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शिक्षा हमारी सरकारों की प्राथमिकता में क्यों नहीं?

देश के छह राज्यों में प्राथमिक स्कूलों में पांच लाख से अधिक शिक्षक नहीं हैं, इनमें से चार लाख से अधिक की कमी सिर्फ बिहार और यूपी में है

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शिक्षा हमारी सरकारों की प्राथमिकता में क्यों नहीं?

सरकारी स्कूलों और कालेजों में शिक्षा की हालत ऐसी है कि जरा सा सुधार होने पर भी हम उसे बदलाव के रूप में देखने लगते हैं. सरकारी स्कूलों में लाखों की संख्या में शिक्षक नहीं हैं. जो हैं उनमें से भी बहुत पढ़ाने के योग्य नहीं हैं या प्रशिक्षित नहीं हैं. दिसंबर 2016 में लोकसभा में एक सवाल का जवाब देते हुए मानव संसाधन मंत्री प्रकाश जावड़ेकर ने बताया था कि प्राथमिक स्कूलों में 907585 शिक्षक नहीं हैं और सेकेंडरी स्कूलों में एक लाख से अधिक शिक्षक नहीं हैं.

इस वक्त तक इनमें से कितने पद भरे गए हैं इसकी जानकारी नहीं है लेकिन इंडियन एक्सप्रेस में 25 दिसंबर 2018 को एक रिपोर्ट छपी थी. Centre for Budget and Governance Accountability (CBGA) और Child Rights and You (CRY) ने एक सर्वे कराया था जिसमें यह बात सामने आई थी कि छह राज्यों में प्राथमिक स्कूलों में 5 लाख से अधिक शिक्षक नहीं हैं. इनमें से 4 लाख से अधिक तो सिर्फ बिहार और यूपी में नहीं हैं. अब आप सोचिए सिर्फ इन दो राज्यों में चार लाख से अधिक शिक्षक नहीं हैं तो यहां पढ़ने वालों की क्या हालत होती होगी. दिसंबर 2016 में प्रकाश जावड़ेकर ने बताया था कि बिहार झारखंड के प्राथमिक स्कूलों में सबसे अधिक शिक्षकों की कमी है. झारखंड में 38.39 प्रतिशत और बिहार में 34.37 प्रतिशत शिक्षकों के पद खाली थे. दिल्ली में 24.96 प्रतिशत, यूपी में 22.99 प्रतिशत शिक्षकों के पद खाली थे.

इंडिया स्पेंड ने विश्लेषण किया था कि बिहार में पहली से सातवीं क्लास के लिए 2 लाख 78 हज़ार से अधिक शिक्षकों के पद खाली हैं. पिछले साल की मीडिया रिपोर्ट के अनुसार हरियाणा जैसे छोटे राज्य में 29,000 शिक्षकों के पद खाली थे. बहाली की प्रक्रिया का जो आलम है उससे नहीं लगता कि इसमें कुछ खास सुधार हुआ होगा. भारत में एक लाख ऐसे स्कूल चलते हैं जहां सिर्फ एक शिक्षक हैं. फोकस इस बात पर भी होता है कि कितने बच्चे स्कूल में है और कितने बाहर रह गए हैं. जब पढ़ाई का स्तर ही घटिया है तो बाहर और भीतर वाले में फर्क क्या करना. जो भीतर है वह भी अशिक्षित है. वैसे एनरोलमेंट के आंकड़ें में अच्छा सुधार हुआ है लेकिन स्कूल जाने पर बच्चे को मिल क्या रहा है, सीख क्या रहा है. हमारा फोकस इस पर है. दस साल से असर की यह रिपोर्ट आती है. चर्चा भी होती है. कुछ असर भी हुआ होगा मगर हम थोड़े बहुत सुधार पर संतोष कर लेते हैं.


इस सर्वे में 3 साल ले लेकर 16 साल के छात्रों का सर्वे किया गया है. उनसे सामान्य नंबर की पहचान कराई गई है, सामान्य शब्दों को पढ़ने के लिए दिया गया और पाठ को भी. गणित के सामान्य सवाल दिए गए. नेता भारत को विश्व गुरु बनाने का फर्जी सपना दिखाते हैं, मगर क्लास रुम में वे आठवीं के बच्चों को दूसरी की किताब पढ़ने लायक नहीं बना पाते. फेलियर छात्रों के कंधे पर भारत को विश्व गुरु बनाना है तो बना लीजिए. हम दुनिया को उल्लू बना रहे हैं या खुद को. कक्षा आठ को प्राथमिक स्कूल का अंतिम पड़ाव माना जाता है. आठवीं क्लास में पहुंचकर बच्चा क्या सीख पाता है.

मात्र 44 प्रतिशत आठवीं के छात्र तीन अंकों की संख्या में एक अंक से भाग दे सकते हैं. 56 फीसदी आठवीं के छात्रों को इसी तरह के सवाल को हल करना भारी पड़ जाता है. 2016 से लेकर 2018 तक आठवीं के बच्चों के सामान्य गणित की यह क्षमता जस की तस है. कुछ राज्यों में स्थिति बेहतर हुई है तो कुछ राज्यों में प्रतिशत और गिरा है. 27 प्रतिशत आठवीं के छात्र दूसरी की किताब नहीं पढ़ सकते हैं. इसमें 2016 के आंकड़े से कोई सुधार नहीं हुआ है. अगर आठवीं में ये हाल है तो फिर 10 वीं के इम्तिहान में क्या होता है आप समझ सकते हैं. तभी बड़ी संख्या में चोरी होती है. आठ लाख, दस लाख की संख्या में छात्र फेल हो जाते हैं. 49.7 प्रतिशत पांचवी के छात्र दूसरी की किताब नहीं पढ़ सकते हैं. इसमें 2016 के बाद से 2.4 प्रतिशत का सुधार हुआ है. 72.2 फीसदी पांचवी के छात्र 100 में 2 का भाग नहीं लगा सकते. फिर भी इसमें कुछ सुधार हुआ है.

अब आते हैं उत्तर प्रदेश पर, इस राज्य का चुनाव इसलिए किया है कि दिन रात इसी की चर्चा होती रहती है. कभी कुंभ है तो कभी गौरक्षा है तो कभी दंगा है तो कभी राजनीतिक गठबंधन है. कभी देश को इतने उतने प्रधानमंत्री देने का गौरव है तो कभी रोज़ बनते और बिखरते गठबंधनों से देश की राजनीति बदल जाने की दावेदारी है. इन सबके बाद यूपी के स्कूलों में पढ़ने गए छात्रों की पढ़ने की क्षमता कैसी है. असर की रिपोर्ट कहती है कि 5 वीं के 52 प्रतिशत छात्र दूसरी की किताब नहीं पढ़ पाते हैं. 7 वीं के 68 फीसदी छात्र दूसरी की किताब नहीं पढ़ पाते हैं. 8 वीं के 73 फीसदी से अधिक छात्र दूसरी की किताब नहीं पढ़ पाते हैं.  यह उस राज्य की शिक्षा का स्तर है जो हर समय राजनीति के केंद में रहता है.

क्या आप जानना चाहेंगे कि पांचवी, सातवीं और आठवीं के छात्रों को पढ़ने का जो सैंपल दिया गया था वह क्या है. असर की रिपोर्ट 224 पेज पर लिखा है कि ''नगमा समझदार लड़की थी. मगर उसका छोटा भाई अमन बहुत नटखट था. एक दिन दोनों बाज़ार में घूम रहे थे. अमन ने रास्ते में पकौड़े देखे. उसे पकौड़े बहुत पंसद थे. मां उसके लिए पकौड़े बनाती थी. नगमा ने कहा कि यह पकौड़े तीखे होंगे. मगर अमन नहीं माना. अमन ने पकौड़े खाए और उसकी आंखों से आंसू निकलने लगे.'' दूसरी क्लास का यह पाठ पांचवी सातवीं और आठवीं के पचास से सत्तर फीसदी बच्चे नहीं पढ़ सके. राजनेता इस जानकारी पर उछल पड़ेगा, वो हालात में सुधार नहीं करेगा बल्कि अपने भाषणों का स्तर गिरा देगा. वह जानता है कि बारीक बातों की समझ लोगों तक नहीं पहुंचेगी इसलिए जुमले की भाषा बोलने लगता है. मगर समाज के हिस्सेदार होने के नाते आपको इस हालात को बदलने की मांग करनी चाहिए.

गणित की बुनियादी शिक्षा हमारे देश में कमज़ोर रही है. फिर भी असर की रिपोर्ट ने जानना चाहा है कि सामान्य अंक गणित में यूपी के बच्चों का प्रदर्शन कैसा है. पहले हम आपको सैंपल बता देते हैं जो पूछा गया है. 63 में से 44 और 92 में से 48 घटाने को कहा गया. छठी, सातवीं और आठवीं के करीब 20 फीसदी छात्र हल नहीं कर सके. तीसरी के छात्रों में से 33 प्रतिशत ऐसे मिले जो 9 तक की संख्या तो पहचान लेते थे मगर उसके आगे 99 तक की संख्या को नहीं पहचान पाए. डिवीजन के सवाल के रूप में कहा गया कि 898 को 7 से भाग देना है और 659 को 4 से भाग देना है. 8 वीं के 44.4 प्रतिशत, 7 वीं के 38.9 प्रतिशत हल नहीं कर पाए.

उत्तर प्रदेश के 63 प्रतिशत से अधिक स्कूलों में दूसरी कक्षा के छात्रों को किसी और कक्षा के साथ मिलाकर बिठाया जाता है. कई बार एक से अधिक कक्षाओं के साथ मिलाकर बिठाया जाता है. 52 प्रतिशत स्कूलों में चौथी के छात्रों को एक या एक से अधिक अन्य क्लास के साथ बिठाया जाता है. क्या आप अपने बच्चे को ऐसे स्कूल में पढ़ाना चाहेंगे जहां चौथी, तीसरी और दूसरी के बच्चों को एक ही क्लास रूप में बिठा दिया जाए. क्या आप इस सवाल पर बात करते हैं, अपने नेता से बात करने की उम्मीद रखते हैं. ये तीन सवाल खुद से भी पूछें.

असर की रिपोर्ट तैयार करने के सिलसिले में 15000 से अधिक सरकारी स्कूलों का दौरा किया गया. इन स्कूलों में पढ़ाई का स्तर ही नहीं बल्कि लाइब्रेरी है या नहीं, है तो उसका इस्तमाल होता है या नहीं. लड़कियों के लिए अलग से कितने शौचालय हैं, कितने शौचालय इस्तमाल होते हैं और कितने में ताले लगे रहते हैं. शौचालय में पानी है या नहीं. जैसे यूपी में भले ही 100 प्रतिशत विद्युतीकरण हो गया हो मगर असर ने पाया कि मात्र 66 प्रतिशत स्कूलों में बिजली का कनेक्शन है. जब असर की टीम गई तो मात्र 55 प्रतिशत स्कूलों में बिजली आई हुई थी. सवाल यह है कि यूपी प्रधानमंत्री देकर खुद के लिए क्या हासिल कर पाया. अगर देश के सबसे बड़े राज्य की शिक्षा का यह स्तर है तो आप समझ सकते हैं. अब अगर पहली से लेकर आठवीं की शिक्षा का यह हाल होगा तो उसका नतीजा दसवीं में दिखेगा ही. मीडिया रिपोर्ट के अनुसार हमने 2018 के कुछ राज्यों के 10 वीं के इम्तिहान में फेल होने वालों का प्रतिशत देखा है. यूपी में 24 प्रतिशत से अधिक छात्र फेल हो गए. संख्या में साढ़े आठ लाख से अधिक छात्र फेल हुए. बिहार में 49.86 प्रतिशत छात्र फेल हो गए. करीब साढ़े पांच लाख से अधिक फेल हुए. मध्य प्रदेश में 34 प्रतिशत छात्र फेल हो गए. संख्या के हिसाब से पौने चार लाख छात्र फेल हुए. झारखंड में 40 प्रतिशत छात्र फेल हो गए. फेल होने वालों की संख्या एक लाख से अधिक थी. हरियाणा में करीब 49 फीसदी छात्र फेल हो गए. संख्या में करीब डेढ़ लाख से अधिक छात्र फेल हुए.

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मीडिया इन प्रदेशों को अंग्रेजी में हिन्दी हार्टलैंड कहता है. हिन्दी भाषी इन पांच राज्यों में पिछले साल 10 वीं के इम्तिहान में 20 लाख से अधिक छात्र फेल हो गए थे. पंजाब का भी बता देता हूं. वहां करीब सवा लाख फेल हुए थे. प्राइम टाइम के बहुत से दर्शक दुनिया के अलग-अलग हिस्से में रहते हैं. क्या वे बता सकते हैं कि उन देशों में बीस लाख छात्र फेल होते हैं, और इसके बाद भी शिक्षा मंत्री की मौज रहती है.

इस बीच मानव संसाधन मंत्री ने कहा है कि इसी अकादमिक वर्ष यानी 2019-20 से निजी शिक्षण संस्थाओं में नया कोटा लागू हो जाएगा. आर्थिक रूप से कमज़ोर छात्रों को 10 प्रतिशत कोटा मिलेगा. इसके लिए इन संस्थाओं में सीटों की संख्या बढ़ाई जाएगी. 900 यूनिवर्सिटी और 40,000 कालेजों में यह लागू हो जाएगा. इसमें प्राइवेट भी हैं और सरकारी संस्थान भी.



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