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क्या हिंदी को लेकर हमारा समाज उदासीन हुआ?

भाषा की भी आचार संहिता होती है, उसका अपना संसार होता है, संस्कार होता है, ज्ञान का भंडार होता है... उन सबका क्या?

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क्या हिंदी को लेकर हमारा समाज उदासीन हुआ?

अगले तीन चरण के चुनाव मुख्य रूप से हिन्दी भाषी प्रदेशों में ही हो रहे हैं. लेकिन इन प्रदेशों में हिन्दी की ही हालत ख़राब है. हिन्दी बोलने वाले नेताओं के स्तर पर क्या ही चर्चा की जाए, उनके भाषणों में करुणा तो जैसे लापता हो गई है. आक्रामकता के नाम पर गुंडई के तेवर नज़र आते हैं. सांप्रदायिकता से लैस हिन्दी ऐसे लगती है जैसे चुनावी रैलियों में बर्छियां चल रही हों. चुनाव के दौरान बोली जाने वाली भाषा का मूल्यांकन हम बेहद सीमित आधार पर करते हैं. यह देखने के लिए कि आचार संहिता का उल्लंघन हुआ है या नहीं. मगर भाषा की भी तो आचार संहिता होती है. उसका अपना संसार होता है,संस्कार होता है. ज्ञान का भंडार होता है. उन सबका क्या.

आज वर्धा के हिन्दी विश्वविद्यालय के एक छात्र ने व्हाट्स ऐप किया कि उत्तर प्रदेश में इस बार दसवीं और बारहवी में दस लाख छात्र फेल हो गए हैं. 26 अप्रैल को यूपी बोर्ड का रिज़ल्ट आया है. हमने रिज़ल्ट चेक किया तो पता चला कि हाई स्कूल की हिन्दी की परीक्षा में 29,50, 442 लाख छात्रों ने हिस्सा लिया. इसमें से 80.54 फीसदी यानी 23,76,335 लाख छात्र ही पास हो सके. 10 वीं के 5,74,107 छात्र फेल हो गए. 19 फीसदी छात्र फेल हो गए. इंटर की परीक्षा में 821077 छात्रों ने हिस्सा लिया, 6,27630 लाख छात्र पास हो गए. 12 वीं हिन्दी में पास होने वाले छात्रों का प्रतिशत रहा 76.44 प्रतिशत. यानी 12 वीं में 1, 93,447 छात्र फेल हो गए. 12 वीं के सामान्य हिन्दी में 2,30,394 लाख छात्र फेल हुए हैं. 10 वीं और 12 वीं में हिन्दी में फेल होने वालों की संख्या हो जाती है 9,97,948. करीब दस लाख छात्र हो जाते हैं.


आप सोचिए. उत्तर प्रदेश जहां हिन्दी में सारी शेखियां बघारी जाती हैं, एक हुंकार में भारत को विश्व गुरु बना देने का दावा किया जा रहा है वहां दस लाख छात्र ऐसे हैं जो हिन्दी में फेल हो गए हैं. हिन्दी के कारण गुमसुम हो गए होंगे. अगर हिन्दी खराब हो और उसके साथ गणित में भी डिब्बा गोल हो तो उस राज्य का नौजवान किस तरह कि कुंठाओ से गुज़र रहा होगा, उस पर क्या बीत रही होगी, हम नहीं समझ सकते. उसका आत्मसम्मान कितने स्तरों पर आहत होता होगा. ख़राब शिक्षा ने इन छात्रों को फेल होने लायक ही बनाया है. ताकि वे व्हाट्स एप यूनिवर्सिटी की अफवाहों को इतिहास भी मान लें और विज्ञान भी. कभी तो हमें स्वीकार करना होगा कि हमने हिन्दी भाषी राज्यों के नौजवानों को पढ़ाई के नाम पर क्या दिया है. उनके सोचने समझने की शक्ति को किस तरह कुचला है. शिक्षा के नाम पर जब उन्हें कुछ दिया ही नहीं है तो फिर उनसे हम उम्मीद क्या कर रहे हैं. यह समस्या दूसरे राज्यों में भी हो सकती है लेकिन फिलहाल हम उत्तर प्रदेश की बात कर रहे हैं. हिन्दी का सिरमौर उत्तर प्रदेश.

हाई स्कूल में गणित की परीक्षा में 19,12,491 छात्र शामिल हुए. पास हुए सिर्फ 73.68 प्रतिशत यानी 14,09206 छात्र 5,03,285 छात्र गणित में फेल हो गए. इंटर में 6,02026 लाख छात्र गणित की परीक्षा में शामिल हुए. इसमें से 3,80,819 छात्र ही पास हुए यानी मात्र 63.26 प्रतिशत. 2, 21,207 छात्र गणित की परीक्षा में फेल हो गए. दसवीं और बारहवीं की परीक्षा में 7,24,492 लाख छात्र फेल हुए हैं.

हिन्दी आतंकित करती है, गणित आतंकित करता है. सरकारी स्कूलों के छात्रों पर इन विषयों के कारण क्या मनोवैज्ञानिक असर पड़ता होगा, यह अभी भले न सोचें, चुनाव के बाद ज़रूर सोचें. जिस गणित से प्यार किया जा सकता था उस गणित से भय पैदा किया जा रहा है. इस भय के कारण कोचिंग इंडस्ट्री खड़ी कर दी गई. एक राज्य को सोचना चाहिए कि वह क्यों गणित अंग्रेज़ी और हिन्दी में अपने नौजवानों को सक्षम नहीं कर पा रहा है. क्या राज्य ने नौजवानों को फेल नहीं किया है. क्या किसी प्राइवेट स्कूल में आपने 100 में 20 छात्रों को हिन्दी में फेल होते देखा है. गणित में फेल होते देखा है. हिन्दी भाषी छात्रों को सताने वाली एक और भाषा है अंग्रेज़ी. इसका भी हिसाब देख लीजिए. इंटर में अंग्रेज़ी में 4,74,345 छात्र फेल हुए हैं. दसवी में अंग्रेज़ी में 5,20493 छात्र फेल हुए हैं. दसवीं और 12 वीं में कुल 9,94,838 लाख छात्र फेल हो गए.

मुमकिन है कि फेल होने वाला एक साथ तीनों विषय में फेल हुआ हो. यह देखना चाहिए कि क्या 10 वीं और 12 वीं में फेल होने वाले छात्र इन तीन विषयों के कारण फेल हुए हैं. अगर ऐसा है तो फिर यह आपात स्थिति है. आंकड़े कुछ ऐसा ही इशारा कर रहे हैं. 10 वीं में 28,39,284 छात्रों ने हिस्सा लिया था. इसमें से 5,65,980 छात्र फेल हो गए. 12 वीं में 23, 52,049 छात्रों ने हिस्सा लिया था. इसमें से 7,04130 लाख छात्र फेल हो गए.

सरसरी तौर पर देखिए तो फेल होने वाले 11 लाख से अधिक छात्रों को हिन्दी, अंग्रेज़ी और गणित ने ही परेशान किया है. वैसे तो संस्कृत की भी हालत बुरी है.  हाई स्कूल में 33 फीसदी छात्र फेल हो गए. एक लाख 67 हज़ार छात्र फेल हो गए. यूपी में 10 वीं में 80.07 प्रतिशत और 12 वीं में 70.06 प्रतिशत फेल हो जाते हैं. यानी 10 से 12 वीं में जाकर फेल होने वाले छात्रों की संख्या और बढ़ जाती है. आपको लग सकता है कि बीच चुनाव में इसकी क्या ज़रूरत है, इसका ठोस जवाब नहीं है मगर जब भी आप यह कहते हुए पाए जाते हैं कि जनता में शिक्षा की कमी है तो आप इन रिज़ल्ट के बहाने उस राज्य को, उसकी जनता को देखिए. जनता का कसूर नहीं है. जनता तो शिक्षा के लिए स्कूलों में गई है अब अगर उसका राज्य, उसकी शिक्षा व्यवस्था उसे गणित, हिन्दी और अंग्रेज़ी में फेल होने के लायक तैयार कर समाज में भेजे तो नतीजा वही निकलेगा जो आपको रोज़ मंच से सुनाई दे रहा है. इन लाखों नौजवानों के साथ जो नाइंसाफी हुई है उसका जिम्मेदार अगर राज्य नहीं है तो फिर हवा को ज़िम्मेदार ठहराना चाहिए और चैत-बैशाख की हवा पर केस कर देना चाहिए.
 
उत्तर प्रदेश में जब हिन्दी की पढ़ाई की यह हालत है, छात्रों के बीच हिन्दी एक डर की तरह बैठी हो, अंग्रेज़ी एक डर हो, गणित एक डर हो, वहां के सियासी भाषणों में डर का कारोबार नहीं चलेगा तो कहां चलेगा. गनीमत है कि इनके पास व्हाट्स ऐप यूनिवर्सिटी है. शायद व्हाट्स ऐप यूनिवर्सिटी इसीलिए इनके बीच है क्योंकि असली स्कूल और कालेज किसी काम के नहीं रहे. भले ही ये मतदाता नहीं हैं मगर फेल पहली बार तो नहीं हुए हैं. पहले के वर्षों में भी फेल होने का यही अनुपात रहता होगा. वो तो अब मतदाता बन ही गए होंगे. आखिर क्यों हमारी राजनीति में भाषा का स्तर गिर रहा है. इसका जवाब इन रिजल्ट में झांक रहा है. इसलिए इसे दर्ज किया जाना ज़रूरी है और वो भी चुनावी संदर्भ में.
 
यूपी में हम हिन्दी की हालत नहीं संभाल पा रहे हैं. अंग्रेज़ी हम हिन्दी वालों को संभाल नहीं पा रही है. प्रियदर्शन कहते हैं कि ये नतीजे बता रहे हैं कि खड़ी बोली से भाषा तक पहुंची हिन्दी धीरे-धीरे बोली के स्तर पर उतर रही है. भाषा का स्तर फिसल रहा है. हिन्दी बोलने की शैली में बची हुई लगती है. कम से कम उत्तर प्रदेश के दवा दुकानदार दवाइयां में ही बड़ी ई की जगह छोटी इ लगा लें तो मेहरबानी हो जाए. ग़लती हो जाती है, हम लोगों से भी होती है मगर पता तो होना चाहिए कि ग़लती होने पर सुधार कैसे की जाती है. प्राइम टाइम में बोर्ड रिज़ल्ट का ज़िक्र यूं ही नहीं आ गया. तेलंगाना तो नया राज्य बना था. 10 दिन के भीतर यहां 25 छात्रों  ने आत्महत्या कर ली है. अब आप सोचिए कि हमारी परीक्षा व्यवस्थाएं छात्रों को मानसिक रूप से किस तरह प्रताड़ित कर रही हैं. तेलगांना की कहानी दूसरी है और भयावह भी है. 10 दिनों में 25 छात्रों की आत्महत्या अगर हमें शिक्षा व्यवस्था पर इमरजेंसी बटन दबाने के लिए मजबूर नहीं करती है तो इसका मतलब है कि हम शिक्षा के संकट को छोड़कर बहुत आगे निकल चुके हैं.

बीजेपी के नेता डा के लक्ष्मण अनिश्चितकालीन धरने पर बैठ गए हैं. वे नतीजे में हुई गड़बड़ी की न्यायिक जांच की मांग कर रहे हैं. छात्रों का आरोप है कि कापी की चेकिंग में काफी गड़बड़ी हुई है. राज्य सरकार ने परीक्षा के लिए एक निजी कंपनी को ठेका दिया था. आरोप लग रहा है कि इस कंपनी ने टेंडर की सभी शर्तें पूरी भी नहीं कीं. परीक्षा का अनुभव नहीं था. यह सब आरोप लग रहे हैं. क्योंकि दोबारा जांच में जब फेल हुई छात्रा या छात्र पास कर गए बल्कि 90 फीसदी से अधिक नंबर आ गए तो लोगों को लगा कि कंपनी की तरफ से गड़बड़ी की बात भी सही है. हमने शिक्षा के सवाल तो तफरीह में लेना शुरू कर दिया है. गंभीर होते तो पूछते कि जब परीक्षा के लिए सरकारी बोर्ड अभी तक थी तो ऐसा क्या हो रहा है और क्यों हो रहा है कि प्राइवेट कंपनियां परीक्षा करा रही हैं. आखिर हमारे बोर्ड को बेहतर क्यों नहीं किया जा सकता है जिनकी जवाबदेही तय होती है.

25 छात्रों की आत्महत्या. 18 अप्रैल को रिजल्ट निकला है. तब से राज्य में हाहाकार मचा हुआ है. 3 लाख से अधिक छात्र फेल हो गए. छात्र और उनके माता पिता गुस्से में है. 16 साल की सान्या अपने स्कूल की टॉपर थी. तालुका में टापर थी मगर 11 वीं में फेल हो गई. जीव विज्ञान में मात्र 12 बर आए. विज्ञान के अन्य विषयों में भी कम नंबर आए. जबकि अंग्रेज़ी में 96 और तेलुगू में 94 नंबर आए हैं. सान्या आई ए एस अफसर बनना चाहती थी.

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मुख्यमंत्री दोबारा कापी चेक कराने की बात कर रहे हैं. लेकिन फेल होने का एक सदमा होता है. हमारी सरकारें परीक्षा व्यवस्था को बेहद हल्के में लेने लगी हैं. सरकारी नौकरियों की परीक्षा व्यवस्था की बात करूंगा तो दो तीन साल और निकल जाएंगे. आप एस एस सी सीजीएल 2017 की परीक्षा के लाखों छात्रों से पूछ लीजिए. अदालत के फैसले के इंतज़ार में कितने महीने निकल गए. इनका मामला सुप्रीम कोर्ट में चल रहा है. 2017 की परीक्षा का रिज़ल्ट अप्रैल 2019 बीत जाए. 98,000 छात्र महीनों से रिज़ल्ट का इंतज़ार कर रहे हैं. एक लड़की ने पत्र लिखा था. वो अपने पिता की ज़िंदगी में सरकारी नौकरी पाना चाहती थी. मगर रिजल्ट की रात लंबी हो गई और उसके पिता चल बसे. एक लड़की के वोट से किसी को फर्क नहीं पड़ता है. लेकिन यह बात तो सही है कि हमारी परीक्षाएं जानलेवा हो चुकी हैं. एस एस सी सीजीएल 2018 का फार्म भर कर कई लाख छात्र परीक्षा शुरू होने का इंतज़ार कर रहे हैं. जो 2017 के केस के कारण रुकी हुई है. 2014 के बाद हिन्दी न्यूज़ चैनल पर हिन्दू मुस्लिम डिबेट के लिए नेशनल सिलेबस लांच हुआ. इसका एक कोर्स वंदेमातरम के ऊपर था. भारत में रहना है तो वंदेमातरम कहना होगा. इसके नाम पर कितने बयान आए जो वंदे मातरम के बहाने सांप्रदायिक ज़हर से लैस थे. जब एक राजनीतिक दल यह थोपे तो उसका मतलब राजनीति होती है.

बिहार के दरभंगा में बीजेपी और जेडीयू की संयुक्त रैली हुई. प्रधानमंत्री मोदी और मुख्यमंत्री नीतीश कुमार मंच पर थे. भाषण के अंत में प्रधानमंत्री ने ज़ोर ज़ोर से वंदे मातरम वंदे मातरम का नारा लगाया. भीड़ और मंच पर बैठे नेता मुट्ठी बांध कर, हवा में हाथ उठा कर वंदे मातरम वंदे मातरम करने लगे. यहां तक कि रामविलास पासवान भी वंदे मातरम वंदेमातरम करने लगे. मगर नीतीश कुमार उसी गठबंधन के बीच अपनी राजनीतिक समझ को बचाते रहे. उनके अगल बगल हर शख्स वंदे मातरम वंदे मातरम कर रहा था. नीतीश कुमार चुपचाप बैठे रह गए. उन्होंने हाथ उठाकर ज़ोर ज़ोर से वंदे मातरम वंदे मातरम नहीं किया. आप इस वीडियो के एक एक फ्रेम को देखिए. देखिए कि किस तरह एक नेता अपने राजनीतिक स्पेस को बनाता है, बचाता है, और किसी को एतराज़ भी नहीं. यही गलती किसी आज़म खान से हो गई होती तो बीजेपी क्या करती, न्यूज़ चैनल क्या करते आप अंदाज़ा लगा सकते हैं. मगर नीतीश कुमार हल्के सहयोगी नहीं है. इसलिए बीजेपी ने आराम से इस बात को भुला दिया.



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