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...और इस तरह जलवायु परिवर्तन के प्रश्नों पर बनता गया मेरा ज्ञान तंत्र

आप अकेले कुछ नहीं होते हैं, आप कई स्तरों पर दूसरों के जरिए समृद्ध होते रहते हैं. ऐसा इको-सिस्टम बनाने की जिम्मेदारी आपकी है...

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...और इस तरह जलवायु परिवर्तन के प्रश्नों पर बनता गया मेरा ज्ञान तंत्र

नदियों और जल के बारे में अनुपम मिश्र से कितना कुछ जाना. उनके संपर्क के कारण इस विषय से जुड़े कई बेहतरीन लोगों से मिला. चंडी प्रसाद भट्ट जी के संपर्क में आया, उनके काम को जाना. अनुपम जी के कारण ही ऐसे कई लोगों को जाना जो इस समस्या की आहट को पहले पहचान चुके थे और बचाने की पहल कर रहे थे. 'आज भी खरे हैं तालाब' का मुक़ाबला नहीं. क्या पता आमिर ख़ान का पानी फ़ाउंडेशन इसी किताब की बुनियाद पर बना हो. इंस्टा पर देखता रहता हूं कि पानी फाउंडेशन महाराष्ट्र के गांवों में चुपचाप काम कर रहा है. पिछले साल मयंक सक्सेना के ज़रिए जाना था कि कैसे उनके दोस्तों के छोटे से समूह ने महाराष्ट्र के कुछ गांवों में पानी को लेकर प्रयास किया है, लाइब्रेरी बनाई है.

सोपान जोशी की किताब 'जल थल मल' उसी दिशा में समृद्ध करती है. सोपान ने मुझे एलिज़ाबेथ कोल्बर्ट की किताब the sixth extinct के बारे में बताया था. उस किताब से जानकारी की दुनिया और विस्तृत होती है. घर में हमसफर के कारण पर्यावरण का इतिहास काफी कुछ जाना. 'डाउन टू अर्थ' को गंभीरता से पढ़ा, उसके अंकों को सहेजकर रखता हूं. यह पत्रिका हर घर में होनी चाहिए. अब तो यह हिन्दी में भी आती है.


दफ्तर के भीतर ह्रदयेश जोशी लगातार जलवायु परिवर्तन को लेकर रिपोर्ट करते रहे. जब तक ह्रदयेश साथ रहा, उसके आते देख लगता था छत्तीसगढ़ चला आ रहा है. ह्रदयेश ने केदारनाथ त्रासदी के बाद एक किताब लिखी- 'तुम चुप क्यों रहे केदार', हिन्दी में. वैसे यह अंग्रेज़ी मे भी है. ह्रदयेश राजनीति पत्रकार हैं. जलवायु परिवर्तन का सवाल राजनीति से अलग कहां. उसकी कई रिपोर्ट आप द क्विंट, न्यूज लॉन्ड्री, फर्स्टपोस्ट पर पढ़ते ही होंगे. हर दूसरा लेख जंगलों और जलवायु के सवाल पर होता है. इसके अलावा वह लगातार इन विषयों पर दूसरों का लिखा पढ़ता है. ह्रदयेश का काम ठोस है. हम एंकरों का तो हीरो वाला है, मगर अपना हार्डी ज़िद्दी है. अपने विषय के लिए कितना कुछ छोड़ दिया.

सुशील बहुगुणा अपनी छुट्टी लेकर उन इलाकों में गए जहां पहुंचना संभव नहीं था. उन्हें वहां तक जुनून ले गया. Blue Sheep पर लंबी सी रिपोर्ट हैरान करती रही. लेकिन यह एक ऐसी रिपोर्ट है जो हिन्दी में जलवायु परिवर्तन और वन्यजीव प्राणियों के मामले में उच्च स्तरीय रिपोर्टिंग की बुनियाद डालती है. सुशील की कई रिपोर्ट हैं जो जलवायु परिवर्तन की आहट को आप तक लेकर आती हैं. आपने भले न सुना हो मगर इनका काम दर्ज है. युवा पत्रकारों को इन रिपोर्ट में संकट के अलावा रिपोर्टर का निजी जुनून देखना चाहिए. इनके पास कोई अपना शो नहीं है फिर भी अपने मुद्दे को लेकर हर शो में घुस जाते हैं.

एक और सहयोगी हैं दिनेश मानसेरा. उत्तराखंड की एक प्यारी सी नदी है गौला. दिनेश ने गौला नदी पर डॉक्यूमेंट्री बनाई है. दिनेश ने कई साल तक बाघों पर रिपोर्टिंग की है. दिल्ली से दूर रहते हुए भी वन्य जीवों पर रिपोर्टिंग का कौशल विकसित करते रहे. बाघ को कुछ भी हो जाए, दिनेश का मेल आ जाता है. इनका पदमाम बाघ संवाददाता होना चाहिए था. मैं इन लोगों को एटीएम कहता हूं. अपने सवाल का कार्ड डालिए और जवाब का नोट निकाल लीजिए!

जब गंगा मुद्दा नहीं बनी थी तब से अजय सिंह ने बनारस में मथकर इस विषय पर रिपोर्टिंग की. इस नदी का लगातार कवरेज हुआ है. अनुराग द्वारी ने हाल ही में राज्य भर से पानी के संकट पर एक लंबी रिपोर्ट की थी. गरीबी और कुपोषण पर उनकी रिपोर्ट एक दिन की बात नहीं है बल्कि लंबा सिलसिला है. महाराष्ट्र और मध्य प्रदेश से एक्सपोज़ किया कि सिस्टम कैसे गरीब को गरीब बनाए रखता है. गरीबी का एक बड़ा कारण जलवायु परिवर्तन भी है.

मुंबई ब्यूरो के हमारे सहयोगियों ने मैंग्रोव और मीठी नदी पर अनगिनत रिपोर्ट की हैं. इन सभी ने जलवायु परिवर्तन, सूखा, वन्य जीवों और नदियों के बारे में हिन्दी में श्रेष्ठ काम किया है. उम्र हो गई है इसलिए कुछ के नाम छूट गए हैं लेकिन मेरा यह लेख इन सभी के प्रति आभार पत्र समझा जाए. ये लोग आसपास न होते तो हमारे समय के सबसे ज्वलंत प्रश्न पर बकलोल बनकर घूमता रहता.

स्वाति त्यागराजन का शो बॉर्न वाइल्ड कौन भूल सकता है. स्वाति को अपने सवालों के साथ जीते देखा है. उनके जीवन में पहले से मौजूद संसाधन इस विषय की तलाश में दूर-दूर तक ले गया. या कहें कि उन्होंने अपना सब कुछ इसके लिए ही जिया.

इन्हीं लोगों के संपर्क में रहने के कारण प्रेरणा सिंह बिंद्रा की किताब The Vanishing पढ़ी और उन्हें बुलाकर बक़ायदा पूरा शो किया. सुनीता नारायण को जब फोन करो, बताने के लिए हाजिर रहती हैं, कभी मना करते नहीं देखा. उन लोगों के कारण वायु प्रदूषण के बारे में कितना जाना. दो लेखकों के संपर्क में आया. निजी तौर पर नहीं, उनकी किताब के. Paul Kalanithi की 'When breath becomes air' और सिद्धार्थ सिंह की 'the great smog of india' से काफ़ी कुछ जाना. आजकल दफ़्तर में चेतन भट्टाचार्जी को रिसर्च करते देखता हूं. ढूंढ-ढूंढ कर जलवायु परिवर्तन पर आर्टिकल पढ़ते रहते हैं, जब पूछना हो जाकर पूछ लिया. चेतन अपने ट्विटर हैंडल पर लगातार इस विषय को उठा रहे हैं.

यह सब इसलिए लिखा कि आप अकेले कुछ नहीं होते हैं. आप कई स्तरों पर दूसरों के ज़रिए समृद्ध होते रहते हैं. ऐसा इको-सिस्टम बनाने की जिम्मेदारी आपकी है. तभी आप उनकी मदद से अच्छी रिपोर्ट बना पाते हैं. ऐसे विषयों की अच्छी चीज़ों तक पहुंच पाते हैं. आप भले ही दूसरी चीजों में उलझे रहते हैं मगर ये लोग आपको समानांतर रूप से तैयार करते चलते रहते हैं.

पत्रकारिता में आने वाले छात्र एक नियम का पालन हमेशा करें. बहुत ज़्यादा पढ़ने वाले और खुद से अधिक जानने वालों से दोस्ती करें, उनका सम्मान करें. जैसे एक पत्रकार को जीने के लिए सोर्स बनाने पड़ते हैं उसी तरह अच्छी हवा में सांस के लिए उसे पढ़े लिखे और अपने से अधिक विद्वानों का नेटवर्क बनाना पड़ता है. मेरे फोन में ऐसे कई लोगों के नाम के आगे knowledge network लिखा है. आप इसे ज्ञान-तंत्र भी कह सकते हैं. हिन्दी के लोफ़र एंकरों और इडियट संपादकों के संपर्क में सिर्फ नौकरी बचाने और पाने तक ही रहें. बाकी अपनी जानकारी की यात्रा अपने स्तर पर जारी रखिए.

इसी इकोसिस्टम से मैंने जाना कि मुझे अमिताभ घोष की किताब 'the great derangement' पढ़नी चाहिए. आप अमिताभ घोष के ट्विटर हैंडल को फॉलो करें. वे अक्सर जलवायु परिवर्तन पर बेहतरीन रिसर्च और काम करने वालों को शेयर करते रहते हैं. अमिताभ घोष की किताब आपकी स्क्रिप्ट में आ चुकी कई बकवास चीजों की सफाई में मदद करेगी

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