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हम कितना असंवेदनशील बनाना चाहते हैं समाज को

ट्रायल का सामना कर रही आरोपी को पार्टी उम्मीदवार के तौर पर पेश किया जा रहा है और एक राष्ट्रीय हीरो का अपमान किया जा रहा है जिसने अपनी जान दी

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हम कितना असंवेदनशील बनाना चाहते हैं समाज को

भोपाल से बीजेपी की उम्मीदवार प्रज्ञा ठाकुर ने भले ही अपने बयान से किनारा कर लिया लेकिन हेमंत करकरे के बारे में उनके बयान का असर गया नहीं है. प्रज्ञा ठाकुर भले ही इस बयान को छोड़ अपने राजनीतिक प्रचार में आगे निकल गईं हैं मगर उनके बयान हेमंत करकरे के साथ काम करने वाले पुलिस अफसरों की अंतरात्मा को चुनौती दे रहे हैं. जिस अफसर की ईमानदारी और पेशेवर तरीके से काम करने का लोहा सब मानते हों, उस पर उठ रही उंगली उन्हें चुप नहीं करा पा रही है. 2017 में रिटायर हो चुकीं, पुणे की पुलिस कमिश्नर रहीं मीरा बोरवनकर ने इंडस डिक्टम नाम की वेबसाइट पर हेमंत करकरे के बारे में लिखा है. आज के इंडियन एक्सप्रेस में महाराष्ट्र के पूर्व पुलिस प्रमुख एसएस विर्क ने भी लिखा है.

लेख का शीर्षक ही है कि हेमंत करकरे को शाप देने वाली साध्वी के प्रमाण पत्र की ज़रूरत नहीं है. एसएस विर्क ने लिखा है कि तथाकथित भगवा आतंक को लेकर उनकी हेमंत करकरे से बातचीत होती रही है. एक बार हेमंत करकरे ने उन्हें बताया था कि महाराष्ट्र के कुछ हिस्सों में बग़ैर किसी कारण बम बलास्ट हुए थे. कुछ शक हुआ तो वे एटीएस चीफ के नाते बलास्ट की जगहों पर जांच के लिए गए. पता चला कि जो लोग घायल हुए थे वे कुछ उग्र हिन्दू संगठन से जुड़े थे, जिनका संबंध राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से था. जब गहराई से जांच की तब पता चला कि उनकी शुरूआती आशंका सही साबित हुई कि उग्र हिन्दू सगंठन का उदय हो चुका है जो आतंक के माड्यूल की तरह काम करता है. यह उदय इस्लामिक आतंक को चुनौती देने के लिए हुआ था. हमने यह एसएस विर्क के छपे लेख से पढ़कर आपको हिन्दी में बताया. हिन्दी अखबारों में ऐसी चीज़ें छपती नहीं हैं.


एसएस विर्क ने यह भी लिखा है कि हेमंत करकरे ने उन्हें बताया था कि कई समूहों की तरफ से उन पर राजनीतिक और यहां तक कि अफसरों की तरफ से दबाव डाले गए कि ये राष्ट्रवादी ताकते हैं इन्हें मत फंसाओ. लेकिन करकरे नहीं माने. आप खुद भी इंडियन एक्सप्रेस में छपे पूर्व आईपीएस एसएस विर्क के लेख को पढ़ें.

मुख्य आरोपी प्रज्ञा ठाकुर ज़मानत पर बाहर हैं. जिन गुप्त ताकतों ने हेमंत करकरे पर दबाव डाला वे अब आक्रामक हो गई हैं. उन्होंने न सिर्फ प्रज्ञा ठाकुर को भोपाल से उम्मीदवार के रूप में स्वीकार किया है बल्कि इसी के साथ वे गुप्त ताकतें अब गुप्त नहीं रहीं. मैं मानता हूं कि हेमंत करकरे पर आरोपों की अभी शुरूआत हुई है, यह अभी और होगा. ठाकुर ने कहा है कि उनके श्राप से करकरे की मौत हुई. खुद को निर्दोष बताते हुए एक कर्तव्यपरायण और पेशेवर अफसर पर आरोप लगाया जिसने अपनी ज़िंदगी की कुर्बानी दी है.

लोकतंत्र में बहुत चीज़ें ग़लत हो जाती हैं, लेकिन कुछ ज्यादा ही ग़लत है. ट्रायल का सामना कर रही आरोपी को पार्टी उम्मीदवार के तौर पर पेश किया जा रहा है और एक राष्ट्रीय हीरो का अपमान किया जा रहा है जिसने अपनी जान दी. शासकों की तरफ से ये गैरज़िम्मेदाराना बर्ताव क्या समाज और सेकुलर ताने-बाने पर असर नहीं डालेगा? हम अपने समाज को कितना असंवेदनशील बनाना चाहते हैं.

26 नवंबर 2008 को हेमंत करकरे के साथ अशोक कामटे और विजय सालस्कर शहीद हुए हैं. इन तीन बेहतरीन पुलिस अफसरों की शहादत एक साथ हुई थी. क्या प्रज्ञा ठाकुर का श्राप हेमंत करकरे के साथ गए इन दो अफसरों को भी लगा था. मुंबई क्राइम ब्रांच की चीफ रहीं, पुणे की पुलिस कमिश्नर मीरन बोरनवकर ने इंडस डिक्टम पर लिखा है कि जब मैं अपनी अंतिम श्रद्धांजलि देने गई थी, उसकी ललाट पर बुलेट का घाव काफी गहरा था, सफेद चादर के नीचे जो नहीं दिख रहा था, उसके बारे में सोच कर कांप गई. प्रज्ञा ठाकुर आपको उस बहादुर शख्स को सम्मान देने के लिए वहां होना था जिसने गोलियों का सामना किया ताकि आप और हम सुरक्षित सो सकें. अगर आप उनके ज़िंदा रहते सम्मान नहीं कर पाईं तो कम से कम मरने के बाद अपमान मत कीजिए. याद रखिए, एक शहीद का अपमान करना, देश का अपमान करना है. हम नागरिक के तौर पर आपको कभी माफ नहीं करेंगे. माफ करना हेमंत प्रज्ञा ठाकुर ने जो तुम्हारे साथ करने की कोशिश की है. देश तुम्हें प्यार करता है, तुम्हारा सम्मान करता है. तुम्हारी आत्मा को शांति मिले,मेरे बहादुर दोस्त.

मीरन बोनवरकर, एसएस विर्क के साथ पूर्व आईपीएस अफसर प्रकाश सिंह भी चुप नहीं रह सके. उन्होंने भी प्रज्ञा ठाकुर के बयान पर कड़ी आपत्ति दर्ज की है.

प्रज्ञा ठाकुर का बचाव प्रधानमंत्री ने किया है. टाइम्स नाउ चैनल को दिए इंटरव्यू में प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि एक महिला एक साध्वी को इस तरह बदनाम किया गया. समझौता ब्लास्ट का फैसला आया. उससे क्या निकला, बिना किसी प्रमाण के 5000 पुरानी सभ्यता को जिसने वसुधैव कुटुंबकम का नारा दिया. उस सभ्यता को आतंकवादी कह रहे हैं? यह उनका बयान है लेकिन प्रज्ञा ठाकुर पर सवाल उठाना 5000 साल पुरानी हिन्दू सभ्यता पर सवाल उठाना कैसे हो गया.

इंडियन एक्सप्रेस की न्यूज़ है. 29 नवंबर 2008 की खबर है. हेमंत करकरे के परिवार ने मुख्यमंत्री मोदी की मदद को अस्वीकार कर दिया. गुजरात के मुख्यमंत्री मोदी हेमंत करकरे और विजय सालस्कर के घर गए थे. वहां कहा था कि उनकी सरकार महाराष्ट्र में जो भी पुलिस कर्मी शहीद हुए थे उनके परिवार को एक करोड़ देना चाहती है. मगर करकरे के परिवार ने मना कर दिया था.

आउटलुक ने 29 नवंबर 2008 को ही एक खबर छापी जिसमें लिखा है कि विधानसभा चुनावों के प्रचार में मुख्यमंत्री मोदी ने मालेगांव धमाके की जांच को लेकर सवाल उठाया था. एटीएस चीफ हेमंत करकरे को कांग्रेस के इशारे पर काम करने वाला बताया था. आउटलुक ने मोदी के भाषण का शब्दश: बयान नहीं छापा है. प्रधानमंत्री मोदी, राजनाथ सिंह और अन्य नेता तब की एटीएस और हेमंत करकरे पर सवाल उठाते रहे हैं. प्रज्ञा ठाकुर मालेगांव धमाका मामले में आरोपी हैं. इससे पहले उन पर हत्या के एक मामले का मुकदमा चला था. प्रज्ञा ठाकुर को राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ के कार्यकर्ता यानी प्रचारक सुनील जोशी की हत्या के मामले में भी आरोपी बनाया गया था.

29 दिसबंर 2007 की रात सुनील जोशी की हत्या होती है और मध्य प्रदेश पुलिस जल्दी ही केस बंद कर देती है. बीजेपी की सरकार थी फिर संघ के कार्यकर्ता की हत्या का केस इतनी जल्दी क्यों बंद किया गया? जब आतंक के मामले में एनआईए ने हर्षद नाम के व्यक्ति को पकड़ा तब सुनील जोशी की हत्या का भेद खुला. एनआईए की अदालत ने सुनील जोशी की हत्या का मामला स्थानीय कोर्ट को सौंप दिया. इसके बाद सुनील जोशी की हत्या की फाइल खुलती है और जांच होती है. आठ लोग आरोपी बनाए जाते हैं जिसमें हर्षद और प्रज्ञा सिंह भी शामिल है. देवास के प्रथम अपर सत्र न्यायाधीश की अदालत में यह मामला चलता है. एक फरवरी 2017 को देवास के प्रथम अपर सत्र न्यायाधीश राजीव आप्टे फैसला देते हैं. इन सभी को बरी किया जाता है मगर इस फैसले में जज राजीव आप्टे एनआईए और मध्यप्रदेश पुलिस की जांच पर गंभीर सवाल उठाते हुए लिखते हैं- हत्या जैसे संवेदनशील और गंभीर प्रकरण में मध्यप्रदेश पुलिस औद्योगिक क्षेत्र देवास एवं राष्ट्रीय अनुसंधान अधिकरण (एनआईए) दोनों ही अनुसंधान एजेंसियों ने पूर्वाग्रह अथवा अज्ञात कारणों से गंभीरतापूर्वक अनुसंधान नहीं करते हुए दुर्बल प्रकृति के परस्पर प्रतिकूल साक्ष्य एकत्रित किए, वह अभियुक्तगण को उन पर विरचित आरोपों में दोषसिद्ध किए जाने के लिए पर्याप्त नहीं होते हुए, ऐसी विरोधाभासी स्वरूप के साक्ष्य से अभियोजन के कथानक पर ही गंभीर संदेह उत्पन्न हो गया है.

क्या इसे क्लिन चिट कहा जाएगा? तो क्या इस फैसले की अपील हाईकोर्ट में नहीं होनी चाहिए थी. यह मामला सुनील जोशी की हत्या का था. आरएसएस ने सुनील जोशी के इंसाफ की मांग क्यों नहीं की? सुनील जोशी को इंसाफ दिलाने के लिए मध्यप्रदेश की बीजेपी सरकार ने हाईकोर्ट में इस फैसले के खिलाफ अपील क्यों नहीं की. फरवरी 2017 में शिवराज सिंह चौहान मुख्यमंत्री थे. देवास कलेक्टर ने जो फाइल राज्य के विधि विभाग को भेजी होगी वह कहां है. उस पर कमलनाथ की सरकार क्यों नहीं बोलती है. क्या निचली अदालत के इंसाफ को अंतिम इंसाफ माना जा सकता है. आखिर सुनील जोशी की हत्या को कैसे भुला दिया गया. किसे बचाने के लिए भुलाया गया.

पूर्व मुख्यमंत्री को बताना चाहिए कि जब हत्या के सामान्य मामले में भी हाईकोर्ट में अपील हो जाती है तो इस मामले में हाईकोर्ट में अपील क्यों नहीं की गई. क्या संघ के प्रचारक सुनील जोशी की हत्या के मामले में इंसाफ दिलाना उनकी प्राथमिकता नहीं थी.

प्रज्ञा ठाकुर के धार्मिक पक्ष को उभारा जा रहा है ताकि कुछ बुनियादी तथ्यों को जनता से दूर रखा जा सके. 2014 में मानवाधिकार आयोग ने महाराष्ट्र पुलिस के डीजीपी को एक पैनल बनाने का आदेश दिया. 2015 में पैनल ने अपनी रिपोर्ट में कहा कि प्रज्ञा के आरोपों की पुष्टि नहीं हो पाई है. सुप्रीम कोर्ट ने कहा, और जांच की ज़रूरत नहीं है, पैनल ने केस बंद कर दिया. 2011 में एक बार फिर सुप्रीम कोर्ट के सामने आया था यह मामला लेकिन उनके दावे को काल्पनिक पाया गया. 23 अप्रैल को मुंबई अदालत में प्रज्ञा ठाकुर ने भी माना कि उन पर आरोप हैं. वे ज़मानत पर बाहर हैं. उनकी यह बात सही है कि आरोपी को चुनाव लड़ने से मनाही नहीं है. जहां तक प्रज्ञा ठाकुर को यातना देने की बात है इसकी बकायदा जांच हुई है.

अगर तब भी विश्वास नहीं था तो मौजूदा एनडीए सरकार अलग से इसकी जांच करा सकती थी. प्रज्ञा ठाकुर पर आरोप 2018 में तय हुए जब एनडीए की सरकार थी. आतंक का मामला है. क्या बरी होने का इंतज़ार नहीं किया जा सकता था.

मुंबई में जिमखाना क्लब के सामने मुंबई आतंकी हमले में शहीद पुलिस वालों की याद में एक स्मारक है. इस पर हेमंत करकरे का भी नाम लिखा है. आज तिस्ता सीतलवाड़ और रिटायर्ड जस्टिस अभय थिपसे, वकील आभा सिंह और कई मुंबईकर ने प्रज्ञा ठाकुर के बयान के विरोध में प्रदर्शन किया.

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महाराष्ट्र एटीएस ने बीजेपी सरकार के तहत पिछले अगस्त में कुछ लोगों को पकड़ा. महाराष्ट्र एटीएस ने अपनी चार्जशीट में 12 सदस्यों को कथित तौर पर सनातन संस्था और हिन्दी जनजागृति संस्था से जोड़ा है. क्या प्रधानमंत्री मोदी और बीजेपी इन्हें भी 5000 साल की हिन्दू सभ्यता से जोड़ेंगे. हेमंत करकरे जब एटीएस के चीफ थे तब कांग्रेस एनसीपी की सरकार थी, इस बार बीजेपी की सरकार है. पिछले साल दिसंबर की खबर है कि महाराष्ट्र एटीएस ने अगस्त 2018 में मुंबई से सटे नालासोपारा में छापे मारकर 20 देसी बम बरामद किए. वैभव राउत, शरद कलस्कर, सुधन्वा गोधलेकर को गिरफ्तार किया गया. वैभव की दुकान और घर से जिलेटिन की दो स्टिक मिली थी. जिलेटिन स्टिक का इस्तमाल धमाके में होता है. वैभव के वकील ने कहा था कि वैभव को फंसाने की कोशिश हुई है. वैभव राउत के समर्थन में लोगों ने मार्च भी किया था. इस वक्त वैभव राउत जेल में है और इस मामले में महाराष्ट्र एटीएस ने चार्जशीट फाइल कर दी है. इसमें 12 लोगों के खिलाफ आरोप दायर किया गया है. इनमें से कुछ आरोपी कथित तौर पर पत्रकार गौरी लंकेश और नरेंद्र दाभोलकर की हत्या से भी संबंधित पाए गए हैं. चार्जशीट में लिखा है कि आरोपियों ने कथित तौर पर हिन्दू राष्ट्र बनाने के लिए एक गिरोह बनाया है. इनका काम है हिन्दू धर्म की निंदा या खिलाफ बोलने वालों को धमकाना और खत्म कर देना. उसके लिए पिस्तौल और हथगोलों का इस्तमाल करना. ये चार्जशीट में लिखा है और अभी साबित होना है. क्या ये सारा काम शांति का है? वसुधैव कुटुंबकम का है?

इस चार्जशीट में कहा गया है कि कुछ आरोपी सनानत संस्था और हिन्दू जनजागृति संस्था के सदस्य हैं. सनातन संस्था ने इसे गलत बताया था और कहा कि जो लोग गिरफ्तार हुए हैं उनका इस संस्था से कोई संबंध नहीं है. क्या इन लोगों की बम बनाने के सामान के साथ की जो गिरफ्तारी हुई है उसे किसी धर्म का अपमान कहा जा सकता है. बम बनाने वाले शांति के पुजारी तो नहीं हो सकते हैं. एक दिसंबर 2018 का महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फड़नवीस का बयान छपा है. उन्होंने महाराष्ट्र विधानसभा में जवाब दिया था कि उनके पहले की सरकार ने सनातन संस्था पर प्रतिबंध लगाने का प्रस्ताव भेजा था. वो अभी केंद्र सरकार के पास लंबित है. केंद्र सरकार ही बता सकती है कि अगर उसे पांच हज़ार साल पुरानी सभ्यता में इतना ही भरोसा है तो फिर प्रस्ताव को रिजेक्ट क्यों नहीं किया गया है, यह लंबित क्यों हैं.



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