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क्या मुद्दों से भटक गई है हमारी राजनीति?

सोचिए मतदाताओं का बड़ा हिस्सा रोज़गार, पानी और स्वास्थ्य को महत्वपूर्ण मानता है मगर मीडिया में इसकी कितनी चर्चा है. खासकर हिन्दी के अखबारों में. इस चुनाव में आप हिन्दी के अखबारों को ध्यान से पढ़ें. देखिए कि उनके कवरेज़ में विपक्ष को कितनी जगह मिल रही है.

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क्या मुद्दों से भटक गई है हमारी राजनीति?

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सपा-बसपा और रालोद गठबंधन की तुलना "सराब" से की.

नई दिल्ली:

चुनावी भाषण शुरू हो गए हैं और मुद्दे हवा हो गए हैं. भाषणों में भाषाओं का हाल कुछ ऐसा हुआ कि अच्छा खासा समय शराब और सराब में लग गया. अपने अपने मुद्दों को लेकर नेताओं का इंतज़ार कर रही जनता अब इन रैलियों के बाद नेताओं के मुद्दे पर भिड़ जाएगी. आज जिस तरह से प्रधानमंत्री और विपक्ष ने अपनी भाषाई क्षमता का प्रदर्शन किया उससे लगता है कि कहीं 2019 का चुनाव डिक्शनरी को लेकर न हो जाए. रोज़गार को मुद्दा बनाने वाले बेरोज़गारों को भी इससे लाभ होगा. नौकरी भले न मिले मगर डिक्शनरी उनके काम आ सकती है. प्रधानमंत्री ने सपा, रालोद और बसपा को सराब बता दिया. दन्त स वाले सराब से तो चचा ग़ालिब ने शराब पर कुछ नहीं लिखा. शराब पर लिखने वाले तमाम शायरों ने श से ही शराब लिखा स से सराब नहीं लिखा. एक काम कीजिए. यू ट्यूब पर जाकर 'मिलन' फिल्म का दो गाना सुनिए.

सावन का महीना पवन करे शोर. इस गाने में अभिनेता सुनील दत्त सोर कहते हैं. वे बार बार पवन करे सोर गाते हैं और नूतन शोर गाती हैं. नूतन सही हैं मगर सुनील दत्त ज़ोर देकर शोर को सोर करा देते हैं. बोल चाल की हिन्दी में स और श के भेद को स्पष्ट करने का यह पहला जन अभियान था. जो गाने में ही फेल कर गया था. दत्त साहब इतने प्यार से ज़ोर देकर तीन बार सोर बोलते हैं कि नूतन जी भी क्या करतीं, शोर को सोर गा देती हैं. उधर तो मामला प्रेम का था, मगर इधर प्रेम का नहीं था. अखिलेश यादव तो सीरीयस हो गए. लगे ज़ोर देने कि अरे बाबा सराब नहीं, शराब. मिलन पार्ट टू का सीन चल रहा है पोलिटिक्स में.


आज टेलिप्रोंपटर ने यह पोल खोल दी है कि सराब और शराब का अंतर वो लोग नहीं जानते हैं जो नफ़रत के नशे को बढ़ावा देते हैं. सराब को मृगतृष्णा भी कहते हैं और ये वो धुंधला सा सपना है जो भाजपा पांच साल से दिखा रही है. लेकिन जो कभी हासिल नहीं होता. अब जब नया चुनाव आ गया है तो वह नया सराब दिखा रहे हैं.

इससे अखिलेश यादव की अपनी या उनकी टीम की भाषाई क्षमता का प्रदर्शन तो खरा हुआ मगर प्रधानमंत्री ने एक ऐसा जुमला बनाया जिससे चर्चा रोज़गार जीएसटी या नोटबंदी की जगह भटक कर इस पर आ गई. अब लालू प्रसाद की पार्टी राजद कहां पीछे रहने वाली थी. राजद ने भी प्रधानमंत्री को स और श का अंतर समझाया. बकायदा इनवर्टेज कोमा यानी उद्धरण चिन्हों के साथ. वाकई आज 2019 का चुनाव व्याकरण और डिक्शनरी पर होते होते बचा है. 

और इस तरह भारत की राजनीति मुद्दों से भटक गई. जुमलों में अटक गई. इसके पहले अमित शाह यूपी में कांग्रेस, सपा और बसपा को कसाब कह चुके हैं. प्रधानमंत्री इसी मेरठ में विधानसभा चुनावों के समय SCAM यानी सपा, कांग्रेस, अखिलेश मायावती बनाया था. प्रधानमंत्री ने सराब को शराब समझा और सेहत के लिए खराब बताया. अच्छी बात है कि प्रधानमंत्री ने सेहत को शेहत नहीं कहा. इसे मैंने नोट किया है किसी और ने नहीं. वैसे नीतीश कुमार उत्साहित नहीं हुए. उन्हें ज़रा भी नहीं लगा कि सेहत के लिए शराब को सराब समझ कर खराब बताने वाले प्रधानमंत्री शराबबंदी तो लागू नहीं करने वाले हैं. वो शायद इन तुकबंदियों का मतलब अब तक समझ गए होंगे.

इक़बाल बानो का मशहूर शेर है. दश्त-ए तन्हाई में ऐ जान-ए-जहां, लरज़ा है, तेरी आवाज़ के साये, तेरे होठों के सराब. इसी तरह डेढ़ सौ साल पहले दुनिया को रोशन करने वाले मशहूर शायर मीर तकी मीर हुए. उनकी गज़ल का एक हिस्सा पढ़ रहा हूं. 'हस्ती अपनी हबाब की सी है, ये नुमाइश सराब की सी है.'
अर्थ भी समझ लीजिए- हस्ती- यानी अपनी ज़िंदगी, अपनी हैसियत, अपना वजूद- हबाब के बराबर है. हबाब यानी बुलबुला. मीर कहते हैं, हम बुलबुलों जैसे हैं. बोलते हैं - ये नुमाइश सराब जैसी है- सराब- यानी मृग मरीचिका. यानी जो दिख रहा है, वो बस मरीचिका है- रेगिस्तान में पानी दिखता है जो है नहीं.मीर साहब इसी ग़ज़ल के आख़िरी शेर में कहते हैं- मीर उन नीम बाज़ आंखों में, मस्ती सारी शराब की सी है.'

श और स की लड़ाई पूरब में शिक्षित और अशिक्षित होने की भी है. पढ़े लिखे लोग स और श में फर्क करने पर ज़ोर देते हैं मगर जिसे शिक्षा नहीं मिली वो श को कभी स और स को श बोलता है. पढ़े लिखे लोग भी ये गलती करते हैं. कैच लाइन और टैग लाइन से आप नहीं बच पाएंगे. बेहतर है आप बेरोज़गारी के सवाल को मनोरंजन के लिए देखें और जुमले बाज़ी को लेकर सीरीयस हो जाएं इससे आपको दुख नहीं होगा. इसे यूं समझिए कि इस तरह से प्राइम टाइम करने लगा तो मुझे भी कोई मेहनत नहीं करनी पड़ेगी. और आप यूं समझिए कि बाकी एंकर कब से बिना मेहनत के अपना शो शुरू कर खत्म भी कर देते हैं. न मैं इसे बदल सकता हूं और न आप. हमने ओम थानवी जी से पूछा. उनके पास कई तरह के शब्दकोश हैं. थानवी जी ने मद्दाह साहब के मशहूर शब्दकोश का हवाला दिया. आपका पूरा नाम मोहम्मद मुस्तफ़ा ख़ां है. इसमें सराब का फारसी का पुल्लिंग शब्द बताया गया है. लिखा है कि वह रेत जो गर्मियों में दूर से पानी की तरह चमकती हुई दिखाई पड़ती है और प्यासे उसे पानी समझ कर उसकी ओर दोड़ते हैं, मृगतृष्णा. कहीं कहीं इसे अरबी का शब्द भी माना गया है. अंग्रेज़ी में सराब को मिराज कहते हैं.

क्या ये सब जानने के लिए आप चुनाव का इंतज़ार कर रहे थे. गांव देहात से घूम कर लौटने वाले पत्रकार लिख रहे हैं कि रोज़गार मुद्दा नहीं है. अगर ऐसा है तो बेरोज़गारों को अपनी तरफ से घोषणापत्र जारी करनी चाहिए कि हमें कुछ साल और बेरोज़गार रहना है. शराब और सराब का विवाद बेरोज़गारों के काम आ सकता था बशर्ते इससे जुड़ा सवाल परीक्षा में आए और परीक्षा हो तो उसका रिज़ल्ट सही समय पर आ जाए. अभी देखिए. यूपी में 2016 में दारोगा भरती परीक्षा में जिन उम्मीदवारों का चयन हुआ था, उनकी नियुक्ति पर इलाहाबाद हाई कोर्ट की लखनऊ बेंच ने रोक लगा दी है. 2016 में भरती आई थी, परीक्षा हुई दिसंबर 2017 में, जुलाई 2018 में फिजिक्ल टेस्ट शुरू हुआ. नियम के हिसाब से उन्हीं का फिजिकल होता है जो लिखित परीक्षा में पास होते हैं. 28 फरवरी 2018 में जब अंतिम परिणाम आया तो फिजिकल टेस्ट वालों को लिखित परीक्षा में फेल कर दिया गया है. 3266 उम्मीदवारों को फिर फिजिकल कैसे हुआ, फिजिकल के बाद उन्हें फेल कैसे किया जा सकता था.

ज़ाहिर है उम्मीदवार हाईकोर्ट पहुंचे और वहां माननीय अदालत ने नियुक्ति पत्र जारी करने पर रोक लगा दी है. 30 मार्च को अगली सुनवाई होगी. इसके बाद भी दिल्ली से गांवों में जाने वाले पत्रकारों को नौजवान बता रहे हैं कि बेरोज़गारी मुद्दा नहीं है. वे इस सवाल को छोड़ किसी और सवाल पर वोट कर रहे हैं तो यह चुनाव भारत की राजनीति से बेरोज़गारी के मुद्दे को हमेशा हमेशा के लिए खत्म कर देगा.

Association for Democratic Reforms (ADR) ने एक सर्वे किया है. दावा है कि देश भर के करीब 2 लाख 75 हज़ार मतदाताओं से सर्वे किया गया है. इस सर्व के अनुसार रोज़गार का मुद्दा सबसे ऊपर है. यह सर्वे अक्तूबर से दिसंबर 2018 के बीच किया गया था. पुलवामा हमले के पहले. रोज़गार के अवसर को जहां 2017 में 30 प्रतिशत मतदाता प्राथमिकता दे रहे थे. 2018 में 47 प्रतिशत मतदाताओं के लिए रोज़गार बड़ा सवाल बन गया है. यानी अकेला ऐसा मुद्दा है जो पहले 56.67 प्रतिशत बड़ा हो गया है. जातियों में ओबीसी के लिए चुनाव में नौकरी को 50.32 प्रतिशत प्राथमिकता देनी चाहिए. गांवों के मतदाताओं के लिए रोज़गार बड़ा मुद्दा है. सिर्फ 3 प्रतिशत मतदाताओं ने सेना को मुद्दा माना है. शहरी मतदाताओं में 4.1 प्रतिशत ने सेना और आतंकवाद को मुद्दा माना है. छत्तीसगढ़, झारखंड, मध्य प्रदेश, बिहार, राजस्थान और यूपी में नौकरी बड़ा मुद्दा है. पानी की समस्या को 30 प्रतिशत से अधिक मतदाताओं ने प्राथमिकता दी है. स्वास्थ्य को 34.6 प्रतिशत मतदाताओं ने महत्वपूर्ण माना है.

सोचिए मतदाताओं का बड़ा हिस्सा रोज़गार, पानी और स्वास्थ्य को महत्वपूर्ण मानता है मगर मीडिया में इसकी कितनी चर्चा है. खासकर हिन्दी के अखबारों में. इस चुनाव में आप हिन्दी के अखबारों को ध्यान से पढ़ें. देखिए कि उनके कवरेज़ में विपक्ष को कितनी जगह मिल रही है. कहीं ऐसा तो नहीं कि एक ही पार्टी के दस नेताओं के बयान से पूरा पेज भर दिया गया है. गोदी मीडिया का हाल तो आप जानते ही हैं. हमारे सहयोगी कर्मवीर ने एडीआर के चोकर साहब से बात की.

एक मुद्दा पेंशन का भी है. डीएमके ने पुरानी पेंशन की व्यवस्था बहाल करने का वादा किया है. आए दिन ऐसे लोग टकराते रहते हैं जो अपनी पेंशन को लेकर परेशान है. क्या सरकारी कर्मचारी पेंशन के सवाल पर वोट करेंगे, इसका जवाब मेरे पास नहीं है. एक मतदाता की कई निष्ठाएं होती हैं. ज़रूरी नहीं है कि वह मुद्दों के लिए ही वोट करे, वह माहौल के लिए भी वोट कर सकता है. यह चुनाव मतदाताओं की लड़ाई है. उनका इम्तहान है. मुद्दा हारेगा या माहौल हारेगा, इसका जवाब मतदाताओं को ही देना है. प्रधानमंत्री ने आज मेरठ, रुदपुर और जम्मू में भाषण दिया है. क्या उन्होंने नौकरी की बात की.

नौकरी को लेकर उन्होंने तीनों जगह एक एक बार ज़िक्र किया. मेरठ में पाकिस्तान का 4 बार ज़िक्र आया, रुद्रपुर में 1 बार और जम्मू में 5 बार. पुलवामा की चर्चा मेरठ में की मगर रुद्रपुर और जम्मू में नहीं. बालाकोट की चर्चा मेरठ और जम्मू में नहीं की, रुद्रपुर में एक बार की. मेरठ का भाषण ही हमने सुना. अपनी सरकार की उपलब्धियां गिनाईं. जनधन से लेकर शौचालय, प्रधानमंत्री आवास योजना से लेकर कई योजनाओं को एक सांस में गिना दिया. विपक्ष पर भी हमला किया. उनके भाषण का छोटा सा हिस्सा सुनिए.

कन्हैया सीपीआई के उम्मीदवार के तौर पर प्रचार शुरू कर चुके हैं. क्राउडफंडिंग वेबसाइट के ज़रिए कन्हैया ने लोगों से आर्थिक मदद मांगी थी. आज ट्वीट कर बताया कि जिस वेबसाइट पर चंदा मांगा जा रहा था, उस पर साइबर हमला हो गया. इसलिए क्राउड फंडिंग बंद हो गई है. जल्दी शुरू होगा. कन्हैया का लक्ष्य है कि 70 लाख जुटाया जाए. 30 लाख तक जुटा लिया गया है. कन्हैया एक दिन में पांच पांच सभाएं कर रहे हैं.

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उधर बीजेपी नेता गिरीराज सिंह बेगुसराय से चुनाव लड़ने के लिए तैयार हो गए हैं. कन्हैया और गिरीराज का मुकाबला दिलचस्प होगा. क्या प्रधानमंत्री बेगुसराय भी जाएंगे प्रचार करने. कन्हैया पर उनके आरोप क्या होंगे और कन्हैया का जवाब क्या होगा, लगता है बेगुसराय में बिजली गिरने वाली है. वैसे बेगुसराय बीजेपी की सीट रही है. पिछले चुनाव में सीपीआई तीसरे नंबर पर थी और राजद दूसरे नंबर.


 



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