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चार्टर्ड एकाउंटेंसी के छात्र प्रदर्शन के लिए मजबूर क्यों?

यह कैसी परीक्षा है जिसमें 73 प्रतिशत छात्र फेल हो जाते हैं. क्या यह किसी संस्था के लिए गौरव की बात हो सकती है?

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चार्टर्ड एकाउंटेंसी के छात्र प्रदर्शन के लिए मजबूर क्यों?

तीन दिनों से प्रदर्शन करने के बाद भी चार्टर्ड अकाउंटेंसी के छात्रों को कोई आश्वासन नहीं मिला है. ट्विट पर ट्रेंड कराने के बाद भी ICAI की तरफ से कोई बात करने नहीं आया है. ट्विटर पर ट्रेंड कराने के साथ-साथ छात्र दिल्ली के आईटीओ स्थित ICAI के मुख्यालय के बाहर प्रदर्शन कर रहे हैं. द इंस्टीट्यूट चार्टर्ड अकाउंटेंट आफ इंडिया का मुख्यालय है यहां. तीन दिनों से प्रदर्शन करने के बाद भी इनसे कोई बात करने नहीं आया है. एक बयान आया है जिसमें कहा है कि छात्रों को री-चेकिंग का अधिकार नहीं दिया जाएगा. छात्रों का कहना है कि आगे की सभी परीक्षाओं में भी री-चेकिंग की सुविधा होनी चाहिए. सेक्शन 39 लागू हो जाने से इन्हें दोबारा चेकिंग का अधिकार नहीं है. सिर्फ नंबरों का टोटल होता है. छात्र कहते हैं कि कई बार सही जवाब देने के बाद भी गलत नंबर दिए जाते हैं. इसकी जांच का अधिकार उन्हें मिलना चाहिए. तमाम परीक्षाओं में दोबारा चेकिंग का प्रावधान होता है तो इस परीक्षा में क्यों नहीं है. छात्रों का कहना है कि सीबीएसआई भी री-चेकिंग की सुविधा देती है. जब भी सूचना के अधिकार से पेपर निकलवाया है, पाया गया है कि सही जवाब देने के बाद भी गलत नंबर दिए गए हैं. ऐसे में री-चेकिंग का विकल्प मिलना ही चाहिए. अगली परीक्षा 6 महीने होगी. अगर उस परीक्षा में भी गड़बड़ी हुई तो क्या उन्हें फिर 6 महीने का इंतज़ार करना होगा, क्या इससे अच्छा नहीं होता कि री-चेकिंग की सुविधा मिले जिससे छात्रों का समय बच सके.

पहले उत्तर पुस्तिका बाहर आई है, जिससे छात्रों को पता चला है कि आब्जेक्टिव के सवाल के सही उत्तर देने पर भी नंबर नहीं दिया गया. दबी जुबान में कहा जाता है कि जानबूझकर सीए के छात्रों को फेल किया जाता है ताकि मार्केट में मांग और आपूर्ति का संतुलन बना रहे लेकिन इसके लिए छात्रों को फेल करना कहां तक ज़रूरी होता है. आज छात्रों को राजनीतिक समर्थन मिला है. राहुल गांधी ने इन छात्रों के पक्ष में ट्वीट किया है. आम आदमी पार्टी के नेता राघव चड्ढा भी पहुंचे तो उन्हें कहा कि वे राजनीति नहीं करना चाहते. राघव ने वहां सीए के तौर पर संबोधित किया. दिल्ली के अलावा, ग्लालियर, उदयपुर, हैदराबाद और पुणे में भी प्रदर्शन चल रहे हैं.


क्या वाकई ऐसा है कि सीए की पढ़ाई करने वाले ज़्यादातर छात्रों को पास होने से रोका जाता है. सीए के कोर्स में 20 पेपर होते हैं. तीन चरणों में इसकी परीक्षा होती है. फाउंडेशन का कोर्स 9 महीने का होता है. इसमें चार पेपर की पढ़ाई होती है. 9 महीने के बाद परीक्षा होती है जिसे पास करने के बाद ही इंटरमीडिएट में जाने के लिए योग्य होते हैं. डेढ़ साल तक इंटरमीडिएट की पढ़ाई होती है जिसमें 8 पेपर पढ़ाए जाते हैं. उसके बाद होती है परीक्षा, लेकिन बहुत कम ही एक बार में पास हो पाते हैं. किसी न किसी पेपर में फेल हो जाते हैं. बहुत से छात्र छह से सात बार तक परीक्षा देते रहते हैं ताकि इंटरमीडिएट में पास हो सकें. दो तीन साल इसी में गुज़र जाता है. उसके बाद तीन साल की इंटर्नशिप होती है और फिर फाइनल के 8 पेपर देने होते हैं. इसमें भी कोई एक बार में पास नहीं होता है.

कई छात्रों से बात करने पर पता चला कि जानबूझकर फेल करने की नीति अपनाई जाती है. बेशक कुछ छात्र नहीं पढ़ते हैं लेकिन इनकी आड़ में सभी को लगातार फेल करना सही नहीं है. पढ़ाई में ही पूरी उम्र बीत जाती है. बहुत से छात्र 7 साल में भी पास नहीं हो पाते तो बीच में पढ़ाई छोड़कर किसी छोटे कारोबारी के यहां 10 से 15 हज़ार की नौकरी करने लग जाते हैं. उनका सात साल बर्बाद हो जाता है. कुछ छात्र दस दस परीक्षा दे चुके हैं मगर पास ही नहीं हुए. कोई 13 बार परीक्षा दे चुका है और पास होने का इंतज़ार कर रहा है.

संस्थान की वेबसाइट पर परीक्षा में बैठने वाले और पास होने वाले छात्रों का पूरा डेटा है. हम आपको नवंबर 2018 की परीक्षा का डेटा दिखाना चाहते हैं. इसमें इंटरमीडिएट, फाइनल के अलग-अलग ग्रुप और दोनों ग्रुप में बैठने वाले छात्रों की संख्या और पास होने वाले छात्रों की संख्या का हिसाब पता चलेगा. नवंबर 2018 की अलग अलग ग्रुप की परीक्षा में बैठने वाले छात्रों की संख्या 2,93,757 बताई गई है. फाइनल की परीक्षा में 1,04,365 छात्र बैठते हैं, पास होते हैं मात्र 31,031 छात्र. इंटर में 1,89,392 छात्र बैठते हैं, पास होते हैं 79,711 छात्र. परीक्षा देने वाले कुल छात्रों में से 27.14 प्रतिशत ही पास हुए. 72.86 प्रतिशत छात्र फेल हो गए.

यह कैसी परीक्षा है जिसमें 73 प्रतिशत छात्र फेल हो जाते हैं. क्या यह किसी संस्था के लिए गौरव की बात हो सकती है. इसलिए सीए के छात्रों की बात पर गौर किया जाना चाहिए और इसकी पढ़ाई से लेकर परीक्षा की प्रणाली में सुधार की आवश्यकता को समझा जाना चाहिए. फेल होने का बिजनेस भी है. icai संसद के कानून से बनी संस्था है. इसकी सालाना रिपोर्ट से पता चलता है कि 2017-18 में परीक्षा की फीस से 168 करोड़ की राशि मिली है जबकि 2016-17 में 130 करोड़ ही मिले थे. सोचिए परीक्षा की फीस से 168 करोड़ रुपये मिल रहे हैं, इसे कमाई ही समझें, और उस परीक्षा में 72 प्रतिशत छात्र पास हो रहे हैं.

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बहुत से छात्र हमें लिख रहे हैं कि घर वालों से संपर्क न होने के कारण उन्हें फीस देने में दिक्कत आ रही है. जो घाटी में रह रहे हैं उन्हें सही समय पर सूचना न मिलने के कारण एडमिशन नहीं मिल पा रहा है. आज हमारे दफ्तर श्रीनगर की नीलम फारूख़ आई थीं. नीलम अपने पिता के साथ आई थीं. 23 सितंबर को दिल्ली पहुंचने पर नीलम को पता चलता है कि जामिया मिलिया इस्लामिया की मेरिट सूची में उसका नाम है. नीलम ने मार्च के महीने में बीए जनरल के लिए आवेदन किया था. जून के महीने में प्रवेश परीक्षा हुई थी. लेकिन जब रिज़ल्ट आया तब कश्मीर में काफी कुछ बदल चुका था. 23 सितंबर को वह दिल्ली आई तब बताया गया कि 24 सितंबर ही आखिरी तारीख है. जब वह 24 को पहुंची तो कहा गया कि 15 अगस्त तक ही स्पॉट एडमिशन ले लेना चाहिए था. तीसरी मेरिट लिस्ट जब जारी हुई तो उसमें नीलम का नाम था लेकिन तब तक कश्मीर में इंटरनेट शट डाउन हो गया था इसलिए उसे खबर ही नहीं लगी. यही नहीं नीलम ने कहा कि उसे कई बातें सुनाई गईं. नीलम बीजेपी के दफ्तर भी गई थी और वहां माइनॉरिटी सेल के सदस्यों से मिलकर अपनी शिकायत दर्ज कराई. जामिया के वीसी को भी पत्र लिखा है.

अब ज़रा बातें ब्रिटेन की करते हैं. ब्रिटेन के नए प्रधानमंत्री बोरिस जानसन ने संसद को समय से पहले 5 हफ्ते के लिए स्थगित कर दिया. इसे लेकर काफी हंगामा हुआ कि संसद कैसे बंद हो सकती है. मामला सुप्रीम कोर्ट में पहुंचा. 11 जजों की बेंच ने 3 दिनों की सुनवाई की और 24 सितंबर को सुप्रीम कोर्ट की प्रेसिडेंट लेडी हेल ने फैसला सुनाया. कहा कि ब्रिटेन के प्रधानमंत्री का फैसला असंवैधानिक है, गैरकानूनी है. इस फैसले पर ब्रिटेन में खूब बहस हो रही है. कार्यपालिका और विधायिका में कौन सर्वोच्च है, इसे लेकर फिर से बहस छिड़ी है. भारत में भी यह सवाल कई बार सामने आ जाता है.



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