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गंभीर मुद्दे इन चुनावों से गायब क्यों रहे? रवीश कुमार के साथ प्राइम टाइम

2019 के चुनाव में अगर किसी चीज की हार हुई है तो गंभीरता की हुई है. गंभीर मुद्दे चुनाव से गायब हुए लेकिन कार्टून की दुनिया में उनकी गंभीरता बची रही.

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गंभीर मुद्दे इन चुनावों से गायब क्यों रहे? रवीश कुमार के साथ प्राइम टाइम

रवीश कुमार

नमस्कार मैं रवीश कुमार, 2019 के चुनाव में अगर किसी चीज की हार हुई है तो गंभीरता की हुई है. गंभीर मुद्दे चुनाव से गायब हुए लेकिन कार्टून की दुनिया में उनकी गंभीरता बची रही. इंटरव्यू होता नहीं था कि लोग हंसना शुरू कर देते थे. ह्मूमर नहीं होता तो 2019 का चुनाव सीरियस नहीं होता. पत्रकारों की जगह अभिनेताओं ने ले ली और सवाल लतीफे बन गए. कई बार तो लगा कि नेता खुद ही कार्टून बन रहे हैं और कार्टूनिस्ट सिर्फ स्केच कर रहे हैं.

भयंकर गर्मी में हुए इस चुनाव में न्यूज चैनल उकताने लगे थे. तभी चौथे चरण के खत्म होते ही 29 अप्रैल को भारतीय सेना ने एक ट्वीट किया कि पहली बार मिथकीय येती के पांव के निशान देखे गए हैं. येती के आते ही चैनलों की बोरियत टूटी और हिम मानव पर चर्चा होने लगी. वैसे ही जैसे टेलकम पाउडर के विज्ञापन में पाउडर लगाते ही हिमालय की ठंडक आ जाती थी. चुनाव में येती रूपक बन गया. कार्टून का कैरेक्टर बन गया. सत्याग्रह के राजेंद धोड़पकर और बीबीसी हिन्दी के कीर्तिश के कार्टून ने येती को पकड़ लिया. 326 ईसापूर्व में सिकंदर महान जब उसने सिंधु घाटी पर विजय प्राप्त की थी तो उसने इच्छा ज़ाहिर की थी कि वह येती देखना चाहता है. ये जानकारी हमें नेशनल ज्योग्राफिक से मिली है. हम सोचते रहे कि चौथे चरण में हिम मानव कैसे आ गया. इसका जवाब सातवें चरण की समाप्ति से दो दिन पहले मिला जब भारतीय राजनीति के महामानव प्रधानमंत्री केदारनाथ की एक कंदरा में पहुंच गए. 10 हजार साल पहले मानव ने कंदरा छोड़ दी थी, 2019 में मानव निर्मित कंदरा से सीधा प्रसारण हुआ. यह विज्ञान की पुरातात्विक घटना थी. जैसे ही प्रधानमंत्री ने सभी सुविधाओं से लैस मानव निर्मित कंदराओं में ध्यान लगाया, मैदानी इलाकों में तप रहे ट्विटर वासियों का ध्यान टूट गया. खूब हंसी मजाक हुआ. लेकिन लोग सीरियस हैं. वे अब इन्हीं गुफाओं में जाना चाहते हैं. गढ़वाल मंडल निगम को खूब फोन आ रहे हैं. यह गुफा अभी आम लोगों के लिए रेडी नहीं है. शायद जुलाई तक नियमावली बन जाए तब बुकिंग शुरू होगी तब जाकर आप यहां सेल्फी ले सकेंगे.

पहली बार भारत के चुनाव में हिम युग और पाषाण युग की चर्चा हुई. अभी तक चुनाव ऐतिहासिक हुआ करते थे, अब प्रागैतिहासिक भी होने लगे हैं. आज हम इस युग को देखने वाले कार्टूनिस्टों से बात करेंगे. उन्होंने कैसे इस चुनाव को देखा. कार्टून की एक खास बात यह होती है कि पहले कैरेक्टर दिखता है, फिर कार्टून आता है. लेकिन कार्टूनिस्ट का चेहरा नहीं देख पाते. उनका नाम जानते हैं. उनके हस्ताक्षर को जानते हैं. पवन टून हैं पटना के कार्टूनिस्ट. हिन्दुस्तान अखबार में इनके कार्टून छपते हैं. इनकी भाषा अलग है. मैं पढ़कर बताता हूं बस आप सीरियस होकर समझिएगा.


पवन के इस कार्टून में टीवी के कवरेज पर तंज है. कैमरे वाले यहां वहां चढ़े नज़र आते हैं, दौड़ते नज़र आते हैं मगर जनता को खबर नज़र नहीं आती. इस कार्टून में चुनावी सभा को कवर कर रहे कैमरामैन से एक मतदाता कह रहा है कि देख लो ई चैनलवा वाला के, चौकीदार जी का हेलिकाप्टर उतरा नहीं, ई हम्मर गोईठा घांगते चढ़ गया खंभा पर, सबसे तेज खबर चलावे ला. यह व्यंग्य है कि मीडिया प्रधानमंत्री की रैली कवर करने के लिए कितना उतावला है.

इस कार्टून में टीवी की बहसों में जाने वाले एक्सपर्ट पर तंज है. एक्सपर्ट जी एग्जिट पोल की तैयारी कर रहे हैं. अपनी पत्नी से कह रहे हैं कि चाय छोड़ो, अभी लगातार बेल का शरबत ही पिलाते रहो कि कंठ ठंडायल रहे, अब कल से दो दिन चौबीस घंटा न्यूज़ चैनल पर चांए चांए ही करते रहना है एग्जिट पोल के नाम पर.

इस कार्टून में मतदाता डाक्टर के पास पहुंचा है. कह रहा है कि प्रचार समाप्त हो गया है उसे कुछ सुनाई नहीं दे रहा है. कह रहा है खाली सननाहट है कान में.

कार्टून वायरल होने लगे हैं. शेयर होने लगे हैं. अब अखबार के कोने में सिमटे नहीं रहते. और अब एक अखबार की संपत्ति भी नहीं रहे. पाठक कब कौन सा कार्टून लेकर दौड़ पड़ेगा ये अखबार के सीरियस संपादक को भी पता नहीं होता है. सतीश आचार्य के कार्टून कितने मारक हैं. आज के तमाम मुद्दों को अपनी नज़र से गढ़ने वाले सतीश आचार्य सुदूर दक्षिण में रहते हुए भी दिल्ली की राजनीति में धमक बनाए रखते हैं. चुनाव आयोग को लेकर उनके बनाए कार्टून पर नज़र डालिए.

यह देखिए ईसी यानी इलेक्शन कमीशन को किस तरह बनाया है. ई और सी को इस तरह से लिखा है जैसे आयोग की रीढ़ टेढ़ी हो गई हो. कर्सिव राइटिंग स्टाइल में ई का एक सिरा जी हजूरी में बदल जाता है.

सतीश का यह कार्टून बूथ लूटिंग का विकास बता रहा है. कैसे पहले बाहुबली पत्थर का मुगदल लिए मतदाता को खींचे चला आ रहा है. फिर बाहुबली मतपेटी हाथ में लिए चला जा रहा है. फिर बाहुबली ठप्पा लगाकर मतपेटी में बैलेट गिरा रहा है लेकिन अब आई टी वाला आ गया है जो ईवीएम मशीन को मैनेज कर रहा है.

ये कार्टून नमो टीवी पर है. यब कब आया किससे पूछ कर आया किसी को पता नहीं चला. पर अच्छी बात यह रही कि यह बिना बताए चला गया. सतीश के इस कार्टून में आप देखिए कि गोदी मीडिया के चैनल रो रहे हैं कि प्रभु हमारी निष्ठा में क्या कमी हो गई कि आप नमो टीवी ले आए. क्या हमारा काम अच्छा नहीं है.

यह कार्टून भी सतीश आचार्य का है. प्रधानमंत्री के सामने चैनलों के रिमोट टोकरी में रखे हैं. चुनाव आयुक्त पूछ रहे हैं कि सर आपके पास नमो टीवी का रिमोट है.

ऐसा नहीं है कि विपक्ष के नेताओं के कार्टून नहीं बने. लेकिन मुख्य रूप से मीडिया चुनाव आयोग और प्रधानमंत्री ही छाए रहें. मंजूल भी काफी लोकप्रिय कार्टूनिस्ट हैं. मंजुल ने चुनाव आयोग को लेकर कई कार्टून बनाए हैं.

इस कार्टून में अमित शाह पीछे से प्रधानमंत्री को कह रहे हैं कि मेरी सेना, मेरा एयर फोर्स कहना विवादास्पद है लेकिन चलेगा. मगर मेरा चुनाव आयोग नहीं कहना है.

इसमें एक पत्रकार माइक बढ़ाकर पूछ रही है कि चुनाव आयोग में कौन जीत रहा है. मुख्य चुनाव आयुक्त सुनील अरोड़ा, आयुक्त सुशील चंदा और आयुक्त अशोक ल्वासा में कौन जीतेगा. आप जानते हैं कि अशोक ल्वासा की असहमति को लेकर काफी विवाद हुआ था.

मीडिया का यह कोना धारदार रहा. कार्टूनिस्टों ने किसी को नहीं छोड़ा. कई बार लगा कि मीडिया के मीडिया नहीं होने की भरपाई कार्टूनिस्ट कर रहे हैं. बीबीसी हिन्दी पर कीर्तिश भट्ट के कार्टून भी मीडिया और चुनाव आयोग पर अपने समय को दर्ज कर रहे थे और शेयर हो रहे थे.

कीर्तिश के इस कार्टून में एक रिमोट है. सारे बटन पर नरेंद्र मोदी के नाम का अक्षर लिखा है. इस चुनाव में या उससे पहले भी मीडिया की यह छवि कार्टूनिस्टों को टीवी सेट के हर सामान में प्रधानमंत्री की छाप दिखा रही थी. इस कार्टून में किरदार चुनाव आयोग से कहता है कि इस वक्त चौकीदार तो आप हैं. जागिए. आयोग सो रहा है.

आप जानते हैं कि चुनाव के बीच में विश्व पुस्तक दिवस पड़ गया था. इसमें किरदार चुनाव आयोग को ही आचार संहिता की किताब भेंट कर रहा है.

Video: रवीश कुमार का प्राइम टाइम: गंभीर मुद्दे इन चुनावों से ग़ायब क्यों रहे?

सत्याग्रह स्क्रोल डॉट इन पर राजेंद्र धोड़पकर जी के कार्टून की बात न हो तो बात अधूरी रह जाएगी. राजेंद्र धोड़परकर जी के इस कार्टून में वैरागी महाराज दिखाई दे रहे हैं. उनके आगे पीछे कैमरे हैं. चमचे कह रहे हैं कि महाराज जी बड़े विरक्त संत हैं. इनके पास सिर्फ एक जोड़ी वस्त्र, कमंडल, मोबाइल और चार-चार कैमरामैनों के अलावा कुछ नहीं रहता है.

इस कार्टून में तानाशाह कौन है, इस बात को लेकर कंपटीशन है. पिंजड़े पर खड़े होकर प्रधानमंत्री और अमित शाह ममता बनर्जी को तानाशाह तानाशाह कह रहे हैं तो ममता बनर्जी भी उन्हें तानाशाह कह रही हैं. एक का तानाशाह भगवा रंग से लिखा है तो दूसरे का तानाशाह नीले रंग से लिखा है.

बीबीसी हिन्दी के गोपाल का यह कार्टून देखिए. गांधी को लेकर इस चुनाव में कितना कांव कांव हुआ. गोडसे को देशभक्त बताया गया है. गोपाल के इस कार्टून में कौओं का झुंड गांधी की मूर्ति पर चोंच मार रहा है. कांव कांव कर रहा है.

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नमो टीवी पर गोपाल ने भी कार्टून बनाए हैं. इसमें प्रधानमंत्री का आदमकद है. सिर पर टीवी है और हथेली में आचार संहिता. गोपाल शून्य के नाम से कार्टून बनाते हैं. एग्ज़िट पोल पर इनके कार्टून भी शानदार हैं.

तो कार्टूनिस्ट इस चुनाव को जिस नज़र से दर्ज कर रहे थे क्या मीडिया उस नज़र से इस चुनाव को देख रहा था, क्या यह अजीब नहीं है कि मीडिया भी कार्टून का कैरेक्टर बन गया है. जहां कभी कोने में कार्टून छपता था, वो अब कार्टून का कैरेक्टर है.



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