी रचना पर चर्चा कर लेते तो व्हाट्सएप यूनिवर्सिटी सार्थक हो जाती.

टैगोर का साहित्यिक संसार काफी बड़ा है. टैगोर ने कहा था कि वे ब्रिटेन के बारे में अपनी राय उसके विशाल साहित्य भंडार के आधार पर बनाते हैं. युद्ध को आप चाहें जिस भी तरह से लिखें, उसका मतलब हत्या, लूटपाट, आगजनी और बलात्कार ही होता है. 55 साल की उम्र में टैगोर 1916 और 1917 के साल जापान और अमेरिका जाकर राष्ट्रवाद पर लेक्चर दे रहे थे. कहते हैं कि जब मुल्क से प्यार का मतलब भक्ति या पवित्र कार्य में बदल जाए तब विनाश निश्चित है. मैं देश को बचाने के लिए तैयार हूं लेकिन मैं किसकी पूजा करूंगा ये मेरा अधिकार है जो देश से भी कहीं ज़्यादा बड़ा है. ये टैगोर के शब्द हैं.

राष्ट्रवाद कभी खत्म नहीं हुआ. राजनीति के क्षेत्र में इसका विकल्प कम ही दि‍खता है. हर राजनीतिक दल अपनी तरह का राष्ट्रवाद गढ़ता है. जो नहीं गढ़ पाता उसे भी याद दिलाया जाता है कि आपको भी गढ़ना है. लोगों को पता है कि इसके नाम पर नेता ठग रहा है मगर यह वो वाद है कि इसके सामने ठगे जाने में ही जनता आनंदित होती है. वर्ना इसका प्रभाव परमाणु गिराकर 1 लाख 40,000 लोगों को मार देने या इसके नाम पर 60 लाख यहूदियों को मार देने के बाद खत्म हो जाता. आज भी इसके नाम पर दूसरे तरीके की हत्याएं हो रही हैं. करोड़ों लोगों को ग़रीब बनाकर चंद लोगों की जेब भरी जा रही हैं. बस आज का राष्ट्रवाद अंतिम समय तक ज़िंदा रहने की मोहलत देता है.

टैगोर ने लिखा है कि मैं किसी एक राष्ट्र के ख़िलाफ़ नहीं हूं. सभी राष्ट्रों के एक सामान्य विचार के ख़िलाफ़ हूं. आख़िर यह राष्ट्र क्या है. राष्ट्र के संगठन के पीछे हमारी तमाम नैतिक शक्तियां लग जाती हैं. बलिदान उस नैतिक शक्ति का सबसे बड़ा प्रतीक है. मानव के त्याग करने की शक्ति अपने अंतिम उद्देश्य से भटक जाती है. वह अपनी अंतरात्मा से मुक्त हो जाता है. खुद को मशीन पर डाल देता है. यानी टैगोर कह रहे हैं कि इसकी धुन में हम हम नहीं रहते. कुछ और हो जाते हैं. नेता इस बात को जानते हैं. इसलिए राष्ट्रवाद उनके लिए वो मशीन है जिस पर आप खुद को डाल देते हैं.

इंसान के इतिहास में आतिशबाज़ी के कुछ ऐसे दौर भी आते हैं जो अपनी ताकत और रफ़्तार से हमें चौंका देती है. ये न केवल हमारे घर में रखे छोटे छोटे दीयों का मज़ाक उड़ाते हैं बल्कि सृष्टि की शुरुआत का भी मज़ाक उड़ाते हैं. लेकिन इस तड़क-भड़क और दिखावों से घर के दीयों को बुझने मत दीजिए. हमें इस तिरस्कार को धैर्य के साथ सहना होगा कि इस आतिशबाज़ी में आकर्षण तो है लेकिन यह टिकाऊ नहीं है क्योंकि इसकी शक्ति इसकी आग तक ही है. इसके बुझते ही वो समाप्त हो जाती है.

टैगोर का वैकल्पिक राष्ट्र क्या था? या सिर्फ राष्ट्रवाद की आलोचना ही थी? 1905 से 1912 के तक चले स्वदेशी आंदोलन के बीच उन्हें ऐसा क्या लगा कि वे राष्ट्रवाद के खिलाफ लिखने लगे. क्या आप आज के या किसी भी समय में जनता के बीच राज्य की अनिवार्यता को खत्म कर सकते हैं और अगर नहीं तो राज्य के रहते राष्ट्रवाद की अनिवार्यता को ख़त्म कर सकते हैं? राष्ट्रवाद के भीतर संशोधन की गुंज़ाइश कम है. उसकी जो प्रकृति है वही उभर उभर कर सामने आती रहती है.

ऐसा कवि दूसरा कहां है जिसकी कल्पना में एक यूनिवर्सिटी थी मगर जब यूनिवर्सिटियां दीवारों में कैद हो रही थीं टैगोर खुलेपन का प्रयोग कर रहे थे. टैगोर की कल्पना की यूनिवर्सिटी आज भारत में ही दूसरी न बन सकी और अब तो विश्व भारती भी उन्हीं संकटों का शिकार है जिन संकटों का खतरा दूसरी यूनिवर्सिटी के सर मंडरा रहा है. टैगोर राजनीतिक स्वतंत्रता की जगह नैतिक और आध्यात्मिक स्वतंत्रता को बड़ा मानते थे. राजनीतिक स्वतंत्रता को लेकर उनकी बातों का अर्थ यही था कि इसके नाम पर चंद अमीर लोगों का गिरोह तैयार होता है जो स्वतंत्रता की आड़ में गुलामी के विशाल संगठन बना लेते हैं. वे कहते हैं कि अलग सोचने वाले संगी साथियों के जीवन को कठिन बना देने की सामाजिक आदत का प्रभाव राजनीतिक संगठन पर भी पड़ता है. जिसके ज़रिए सामान्य मतभेदों को दबाने का अत्याचार शुरू हो जाता है.

नेशनल बुक ट्रस्ट ने टैगोर के राष्ट्रवाद का हिन्दी अनुवाद छापा है जिसे सौमित्र मोहन ने किया है. मात्र 40 रुपये की यह किताब है. आप वहां से भी राष्ट्रवाद पर टैगोर के लेखों को पढ़ सकते हैं. अंग्रेजी बांग्ला में तो यह लेख है ही. टैगोर इस बात को लेकर सचेत हैं कि अच्छे और ईमानदार लोग भी इस राष्ट्रवाद का इंसानीयत के खिलाफ इस्तमाल करते हैं. टैगोर अपनी आलोचना में ईमानदार और अच्छे लोगों की इस सीमा को क्यों रेखांकित कर रहे हैं और लिखते हैं कि ईमानदार लोग भी अपने विकास के लिए दूसरों के मानव-अधिकारों को छीन सकते हैं और वंचितों को दोष देते हुए कह सकते हैं कि इससे बेहतर व्यवहार के वे अधिकारी नहीं हैं. जो लोग अपने स्वभाव से ठीक होते हैं वे भी अपने काम और विचार से दुनिया को उसके रेगिस्तानों के लिए तैयार करने में मदद कर रहे हैं.

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टैगोर का ज़ोर इस बात पर रहता है कि भारत का भविष्य नैतिक आदर्शों से समृद्ध है. लेकिन उसके नाम पर ही इतनी ठगी है उसका हश्र हम रोज़ देखते हैं. ऐसी कोई संस्था नज़र नहीं आती तो अपने कर्तव्यों की नैतिकता पर खरी उतरती हो. चाहे कोर्ट हो, चाहे मीडिया हो या पुलिस जो कभी थी ही नहीं. टैगोर कहते हैं कि यह सोचना ही गलत है कि मानव की महानता का एक ही रास्ता है जिसे दुष्टता के साथ बनाया गया हो.

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VIDEO: रवीश कुमार का प्राइम टाइम : रबीन्द्रनाथ टैगोर का राष्ट्रवाद और आज का समय