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प्राइम टाइम इंट्रो : बहुत सताते हैं हमारे दम तोड़ते बदहाल शहर

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प्राइम टाइम इंट्रो : बहुत सताते हैं हमारे दम तोड़ते बदहाल शहर
भारत के शहरों को करीब से देखने की जरूरत है. सड़कों पर कारें भरी हैं और आदमी उन कारों में घंटों फंसा हुआ है. हवा की हालत खराब है. थोड़ी सी बरसात होती है कि शहर डूबने लगते हैं. भारत का ऐसा कोई प्रमुख शहर नहीं बचा है जो ट्रैफिक जाम और प्रदूषित हवा से कराह नहीं रहा है. हमें लगता है कि यह कोई वक्ती समस्या है, मगर अब यह मान लेना चाहिए कि हमारे शहर दम तोड़ने के कगार पर हैं. इन्हें बेहतर बनाए जाने की बातें अखबारों में ही होती हैं, जमीन पर कम ही दिखता है. अवसर भी इन्हीं शहरों में हैं तो जाहिर है आबादी का दबाव भी बढ़ेगा. बीस साल से शहर की सुविधाओं का निजीकरण किया गया. शायद और निजीकरण की कोई तरकीब निकाली जा रही है. मगर इस प्रक्रिया में निगमों के प्रशासन में जो कमजोरी आई है, उससे समस्या और भी बढ़ी है. बेंगलुरु के Janaagraha Centre for Citizenship and Democracy ने 21 शहरों का सर्वे करने के बात ये नतीजा निकाला है. हर शहर की अलग-अलग पैमानों पर रेटिंग की गई है इस लिहाज़ से किसी भी शहर ने बहुत बेहतर प्रदर्शन नहीं किया है. मतलब आप किसी को भी मॉडल शहर के रूप में पेश नहीं कर सकते हैं.
 
तिरुवनंतपुरम, पुणे और कोलकाता देश के चोटी के शहरों में आते हैं. 2015 में दिल्ली छठे स्थान पर थी, 2016 में नौवें स्थान पर आ गई है. शहरी प्रशासन के तीन बिंदुओं पर दिल्ली का प्रदर्शन खराब रहा है. एक करोड़ 80 लाख आबादी है दिल्ली की. देश की राजधानी भोपाल और कानपुर से भी पीछे है. यह सुनकर कानपुर वालों को खुश होने की जरूरत नहीं है. बृहन्मुंबई नगरपालिका चुनाव के वक्त हमने बताया था कि कानपुर के पास राजस्व वसूली के कानून मुंबई से बहुत बेहतर हैं मगर यह शहर मकानों की संख्या के अनुपात में प्रॉपर्टी टैक्स वसूल नहीं पाता है. दिल्ली को नगर योजना के मामले में सबसे अधिक अंक मिले हैं. मुंबई और बेंगलुरु से भी ज्यादा. मैं बहुत ज्यादा रेटिंग को लेकर उत्साहित नहीं होता हूं. हर रेटिंग एजेंसी के अलग-अलग पैमाने होते हैं और अलग-अलग रेटिंग होती हैं. फिर भी इसके बहाने अगर शहरों के प्रशासन, उनकी पारदर्शिता, जवाबदेही और भागीदारी को लेकर चर्चा करने का मौका मिले तो इसे हाथ से नहीं जाने देना चाहिए.
 
सर्वे में पाया गया है कि 21 शहर जिनता खर्च करते हैं, उसका 37 फीसदी ही वसूल कर पाते हैं. पटना तो खुद से 17 फीसदी ही वसूल पाता है. इस शहर को भी आपरेशन की सख्त जरूरत है. मुंबई, हैदराबाद और पुणे, ये तीन शहर हैं जो अपने खर्चे का 50 फीसदी खुद जुटाते हैं.
 
सर्वे में कहा गया है कि भारत का कोई भी शहर लंदन और न्यूयार्क का मुकाबला नहीं कर सकता. यह कहते हुए हम नहीं जानते हैं कि लंदन और न्यूयार्क की अपनी क्या समस्याएं हैं. इस सर्वे के लिए बनाए गए पैमाने के लिए दस नंबर रखे गए. भारत के किसी भी शहर ने चार अंक से अधिक हासिल नहीं किए हैं. जबकि लंदन और न्यूयार्क को 9.4 और 9.7 अंक मिले हैं. किसी भी भारतीय शहर के पास मास्टर प्लान के उल्लंघन को रोकने की ठोस नीति नहीं है. हर शहर में अनधिकृत कालोनियां पनप रही हैं. इस मामले में भारत के सभी शहर को शून्य अंक मिले हैं.
 
अनधिकृत कालोनी और झुग्गियों को पेश करने की अपनी राजनीति है. दिल्ली में ही साठ से सत्तर फीसदी लोग झुग्गी जैसी जगह में रहते हैं. इनका मामला सिर्फ वैध और अवैध के चश्मे से नहीं देखा जा सकता है. बहरहाल अतिक्रमण भी एक सच्चाई है जिसका फायदा गरीब लोगों से ज्यादा अमीर और प्रभावशाली लोग उठाते हैं. जैसे पूरे शहर की सार्वजनिक जगह पर लोगों ने अपनी कारों से कब्जा कर रखा है. मोहल्ले के मोहल्ले जाकर देखिए तो चलने-फिरने की जगह पर लोगों की कार खड़ी है. हम इस अतिक्रमण को नहीं देखते हैं मगर झुग्गी में रहने वाले लोगों को, चूंकि वे गरीब और कमजोर होते हैं, समस्या के रूप में देखते हैं. इसलिए कहा कि किसी झुग्गी को देखने का नजरिया अपने आप में राजनीतिक नजरिया है.
 
2014 में बेंगलुरु म्यूनिसिपल कारपोरेशन ने 400 इमारतों का सर्वे किया था. सिर्फ तीन ने नियमों का पालन किया था. इसलिए ग़रीब और कमजोर लोगों की तुलना में साधन संपन्न लोग, जो खुद को टैक्स देने वाला कहते हैं, नियमों को तोड़ते हैं. वो ज़्यादा अतिक्रमण करते हैं. उनकी कालोनी की सड़क सरकार के पैसे से बनती है मगर गेट लगाकर वे उसे अपना बना लेते हैं. ये तब है जब एक प्रतिशत लोग भी इस देश में टैक्स नहीं देते हैं. हम बात करेंगे कि क्या जिन लोगों ने लीगल तरीके से मकान बनाए हैं, क्या वे सभी हाउस टैक्स देते हैं.

सर्वे कुछ सवाल उठता है जिन पर बहस होनी चाहिए जैसे- हमें देखना होगा कि हम निगमों और नगरपालिकाओं में कितना निवेश कर रहे हैं. शहरों की योजना के ज़्यादातर कानून पिछली सदी के बने हुए हैं. भारत में चार लाख की आबादी पर एक प्लानर है, नियोजक है. अमरीका में चार लाख पर 48 और ब्रिटेन में 148 प्लानर हैं. प्लानर की क्या भूमिका है, यह भी हम ठीक से नहीं जानते हैं.
 
ऐसा नहीं है कि शहरों को लेकर कुछ नहीं हो रहा है. हो रहा है मगर कुछ काम यहां अच्छा हो रहा है तो कुछ वहां. सिस्टम के स्तर पर अभी बदलाव की शुरुआत नहीं हुई है. यह बात कोई आज नहीं उठ रही है, न ही जनआग्रह पहली बार उठा रहा है, बल्कि आप पिछले मुंबई, दिल्ली, बेंगलुरु, पुणे और कोलकाता जैसे बड़े शहरों के अखबार उठाकर देख लें उनमें निगमों की समस्या को लेकर खूब चर्चा होती है. खबरें होती हैं. राजस्थान और उड़ीसा का उदाहरण सर्वे रिपोर्ट में दिया गया है, हम उस पर बात करेंगे. उड़ीसा भारत का पहला राज्य है जहां निगमों और नगरपालिकों के अधिकारियों के लिए अलग से म्यूनिसिपल कैडर बना है.  इस रिपोर्ट को आप वेबसाइट पर जाकर जरूर पढ़ें काफी कुछ समझने को मिलेगा. जैसे -  एक लाख की आबादी पर स्टाफ की भी बड़े से लेकर छोटे शहरों में भयंकर कमी है. दिल्ली में एक लाख पर 1260 कर्मचारी हैं तो रांची में सिर्फ 87. पानी कितना लीक हुआ, इस्तेमाल हुआ, इस पर नज़र रखने का कोई सिस्टम नहीं है. कायदे से सभी को पानी की सप्लाई मिलनी चाहिए, मगर 71 प्रतिशत आबादी को ही मिलती है. पानी की आपूर्ति पर जो लागत आती है उसका 39 फीसदी ही निगम वसूल पाते हैं.
 
जाहिर है शहरों में पानी आपूर्ति की हालत खराब है. हम आपूर्ति की बात करते हैं मगर पानी बचाने का कहीं कोई प्रयास नहीं है. इसी तरह से किसी भी शहर में कचरा प्रबंधन के बेहतर इंतजाम नहीं हैं. आधे-अधूरे तरीके से कचरा उठाया जाता है, खूब भ्रष्टाचार है. पार्षद कचरा उठाने वाली एजेंसियों में हिस्सेदार होते हैं, जो नहीं होना चाहिए. किसी भी शहर में पार्षदों को पर्याप्त और स्पष्ट अधिकार नहीं मिले हैं. इस पैमाने पर भारत के हर शहर को दस में से तीन अंक ही मिले हैं.
 
लेकिन केरल की राजधानी तिरुवनंतपुरम में ऐसा क्या खास है जिसे दो बार से पहला स्थान मिल रहा है. इस पहले स्थान में एक भी झोल है. तिरुवनंतपुरम को 10 से 4.4 अंक मिले हैं. यानी बिना फर्स्ट डिवीज़न लाए कोई शहर पहले नंबर पर आ गया है. मतदान के मामले में तिरुवनंतपुरम पहले नंबर पर है. यहां नगरपालिका के चुनाव में 72 फीसदी मतदान होता है. दूसरे नंबर पर कोलकाता है जहां 69 फीसदी मतदान होता है, तीसरे नंबर पर लुधियाना है जहां 63 फीसदी लोग मतदान करते हैं. पटना में 47 फीसदी ही मतदान होता है.
 
सर्वे रिपोर्ट में पेज नंबर 25 पर दिलचस्प जानकारी है कि शहर दावा क्या करते हैं और उनकी असलियत क्या है. कैग की रिपोर्ट के आधार पर यह सूची बनाई गई है. इसके अनुसार तिरुवनंतपुरम अर्बन प्लानिंग के मामले में जो दावा करता है वह असलीयत में नहीं है. बिल्डिंग बनाने के मामले में भी इसका दावा असलियत से दूर है. घरेलू और औद्योगिक मामले में पानी की सप्लाई को लेकर जो दावा किया गया है वो हकीकत में नहीं है. पब्लिक हेल्थ, सफाई, कचरा प्रबंधन के मामले में भी शहर जो दावा करता है, हकीकत में नहीं है. फायर सेफ्टी के मामले में भी स्थिति खराब है. गडरीबी कम करने के मामले और झुग्गियों को बेहतर बनाने के मामले में तिरुवनंतपुरम ने जो दावा किया है, वो हकीकत के करीब है. सड़क और पुल के मामले में भी इसका प्रदर्शन अच्छा है. कैग की रिपोर्ट भारत के नंबर वन शहर की इस तरह से पोल खोल देती है. मगर आप रेटिंग पर मत जाइए, इस रिपोर्ट के ज़रिए जो मूल सवाल उठते हैं वो यह हैं कि क्या हमारी नगरपालिकाएं बेहतर तरीके से काम कर पा रही हैं. क्यों हमारे शहरों की स्थिति नारकीय बनी हुई है. मेयर के अधिकार क्यों नहीं स्पष्ट हैं. क्यों राजस्व वसूली कम है. क्यों अतिक्रमण के मामले में भारत के तमाम शहरों का प्रदर्शन एक सा है. मुझे पता है कि आपको आपका शहर बहुत सताता है. हर दिन ट्रैफिक जाम में आपको घंटों खड़ा करता है, समय पर पानी नहीं आता, पड़ोस का स्कूल खराब है.


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