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पटना हाईकोर्ट में जज के फैसले से सनसनी क्यों?

क्या घर में रखी किताबें आपको सलाखों के पीछे पहुंचा सकती हैं, उनके टाइटल क्या आपको आतंक जैसे मामले में पकड़ने के लिए बने कानून की गिरफ्त में डाल सकते हैं.

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पटना हाई कोर्ट में आज अप्रत्याशित हुआ. जस्टिस राकेश कुमार के फैसले को 24 घंटे के भीतर 11 जजों की बेंच ने निरस्त कर दिया. जस्टिस राकेश कुमार से इस वक्त सारा काम ले लिया गया है. वो किसी केस की सुनवाई नहीं कर रहे हैं. इस फैसले में ऐसा क्या था कि सुबह-सुबह 11 जजों की बैठक हुई और पूरे फैसले को निरस्त किया. जस्टिस राकेश कुमार पूर्व आईएएस अधिकारी केपी रमैय्या की अग्रिम ज़मानत के मामले में सुनवाई कर रहे थे. 23 मार्च 2018 को हाईकोर्ट ने उनकी अग्रिम जमानत की याचिका ठुकरा दी थी. रमैय्या ने समय से पहले रिटायरमेंट की अर्जी दी थी. उन्हें पता था कि रिटायरमेंट की अर्जी मंजूर हो गई है. उन्होंने ढाई करोड़ से अधिक की राशि के दो अलग-अलग चेक जारी कर दिए थे. इस मामले के संदर्भ में अग्रिम जमानत की याचिका पर सुनवाई हो रही थी. जस्टिस राकेश कुमार ने लिखा कि बेशक ज़मानत देना या न देना कोर्ट का विवेकाधिकार है, लेकिन जिस तरह से आरोपी को ज़मानत दी गई है, वह न्यायपालिका पर सवाल उठाता है. यह कोर्ट इस बात की जांच करने के लिए अधिकृत है कि ज़मानत न्यायिक विवेक के आधार पर दिया गया है या बाहरी दबाव के आधार पर. मेरी राय में इस मामले की जांच होनी चाहिए और जांच पटना के जिला जज को करना चाहिए.

सवाल था कि क्या बेल के समय नियमित बेंच छुट्टी पर थी, अखबारों में जो रिपोर्ट छपी है वो सही है या नहीं. अगर नियमित बेंच की जगह जो बेंच बैठी थी, उस जज के पिछले छह महीने के फैसलों की जांच होनी चाहिए. हाईकोर्ट के द्वारा ज़मानत रद्द करने पर आरोपी कई महीने तक अदालत में नहीं आया, इसके बाद भी इस मामले में उसे ज़मानत दी गई. यह भी पता किया जाए कि स्पेशल जज छुट्टी पर अन्य कारणों से तो नहीं गए थे. जस्टिस राकेश ने 15 वें पैराग्राफ में लिखा कि न्यायपालिका के सम्मान को बचाने के लिए भ्रष्टाचार पर पर्दा नहीं डालना चाहिए वर्ना पूरे समाज का विश्वास हिल जाएगा. इस फैसले में जस्टिस राकेश कुमार ने न्यायपालिका के भीतर पैसे लेकर कुछ मामलों का भी ज़िक्र किया है. 20 पन्नों के इस फैसले में उन्होंने लिखा है कि भ्रष्ट न्यायिक अधिकारियों को बचाने के उदाहरण हैं. आरोप लगने और सही पाए जाने के बाद भी विभाग द्वारा बचाया गया हो. सामान्य तौर पर मैं ऐसे आदेश पास नहीं करता लेकिन पिछले कुछ वर्षों से इस कोर्ट में चीज़ें सही संदर्भ में नहीं चल रही है. मैंने 25 दिसंबर 2009 को न्याय करने की शपथ ली थी, और अगर मैं भ्रष्टाचार के मामले में कदम उठाने में नाकाम होता हूं तो खुद के साथ न्याय नहीं कर पाऊंगा. यह सभी को पता है कि इलाहाबाद हाई कोर्ट के एक वरिष्ठ जज ने चारा घोटाले की सुनवाई के दौरान अपनी पत्नी को राज्यसभा की सदस्यता दिला दी. जब मैं जज बना तो देखा कि वरिष्ठ जज चीफ जस्टिस की खुशामद करने में लगे हैं. मैं सोचता था कि सीनियर जज को ये सब करने की क्या ज़रूरत है. लेकिन कुछ समय बाद मुझे पता चला कि ये सब अपनी पसंद के या जाति के लोगों को जज बनाने के लिए किया जा रहा है या किसी भ्रष्ट न्यायिक अधिकारी को बचाने के लिए.


इसके बाद चीफ जस्टिस के आदेश से जस्टिस राकेश कुमार से सारे मामले ले लिए गए. नोटिस जारी कर दिया गया और फिर 11 जजों की बेंच ने फैसला किया कि जस्टिस राकेश कुमार का फैसला निरस्त समझा जाना चाहिए. जस्टिस अमरेश्वर प्रताप साही ने फैसला सुनाते हुए कहा कि माननीय जस्टिस राकेश कुमार के सामने जितने भी मामले लंबित हैं, तत्काल प्रभाव से वापस लिए जाते हैं.

दो बातें हैं. सुप्रीम कोर्ट अगर बेल न दे तो भी निचली अदालतें बेल दे सकती हैं और किसी जज का लिखा हुआ फैसला अदालत निरस्त कर सकती है. लेकिन जस्टिस राकेश कुमार ने विस्तार से भ्रष्टाचार को लेकर सवाल उठाए हैं, उनका क्या. उनका अब कुछ नहीं, क्योंकि फैसला ही निरस्त हो गया है. पटना हाईकोर्ट कवर करने वालों को याद नहीं आ रहा है कि हाल फिलहाल कब फैसला पलटा गया है.

सन 1869 में लियो टॉलस्टाय ने 'वॉर एंड पीस' पूरी की थी, 2019 में भारत में इस किताब को लेकर वॉर जैसी स्थिति तो नहीं है लेकिन पीस जैसी भी नहीं है. पहले इस मामले को समझना ज़रूरी है कि संदर्भ क्या है. क्या मीडिया ने हड़बड़ी में रिपोर्टिंग कर दी और सोशल मीडिया में लोग सक्रिय हो गए. मुंबई हाई कोर्ट में भीमा कोरेगांव मामले में गिरफ्तार एक आरोपी वी गोंज़ल्विस की ज़मानत याचिका पर सुनवाई हो रही थी. इसकी सुनवाई जस्टिस सारंग कोतवाल कर रहे थे. पुणे पुलिस उनकी ज़मानत का विरोध कर रही थी जिसने गोंज़ाल्विस को पिछले साल अगस्त में अनलाफुल एक्टिविटिज़ प्रिवेंशन एक्ट के तहत गिरफ्तार किया था.

पुलिस ने गोंजल्विस के खिलाफ सीडी और कुछ किताबें पेश कीं और कहा कि उनके घर से बरामद हुई हैं और गंभीर हैं. जो भी ज़ब्ती हुई है उसकी सूची पेश की गई, जिसमें कई चीज़ें थी, मार्कसिस्ट आर्काइव की सीडी, कबीर कला मंच की सीडी जिसका टाइटल है राज्य दमन विरोधी और कुछ किताबें. सुधा भारद्वाज के वकील युग मोहित चौधरी ने कहा कि उस सूची में लियो टॉल्सटाय की किताब वॉर एंड पीस है ही नहीं लेकिन मीडिया में रिपोर्ट बन गई कि जस्टिस सारंग कोतवाल ने वॉर एंड पीस से संबंधित टिप्पणी की है और पूछा है कि दूसरे देश के युद्ध से संबंधित किताब क्यों है, वो कोर्ट को बताना होगा. सुधा भारद्वाज के वकील युग मोहित चौधरी ने कहा कि मीडिया में वार एंड पीस एन जंगल महल की बात हो रही थी. पीटीआई में उनका बयान जारी किया है. अगर आप हफपोस्ट की रिपोर्ट पढ़ेंगे तो उसमें लिखा है कि गोंज़ाल्विस के वकील मिहिर देसाई और जस्टिस सारंग कोतवाल दोनों ने कहा है कि किताब रखने से आतंकवादी नहीं हो जाता है. इस बहस में जो उल्लेख करने वाली बात है या बहस करने वाली बात है वो है पुणे पुलिस यानी सरकारी वकील अरुणा पाई की दलील. अरुणा पाई ने कहा कि एक साल पहले गोंज़ाल्विस के कंप्यूटर के हार्ड डिस्क से अभी तक कुछ भी गंभीर नहीं मिला है. लेकिन उनके घर से कुछ सीडी और किताबें मिली हैं जिनके टाइटल आपत्तिजनक हैं. जस्टिस कोतवाल ने कहा कि पुणे पुलिस को भी संतुष्ट करना होगा कि ये क्यों गंभीर है जो बताने में फेल रही है.

तो लियो टॉलस्टाय की किताब वॉर एंड पीस का ज़िक्र नहीं हो रहा था. विश्वजीत रॉय के संपादन में छपी किताब War and Peace in Junglemahal: People, State and Maoists का ज़िक्र हो रहा था. हम आपको बता दें कि पश्चिम बंगाल के पुरुलिया, पश्चिम मिदनापुर और बांकुरा को मिलाकर जंगलमहल कहा जाता है. जो बहस करने लायक है वो यह कि क्या घर में रखी किताबें आपको सलाखों के पीछे पहुंचा सकती हैं, उनके टाइटल क्या आपको आतंक जैसे मामले में पकड़ने के लिए बने कानून की गिरफ्त में डाल सकते हैं. आदमी तो छोड़िए क्या पता एक दिन लाइब्रेरी भी आतंकवादी या राष्ट्रविरोधी घोषित हो जाए क्योंकि वहां ऐसी किताबें हो सकती हैं जिनके टाइटल किसी को राज्य विरोधी लग सकते हैं. ऐसे लोग जो आतंक पर रिसर्च करते हैं वो अपनी किताबों के टाइटल काट कर अभी से वहां सामाजिक प्रश्नावली लिख दें या फिर वहां पर प्रात व्यायाम के तीस फायदे लिख दें. ऐसे सबूतों के आधार पर किसी को भी सालों जेल में टहलाया जा सकता है. इस पर बहस करने की ज़रूरत है. अगर आपको आज के समय में कोई किताब पढ़नी है तो जार्ज ओरवेल की 1984 पढ़ें या फिर हक्सले की ब्रेव न्यू वर्ल्ड पढ़ें. दोनों एक साथ पढ़ेंगे तो और भी अच्छा.

वॉर एंड पीस का हिन्दी अनुवाद भी है लेकिन 2100 पन्नों का है और तीन खंडों में छपा है. लियो टॉलस्टाय ने इसे 1865 से लिखना शुरू किया था. टॉलस्टाय खुद इसे नॉवेल यानि उपन्यास नहीं मानते थे, महाकाव्य भी नहीं और इतिहास तो बिल्कुल नहीं मानते थे. 2016 में गार्डियन अख़बार में फिलिप हेनशेर ने लिखा है कि अगर आपने वॉर एंड पीस नहीं पढ़ी है तो इसे दस कारणों से पढ़नी चाहिए. इस उपन्यास के पात्र अपने अनुभवों के आधार पर लगातार बदलते रहते हैं. यह कोई फिल्मी हीरो हीरोईन की किताब नहीं है. किताब समझाना चाहती है कि लोग जो भी करते हैं वो क्यों करते हैं, किताब ऐसे पात्रों को भी समझने और उनसे सहानुभूति रखने का सलीका सिखाती है जिनसे आप सहमत नहीं होते हैं. यह किताब किसी भी किरदार के लिए शर्मिंदा नही है और न ही किसी एक को सही ठहराने का प्रयास करती है. आप इसे पढ़ने के दौरान देखते हैं कि एक ही घटना को अलग-अलग लोग किस तरह से देखते हैं. इसमें मानवीय स्थिति को समझने का प्रयास है. जो पात्र शुरू में अच्छे लगते हैं वो बाद में मायूस करते हैं और जो शुरू में खराब लगते हैं वो बाद में अच्छे लगते हैं.

फिलिप हेनशेर की बात को पढ़ते हुए लग रहा था कि वे आज के माहौल के बारे में लिख रहे हैं जहां हर बात को शत्रुता के खांचे में रखकर पेश किया जाता है. इस नावेल को दस दिनों में पढ़ा जा सकता है और पुलिस के अलावा पत्रकार भी पढ़ सकते हैं. मैंने नहीं पढ़ी है. हेनशेर की यह टिप्पणी ज़्यादा अच्छी लगी कि यह किताब आपसे बहस करेगी. आप इससे बहस करेंगे मगर एकमत होने के लिए यह आसान रास्ते नहीं अपनाएगी.

हम फिर से बता दें कि जस्टिस सारंग के सामने जो सूची पेश की गई उसमें टाल्सटाय की वॉर एंड पीस नहीं है, बल्कि दूसरी किताब का ज़िक्र है. हां यह सवाल बड़ा है कि क्या किताबें अब गंभीर सबूत के तौर पर पेश की जाएंगी, वो भी जो प्रतिबंधित नहीं हैं. लेकिन इस गलती से एक महान किताब की चर्चा हो गई, यह अच्छा है. मगर दुखद है कि जस्टिस सारंग के बारे में गलत धारणा भी बन गई. जैसा कि वॉर एंड पीस का भाव है, जो शुरू में बुरा लगता है वो अंत में अच्छा लग सकता है और जो शुरू में अच्छा होता है, अंत में बुरा लग सकता है. इस किताब ने न्याय कर दिया है. इस सूची में मार्कसिस्ट आर्काइव का ज़िक्र है. दुनिया भर की यूनिवर्सिटी में और भारत में भी मार्क्सवाद पढ़ाया जाता है. एक वेबसाइट है जिसका पता है marxists.org, यहां पर सैकड़ों लेखकों के लेख और किताबें पढ़ सकते हैं. इस साइट को अमेरिका में नॉन प्रोफिट के रूप में पंजीकृत किया गया है. 1990 में एक व्यक्ति ने इसे बनाया था जिसमें अब कई देश के लोग जुड़े हैं. ब्रिटिश लाइब्रेरी ने भी इसे अपनी आर्काइव में शामिल किया है. इस साइट पर उपलब्ध हर सामग्री क्रिएटिव कामंस लाइसेंस के तहत है. यानी आप इसका इस्तेमाल किसी भी रूप में कर सकते हैं, व्यावसायिक भी. आनलाइन के अलावा यह सीडी, किताब के माध्यम से भी सामग्री देने की कोशिश करती है.

न्याय प्रक्रिया में जांच और सबूतों के साथ व्यवहार को लेकर व्यापक बहस हो सकती थी मगर जल्दबाज़ी में सब हेन-तेन हो गया. न्याय की हालत क्या है उसके बारे में भी देखिए. हम न पुलिस सिस्टम की सड़न पर ध्यान दे रहे हैं और न ही न्यायपालिका के भीतर की सड़न पर. जोगिंदर और चंदरावती इतने हताश हो चुके थे कि थाने के बाहर आग लगा ली. उनके गांव का सत्यपाल कई दिनों से मार पीट कर रहा था और पत्नी को छेड़ रहा था. एक महीने तक जोगिंदर पुलिस के पास दौड़ा लेकिन पुलिस ने कुछ नहीं किया. सोचिए सारा सिस्टम किसके लिए है फिर. कोई यूं ही आग लगाने का फैसला नहीं कर लेता है. दोनों की हालत गंभीर है और दिल्ली में इलाज चल रहा है. आम लोग इसी तरह से अपनी परेशानियों में जल रहे हैं या फिर खुद को जला रहे हैं. घटना मथुरा की है. सत्यपाल ने शराब पीकर मारा फिर भी पुलिस ने रिपोर्ट नहीं लिखी. मामले की हमेशा की तरह जांच हो रही है और फिलहाल तीन पुलिसकर्मी सस्पेंड हो गए हैं.

पूर्व गृह राज्यमंत्री चिन्मयानंद पर आरोप लगाने वाली लड़की अभी तक गायब है लेकिन पुलिस ने चिन्मयानंद के ख़िलाफ़ कोई कार्रवाई नहीं की है. लड़की के पिता का आरोप है कि तहरीर में रेप का आरोप लगाने के बावजूद पुलिस ने रेप का मुक़दमा दर्ज नहीं किया. जब यह मामला प्रकाश में आया तो कुछ वकील सुप्रीम कोर्ट के पास गए और कहा कि अदालत स्वत: संज्ञान ले. उन्नाव की तरह दूसरी घटना न हो जाए इसलिए संज्ञान लेना ज़रूरी है. पहले सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि हाई कोर्ट के पास जाएं लेकिन अब सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि इस मामले को देखेगा.

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लड़की का पता नहीं चल रहा है. रक्षाबंधन के दिन उसने अपनी मां से कहा था कि अगर मेरा फोन लंबे समय तक बंद रहे तो समझ लेना कि किसी समस्या में हूं. वह तभी बंद होता है जब हाथ में नहीं होता है. उधर इन विवादों के बीच चिन्मयानंद हरिद्वार के अपने आश्रम में हैं. मीडिया ने उनसे बात करने की कोशिश की लेकिन जवाब यही मिला कि मुझे कुछ नहीं मालूम है. चिन्मयानंद पर एक और लड़की ने दुराचार का केस लिखवाया था. सरकार ने उसे वापस लेने की कोशिश की लेकिन हो नहीं पाया. उनके प्रभाव का अंदाज़ा लगाया जा सकता है कि पुलिस से लड़की के पिता ने दुराचार की बात कही मगर मामला दर्ज नहीं हुआ. चिन्मयानंद के चार आश्रम हैं. पांच कालेज हैं. इस बीच सन्यासी भी हैं. एसएस आईएमबी कालेज, एसएस लॉ कालेज, देवी संपदा इंटर कालेज, बीटीसी बीएड कालेज. कालेज के प्रिंसिपल कहते हैं कि लड़की के गायब होने की खबर मीडिया से पता चली है. पुलिस ने अभी तक चिन्मयानंद से पूछताछ नहीं की है. चिन्मयानंद ने भी एफआईआर दर्ज कराई है कि उनसे फिरौती मांगी गई.

आजकल नौकरियां जाने के बहुत से मैसेज आते हैं. खासकर होटल इंडस्ट्री के लोग बहुत लिखते हैं. हम हनुमान जी तो हैं नहीं कि सब जगह पहुंच जाएं लेकिन पता नहीं सरकारी दावों में तो ये सब कोरी कल्पना लगती है. वहां तो सब ठीक है. फिर भी नौकरी तो नौकरी है, किसी की न जाए तो अच्छा. कर्नाटक के सूक्ष्म, लघु व मध्यम उद्योग (msme) जगत के संगठन के अध्यक्ष आर राजू ने कहा है कि मंदी डर नहीं बल्कि हकीकत है, अगर कुछ नहीं किया गया तो 30 लाख लोगों की नौकरियां जा सकती हैं. निहाल ने बताया है कि गारमेंट सेक्टर में धंधा 70 फीसदी मंदा है. सात दिन की जगह चार या पांच दिन ही काम होता है.



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