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वक्त कमलनाथ का और धीरज सिंधिया के हिस्से में

तीन राज्यों में कांग्रेस बनाने की तैयारी में कांग्रेस, मध्यप्रदेश में कमलनाथ का मुख्यमंत्री बनना लगभग तय

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वक्त कमलनाथ का और धीरज सिंधिया के हिस्से में

आज जो भी हुआ उसे बैठक नहीं, उठक-बैठक कहा जाना चाहिए. कांग्रेस को तीन मुख्यमंत्री चुनने में तीन दिन लग गए. अक्सर दो की लड़ाई में किसी तीसरे को फायदा होता था पर दो की लड़ाई ऐसी हुई कि किसी तीसरे की लॉटरी ही नहीं लगी. ऐसा नहीं था कि यह समस्या चुनाव के पहले नहीं रही होगी लेकिन तब तो निपटा लिया गया कि चुनाव के बाद देखेंगे. लीजिए अब देखिए. और आप भी देखिए कि कांग्रेस के नेता राहुल गांधी इसे कैसे देख रहे हैं. जब यह सोचा जा रहा था तब अचानक आठ बजे के बाद राहुल ट्वीट करते हैं और लियो टॉल्सटॉय को बीच में ले आते हैं. मगर ट्वीट में खुद बीच में दिख रहे हैं और एक तरफ सिंधिया और एक तरफ कमलनाथ दिख रहे हैं. लिखा है कि धीरज और वक्त दो शक्तिशाली लड़ाके हैं. अब इनमें से धीरज कौन है और वक्त कौन इस पर विवेचना कीजिए तो मेरी नजर में वक्त कमलनाथ का है और धीरज सिंधिया के हिस्से आया है. एंड वाले हिस्से में यानी बीच में राहुल गांधी हैं. बाकी देखते हैं विधायक दल की बैठक में क्या फैसला होता है. राहुल मुस्कुरा रहे हैं लगता है कि मध्यप्रदेश का मामला सेटल हो गया है.

साढ़े दस बजे ऐलान होने वाला है. कमलनाथ और सिंधिया दोनों भोपाल के लिए रवाना हो गए हैं. जिस तरह से सिंधिया ने ट्वीट किया है कि कुर्सी के लिए दौड़ नहीं है. उससे लगता है कि उन्होंने कुरसी का मोह छोड़ दिया है. छत्तीसगढ़ और राजस्थान में भी लोग इंतज़ार कर रहे हैं कि अगला ट्वीट किसका आएगा, उसमें भी टॉल्सटॉय का कोट होगा या मार्टिन लूथर किंग का होगा या विंस्टन चर्चिल का होगा. आम तौर पर इन्हीं चार पांच लोगों का कोट भारत में ज़्यादा चलता है. एक शेक्सपीयर भी हैं जिनका कोट जब तब कोई न कोई कर देता है.


राहुल गांधी का घर. यहां से आज पहुंचने और निकलने की ही ख़बरें आती रहीं. एक मिनट में खबरें फॉर्वर्ड होती थीं अगले मिनट में वही खबर रिवाइंड हो जा रही थी. पहुंचने वाले पर नज़र रखने के लिए अलग रिपोर्टर. पहुंच कर निकलने वाले के लिए अलग रिपोर्टर. पर्यवेक्षक पहुंचे कि दावेदार पहुंचे, ये भी कंफ्यूज़न चलता रहा. इस बीच सोनिया पहुंच गईं, फिर अलग से मारा मारी. सोनिया से पहले प्रियंका पहुंच गईं. राहुल गांधी अपने घर में थे इसलिए उन्हें कहीं से पहुंचने की ज़रूरत नहीं थी. आज वे पहुंचे हुए लग रहे थे. पहुंचे हुए में से कितने पहुंचने के बाद निकल गए और कितने पहुंचे हुए ही रह गए, इसका हिसाब भी रखना था. चैनलों के बीच प्रतिस्पर्धा. रिपोर्टर कम. पहुंचने वाले ज्यादा. लिहाज़ा दोस्ती करनी पड़ी और मिल जुलकर ख़बरें चलानी पड़ी. हर चैनल पर एक साथ खबरें फ्लैश होने लगीं. इस बीच राहुल के रसोइये पर क्या गुज़री होगी, किसी ने मेरे अलावा उसके बारे में नहीं सोचा. हो सकता है कि खुश होगा कि उसके नेता के यहा मज़मा लगा है, सब फिर से आने लगे हैं, यह भी हो सकता है कि सुबह से चाय और पानी भिजवाते भिजवाते तंग आ गया होगा. वो अलग से खबरें लेकर जाता होगा. कप उठाते हुए कुछ सुन लेता होगा तो घर में बताता होगा कि फलाने तो धमका रहे हैं. 2014 के बाद कांग्रेस मुख्यालय की रिपोर्टिंग दस मिनट में खत्म हो जाती थी, राहुल गांधी आते थे हार की ज़िम्मेदारी लेकर चले जाते थे. आज राहुल के घर से लाइव कवरेज़ का दौर घंटों चला. इतना वक्त तो चुनाव आयोग ने मध्य प्रदेश की काउंटिंग में नहीं लिया होगा जितना टाइम राहुल गांधी ने सिर्फ दो नामों में से एक के चयन में लिया है. कहीं राहुल के घर किसी ने ईवीएम को हैक तक नहीं कर लिया है.

बड़े बड़े नेता राहुल गांधी के घर पहुंचते हुए या वहां से निकलते हुए यही कहते गए कि राहुल जी को तय करना है. राहुल जी जो चाहेंगे वही होगा. यह सुनकर लगता था कि अच्छा अब गुटबाज़ी बंद हो गई है. सबको राहुल गांधी के चाहने का इंतज़ार है. लेकिन रायपुर में भूपेश बघेल के घर पर ही कार्यकर्ता फैटा-फैटी करने लगे. उन्हें इससे मतलब नहीं कि राहुल जी क्या चाहते हैं. उन्हें मतलब इस बात से था कि उनके नेता के लिए वे लोग क्या चाहते हैं. भोपाल में कमलनाथ का पोस्टर लगता था तो सिंधिया का भी लग जाता था. जयपुर का भी वही हाल था. राहुल जी के चाहने से पहले ही गहलोत के मुख्यमंत्री बनने की बधाई वाले पोस्टर लग गए. ये खबर चली तो सचिन के समर्थक जाम लगाने लगे ताकि उनकी दावेदारी की भी खबरें चलती रहें. करौली राजस्थान में सचिन पायलट ज़िंदाबाद के नारे लगते रहे. सचिन ने ट्वीट कर दिया कि 'मैं सभी के शांति एवं अनुशासन बनाए रखने का आग्रह करता हूं. मुझे पार्टी के शीर्ष नेतृत्व पर पूरा विश्वास है. प्रदेश के हित में माननीय श्री राहुल गांधी जी एवं श्रीमती सोनिया गांधी जी जो भी फैसला लेंगे उसका हम स्वागत करेंगे. हम सभी कांग्रेस के समर्पित एवं निष्ठावान कार्यकर्ता हैं इसलिए पार्टी की गरिमा को बनाए रखना हम सब की ज़िम्मेदारी है.'

राहुल जी चाहेंगे, राहुल जी चाहेंगे, राहुल जी चाहेंगे. दावेदार भी राहुल गांधी से मज़ाक कर रहे थे. बोल रहे थे कि राहुल जी जो चाहेंगे मगर भीतर राहुल जी से बोल रहे थे कि हम बनेंगे क्योंकि हम ये चाहते हैं.

नतीजे आने पर एक्सपर्ट राहुल गांधी के कसीदे कसने लगे. कहने लगे कि राहुल का पार्टी के भीतर नेतृत्व और दबदबा कायम हो गया और साबित हो गया. लेकिन जब मुख्यमंत्री का नाम तय करने का वक्त आया तो राहुल पर दूसरे नेताओं का दबाव और दबदबा कायम होने लगा. इसका मतलब है कि कांग्रेस में अभी कुछ भी कायम नहीं हुआ है. न राहुल का कायम हुआ है न सिंधिया का न पायलट का, न गहलोत का न कमलनाथ का. एक लिहाज़ से अच्छा है कि दो गुटों को अपनी दावेदारी करने की स्वतंत्रता है. वे नेता के सामने आवाज़ उठा रहे हैं. अपना दावा कर रहे हैं. लेकिन जब मुख्यमंत्री का चुनाव होगा तब देखा जाएगा कि लोकतंत्र का पैमाना तब दिखेगा. क्या राहुल गांधी नाम के चयन में कोई ठोस पैमाना सामने रखेंगे. क्या परिश्रम को पारिश्रमिक मिल रही है यह देखना होगा. क्या राहुल गांधी अपने चयन में नए नेता को मौका देंगे जो उनकी उम्र का है. या फिर वे चूक जाएंगे. 2014 के बाद नरेंद्र मोदी ने महाराष्ट्र में 44 साल के देवेंद्र फडणवीस को मुख्यमंत्री बनाकर एक बड़े प्रदेश को नौजवान के हाथों सौंपा था. मगर उन्हीं ने हरियाणा में खट्टर और झारखंड में रघुवर दास को चुनकर चौंका दिया. लोग पता करने के लिए कि ये कौन हैं. एम ए खट्टर का नाम तो हरियाणा के स्टार प्रचारकों की सूचि में अंतिम पायदान पर था. वे मुख्यमंत्री बने. लेकिन कांग्रेस में स्थिति अलग है. किसी तीसरे नाम को चांस नहीं मिल रहा है.

ऐसा नहीं है कि छत्तीसगढ़ में दावेदारी को लेकर शांति है या मामला सुलझ गया. वहां भी दावेदारों के दिल धड़क रहे हैं. प्रदेश अध्यक्ष भूपेश बघेल की दावेदारी आगे चल रही है. भूपेश बघेल पाटन से चुनाव जीतते रहे हैं. संयुक्त मध्य प्रदेश में भी यहां से विधायक रहे और दिग्विजय सिंह की सरकार में मंत्री रहे. जब छत्तीसगढ़ राज्य बना तो अजीत जोगी की सरकार में मंत्री बने. विधानसभा में डिप्टी लीडर रहे लेकिन 2014 के बाद से अध्यक्ष रहे हैं. कुर्मी समाज से आते हैं और ओबीसी नेता होने के कारण बड़ा जनाधार भी रहा है.

भूपेश बघेल के घर पर पूजा अर्चना की तैयारी होने लगी है. दुर्ग भिलाई के पास है पाटन, वहां से भूपेश बघेल जीतकर आते हैं. इनके पिताजी भी इस लड़ाई में आ गए हैं. अब पिताजी आ गए हैं तो एंगल थोड़ा इमोशनल हो चुका है. शायद पिताजी का इशारा अपने पड़ोसी की ओर है. टी एस सिंह देव पर है. टी एस सिंह देव भी जीते हैं. मुख्यमंत्री की दौड़ में हैं. त्रिभुवनेश्वर सिंह देव नेता विपक्ष रहे हैं. पूर्व सरगुजा रियासत से आते हैं. 1983 में अंबिकापुर नगरपालिका अध्यक्ष से शुरुआत की थी. 10 साल तक नगरपालिका अध्यक्ष रहे. राजपरिवार से जुड़े जितने भी नेता भारतीय राजनीति में हैं उनमें से शायद ही कोई नगर पालिका अध्यक्ष बना हो. अगर इतने नीचे से शुरुआत की है तो फिर राजपरिवार से होने का आरोप भी उचित नहीं है. 2008 से अंबिकापुर सीट से विधायक चुने जाते रहे हैं.

कमलनाथ मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री बनने जा रहे हैं. छिंदवाड़ा से 9 बार सांसद रहे हैं. कानपुर में जन्मे, कोलकाता के सेंतज़ेवियर से पढ़े हैं. केंद्र में कई बार और कई विभागों के मंत्री रह चुके हैं. कैंप्टन अमरिंदर सिंह के अलावा दूसरे ऐसे मुख्यमंत्री हैं जो दून स्कूल के हैं. इस बीच मध्य प्रदेश भाजपा की हारने वाली उम्मीदवार अर्चना चिटनिस ने वोट न देने वालों को देख लेने की धमकी दी है.



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