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रवीश कुमार की कलम से : बेमिसाल पेरिस मार्च पर भारत-पाकिस्तान के बिना रह गया अधूरा

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रवीश कुमार की कलम से : बेमिसाल पेरिस मार्च पर भारत-पाकिस्तान के बिना रह गया अधूरा
नई दिल्ली: 'मैं मुसलमान हूं, लेकिन मैं शार्ली हूं।' 'मैं मुसलमान हूं, लेकिन मैं पुलिस हूं।' 'मैं मुसलमान हूं, लेकिन मैं यहूदी भी हूं।'

इस तरह के अलग-अलग बैनर अपने हाथों में लिए मानवता का समंदर पेरिस की सड़कों पर तैर रहा था। यह तीनों नारे जवाब थे हर उस दलील के, जो आतंक की ऐसी घटनाओं के वक्त मैं और वह में बंटवारा करती है। इस मार्च में मैं और वह मिलकर हम बन गए।

पेरिस की यह एकता मार्च उस फ्रांस की वापसी का एलान है, जिसके खात्मे की बात बुधवार के हमले के बाद की जाने लगी थी। यह मार्च उन सबको जवाब है, जो लिखने लगे थे कि फ्रांस अब फ्रांस नहीं रहा। पेरिस अब पहले जैसा नहीं रहा।

इस मार्च ने कार्टून बनाने और न बनाने की बहस को भी खत्म कर दिया है। एक मुस्लिम लड़की अपने हाथों में बैनर लिए चली जा रही है कि मैं मुस्लिम हूं और मैं शार्ली हूं।

शार्ली एब्दो के बनाए कार्टून को लेकर कहा जा रहा था कि ऐसे कार्टून बनाए ही क्यों गए, जिससे लोगों की भावनाओं को ठेस पहुंची। क्यों जानबूझ कर उकसाया गया? आज पेरिस की सड़कों पर लाखों लोगों ने निकलकर इस बहस को भी समाप्त कर दिया।

शार्ली एब्दो के हर उस कार्टून को सबने अपना लिया, जिसे लेकर कार्टूनिस्ट की सीमा की परिभाषा तय की जा रही थी। आज सही मायने में अभिव्यक्ति की आज़ादी एक नया विस्तार पा गई, जिसे कई यथास्थितिवादी तरह-तरह से सीमाओं में बांधने लगे थे। वरना लाखों लोगों के इस समंदर में बड़ी संख्या में फ्रेंच मुस्लिम भाग नहीं ले रहे होते। तमाम मस्जिदों के इमाम मार्च नहीं कर रहे होते। फ्रांस की गैर मुस्लिम जनता भी इनके साथ कंधे से कंधा मिलाकर चल रही थी। यह मार्च मुस्लिम-ग़ैर मुस्लिम का नहीं था। कहीं कोई धक्का-मुक्की नहीं। कहीं नफ़रत के नारे नहीं थे। मज़हब नहीं मानवता के नारे लग रहे थे।

सीएनएन पर एक फ्रांसिसी दार्शनिक ने कहा कि अमरीका में हुए आतंकवादी हमले के बाद भी ऐसा मार्च नहीं निकला था। लोग इस तरह एकजुट होकर सड़कों पर नहीं निकले थे। तब अमरीका से कई समुदायों के प्रति दुर्व्यवहार की ख़बरें आने लगी थीं। आतंकवादी घटना से अमरीका का मुस्लिम समुदाय भी दहशत में आ गया था और उसके प्रति वहां के समाज में शक और नफरत की भावना फैलने लगी थी। लेकिन पेरिस ने इसका भी जवाब दे दिया। इसलिए यह मार्च फ्रांस का था। उस मुल्क का, जिसने अभिव्यक्ति और बराबरी की आज़ादी की लड़ाई किसी भी मुल्क से ज्यादा लड़ी है। पूरी दुनिया के लिए अभिव्यक्ति और बराबरी को ऐतिहासिक संदर्भों में परिभाषित किया है।

फ्रांस ने यह सब इतनी आसानी से हासिल नहीं किया। फ्रांसिसी क्रांति का इतिहास दुनिया के रक्तरंजित इतिहासों में से एक है। इस आज़ादी के लिए भी हिंसा हुई है, लेकिन पेरिस की सड़कों पर उतरी लोगों की भीड़ अभिव्यक्ति की आज़ादी के लिए हिंसा को खारिज कर रही थी। फ्रांस सिर्फ यूरोप के उस भौगोलिक इलाके में नहीं है, बल्कि फ्रांस हर उस इलाके में है जहां बराबरी और आज़ादी की बात होती है, जहां इसकी रक्षा के लिए लोग जान दे देते हैं। उन सबकी प्रेरणा का मुल्क है फ्रांस, भले ही वे फ्रांस के बारे में कुछ ना जानते हों।

43 देशों के राष्ट्राध्यक्षों, राजदूतों या विदेश मंत्रियों ने इस मार्च में हिस्सा लिया। सब इस मार्च में कंधे से कंधा मिलाकर चल रहे थे। ब्रिटेन के अलावा जर्मनी, जॉर्डन, तुर्की, इज़रायल और फिलिस्तीन के राजनेता भी इस मार्च में शामिल हुए। यह दृश्य पूरे यूरोप को एकजुट कर रहा था। अंधराष्ट्रवाद और इस्लामफोबिया के खिलाफ संदेश दे रहा था।

एकता मार्च का मतलब तमाम मुल्क भी आतंकवाद के खिलाफ एक हैं और इस एकता में गैर मुस्लिमों के साथ-साथ मुसलमान भी शामिल हैं। एक मुस्लिम महिला ने कहा कि इमामों को बताना होगा कि इराक और अफगानिस्तान के आतंकवादी आतंकवादी हैं। वे इस्लाम के नुमाइंदे नहीं हैं।

एकता का अद्भुत मार्च था यह। पेरिस ने दिखा दिया कि हमले के बाद भी वह अपने गली-मोहल्ले में ईसाई बनाम इस्लाम की बहसों में नहीं फंसा है। उसकी आंखों पर नफ़रत का वह पर्दा नहीं चढ़ा है, जो ऐसे हमलों के वक्त एशिया के मुल्कों में आसानी से पसर जाता है। सारी बहस हिन्दू बनाम मुस्लिम की हो जाती है।

पेरिस ने ऐसी बहसों को समाप्त कर दिया, जिसे हमले के बाद से तरह-तरह के संदर्भों के ज़रिए उभारा जा रहा था। पेरिस ने बता दिया है कि हम मानवता के लिए सड़कों पर आए हैं और हर किसी का सम्मान करते हुए आतंकवाद के ख़िलाफ हैं।

ऐसी ही सद्भावना पेशावर में स्कूल पर हुए हमले के वक्त पाकिस्तान और भारत के लोगों ने भी व्यक्त की थी, लेकिन इस्लामाबाद की सड़कों पर एक साथ उतरे बिना। पाकिस्तान से बातचीत न होने के बाद भी भारत के प्रधानमंत्री ने फोन कर संवेदना जताई। भारत के हज़ारों स्कूलों में शोक सभाएं हुईं। शायद हमारी सीमाएं इतनी कंटीली न होती तो मुंबई हमले और पेशावर हमले के वक्त भारत और पाकिस्तान के शांति पसंद लोग भी अपनी एकता का ऐसा ही प्रदर्शन करते जैसा फ्रांस ने किया।

आतंक की भाषा का जवाब एकता ही है। किसी भी समाज को बांटने की राजनीति का जवाब एकता ही है। इस एक संदेश को लेकर पेरिस में निकाला गया यह मार्च आतंकविरोधी जनमत के इतिहास में मील का पत्थर बन गया है।

बस एक कमी रह गई। इस मार्च में भारत और पाकिस्तान के राजनेताओं को भी होना चाहिए था। दुनिया भर के चैनल भले ही इसे पूरी दुनिया के एकजुट होने के रूप में बता रहे थे, लेकिन आतंक के ख़िलाफ किसी भी लड़ाई या मार्च में भारत और पाकिस्तान की शिरकत के बिना वह दुनिया नहीं बनती है, जिसके बन जाने का एलान किया जा रहा था।

फिर भी इस मार्च ने आज कई सवालों के जवाब दे दिए हैं। यही कि अभिव्यक्ति के ख़तरे उठाए जा सकते हैं। अगर ऐसा समाज हो तो इस समाज के भरोसे जान भी दी जा सकती है। पेरिस की सड़कों पर लाखों लोगों ने इस जान की कीमत को समझा है। असली सलामी दी है।


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