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मुजफ्फरपुर में 100 से ज़्यादा बच्चों की मौत का ज़िम्मेदार कौन?

मुजफ्फरपुर ज़िले में मौत से जुड़े जो कारण सामने आ रहे हैं वो एक ऐसा विषय है अगर 100 बच्चों की मौत न हो तो आपका यही मीडिया उस पर तीस सेकेंड की भी ख़बर न दिखाए. मीडिया ही नहीं आप भी नहीं देखना चाहेंगे. ज़ाहिर है आप भी रात के 9 बजे कुपोषण पर चर्चा नहीं देखना चाहेंगे क्योंकि आप तो मानते हैं कि वो दिखाया जाए जिससे लगे कि कुछ हो रहा है. कुपोषण वगैरह तो चलता ही रहता है.

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बिहार के मुजफ्फरपुर ज़िले में एक्यूट एंसिफलाइटिस के कारण 100 से अधिक बच्चों की मौत हुई है. 2014 में भी 139 बच्चों की मौत हो गई थी. 2012 में 178 बच्चों की मौत हो गई थी. कोई ऐसा साल नहीं गुज़रता है जब यहां अप्रैल से लेकर जून के बीच बच्चों की मौत की ख़बरें नहीं आती हैं. भावुक होने के लिए मीडिया 2012 में भी भावुक हुआ होगा, 2014 में भी हुआ होगा और 2019 में भी हो ही रहा है. मुजफ्फरपुर ज़िले में मौत से जुड़े जो कारण सामने आ रहे हैं वो एक ऐसा विषय है अगर 100 बच्चों की मौत न हो तो आपका यही मीडिया उस पर तीस सेकेंड की भी ख़बर न दिखाए. मीडिया ही नहीं आप भी नहीं देखना चाहेंगे. ज़ाहिर है आप भी रात के 9 बजे कुपोषण पर चर्चा नहीं देखना चाहेंगे क्योंकि आप तो मानते हैं कि वो दिखाया जाए जिससे लगे कि कुछ हो रहा है. कुपोषण वगैरह तो चलता ही रहता है. आप भी याद कीजिए कि कुपोषण और गरीबी को लेकर कब आपने न्यूज़ चैनल में अभियान टाइम चर्चा देखी थी. अगर कोई करे तो क्या आप देखना चाहेंगे, अगर कोई इस सवाल को लेकर डिबेट करे कि फलां बीमारी को रोकने के लिए टीकाकरण ठीक से चल रहा है या नहीं तो क्या आप देखेंगे. शायद बहुत से दर्शक चैनल बदल लेंगे. फेसबुक से लेकर चैनलों में ज्यादातर लोग परेशान इस बात से हैं कि कोई कुछ बोल क्यों नहीं रहा है. हम भावुक लोगों की भीड़ तलाश रहे हैं. जब वह भीड़ नहीं बनती है तो उत्तेजना शांत होने लगती है तब हम आखिरी कोशिश करने लगते हैं. अलबलाने लगते हैं. नाम लेकर एक दूसरे को पुकारने लगते हैं. मुख्यमंत्री कहां हैं, प्रधानमंत्री कहां हैं. सरकार कहां है. क्रिकेट मैच देखने वाले को कोसने लगते हैं. सच यही है कि किसी को फर्क नहीं पड़ता है. हम सबने इस तरह की अलबलाहट कई बार देख ली है. समस्या वहीं की वहीं हैं. सिस्टम वैसा का वैसा है. आधा अधूरा. अब दर्शकों का समाज इस स्तर पर आ गया है वह किसी भी मुद्दे पर डिबेट चाहता है. यह उसकी अंतिम ख्वाहिश हो गई है. डिबेट कराइये. जैसे मेले में भैसा या भेड़ा लड़ाते हैं, वैसे डिबेट कराइये. यह सारी बातें अपनी आलोचना में भी कह रहा हूं.  कुलमिलाकर भावुकता भरी रिपोर्टिंग में आप दर्द के अहसास से रू-ब-रू तो हो जाते हैं मगर तुरंत आप उसे भूल भी जाते हैं. तभी तो आप भूल गए कि 2014 में 139 बच्चों की मौत हुई थी.

तभी आपको याद नहीं आया कि डॉ. हर्षवर्धन तो इस अस्पताल में 2014 में भी गए थे, 2019 में भी गए. 2014 में 20 से 22 जून तक डॉ. हर्षवर्धन मुजफ्फरपुर में ही रहे थे. इस दौरे के बारे में 2014 में डॉ. हर्षवर्धन ने फेसबुक पर विस्तार से लिखा है जो अभी भी मौजूद है. उसके कुछ दिनों बाद वे स्वास्थ्य मंत्री पद से हटा दिए गए और उनकी जगह जे पी नड्डा आ गए. सवाल यह पूछा जाना चाहिए कि इन पांच सालों में केंद्र सरकार के स्वास्थ्य मंत्रालय ने मुज़फ्फरपुर को लेकर क्या किया. उन घोषणाओं पर क्यों नहीं अमल किया जो कई स्तरों की बैठकों के बाद किए गए थे. 2014 में हर्षवर्धन ने कहा था कि 100 फीसदी टीकाकरण होना चाहिए. कोई बच्चा टीकाकरण से नहीं छूटना चाहिए. जल्दी ही यहां 100 बिस्तरों वाला बच्चों का अस्पताल बनाया जाएगा. पांच साल बाद वही हर्षवर्धन जब दोबारा स्वास्थ्य मंत्री बने हैं तो वही सब दोहरा रहे हैं.


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100 करोड़ का 100 बिस्तरों वाला बच्चों का अस्पताल बनेगा. उस वक्त डॉ. हर्षवर्धन ने एलान किया था कि गया, भागलपुर, बेतिया, पावापुरी और नालंदा में विरोलॉजिक डायनोग्सिटक लैब बनाया जाएगा. मुजफ्फपुर और दरभंगा में दो उच्च स्तरीय रिसर्च सेंटर बनाए जाएंगे. यही नहीं मेडिकल कालेज की सीट 150 से बढ़ाकर 250 कर दी जाएगी. याद रखिएगा जून 2014 में 139 बच्चों की मौत हुई थी. पांच साल बाद डॉ. हर्षवर्धन यही सब कह रहे हैं, लैब बनेगा, अस्पताल बनेगा.  पांच साल पहले इन तमाम बैठकों के फैसले पर अमल हुआ होता तो 100 बच्चों की मौत नहीं होती.

2014 की बात 2019 में भी कहनी पड़ रही है. केंद्र का स्वास्थ्य मंत्रालय से पूछा जाना चाहिए कि 2014 में स्वास्थ्य मंत्री ने जो ऐलान किया था उस पर क्या कदम उठाए गए. कोई कदम क्यों नहीं उठाए गए. अगर इसमें केंद्र के मंत्री का रोल नहीं है तो फिर वे दौरा करने के बाद घोषणा क्यों करते हैं. क्या उन्होंने मीडिया में ही एलान किया था, ऐसा तो लगता नहीं. फिर इसका जवाब कौन देगा कि पांच साल में बिहार में वाइरोलाजिकल लैब क्यों नहीं बने. मुज़फ्फरपुर में 100 बिस्तरों वाला अस्पताल क्यों नहीं बना. केंद्र भूल गया तो राज्य सरकार क्या कर रही थी. 2015 से 17 के बीच भी इस जिले में मौतें होती रहीं भले ही संख्या 50 से कम थी. बिहार के स्वास्थ्य मंत्री क्या कर रहे थे. बिहार के मुख्यमंत्री क्या कर रहे थे. एक महीने से वहां नहीं गए लेकिन पटना में ही रहते हुए मुज़फ्फरपुर के गरीब बच्चों के लिए क्या किया. मुज़फ्फपुर की जनता ने अपने लिए क्या किया. कभी किसी से पूछा. बिहार सरकार बता सकती है कि 2014 में 139 बच्चों की मौत के बाद उसे तीन साल का वक्त मिला था, उसने क्या किया. बिहार सरकार ने 100 बच्चों की मौत को रोकने के लिए क्या किया.

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डॉ हर्षवर्धन बिहार में पांच विषाणु जांच केंद्र बनाने की बात कर रहे है. सबसे पहले डा हर्षवर्धन यही बता दें कि केंद सरकार की जो ऐसी संस्थाएं हैं उनमें कितने स्टाफ हैं. नेशनल सेंटर फॉर डिज़िज कंट्रोल जैसी संस्था में पर्याप्त स्टाफ है. हमने इसकी वेबसाइट चेक की. दिल्ली से लेकर भारत के दूसरे शहरों में कुल 9 ब्रांच हैं. इन सभी ब्रांचों में ब्रांचों में मिलाकर वैज्ञानिकों और हर स्तर के अधिकारियों कर्मचारियों की कुल संख्या 434 ही है. भारत की आबादी है एक अरब से अधिक. कितनी महामारियां फैलती हैं. इस हिसाब से यह संख्या कितनी कम है. इसका बजट भी मात्र 233 करोड़ है. यह सब जानकारी एनसीडीसी की वेबसाइट से ली है. अब आइये महामारियों से लड़ने वाली दुनिया की सबसे प्रतिष्ठित बड़ी संस्था सीडीसी की बात करते हैं. सीडीसी यानी सेंटर फार डिज़िल कंट्रोल. अमेरिका के अटलांटा में हैं. इसका बजट सुनकर ही आप बेहोश हो जाएंगे. इस अकेली संस्था का बजट 2018 के लिए 11.1 बिलियन अमेरिकी डॉलर है. भारतीय रुपयों में 77,000 करोड़. भारत के स्वास्थ्य बजट से भी ज्यादा है एक सेंटर का बजट. भारत का स्वास्थ्य बजट 52 हज़ार करोड़ है. अब आपको समझ आ जाएगा कि हम महामारियों से लड़ने के नाम पर चूने और फिटकरी का छिड़काव ही कर पाते हैं, यही बहुत है. भारत की संस्था नेशनल सेंटर फॉर डिज़िज़ कंट्रोल में 500 कर्मचारी भी काम नहीं करते होंगे लेकिन अटलांटा के सीडीसी में 10 हज़ार से अधिक लोग काम करते हैं. जिनमें से 2 प्रतिशत लोग दुनिया के अलग-अलग देशों में काम करते हैं. बाकी अमेरिका में काम करते हैं. सीडीसी में काम करने वाले पांच हज़ार से ज्यादा लोगों के पास मास्टर्स और डाक्टर की डिग्री हैं. इसलिए कहा कि हिन्दी पत्रकारिता को अब भावुकता की नौटंकी से बचना चाहिए. वास्तविकता पर आ जाना चाहिए. हम महामारी से लड़ने के नाम पर मीडिया में हेडलाइन के लिए लड़ते हैं. मंत्री का दौरा हो गया. घोषणा हो गई. फीता कट गया. अखबार के पन्ने भर गए और जनता मूर्ख बन गई.

मैं मुज़फ्फरपुर में 100 बच्चों की मौत से दूर नहीं गया हूं. आपको लग सकता है कि यह सब क्या बोरिंग बातें बता रहा हूं. बानी और वृंदा ने काफी मेहनत की है इन जानकारियों को जुटाने में. सुशील बहुगुणा ने रिसर्च गेट नाम की वेबसाइट पर जाकर देखा तो इस मामले में कारणों और उपायों पर कई रिसर्च पेपर लिखे गए हैं जिन्हें अंतराष्ट्रीय मंचों पर पेश किया गया है. 

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आप भी रिसर्च गेट पर जाकर इस महामारी से संबंधित रिसर्च पेपर पढ़ सकते हैं. भारत के ही डाक्टरों ने सीमित संसाधनों के बाद भी अच्छा काम किया है. सब कुछ बताया है मगर सिस्टम ने इस पर अमल किया होता तो 100 बच्चों की जान नहीं जाती. क्या बड़ी मेहनत से की गई ऐसी रिसर्च के नतीजे सिर्फ़ फाइलों में दबाकर रखने के लिए हैं. रिसर्चर सिर्फ़ रिसर्च कर सकते हैं. उस पर अमल करने की ज़िम्मेदारी स्वास्थ्य महकमे की है चाहे वो केंद्र सरकार का हो या फिर राज्य सरकार का. दरअसल हमारी अधिकतर अफ़सरशाही को अपने वैज्ञानिकों और रिसर्चर्स के काम की क़ीमत का अंदाज़ा ही नहीं है. वो उनकी सिफ़ारिशों को सामान्य बात मानकर उन्हें पढ़ना या समझना भी ज़रूरी नहीं मानते.

फिर कैसे बिहार के उप मुख्यमंत्री सुशील मोदी ने ट्वीट कर दिया कि इस बीमारी का इलाज नहीं है. उन्होंने ट्वीट कर दिया कि अमेरिका के पास भी इलाज नहीं है. प्रिवेंशन यानी रोकथाम भी इलाज माना जाता है, इस बात को कौन किसे समझा देगा. ये काम करने से बेहतर है कि आप दिन के कई घंटे वॉट्सएप में बिताएं. पता भी नहीं चलेगा कि आपको कुछ पता नहीं चल रहा है. आपको एक और बात बताना चाहता हूं. महामारियां जब फैलें तो कारणों का पता लगाने, साक्ष्य जुटाने, रिसर्च करने, रोकने के उपाय बताने के लिए अटलांटा के सीडीसी में एक पद होता है. एपिडेमिक इंटेलिजेंस आफिसर का. जब हमारे मित्र डॉक्टर ने यह बात बताई तभी ध्यान गया कि देखा जाए कि हम भारत में ऐसी महामारियों के लिए क्या कर रहे हैं. बहरहाल डॉ हर्षवर्धन अपने मंत्रालय की इन संस्थआओं का हाल पता कर लें और अपनी तरफ से ही मीडिया को ट्वीट कर बता दें, कितना बजट है, कितना स्टाफ है और क्या हाल है. मंत्री खुद बता दें क्योंकि मीडिया में खासकर न्यूज़ चैनलों में ऐसे बोरिंग विषयों की रिपोर्टिंग नहीं होती है. तभी होती है जब 100 बच्चे मर जाते हैं. 

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मुजफ्फपुर के श्री कृष्ण मेडिकल कालेज अस्पताल में जहां 100 से अधिक बच्चों की मौत हुई है वहां 50 बिस्तरों की आई सी यू है. पांच साल में इस अस्पताल की क्षमता इतनी ही बढ़ी है. आप इन तस्वीरों को देखकर भावुक न हों. यही हाल ज्यादातर सरकारी अस्पतालों का है. दिल्ली का ट्विटर क्लास अगर अपने बच्चों को ज़मीन पर बैठा देख लेगा तो इंडिया शेम-शेम करने लगेगा. हिन्दी का क्लास चुप-चाप मर जाता है और भारत पर मरने के बाद भी गर्व करता है. ये अंतर है. आलम यह है कि बिहार के उप मुख्यमंत्री सुशील मोदी ने बयान जारी किया है कि बजट से पहले जो बैठक होगी उसमें केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण से इसके लिए बजट मांगेंगे. ज़ाहिर है राज्य सरकार ने अपनी तरफ से कुछ खास नहीं किया होगा या उसके पास पैसा नहीं होगा. अब केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री प्राइमरी हेल्थ सेंटर में एक साल में 10-10 बिस्तरों वाला आईसीयू बनाने की बात कर रहे हैं. यानी 160 बिस्तरों की आईसीयू. इसी महीने 2020 में उनके इस दावे की जांच कर लीजिएगा. हमारे सहयोगी मनीष कुमार के अनुसार मुज़फ्फरपुर में 16 प्राइमरी हेल्थ सेंटर हैं. मनीष से बात करते हुए सिविल सर्जन शैलेष प्रसाद सिंह ने कहा कि प्राइमरी हेल्थ सेंटर में दो-दो बिस्तरों के आईसीयू बनाए गए हैं, तो फिर सारे मरीज़ मुज़फ्फपुर क्यों आ रहे हैं. क्या जो मरीज़ यहां आ रहे हैं उन्हें इन प्राइमरी हेल्थ सेंटर पर गाइडलाइन के हिसाब से उपचार मिला है. यही नहीं टीकाकरण भी 76 पर्सेंट हो सका. 100 फीसदी नहीं हुआ. 

एक डेटा और देता हूं. नेशनल सैंपल सर्वे के अनुसार बिहार में 3000 प्राइमरी हेल्थ सेंटर होने चाहिए, पर हैं मात्र 1883. इतनी कमी है. क्या ये ठीक होगा. इस सवाल का जवाब आपको तब मिलेगा जब आप साल भर सौ लोगों को वॉट्सएप पर गुडमार्निंग मैसेज भेजेंगे. भारत में पब्लिक हेल्थ पर काम करने वाले कई डॉक्टर इस विषय पर शोध कर रहे हैं. उन सबसे ऑफ रिकार्ड बातचीत हुई. कइयों के रिसर्च पेपर पढ़े. जो इंटरनेट पर आपके लिए भी उपलब्ध हैं. उन्हें पढ़ने के बाद यही लगा कि बिहार के 100 बच्चों की मौत नहीं हुई, उनकी हत्या हुई है. अगर सिस्टम मुस्तैद रहता तो गरीब परिवारों में बच्चों की मौत नहीं होती. क्या ग़रीबी एक कारण है? बिल्कुल है. गरीब हैं तभी तो सिस्टम ढीला पड़ गया. गरीब हैं तभी तो इनके बच्चे कुपोषण के शिकार हैं. तभी तो इनकी मौत हुई है. अब आपने सुना कि लीची खाने से मौत हुई है. कई लोगों ने हंसा. उन्होंने सही किया. वे हंसते ही तो आ रहे हैं. रोने से तो कोई फायदा भी नहीं. मेडिकल जर्नल है लांसेट. दुनिया में इसकी अपनी प्रतिष्ठा है. इसके लिए अरुण शाह और टी जेकब जॉन ने एक रिसर्च पेपर लिखा था जो 31 मार्च 2017 को छपा था. दोनों 2012 में बिहार गए थे जब 178 बच्चों की की मौत हो गई थी. 

जेकब जॉन और अरुण शाह का पेपर बताता है कि मुज़फ्फरपुर में होने वाली मौत का संबंध लीची से है. ग़रीबी से है और कुपोषण से है. इन्होंने 2012 में रिकॉर्ड देखा तो पता चला कि ज्यादातर बच्चों को सुबह के 6 से 7 बजे के बीच दौरे पड़ते हैं. दौरे पड़ने का मतलब साधारण ज़ुबान में यह हुआ कि बच्चों का दिमाग सुन्न होने लगा. होता यह है कि लीची सुबह 4 बजे तोड़ी जाती है. तोड़ने वाले गरीब मज़दूर होते हैं. रात को कम खाया होता है. खाली पेट मां बाप और बच्चे पहुंच जाते हैं और लीची तोड़ते वक्त खा लेते हैं. जब कमज़ोर शरीर वाला और खाली पेट वाला बच्चा लीची खाता है तो वह एक्यूट एंसिफलाइटिस की चपेट में आ जाता है. वैसे इसे एंसीफेलोपैथी बोलते हैं. दिमागी बीमारी के लिए इस शब्द का इस्तेमाल होता है. ध्यान रखिए कि फलाइटिस और पैथी में अंतर होता है. लीची में एक ऐसा तत्व होता है जो कुपोषण वाले खाली शरीर में ग्लूकोज का बनना बंद कर देता है. ग्लूकोज बंद होते ही दिमाग काम करना बंद कर देता है और तेज़ी से ब्रेन के बाद लीवर पर असर होता है. बच्चा मर जाता है. रिसर्च में यह सुझाया गया है कि अगर बच्चे को तुरंत ही ग्लूकोज दिया जाए तो उसे बचाया जा सकता है. ग्लूकोज़ देने से शरीर में इंसूलिन बनने लगता है और वह ब्रेन यानी दिमाग में ग्लूकोज़ बनाने वाले तत्वों को सक्रिय कर देता है. यह बात पब्लिक में है. यही लीची जब स्वस्थ्य शरीर का कोई भी खाएगा तो उसे कुछ नही होगा. हम आप खाएंगे तो कुछ नहीं होगा. लेकिन कुपोषण का शिकार बच्चा खाएगा तो उसके लिए घातक हो सकता है.

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बिहार के कशिश न्यूज़ चैनल के संवाददाताओं ने मुज़फ्फरपुर के अस्पताल में इस वक्त भर्ती मरीज़ों और डॉक्टरों से लीची को लेकर सवाल पूछा. तो पता चला कि 100 में से 88 लोगों ने माना कि बच्चे ने लीची खाई है. अप्रैल, मई, जून के समय का संबंध लीची से है और इनका संबंध गरीबी, कुपोषण से है. नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे जो 2015-16 में हुआ था उसके अनुसार बिहार में 5 साल के 44 फीसदी बच्चे कुपोषण के शिकार हैं. आप सोच सकते हैं कि कितनी गरीबी है. भारत का राष्ट्रीय औसत 36 फीसदी है. दुनिया में सबसे अधिक कुपोषण के शिकार लोग भारत में रहते है. 117 मुल्कों में हमारा स्थान 103 है. तो लीची में खराबी नहीं है खराबी है बिहार की गरीबी में, उसके सिस्टम में. अरुण शाह और टी जेकब ने अपने रिसर्च में बताया था कि 2012 में मरने वाले बच्चे फूड बेस्ट टॉक्सिंस के कारण इनेफलाइटिस की चपेट में आ गए. लखनऊ के डॉ मुकुल दास ने बताया कि लीची कारण हो सकता है क्योंकि जमैका में भी लीची की तरह का एक फल है जिसमें इस तरह के लक्षण देखे गए हैं. शायद इसलिए जमैका के अखबार जमेकन आब्ज़र्वर में भी मुजफ्फरपुर में लीची से हुई मौत पर रिपोर्ट छपी है. इंडिपेंटेड अखबार से हमें 2014 की एक रिपोर्ट मिली जिसमें जमैका और मुजफ्फरपुर में हुई मौत के बीच एक समानता पाई गई है. वहां लीची जैसी फसल को एकी (ackee) कहते हैं, जिससे एक्यूट एंसिलोपैथिक डिज़िज फैला था. एकी और लीची में एक ही तरह का टॉक्सिक पाया जाता है. दोनों ही जगह खाए-पीए बच्चों में इस फल का कोई असर नहीं हुआ. 

उड़ीसा और सहारनपुर में भी खाने में ज़हरीले तत्व होने के कारण इस तरह की मौत की घटना हो चुकी है. 2016 में ओडिशा के मलकानगिरी में 100 से अधिक बच्चों की मौत हो गई थी. वहां भी देखा गया कि एक खास तरह के पौधे के बीज खाने से ब्रेन में ग्लूकोज़ का बनना बंद हुआ और बच्चे मरने लगे. वहां पर इसे लेकर जागरूकता फैलाई गई और अब वहां से ऐसी कोई सूचना नहीं है. टी जेकब जॉन ने सहारनपुर एंसिफलाइटिस का नाम दिया है. यानी उसके कारण और कैरेक्टर अलग थे. मुजफ्फरपुर एंसिफलाइटिस का नाम दिया है क्योंकि यहां कारण लीची है. इन वैज्ञानिकों ने बिहार के स्वास्थ्य मंत्रालय को सलाह भी दी था कि ऐसे वक्त में क्या क्या करना चाहिए. क्या उन पर कदम उठाया गया, उठाया गया होता तो 100 से अधिक बच्चों की मौत क्यों होती. टी जेकब जॉन ने अपने एक रिसर्च पेपर में लिखा है.

हेल्थकेयर में जांच के गलत नतीजे या इलाज के गलत तरीके को चिकित्सा में लापरवाही माना जाता है. पब्लिक हेल्थ यानी लोक स्वास्थ्य में गलत मैनेजमेंट को लापरवाही माना जाता है. इसके कारण जो मौत होती है उसे हत्या समझा जाना चाहिए. राज्य सरकार के अधिकारी मानते हैं कि महामारी होने पर जांच की ज़िम्मेदारी केंद्र सरकार की होती है. दिल्ली में माना जाता है कि स्वास्थ्य राज्य का विषय है. राज्य का काम है जांच करे और बीमारी की रोकथाम करे. दुर्भाग्य यह है कि इसके शिकार लोग होते हैं. उनकी आवाज़ कहीं नहीं होती है. 

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मैं यह सब इसलिए नहीं बता रहा कि सरकार या सिस्टम या समाज शर्म करे. मुझे पता है दो चार दिनों बाद सब सामान्य हो जाएगा. एक तरीका यह हो सकता है कि सभी लीची बागान में बिहार सरकार एक बोर्ड लगा दे या बोर्ड लगाना अनिवार्य करा दे कि सुबह के वक्त लीची तोड़ने आए बच्चों को खाली पेट खाने से मना करें. उनके परिवार को समझाएं. दूसरा सरकार कुपोषण दूर करने का काम करे. भारत विश्व गुरु बनने वाला है, खाली पेट विश्व गुरु के क्लास रूम में बैठे इन बच्चों की निगाह लीची पर ही रहेगी जो उनकी मौत का इंतज़ार कर रही होगी. सोचिए बिहार के सौ बच्चों को खड़ा करेंगे तो 44 बच्चे आपको कुपोषण के शिकार मिलेंगे. क्या अच्छा लगेगा? ठीक है कि इन मसलों पर चुनाव नहीं होते हैं लेकिन जनता ने कहां कहा है कि चुनाव के बाद उसे इस कारण मार दिया जाए.

डाक्टरों पर दबाव रहता है. ऐसे वक्त में वे सरकार की ही बात करेंगे. उन्हें भी पता है कि पर्याप्त सिस्टम नहीं है. जागरुकता के लिए कर्मचारी कहां हैं और कौन है? जिस तरह के आर्थिक रूप से कमज़ोर तबके में बच्चों की मौत हुई है वहां तो घर घर जाकर जागरुकता फैलानी होगी. बताना होगा कि खाली पेट लीची न खाएं. मिड डे मिल और आंगनबाड़ी का दायरा बढ़ाना होगा. कुपोषण का होना बता रहा है कि दोनों योजनाएं फेल हैं. फेल है तभी तो श्री कृष्ण अस्पताल में मरने वाले बच्चे पूरवी चंपारण से आए हैं. समस्तीपुर से आए हैं. बेगुसराय से आए हैं. मुज़फ्फरपुर से तो आए ही हैं. चार चार जिलों से मरीज़ एक अस्पताल में पहुंचे तो सोचिए हेल्थ सिस्टम की क्या हालत हो रही है. 

निधि, शहनाज़, अस्मिन ख़ातून, शलवानी कुमारी, सुगांती कुमारी, समरीन परवीन, खुशी कुमारी, शितांशु कुमारी, नीतू कुमारी, अनिशा कुमारी, शंकर कुमार, इंदल कुमार, प्रह्लाद कुमार, वीतू कुमारी, सुहानी ख़ातून, प्रीति कुमारी, गुंजन, निशा कुमारी, अनुष्का कुमारी, तरन्नुम, संजीत कुमार, विकास कुमार, विक्रांत कुमार, सबिस्ता परवीन, सन्नी कुमार, आलोक कुमार, गोनौर कुमार, निधि कुमारी, सीता कुमारी, मुस्कान कुमारी, सोनाली ख़ातून, साहिदा ख़ातून, अंजिली कुमारी, स्वाति, ज्योति कुमारी, चांदनी कुमारी, सोनू कुमार, आयुष कुमार, गुंजा कुमारी, राजा बाबू, कहानी कुमार, गुड़िया, रवीना कुमारी, फरज़ाना ख़ातून, हम सबका नाम नहीं ले सकते हैं. काश सबके नाम दे पाता. सिस्टम की लापरवाही से इनकी हत्या हुई है हमने इन सबका नाम संख्या में समेट दिया है. अब कभी ये नाम पुकारे नहीं जा सकेंगे. कुछ के ही सही, पुकार कर देखना चाहिए शायद किसी को फर्क पड़े.  

मुज़फ्फरपुर में जो हुआ है उसका कारण वायरस नहीं है. लीची की संभावना ज़्यादा है. जापानी बुखार का वायरस मानव शरीर में मच्छरों के ज़रिए आता है. बारिश के दिनों में. जहां धान की खेती होती है. जहां विदेशों से पक्षी आते हैं. वे अपने साथ वायरस ले आते हैं. यह अलग बीमारी है. इसे भी एंसिफलाइटिस ही कहा जाता है. इसका समाधान है. बीमारी होने के बाद तो नहीं है मगर होने से पहले का है. अगर टीकाकरण हो जाए तो जापानी बुखार नहीं फैलता है. तो आप चेक करें कि जापानी बुखार का सरकार ने टीकाकरण आपके इलाके में करवाया है या नहीं? 

इस तरह की बीमारी का हमला साल दो साल के अंतराल के बाद होता है. हम जब तक सिस्टम को मज़बूत नहीं करेंगे, अस्पतालों को ठीक नहीं करेंगे और अभियानों को प्रभावी नहीं बनाएंगे 100-100 करके बच्चे मरते जाएंगे. मुजफ्फरपुर में चाहे तो सरकार इस बीमारी से होने वाली मौत को रोक सकती है. एक सवाल उठ रहा है कि बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार मुजफ्फरपुर क्यों नहीं जा रहे हैं? मुख्यमंत्री नहीं जाकर बिल्कुल ठीक कर रहे हैं क्योंकि इसी सवाल के दम पर मीडिया में यह स्टोरी ज़िंदा तो है. वरना उनके जाने के बाद इसके कवरेज में सबकी दिलचस्पी समाप्त हो जाएगी. सारा ज़ोर इसी पर है कि मंत्री लोग जा क्यों नहीं रहे हैं? सवाल एक और है. मुख्यमंत्री के जाने से ही क्या हो जाएगा? क्या बिहार की स्वास्थ्य व्यवस्था में गुणात्मक सुधार आ जाएगा? पीआरएस यानी पोलिसी रिसर्च स्टडीज़ ने बिहबार के 2018-19 के स्वास्थ्य बजट का विश्लेषण किया है. मीडिया रिपोर्ट की खाक छानने से और भी कई जानकारियां मिली हैं. 

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बिहार अपने बजट का 4.4 प्रतिशत ही स्वास्थ्य पर खर्च करता है. 18 राज्यों के औसत ख़र्च से यह काफी कम है. बिहार में 17,685 लोगों पर एक डॉक्टर है. राष्ट्रीय औसत 11,097 लोगों पर एक डॉक्टर का है. यह जानकारी बिहार के स्वास्थ्य मंत्री ने 2018 में विधानसभा में दी थी.

बिहार की स्वास्थ्य व्यवस्था को समझना है तो स्वास्थ्य मंत्री का नाम मत पूछिए. बस गंगा पुल पर खड़े हो जाइये. बिहार भर से एंबुलेंस के नाम पर खटारा गाड़ियां मरीज़ों को ढो कर पटना के प्राइवेट अस्पतालों में ले आती हैं. अपना कमीशन लेकर लौट जाती हैं. इस एंबुलेंस के बारे में भी बताना चाहता हूं मगर आज नहीं. आजकल आपने देखा होगा कि सरकारें कुछ नहीं कर पातीं तो एंबुलेंस गाड़ियां लांच कर देती हैं. मंत्री जी झंडा दिखा कर रवाना कर देते हैं. कुछ साल के बाद जरूर पूछिए कि ये गाड़ियां जो रवाना हुई हैं, जाती किस अस्पताल में हैं, जाती हैं तो क्या वहां डॉक्टर भी होते हैं. प्राइवेट एंबुलेंस धंधा क्यों बन गया है? ज़ाहिर है अस्पताल नहीं है. 100 बच्चों की मौत हुई है. कोई ज़िम्मेदार नहीं है.
 



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