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सिस्टम की क्रूरता से इंसान का मतलब नहीं रहा...

हमारी राजनीतिक चर्चा थ्योरी और थीम के आसपास घूमती रहती है. शायद इनके विश्लेषण में विद्वान होने का मौक़ा मिलता होगा.

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सिस्टम की क्रूरता से इंसान का मतलब नहीं रहा...
हमारी राजनीतिक चर्चा थ्योरी और थीम के आसपास घूमती रहती है. शायद इनके विश्लेषण में विद्वान होने का मौक़ा मिलता होगा. राजनीति चलती भी है थीम और थ्योरी से. इस छतरी के नीचे हमारा सिस्टम कैसी-कैसी क्रूरताओं से भरा है, हम उसके प्रति 'हाय-हाय' और 'मुर्दाबाद' से ज़्यादा संवेदनशील भी नहीं होते. इससे ज़्यादा कोई कर भी क्या सकता है, इस तर्क से थोड़ा आगे निकलकर देखिए, तो पुलिस से लेकर न्याय व्यवस्था और समाज में इतने गिद्ध भरे हैं कि इंसान का मतलब नहीं रह गया. सब जानते हैं, मगर सबके जानने के बीच ही ऐसे क्रूर लोग सिस्टम के भीतर बैठे हैं, हत्या के केस में घूस खाने के लिए और देने के लिए.

कल मध्य प्रदेश के बुरहानपुर से हरिकृष्ण प्रेमचंद, उनकी पत्नी और बेटा आए थे. मेरी मां और पिताजी की उम्र के. पुलिस और कोर्ट सिस्टम ने इतना लाचार बना दिया है कि हाथ जोड़ने लगे और बात बताने से पहले रोने लगे. ससुराल वालों ने उनकी गर्भवती बेटी प्रगति साधवानी को इतना मारा कि कोमा में चली गई. 85 दिन कोमा में रही. पुणे के एक अस्पताल में बेटी मौत से जूझ रही थी और उसके पिता वहीं फुटपाथ पर टाइल बेचने लगे, क्योंकि बुरहानपुर में टाइल की छोटी-सी दुकान थी. पुलिस ने केस तक दर्ज नहीं किया. जब किया, तो इतना कमज़ोर कर दिया कि कुछ हुआ नहीं. इस कहानी का डिटेल कुछ नहीं लिखा है. आप सहन नहीं कर पाएंगे. ससुराल वाले पैसे खिलाकर ख़ुद को बचा रहे हैं और बेटी के मां-बाप अपनी बेटी को इंसाफ़ दिलाने के लिए महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री से 20 बार मिल रहे हैं, अपने बेटों की उम्र के पत्रकारों के सामने हाथ जोड़ कर रो रहे हैं.

आज सुबह शाश्वत का एक मैसेज आया. उसे पढ़ते हुए लगा कि कुछ तो कहीं बचा नहीं है फिर यह थीम और थ्योरी की बहस किसलिए है. कुछ भी नया नहीं है, मगर सवाल तो यही है कि यह कब तक चलेगा कि यह सब तो होता रहता है. अमेरिका से लौटकर बिहार में रहते हुए लगभग डेढ़ साल हुआ है. इतना समय कैसे गुज़ारा, पता नहीं चला. शुरुआत के कुछ महीनों में जब लोग मदद-पैरवी के लिए आते थे, तो लगता था कि क्या सही में इस तरह की बात हो सकती है. बाद में जब हर शनिवार और रविवार लोगों से मिलने के लिए गांव में बिताने लगा, तो एहसास हुआ कि बिहार की विधि व्यवस्था इतनी सड़ चुकी है कि बिहार का शीर्ष नेतृत्व और बड़े से बड़ा प्रशासनिक अधिकारी भी हार मान चुका है या फिर उन्हें कोई फर्क नहीं पड़ता है. किसी भी थाना-सरकारी कार्यालय में कोई काम बिना वसूली के नहीं होता है और अधिकांश शक्तिशाली लोग अपने से कमज़ोर का शोषण करते हुए नज़र आते हैं.

अभी हाल ही में एक घटना हुई है. दो मिनट के लिए सोचिएगा कि जिसके साथ हुआ है, उसके परिवार वालों पर क्या बीतती होगी. एक मुस्लिम औरत को उसके पति ने दहेज़ के लिए गला घोंटकर मार दिया. पति लाश को दफ़नाने के लिए अपने भाई के साथ रात में चोरी-छिपे दो-तीन कब्रिस्तानों में गया, मगर लोगों को पता चल गया और हल्ला हुआ, तो वहां से भाग गया. बाद में घर के पाखाने के टंकी के बगल में लाश को गाड़ दिया. लड़की के घर वालों को किसी पडोसी ने फ़ोन किया तो वह पूछताछ करने आए. ससुराल वालों ने उन्हें बताया कि उनकी बेटी ने ज़हर खा लिया था और उसे दफना दिया गया है. जब लड़की के घरवालों ने पूछा कि कहां दफनाया गया है, तो ससुराल वाले बरगलाने लगे. लड़की के घर वालों को संदेह हुआ, तो पुलिस को ख़बर की गई. पुलिस के आते ही पति भाग गया. बड़ी मशक्कत के बाद लाश बरामद हुई, मगर तब तक सड़नी शुरू हो गई थी.

पुलिस ने लाश को पोस्टमॉर्टम के लिए मोतिहारी सदर अस्पताल भेज दिया. दो दिन बीतने के कारण लाश की स्थिति काफी खराब हो गई थी और उसका पोस्टमॉर्टम वहां नहीं हो सकता था, इसलिए मोतिहारी सदर अस्पताल के डॉक्टर ने मुज़फ़्फ़रपुर मेडिकल कॉलेज रेफर कर दिया. कानूनी रूप से लाश को एक जिले से दूसरे जिले में ले जाने के लिए ज्यूडीशियल मजिस्ट्रेट द्वारा अधिकारी नियुक्त किया जाता है. तब तक मोतिहारी थाना पुलिस वालों ने पोस्टमॉर्टम के लिए लाश नहीं ले जाने के लिए तकरीबन एक लाख रुपये की घूस ले ली थी. पुलिस वालों को असहयोग करता देख लड़की के घरवालों ने मुझे फोन किया. मैंने डीएम और थाना अध्यक्ष को फोन किया, तब जाकर ज्यूडीशियल मजिस्ट्रेट के यहां दूसरे जिले में पोस्टमॉर्टम के लिए अधिकारी बहाल करवाने के लिए पुलिस द्वारा आवेदन दिया गया.

शाम में पुलिस का एक अधिकारी लाश लेकर मुज़फ़्फ़रपुर मेडिकल कॉलेज गया. अगले दिन लाश का पोस्टमॉर्टम किया गया. पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट में डॉक्टर ने कहा कि सामान्य कारणों से मौत हुई है. जब मुझे दोबारा फोन आया कि पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट में नॉर्मल डेथ लिखा है, तो मैंने पोस्टमॉर्टम करने वाले डॉक्टर का पता किया. पता चला कि वह मेरे गांव के पास के ही एक डॉक्टर हैं, जो मुज़फ़्फ़रपुर मेडिकल कॉलेज में पोस्टेड हैं. उनसे पूछा कि ऐसे कैसे लिख दिया, तो ठीक जवाब नहीं दे पाए. थोड़ा ज़ोर देकर कहा कि ठीक-ठीक बताइए, नहीं तो CID के जांच के लिए आवेदन दिया जाएगा. तब उन्होंने जवाब दिया, 'ये लोग बताया नहीं कि ये आपके आदमी हैं, गलती हो गई है, मगर अभी विसरा का जांच होना है, उसमें कुछ करने का प्रयास कर सकते हैं...' बाद में पता चला कि पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट गलत लिखने के लिए लड़के के घर वालों ने पांच लाख घूस दी थी. जिसने हत्या की है, वह अभी भागा हुआ है. अब पुलिस का कहना है कि केस ही गलत है, पोस्टमॉर्टम की रिपोर्ट में साफ तौर पर सामान्य कारणों से मौत लिखा है.  वैसे भी अब किसी कोर्ट में यह साबित नहीं हो पाएगा कि हत्या हुई थी, क्योंकि पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट में सामान्य मौत लिखा गया है.

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- रवीश कुमार

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण) : इस आलेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी विचार हैं. इस आलेख में दी गई किसी भी सूचना की सटीकता, संपूर्णता, व्यावहारिकता अथवा सच्चाई के प्रति NDTV उत्तरदायी नहीं है. इस आलेख में सभी सूचनाएं ज्यों की त्यों प्रस्तुत की गई हैं. इस आलेख में दी गई कोई भी सूचना अथवा तथ्य अथवा व्यक्त किए गए विचार NDTV के नहीं हैं, तथा NDTV उनके लिए किसी भी प्रकार से उत्तरदायी नहीं है.


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