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क्या प्रधानमंत्री मोदी मध्यप्रदेश की एक सभा में मेरा लिखा यह भाषण पढ़ सकते हैं?

पत्रकार भाई तुम 2015-16 की रिपोर्ट से ही भाषण बनाओ. मैं पढ़ दूंगा. डेटा नया ऑयल है. तो जो सरकारी डेटा है उससे से हमें तेल निकालना आता है.

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क्या प्रधानमंत्री मोदी मध्यप्रदेश की एक सभा में मेरा लिखा यह भाषण पढ़ सकते हैं?

भाइयो और बहनो,

आज मैंने भाषण का तरीका बदल दिया है. मैंने अलग-अलग फार्मेट में भाषण दिए हैं लेकिन आज मैं वो करने जा रहा हूं जो कांग्रेस के नेता पिछले सत्तर साल में नहीं कर सके. मैंने रटा-रटाया भाषण छोड़कर कुछ नया करने का फैसला किया है. मुझे यह कहने में संकोच नहीं कि यह भाषण रवीश कुमार ने लिखा है, लेकिन दोस्तो, भाषण कोई भी लिखे, अगर वह राष्ट्रहित में है. पर मैंने भी कह दिया कि मैं पढूंगा वही जो सरकारी दस्तावेज़ पर आधारित होता है. रवीश कुमार मान गए और उन्होंने मध्यप्रदेश के उच्च शिक्षा विभाग की वेबसाइट से 2015-16 की रिपोर्ट निकाली. 2016-17 और 2017-18 की रिपोर्ट ही नहीं है, वेबसाइट पर.

मैं तो कहता हूं कि रिपोर्ट होगी मगर सबको खोजना नहीं आता है. ये जो स्पीच राइटर हैं आप तो जानते हैं न इनको. अरे, दो-दो साल की रपट वेबसाइट पर नहीं है तो क्या हुआ, जो है उसी को पढ़ेंगे. हमें पूरा भरोसा है हम किसी भी साल नौजवानों को पीछे रखने में पीछे नहीं हटे हैं. मैंने भी कहा कि मध्यप्रदेश में भाजपा सरकार के 15 साल काम ही काम के साल रहे हैं, पत्रकार भाई तुम 2015-16 की रिपोर्ट से ही भाषण बनाओ. मैं पढ़ दूंगा. डेटा नया ऑयल है. तो जो सरकारी डेटा है उससे से हमें तेल निकालना आता है.

मित्रों,


मेरे मध्यप्रदेश में 437 शासकीय महाविद्यालय हैं. गर्वनमेंट कालेज. 437 कालेज भाइयो, बहनो. ये कालेज आपके पैसे से चलते हैं. जबकि 800 से अधिक कालेज ऐसे हैं जिसके लिए आप टैक्स नहीं देते मगर मोटी फीस देकर चला रहे हैं. प्राइवेट से लेकर पब्लिक सेक्टर सब आप ही चला रहे हैं. 1300 से ज़्यादा कालेज हैं. कालेज की कोई कमी हमने मध्यप्रदेश की जनता को नहीं होने दी है. 2015-16 की रिपोर्ट है. लॉ कालेज के लिए 28 प्रिसिंपल के पद स्वीकृत थे. 28 के 28 खाली थे भाइयो बहनो. प्रिंसिपल की कोई ज़रूरत ही नहीं है. बेवजह नियम बनाते रहते हैं. हम मिनिमम गर्वनमेंट मैक्सिमम गर्वनेंस की बात करते हैं. ये कालेज बिना प्रिंसिपल के अपने आप चलते रहे हैं.

हमने कालेज ही नहीं, क्लास रूम को भी खाली रखा है. नौजवान क्लास में आएं, बात-विचार करें, आपस में चर्चा करें, कैंपस में तोप देखें, तिरंगा देखें, अब टीचर होंगे तो ये सब कहां कर पाएंगे. राष्ट्रवाद का निर्माण कहां हो पाएगा. इसलिए 2015-16 की सालाना रिपोर्ट कहती है, और ये मैं नहीं कह रहा हूं. उच्च शिक्षा विभाग की रिपोर्ट कहती है, 704 प्राध्यापक होने चाहिए थे, हमने 474 रखे ही नहीं. 7412 असिस्टेंट प्रोफेसर होने चाहिए, शिवराज जी ने कहा कि 3025 असिस्टेंट प्रोफेसर रखने की कोई जरूरत नहीं है. हमारा युवा खुद ही प्रोफेसर है. वो तो बड़े बड़े को पढ़ा देता है जी, उसे कौन पढ़ाएगा. हर युवा मास्टर है, उसका मास्टर कोई नहीं. यह हमारा नारा है. नारा मैं खुद लिख रहा हूं, रवीश कुमार नहीं. पत्रकार लोग डेटा-वेटा करते रहते हैं, चुनाव उससे नहीं होता लेकिन हमने कहा कि चलो भाई आज शिक्षा को मुद्दा बना ही देते हैं.

लाइब्रेरी की कोई जरूरत नहीं है. आप तो स्मार्ट फोन से सब पढ़ लेते हो. 264 महाविद्यालयों और यूनिवर्सिटी में वाई फाई की सुविधा दे दी गई है. आपको मिल रही है कि नहीं, मिल रही है. हाथ उठाकर बोलिए, आपके कालेज में वाई फाई है या नहीं. 391 लाइब्रेरियन के पद मंजूर हैं लेकिन 253 पद खाली रख छोड़े थे हमने. एक कालेज में प्रिंसिपल से लेकर प्राध्यापक के बहुत पद होते हैं. इस तरह से दोस्तो 9377 पद पर लोग होने चाहिए थे, 4374 पद खाली थे दोस्तो, 4374. क्या-क्या नहीं खाली था. प्रिंसिपल, प्राध्यापक, असिस्टेंट प्रोफेसर, क्रीड़ा अधिकारी, रजिस्ट्रार हमने सब खाली रख छोड़े हैं. ऐसा नहीं है कि हमने भर्ती न करने की कसम खा ली हो.

हम विज्ञापन निकालते रहते हैं. 2015-16 में 2371 पदों की बहाली निकाली थी. अब ये पता नहीं कि बहाली हुई या नहीं, काश 2016-17 की रपट भी वेबसाइट पर मिल जाती. मध्यप्रदेश के पौने छह लाख युवा कालेजों में बिना प्राध्यापक, सहायक प्राध्यापक के ही पढ़ा रहे हैं. हमारे युवाओं ने दुनिया को दिखा दिया है. हमारा युवा देश मांगता है, कालेज और कालेज में टीचर नहीं मांगता है. वो देश के लिए खुद चार घंटा अधिक पढ़ लेगा. और ट्यूशन के लिए मास्टर कहां कम हैं. तभी तो हम स्कूटी और मोपेड देने वाले हैं ताकि बच्चे कालेज कम जाएं, सीधे ट्यूशन जाएं.

परमानेंट टीचर का झंझट ही छोड़ दिया. इस साल तो शिवराज सिंह चौहान ने अतिथि विद्वानों का मानदेय न्यूनतम 30,000 कर दिया है वर्ना कई साल तक तो वे न्यूनतम मजदूरी से भी कम पर पढ़ा रहे थे. इसे त्याग कहते हैं. 15 साल हमने यूं ही राज नहीं किया है. तभी तो चुनाव के कारण हमने जुलाई में न्यूनतम 30,000 कर दिया. दिवाली आई तो हमने कहा कि एक महीने की सैलरी दे दो ताकि लगे कि सैलरी मिल सकती है. पांच महीने में एक महीने की सैलरी दे दो, नौजवान काम करने के लिए तैयार हैं. हम तो वो भी नहीं देते मगर राज्य मानवाधिकार आयोग ने नोटिस दे दिया कि इन्हें सैलरी दी जाए. तभी कहता हूं कि विकास के काम में ये मानवाधिकार आयोग वाले बहुत रोड़ा अटकाते हैं. कोई नहीं, हमने भी चार महीने की सैलरी नहीं दी. एक ही महीने की दी. दीवाली का खर्चा ही क्या है. पटाखे तो बैन हो गए हैं. दीया तो मिट्टी से बन जाता है.

अब देखिए, चार महीने की सैलरी नहीं दी है तब भी अतिथि विद्वान कालेज जा रहे हैं, पढ़ा रहे हैं. विरोधी कहते हैं कि तिरंगा और तोप का कोई लाभ नहीं. ये सब कैसे हो रहा है, मित्रो, मैं मानता हूं कि राष्ट्रवाद के कारण हो रहा है. राष्ट्रवाद की भावना से प्रेरित नौजवान बिना सैलरी के पढ़ा रहे हैं और बिना टीचर के पढ़ रहे हैं. ये लिबरल और अर्बन नक्सल कुछ भी कहते रहें, आज देश को शिक्षा की जरूरत ही नहीं है. हमने उसकी जरूरत ही खत्म कर दी है. हम नए विचारों को लेकर आगे बढ़ रहे हैं.

हम अतिथि विद्वानों को छुट्टी भी नहीं देते हैं. छुट्टी लेते हैं तो सैलरी काट लेते हैं. मित्रो, मैंने एक दिन की भी छुट्टी नहीं ली है. ये अतिथि विद्वान ही असली मोदी हैं. बिना छुट्टी के पढ़ा रहे हैं. साल में एक लाख 2000 लेकर पढ़ाने वाले दुनिया में ऐसे शिक्षक कहीं नहीं मिलेंगे. शहरों में दिक्कत होती है, मैं मानता हूं. इसलिए ज़्यादातर अतिथि विद्वानों को हमने गांवों में लगा रखा है. 2002 में एक कक्षा के 75 रुपये मिलते थे और एक दिन में चार कक्षा के पैसे मिलते थे. आंदोलन हो गया. हमने कहा बढ़ा दो. चार कक्षा की जगह तीन कक्षा के पैसे दे दिए. उनका कुछ बढ़ गया लेकिन हमारा बहुत नहीं घटा. मध्यप्रदेश के कालेजों में एमए पास, नेट पास, पीएचडी किए नौजवानों ने कई साल देशहित में 13 हजार, 14 हजार महीने की कमाई पर पढ़ाया है. भाइयो, बहनो, ये देश मोदी नहीं चला रहा है. ये देश इन नौजवानों से चल रहा है. जो अपना भविष्य खतरे में डालकर राज्य का भविष्य संवार रहे हैं.

मित्रो, मेरा स्पीच रवीश कुमार ने लिखा है. उन्होंने अतिथि विद्वानों के नेता देवराज से बात कर ली है. देवराज ने इन्हें बता दिया है कि यूजीसी के हिसाब से 30 छात्र पर एक सहायक प्रोफेसर होना चाहिए. तो इस हिसाब से 12000 सहायक प्रोफेसर होने चाहिए. सरकारी कालेजों में सहायक प्रोफेसर के 7000 से अधिक पद मंजूर हैं लेकिन 5000 से अधिक शिक्षक अतिथि विद्वान हैं. हमने न तो किसी को परमानेंट रखा न इन अतिथि विद्वानों को कभी पूरी सैलरी दी. परमानेंट करता तो डेढ़ लाख महीने की सैलरी देनी पड़ती, मगर यही नौजवान 15 साल से मात्र एक लाख की सैलरी में पूरा साल पढ़ा रहे थे. मध्यप्रदेश की जनता यूं ही मामा नहीं कहती है. भांजों का काम ही क्या है. मामा-मामा करना है. मां भी खुश, मामा भी खुश.

यही नहीं जो जनभागीदारी से कालेज चलते हैं, वो भी चालाक हो गए हैं. एक ही शहर का एक कालेज एक शिक्षक को 18000 सैलरी देता था तो दूसरा कालेज उसी विषय को 10,000 में पढ़वा रहा था. भाजपा की सरकार ने उच्च शिक्षा पर उच्चतम पैसे बचाए हैं. आज तक किसी ने इसकी शिकायत की, किसी ने नहीं की. आंदोलन वगैरह होते रहते हैं मगर ये नौजवान जानते हैं कि इनका मामा अगर कोई है तो वो कौन है. भांजा कभी मामा से बगावत करता है क्या, भारतीय परंपरा है. हम संस्कार को शिक्षा के पहले रखते हैं. पहले राष्ट्रवाद, फिर संस्कार और दोनों से सरकार.

अभी हम इन अतिथि विद्वानों को भी निकालने वाले हैं. अप्रैल में 3200 की वेकैंसी निकाली थी, 2600 का रिजल्ट निकला है. अभी ज्वाइनिंग नहीं हुई है. इनके कालेज जाते ही, पुराने अतिथि विद्वान निकाल दिए जाएंगे. नए नौजवान आएंगे और जमकर पढ़ाएंगे. इस तरह से अगर हम पंद्रह-पंद्रह साल में परमानेंट शिक्षक की भर्ती करें तो शिक्षा का बजट कितना कम हो सकता है. मित्रो, मैं रवीश कुमार की बात से सहमत नहीं हूं कि नौजवानों की पोलिटिकल क्वालिटी थर्ड क्लास है.

आज मध्यप्रदेश के नौजवानों ने बिना टीचर के पढ़कर दुनिया को दिखा दिया है. मध्यप्रदेश के पढ़े-लिखे नौजवानों ने दस-दस साल एक लाख रुपये में पूरे साल पढ़ाकर जो दिखाया है, वह बताता है कि इनकी पोलिटिकल समझ थर्ड क्लास नहीं है. इनके मां-बाप ने शिकायत नहीं की. इन्होंने शिकायत नहीं की. अब आप ही पूछो कि रवीश कुमार को क्या प्राब्लम है. उन्हें क्यों शिकायत है?

मैं बधाई देता हूं कि हमने मध्यप्रदेश में उच्च शिक्षा का विकास किया है. मैं तो कहता हूं कि आ जाए कोई हमसे इस मामले में बहस कर ले. मेरे मध्यप्रदेश के नौजवान किसी से बहस नहीं करते. वैसे चुनावों में बातें तो बहुत होती हैं मगर शिक्षा पर कोई भी मुझसे बात कर ले. पूछो जो पूछना है, मैं जवाब दूंगा. अरे पूछोगे तब न जब हम तुमको पूछने के लायक बनाएंगे. भारत माता की जय. भारत माता की जय.

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नोट- दोस्तो, चुनाव दर चुनाव मैंने देखा है कि शिक्षा जैसे जरूरी विषय पर बात नहीं होती. नेता बात नहीं करते, जनता बात नहीं करती है. तो सोचा कि लिखने की शैली में बदलाव करता हूं. प्रधानमंत्री के करीब हो जाता हूं. उनका भाषण लिख देता हूं. एक कोशिश करता हूं कि चुनाव में शिक्षा की बात हो. नौजवान मध्यप्रदेश के कालेज, क्लास रूम की तस्वीर खींचकर प्रधानमंत्री और राहुल गांधी को टैग करें, ट्वीट करें. कालेज जाने वाले नौजवान बात नहीं करेंगे तो कौन करेगा. क्या वो चाहेंगे कि यह बात साबित हो जाए कि नौजवानों की राजनीतिक समझ थर्ड क्लास है, नहीं न. तो कल से मध्यप्रदेश के नौजवान अपने-अपने कालेज का हाल तस्वीर के साथ ट्वीट करें. टैग करें. मुझे बताएं.


डिस्क्लेमर (अस्वीकरण) : इस आलेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी विचार हैं. इस आलेख में दी गई किसी भी सूचना की सटीकता, संपूर्णता, व्यावहारिकता अथवा सच्चाई के प्रति NDTV उत्तरदायी नहीं है. इस आलेख में सभी सूचनाएं ज्यों की त्यों प्रस्तुत की गई हैं. इस आलेख में दी गई कोई भी सूचना अथवा तथ्य अथवा व्यक्त किए गए विचार NDTV के नहीं हैं, तथा NDTV उनके लिए किसी भी प्रकार से उत्तरदायी नहीं है.



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