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राज्यपाल बनाम रवीश कुमार नहीं था वह, तब फिर दोनों हाथ क्यों मिलाते, साथ खाना क्यों खाते...

राज्यपाल जी ने आते ही मुझसे हाथ मिलाया और प्राइम टाइम के यूनिवर्सिटी सीरीज़ का ज़िक्र किया और कहा कि शुक्रिया आपका, आपकी वजह से मैंने बिहार में बहुत कोशिश की मगर तबादला हो गया.

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राज्यपाल बनाम रवीश कुमार नहीं था वह, तब फिर दोनों हाथ क्यों मिलाते, साथ खाना क्यों खाते...

“आप सब सार्वजनिक जीवन में जा रहे हैं जो भी करेंगे वह सार्वजनिक जीवन का दायरा होगा. तो आपकी उस जवाबदेही में यह चिन्ता भी होनी चाहिए कि पड़ोस की चंबल नदी के सेहत की चिन्ता करें और यह चिन्ता भी होनी चाहिए कि सुदूर श्रीनगर के राजभव में फैक्स मशीन की हालत कैसी है. बेजवाड़ा भाई ने अस्थि पंजर को झकझोर दिया. आप टेक्नालजी के छात्र हैं तो गटर की सफाई की मशीन पर ध्यान दीजिए और एक ऐसी फैक्स मशीन भी बनाइये जो शाम सात बजे के बाद भी ख़राब न हो. यह बात मैंने क्यों कहीं. मैं चाहता तो अपने विशिष्ठ अतिथि के सम्मान में इस बात को किनारे रख  सकता था, मगर यह बात मैंने इनके सामने ही कही क्योंकि यही लोकतंत्र है. मुझे इन पर पूरा भरोसा है कि यह मुझे कभी नहीं कहेंगे कि रवीश कुमार ने यह बात आई एस आई के इशारे पर कही है. यह लोकतंत्र हैं। आपका सवाल जिनसे होता है आप उन्हीं से मुखाबित होते हैं.“ 

बिल्कुल यह बात मैंने कही और जम्मू कश्मीर के राज्यपाल सत्यपाल मलिक के सामने कही. लेकिन यह पूरी तस्वीर नहीं है. जब तक आप दोनों बातों को नहीं जानेंगे, आप सिर्फ वायरल हुए वीडियो को सच समझ कर रह जाएंगे. ग्वालियर के आई टी एम यूनिवर्सिटी में जिस तरह से खुलकर सारे वक्ता बोल रहे थे, वह आज कल की यूनिवर्सिटी में कल्पना करना मुश्किल है. एक छोर पर बेजवाड़ा विल्सन नौजवानों को झकझोर रहे थे तो दूसरे छोर पर पूर्व सेनाध्यक्ष जनरल दलबीर सुहाग काम करने और ढिंढोरा न पीटने का मतलब समझा रहे थे. तभी सूचना मिली कि राज्यपाल सत्यपाल मलिक आ रहे हैं. राज्यपाल जी ने आते ही मुझसे हाथ मिलाया और प्राइम टाइम के यूनिवर्सिटी सीरीज़ का ज़िक्र किया और कहा कि शुक्रिया आपका, आपकी वजह से मैंने बिहार में बहुत कोशिश की मगर तबादला हो गया. हम दोनों इस संक्षिप्त टिप्पणी के साथ अपनी अपनी कुर्सी पर बैठ गए.


जीवन में पहली बार मिल रहे दो लोगों के बीच गर्मजोशी भरने के लिए इतनी तारीफ़ काफी थी. हम दोनों सहज हो गए. मैं उनसे सम्मान पाकर कृतज्ञ हो गया. मगर यही कृतज्ञता मुझे बेचैन करने लगी. मैं उससे लड़ने लगा. उस स्पेस की लड़ाई शुरू हो गई, जिसके विस्तार के लिए मैं ख़ुद से जूझता रहता हूं और सत्ता से भिड़ता रहता हूं. चंद सेकेंड के दायरे में तय कर लिया कि मैं जो बोलना चाहता हूं, उस पर राज्यपाल की कृतज्ञता को हावी नहीं होने दूंगा. यूनिवर्सिटी के संस्थापक रमाशंकर सिंह सत्यपाल मलिक के जवानी के दिनों के साथी रहे हैं. मुझे अपने मेज़बान की भी चिन्ता हो गई. एक किस्म का मनोवैज्ञानिक दबाव बनने लगा कि मेरे बोल देने से कहीं उनके रिश्तों पर असर न पड़ जाए. मंच के सामने रमाशंकर सिंह और सत्यपाल मलिक के पुराने दिनों के एक और वेद प्रताप वैदिक बैठे थे. मुझे ये पता था कि वैदिक जी बुरा नहीं मानेंगे.

मैं ख़ुद को टेस्ट करने लगा. क्या मुझे इस इम्तहान से गुज़रना चाहिए? चंद सेकेंड के फासले में तय कर लिया कि मैं इस इम्तहान से गुज़रना चाहता हूं. मैं जो भी कहना चाहता हूं वो अभी कहूंगा और सामने कहूंगा. जब अपने भाषण के लिए उठा तब यह संघर्ष और तेज़ हो गया. माइक तक पहुंचने में बहुत कम सेकेंड का फासला था. हम क्यों इतना रोकते हैं ख़ुद को, बोलने से डरते क्यों हैं, संकोच क्यों करते हैं, बोल दूंगा तो क्या हो जाएगा. जो होना है वो तो हो चुका है, जो हो चुका है वही तो बोल रहा हूं. तभी ध्यान आया कि बोलने के बाद उन्हीं के बगल में जाकर बैठना है. मेरे और राज्यपाल के बीच ज़्यादा दूरी नहीं थी. हम दोनों के बीच सिर्फ एक कुर्सी का फासला था. मेरे बोलने पर खूब तालियां बजीं, राज्यपाल झेंप गए लेकिन जब लौट कर अपनी कुर्सी की तरफ आया तो उन्होंने मुझसे हाथ मिलाया. मैं बैठ गया. यह लोकतंत्र का एक शानदार लम्हा था. इससे भी शानदार लम्हा अभी आना बाकी था.

अब राज्यपाल भाषण देने के लिए कुर्सी से उठते हैं. मेरी बात का असर उनके दिमाग़ पर हो चुका था. उनके पास भी तय करने का वक्त कम था कि मेरी बात पर जवाब दें या जो तैयार कर आएं हैं वही बोलें. आम तौर पर राज्यपाल दीक्षांत समारोहों में औपचारिक किस्म का भाषण देते हैं. सत्यपाल मलिक के भीतर उनकी जवानी के दिनों का छात्र नेता जाग उठा. उनके बातों में हल्का सा गुस्सा दिखा लेकिन उन्होंने मेरा ज़रा भी अपमान नहीं किया. भाषा की मर्यादा नहीं तोड़ी. वे मेरा नाम लेकर बात कहने लगे. मुड़ कर मेरी तरफ देखने लगे. बताने लगे कि क्यों यह फैसला किया. फैक्स मशीन की बात पूरी बात नहीं है. सत्यपाल मलिक ने कहा भी कि रवीश भाई आपने फैक्स मशीन की बात कह मुझे डीरेल कर दिया यानी पटरी से उतार दिया. मैं अब उनकी बात को रिकार्ड करने लगा था. मैं एक राज्यपाल को अपनी ही बात की प्रतिक्रिया में कैमरे के पीछे से देख रहा था.

राज्यपाल ने जो जवाब दिया उसमें किसी को नहीं छोड़ा. न कश्मीर के नेताओं को न ही दिल्ली की सरकार को और न ही कश्मीर को बदनाम करने वाले दिल्ली मीडिया को. वह अजीब विडंबनाओं का लम्हा था. कश्मीर में कथित रूप से संविधान और लोकतंत्र की हत्या के आरोप के संदर्भ में राज्यपाल अपना पक्ष रख रहे थे मगर इसी प्रक्रिया में वे लोकतंत्र का विस्तार भी कर रहे थे. एक नया पैमाना गढ़ रहे थे. जनता के बीच जवाब दे रहे थे. वे चाहते तो अपने पद की हैसियत का इस्तमाल करते हुए मेरे बारे में उल्टा सीधा बोल सकते थे, मगर ऐसा बिल्कुल नहीं किया तब भी जब मैंने उन्हें डी-रेल कर दिया था. राज्यपाल सत्यपाल मलिक भी अचानक आए इस इम्तहान में शानदार नंबरों से पास हो गए.

उनका भाषण ख़त्म हुआ. अपनी कुर्सी की तरफ आने लगे तो मैं अपनी कुर्सी से उठा. उन्होंने अपना हाथ बढ़ाया और मैंने अपना. हम दोनों ने हाथ मिलाया. न तो उनकी नज़रों में गुस्सा था और न ही मेरी नज़रों में शर्मिंदगी. वे राज्यपाल वाली अपनी ऊंची कुर्सी पर बैठ गए. राष्ट्रगान के बाद जब वे जाने के लिए उठे तो मेरी तरफ आए और कुछ बाते बताने लगे. उस क्षण में भी वे मुझ से भरोसा मांग रहे थे और मैं भरोसा न तोड़ने का वादा कर रहा था. उन्होंने मुझ पर भरोसा किया और बातें बताईं. मैंने कहा कि लेकिन जो आपने भाषण दिया है उसकी रिकार्डिंग दिल्ली भेज दी है. बस मैं चलाने से पहले आपको बता देना चाहता हूं. उन्होंने कहा जो ऑन रिकार्ड कहा है वो ऑन रिकार्ड है. हम दोनों हंसने लगे. पीछे खड़े उनके एडीसी की हंसी छूट गई. शायद उन्होंने भी ऐसा नहीं सोचा होगा कि लोकतंत्र में यह भी हो सकता है.

इसके बाद हम लोग रमाशंकर सिंह के घर पहुंचे. उनके लॉन में एक मेज़ पर एक तरफ राज्यपाल खाना खा रहे थे और दूसरी छोर पर मैं आकर बैठ गया. आस-पास के लोग सहमे देख रहे थे कि यहां फिर आमने-सामने हैं. मैं थाली में दाल और रोटी की जगह तय करने में व्यस्त हो गया ताकि मछली के लिए ठीक-ठाक जगह बन सके. तभी राज्यपाल सत्यपाल मलिक अपनी कुर्सी से उठकर मेरे बगल में आ गए. किसी ने बगल में कुर्सी रखी और राज्यपाल मेरे करीब बैठ गए. उन्होंने बहुत कुछ बताया कि कश्मीर के युवाओं के लिए क्या क्या कर रहे हैं. मैंने कहा कि लद्दाख में यूनिवर्सिटी नहीं है. छात्र बहुत परेशान हैं. सत्यपाल मलिक ने कहा कि मुझे पता है और मैं कुछ कर रहा हूं. कुछ बातें और भी हुईं जिनका यहां बताने का मतलब नहीं है. इसके बाद राज्यपाल मलिक इजाज़त लेकर उठे कि मुझे जाना पड़ेगा क्योंकि अंधेरा हो जाने पर मेरा हेलिकाप्टर लैंड नहीं कर पाएगा. यह लोकतंत्र का सबसे रचनात्मक क्षण था.

आई टी एम यूनिवर्सिटी में राज्यपाल ने कश्मीर को लेकर जो कहा उसे लेकर विवाद हो सकता है. उस पर मेरी कोई ठोस राय नहीं है क्योंकि मैं कश्मीर का जानकार नहीं हूं. लेकिन उस दौरान जो उनका व्यवहार था वह मेरे जीवन के यादगार क्षणों में से एक है. शायद यह राज्यपाल सत्यपाल मलिक के जीवन का भी शानदार लम्हा रहा होगा. भारत के लोकतंत्र को ऐसे और शानदार लम्हों की ज़रूरत है. जिस तरह से सामने सवाल करने की परंपरा ख़त्म होती जा रही है, उसके लिए ज़रूरी है कि इस स्पेस को फिर से हासिल किया जाए.

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मैंने यह सब इसलिए लिखा ताकि आप बेहतर तरीके से जज कर सकें कि लोकतंत्र के स्पेस को हासिल करने का यह तरीका कितना सही था और दोनों ने इस इम्तहान को कैसे पास किया. फिज़ा में डर का माहौल है. पूछो मत नौकरी चली जाएगी. पूछो मत ट्विटर पर गाली देने वाले आ जाएंगे. हम दोनों ही इस दबाव से मुक्त थे. जब आप दोनों बातें जानेंगे तभी आप सही तरह से जज कर पाएंगे कि उस दिन जो हुआ उसका लाभ किसे मिला है. लोकतंत्र के माहौल को मिला है या फिर किसी एक व्यक्ति को.

मैं यह सारी बातें नहीं लिखता तो उनके उस वक्त के व्यवहार के साथ अनादर हो जाता और आप वायरल हो रहे मेरे वीडियो से सिर्फ एक ही पक्ष को जान पाते. राज्यपाल ने मेरे सवाल पूछने के अधिकार और बोलने के स्वभाव की सराहना की. मुझे कश्मीर आने का न्यौता दिया. इन सबके लिए राज्यपाल सत्यपाल मलिक का शुक्रिया.



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