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क्या न्यूज़ चैनल आम आदमी की आवाज़ हैं?

जब 11 लाख लोगों से जुड़ी स्टोरी गायब कर दी गई तो क्या आप वाकई आश्वास्त हैं कि जिस माध्यम के सामने बैठे हैं वो आपकी आवाज़ का प्रतिनिधि है. वो आपकी आवाज़ का प्रतिनिधि है या आप उसके प्रोपेगैंडा के प्रतिनिधि बनते जा रहे हैं.

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क्या न्यूज़ चैनल आम आदमी की आवाज़ हैं?

क्या आपको वाकई लगता है कि न्यूज़ चैनलों ने आप आम आदमी को आवाज़ दी है. इस सवाल पर सोचिएगा और खुद से पूछिएगा कि उनके ज़रिए आपकी आवाज़ सरकार की ओर जा रही है या सरकार को पसंद आने वाले मुद्दे चैनलों के ज़रिए आप तक आ रहे हैं. इस फर्क को समझ लेने से ही आप देख पाएंगे कि जब आप अपने मुद्दे लेकर सड़कों पर आते हैं तो ज़्यादातर मामलों में चैनल वहां से चले जाते हैं. जैसे आप ही अपनी परेशानियों के कारण हैं. सरकार या उसकी नीति नहीं. न्यूज़ चैनल ने आपको अभ्यास के ज़रिए बदल दिया है. बड़ी आसानी से सूचनाओं और सवालों को गायब कर दिया गया है. राजनीतिक एजेंडे के साथ कदमताल करना सि‍खा रहे हैं. बहुत से लोग सीख भी रहे हैं. इस प्रक्रिया में हो यह रहा है कि आम आदमी अपनी तकलीकों के साथ मीडिया के इस स्पेस से गायब कर दिया गया है. इसे आप आसानी से समझ सकते हैं. 11 लाख आदिवासियों को उनकी ज़मीन से बेदखल किया जाएगा क्या ये स्टोरी चैनलों की दुनिया से गायब नहीं कर दी गई. 900 चैनलों में से दो चार पर आई होगी तो उस पर ध्यान न दें. जब 11 लाख लोगों से जुड़ी स्टोरी गायब कर दी गई तो क्या आप वाकई आश्वास्त हैं कि जिस माध्यम के सामने बैठे हैं वो आपकी आवाज़ का प्रतिनिधि है. वो आपकी आवाज़ का प्रतिनिधि है या आप उसके प्रोपेगैंडा के प्रतिनिधि बनते जा रहे हैं. दर्शक बनना रिमोट से चैनल बदलना नहीं होता है.

ये खबर उन लोगों के लिए नहीं है जो पेंशन नहीं चाहते हैं. मगर ये लोग पेंशन के लिए आए हैं. अचानक कुछ हुआ है. 2004 से पुरानी पेंशन व्यवस्था खत्म कर दी गई. पेंशन को लेकर हाल में दिल्ली में छोटे बड़े की प्रदर्शन हुए. हम यह नहीं कहते कि ये लोग टीवी के सामने पेंशन का मुद्दा ही देखने जाते होंगे क्योंकि इन्हें भी प्रोपेगैंडा ने बांध दिया है. हिन्दू-मुस्लिम मुद्दे इनके दिलो दिमाग पर भी छाए रहते होंगे. इस लिहाज़ से भी देखें कि जब ये मुद्दे लेकर जंतर मंतर पर आते हैं, तो ये मीडिया में अपने लिए जगह हासिल कर पाते हैं. यह बिल्कुल संभव नहीं है कि हर धरना प्रदर्शन कवर हो जाए लेकिन जिस तरह से कई धरनों के बाद पेंशन एक सवाल बन रहा है उस सवाल से मीडिया क्यों भाग रहा है. सांसद विधायक पेंशन लेंगे और कर्मचारी को पेंशन नहीं. न्यू पेंशन स्कीम अगर इतनी ही अच्छी योजना है तो सबसे पहले उसमें सांसदों और विधायकों को डालना चाहिए. देश के अलग-अलग हिस्सों से आए इन लोगों को कितना खाली लगा होगा कि दिल्ली आए, नारे भी लगाए मगर किसी ने नोटिस ही नहीं किया. इन सबको समझ आने लगा है कि पुरानी पेंशन में आखिरी वेतन का आधा हिस्सा तो मिलता था लेकन नई पेंशन स्कीम में कितना मिलेगा किसी को पता नहीं है. लेकिन अगर इन लोगों को भी एक कमरे में बंद कर राष्ट्रवादी कवियों की कविताएं सुनाई जाए तो मेरा दावा है कि पेंशन तो नहीं बहाल होगी, पेंशन को लेकर धरने प्रदर्शन बंद हो जाएंगे. इन लोगों को भी खुद से लड़ना होगा. वे जनता हैं या चैनलों के बनाए हुए सामान जिसे दर्शक कहते हैं. हमारे सहयोगी राजीव रंजन जंतर मंतर गए थे. अखिल भारतीय राज्य सरकारी कर्मचारी फेडरेशन के नेता से बात करने.


पेंशन दुनिया भर में मुद्दा रहा है. मीडिया भले टाल दे मगर लोग इस मुद्दे को लेकर सड़कों पर आ जाते हैं. इनकी मांग थी कि ठेके पर कर्मचारी नहीं रखे जाएं. अब जो ठेके पर रखे गए हैं और जिन्हें पेंशन नहीं मिल रही है उनकी अंतरात्मा ही बता सकती है कि वोट वे अपने सवाल के आधार पर देंगे या भावुक मुद्दों के आधार पर. अपनी मांगों के लिए धरना प्रदर्शन करने वाले इन लोगों के इम्तहान का वक्त आ रहा है. यह चुनाव दर्शक के नागरिक होने का भी चुनाव है.

अब देखिए पुणे में 15 दिनों से ये छात्र धरने पर बैठे हैं. यहां पर एम फिल और पीएचडी के छात्रों को 5000 और 8000 रुपये मासिक स्टाइपेंड मिलता था. यूनिवर्सिटी ने इसे बंद कर दिया. 2018-19 के लिए जिन छात्रों ने एडमिशन लिया है उन्हें 10 महीने बाद भी स्टाइपेंड नहीं मिला है. इनमें से कई गरीब और पहली पीढ़ी के छात्र हैं. 8 फरवरी से 20 फरवरी तक इन छात्रों ने यहां धरना दिया. 12 दिनों के धरने के बाद जब कोई सुनवाई नहीं हुई तो पिछले तीन दिनों से छात्रों ने आमरण अनशन शुरू कर दिया है. इनमें 5 लड़कियां हैं और 3 लड़के हैं. आदिवासी पृष्ठभूमि के छात्र इतने गरीब हैं कि एक छात्र स्टाइपेंड बंद होने के कारण अंगूर के बाग में 150 रुपये की मज़दूरी कर रहा है. ऐसा मुझे बताया गया है. इन छात्रों की मांग है कि एम फिल के छात्र को 18 महीने का स्टाइपेंड मिले और पीएचडी के लिए 4 साल का मिले. इसके लिए पुणे यूनिवर्सिटी मे बंद का आहवान किया गया था.

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कर्नाटक बीजेपी के सांसद से लेकर बनारस बीजेपी से जुड़े बीएचयू के राजनीतिक शास्त्र के प्रोफेसर तक ने मेरा नंबर सार्वजनिक कर रहे हैं. सांसद शोभा ने कई पत्रकारों की तस्वीरें ट्वीट कर पूछा है कि देशद्रोहियों को सबक सिखाना है. बीएचयू के ये प्रोफेसर बनारस बीजेपी में सक्रिय भी रहे हैं. आसानी से समझा जा सकता है कि अफवाहें कौन फैला रहा है और कौन उन अफवाहों को मान्यता दे रहा है. गालियां देने वाल देशभक्त हो ही नहीं सकता है. कभी आपने सुना है कि आज़ादी की लड़ाई में शामिल हमारे नेता गालियां देते थे. आज़ाद से लेकर भगत सिंह से लेकर गांधी तक. सबने भाषा की शानदार मर्यादा कायम की. कुछ लोगों ने मुझे जान से मारने की धमकी दी है जिसकी शिकायत पुलिस में करा दी है. एक गुज़ारिश है कि अब जब मेरा नंबर आ ही गया है तो फोन करने या मेसेज करने से पहले अपने विवेक का इस्तमाल ज़रूर करें. बधाई, शुभकामनाएं, गुडमार्निंग मेसेज, हलो या नमस्कार टाइप के मेसेज न भेजें. आपसे संपर्क रहने के कारण ही एक ऐसा मेसेज आया जिसे पढ़ने से मैं खुद को रोक नहीं पा रहा हूं. अनिगनत समस्याओं के लिए लोगों ने मुझे लिखा है मगर आज 22 साल के करियर में पहली बार किसी ने लाइब्रेरी के लिए लिखा है. वो भी दिल्ली के देहात से. लिखा है कि हम दक्षिण पश्चिम दिल्ली की लोकसभा की नज़फगढ़ विधानसभा क्षेत्र के निवासी हैं. मेरे क्षेत्र में एक भी पुस्तकालय की सुविधा नहीं है. न जाने कितने छात्रों को सरकारी लाइब्रेरी के लिए 45 किलोमीटर दूर पटेल नगर या सोरिजिनी नगर जाना पड़ता है. फिलहाल छात्रों को यहां के निजी पुस्तकालयों में जाना पड़ता है और उनका मासिक खर्च 1000 से 2000 रुपये आता है जो कि देहात के छात्र के लिए मुश्किल ही नहीं नामुमकिन है. इस क्षेत्र में दिन प्रतिदिन बढ़ती शिक्षा की तरफ रुचि से पुस्तकालय की आवश्यकता और बढ़ जाती है.

कभी नहीं सोचा था कि इसी दिल्ली के देहात के छात्र मुझे लिखेंगे कि गांव में लाइब्रेरी नहीं है. मुझसे रहा नहीं गया सो इनका पत्र पढ़ दिया. लिखने वाले ने बताया कि इलाके के सांसद और विधायक से भी कहा मगर लाइब्रेरी की जगह गांव में बेंच लगाकर चले गए. दिल्ली देहात के लड़कों ने लाइब्रेरी मांगी है, लाइब्रेरी मिल जानी चाहिए. हम भले लोगों के मुद्दे न जानें, लोग अपना मुद्दा जानते हैं. ये और बात है कि टीवी उन पर अपना मुद्दा थोप देता है और वे दब जाते हैं. 20 दिसंबर को मुंबई में देश भर से यौन हिंसा की शिकार महिलाएं जमा हुईं और उन्होंने दिल्ली के लिए यात्रा निकाली. 22 फरवरी को वे दिल्ली आ गई हैं. ये महिलाएं साहस कर पाईं हैं कि समाज के सामने आ सकें, आपबीती बता सकें कि ताकि हम समाज का चेहरा देख सकें. ये तो चाहती हैं कि अपना चेहरा दिखाकर आपसे बात करें मगर सुप्रीम कोर्ट का कोई निर्देश है. अदिती राजपूत इन महिलाओं से बात करने गईं थीं. यौन हिंसा सबसे अधिक घरों के भीतर होती है वही घर जहां महान भारतीय परिवार रहता है. यह मार्च 24 राज्यों के 200 ज़िलों से गुज़रा है. जहां जहां से गुज़रा है कोई 25000 महिलाएं इस काफिले से जुड़ती गईं. दिल्ली तक आते आते संख्या कम तो हो गई लेकिन जो आईं हैं उनकी बात तो सुनिए.


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