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'कश्मीर कांड' के कारण की तलाश...

जम्मू एवं कश्मीर में ऐसा होने की भनक किसी को नहीं लगी. मीडिया को अचानक बताया गया कि BJP वहां महबूबा मुफ्ती सरकार से अलग होने जा रही है.

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'कश्मीर कांड' के कारण की तलाश...

फैसला BJP का था, सो कारण बताने की ज़िम्मेदारी उसी की थी.

जम्मू एवं कश्मीर में ऐसा होने की भनक किसी को नहीं लगी. मीडिया को अचानक बताया गया कि BJP वहां महबूबा मुफ्ती सरकार से अलग होने जा रही है, और दो घंटे के भीतर ही नाकामियों का ठीकरा महबूबा पर फोड़ते हुए BJP ने सरकार गिराने का ऐलान कर दिया. मसला एक विशेष राज्य में सरकार गिराए जाने का है. सब कुछ फटाफट हुआ, लिहाज़ा जम्मू एवं कश्मीर जैसे खास प्रदेश में इतनी बड़ी राजनीतिक घटना का विश्लेषण ढंग से नहीं हो पा रहा है. यह तक समझ में नहीं आ रहा है कि इतने बड़े फैसले का तात्कालिक कारण क्या हो सकता है...?

खुद BJP ही कोई फौरी कारण नहीं बता पाई...
फैसला BJP का था, सो, कारण बताने की ज़िम्मेदारी उसी की थी, लेकिन उसने जो कारण गिनाए, उनमें एक भी ऐसा नहीं था, जिसे तात्कालिक कारण माना जा सके. एक ही बात प्रमुखता से कही गई कि कश्मीर में आतंकवाद काबू में नहीं आ रहा था. यानी इसी नाकामी की ज़िम्मेदारी महबूबा के मत्थे मढ़कर सरकार से अलग होने का बहाना समझ में आता है. अब यह अलग सवाल है कि यह बात जनता के गले उतरेगी या नहीं. खासतौर पर इसलिए कि जम्मू एवं कश्मीर सरकार में शामिल यही BJP तीन साल से कहती आ रही थी कि वहां के हालात सुधारने में उसने कमाल कर दिया है. भले ही कश्मीर और साथ ही साथ पूरे देश की जनता का अनुभव इस दावे से उलट रहा हो, लेकिन यह तो जगज़ाहिर है कि नोटबंदी करते समय भी काले धन को आतंकवाद से जोड़ने का प्रचार हुआ था. पत्थरबाजी के खिलाफ मुहिम के तौर पर केंद्र सरकार ने उस नारे का इस्तेमाल किया था. बहुत ही मुश्किल दौर में सर्जिकल स्ट्राइक को प्रचारित करना पड़ा था. लेकिन सामान्य अनुभव यह था कि आए दिन अपने जवानों की शहादत की खबरें रुक नहीं रही थीं. इन हालात में BJP वहां अपनी छवि बचाने का कोई तरीका नहीं ढूंढती तो और क्या करती...?

हिसाब राजनीतिक नफा-नुकसान का...
वैसे तो राजनीति में सिर्फ नफा ही नफा दिखाई देता है. फौरी तौर पर किसी को नुकसान होता भी हो, तो आगे चलकर वह नफे में तब्दील हो जाता है. यहां फौरी तौर पर दोनों पार्टियां नफे में दिखती हैं. या यों कहें कि कश्मीर के हालात जितना नुकसान पैदा कर रहे थे, उसे कमतर करने का फायदा तो है ही. खासतौर पर उस वक्त, जब सन 2019 के लोकसभा चुनाव की तैयारियां ज़ोर पकड़ ही चुकी हैं. बहुत ही सरल-सा सवाल है कि क्या PDP और BJP लोकसभा चुनाव एक साथ मिलकर लड़ सकती थीं...? बिल्कुल नहीं. उन्होंने पिछला विधानसभा चुनाव जबर्दस्त प्रतिद्वंद्विता के साथ लड़ा था. दोनों का जनाधार बिल्कुल अलग-अलग है. अगला चुनाव उन्हें अलग-अलग ही लड़ना पड़ता. यानी दोनों को ही जल्दी से जल्दी अलग-अलग दिखने में ही मुनाफा था. लेकिन सनद रहे कि दोनों पार्टियां अलग होने के लिए अदावत के दृश्य नहीं बना पाईं. बहुत संभव है कि इसका ज़्यादा फायदा इस पूर्व गठबंधन के मुख्य प्रतिद्वंद्वी कांग्रेस और नेशनल कॉन्फ्रेंस को मिल जाए. वैसे भी पिछले तीन साल में कश्मीर को लेकर जो हताशा और निराशा का माहौल बनता चला आया, उसका फायदा कांग्रेस और नेशनल कॉन्फ्रेंस को खुद-ब-खुद मिल ही रहा था. यही कारण है कि सरकार गिराने के ऐलान के लिए BJP की प्रेस कॉन्फ्रेंस के फौरन बाद ही कांग्रेस की तरफ से गुलाम नबी आज़ाद  और नेशनल कॉन्फ्रेंस की ओर से उमर अब्दुल्ला सबसे पहले मीडिया के सामने आए. यहां तक कि महबूबा मुफ्ती ने इन दोनों नेताओं के दो घंटे बाद मीडिया से बात की.

महबूबा मुफ्ती के संयत रहने के मायने...
महबूबा मुफ्ती की प्रेस कॉन्फ्रेंस की एक बात बहुत ही गौरतलब थी. वह यह कि उन्होंने BJP से नाराज़गी बिल्कुल भी नहीं दिखाई. वह अपनी पार्टी (और गठबंधन) की सरकार के तीन साल के कामकाज का ब्योरा ही देती रहीं. वह बताती रहीं कि जम्मू एवं कश्मीर के लोगों के हित में उन्होंने क्या किया. BJP की तरफ से अदावत, विरोध या संघर्ष के इस मौके पर सभी को लग रहा था कि महबूबा भी BJP जैसे तेवरों में ही BJP के खिलाफ बोलेंगी, लेकिन उन्होंने ऐसा एक भी शब्द न बोलकर मीडिया को चक्कर में डाल दिया. उनके इस अंदाज़ का विश्लेषण अभी हो नहीं पाया है, लेकिन एक अटकल लगाई जा सकती है कि शायद वह अब घाटी की बजाय जम्मू और लद्दाख में जनाधार बढ़ाने की बात सोच रही हों. उनका संयत रहना इस मकसद को हासिल करने में कुछ काम का हो सकता है. आखिरकार वह लम्बे अरसे तक जम्मू एवं कश्मीर की मुख्यमंत्री रही हैं.

BJP के लिए कश्मीर सिर्फ कश्मीर तक सीमित नहीं...
केंद्र सरकार पर काबिज़ BJP के लिए कश्मीर सबसे ज़्यादा दुखती रग बन चला था. BJP की अगुवाई वाली केंद्र सरकार को पिछले चार साल में आर्थिक और सामाजिक मोर्चे पर जिस कदर जूझना पड़ा है, उससे कहीं ज़्यादा सीमा और भीतरी सुरक्षा के मोर्चे पर भी जूझना पड़ा. सुरक्षा के इसी मुद्दे को लेकर BJP ने पिछले चुनाव में वायदों के ज़रिये माहौल बनाया था. इसीलिए पिछले चार से देश में सेना और सुरक्षाबलों के जवानों की शहादत की हर ख़बर सरकार के कामकाज के लिहाज़ से ही सुर्खियों में बनी रही. यानी BJP के लिए कश्मीर वहीं तक सीमित नहीं है, बल्कि अगले लोकसभा चुनाव के लिए भी खासी परेशानी का सबब बन चुका है.

सरकार गिराने का यह वक्त...
BJP-PDP की गठबंधन सरकार तीन साल से ऊपर चल चुकी थी. राजनीतिक विचारधारा में भारी भेद के बावजूद इतने समय तक ऐसी सरकार का चलना आश्चर्य ही माना जाना चाहिए. और फिर अगले साल लोकसभा चुनाव में गठबंधन को भारी दिक्कत आना तय था. सो, आम चुनाव से 10 महीने पहले के वक्त से ज़्यादा माकूल मौका और कौन सा होता. BJP और PDP दोनों के लिए अपने-अपने जनाधारों के पास लौटने के लिए कम से कम इतना वक्त तो चाहिए ही. किसी बात को भुलाने के लिए इतना समय तो लगता ही है.

केंद्र सरकार के लिए सबसे बड़ी चुनौती...
वैसे तो BJP के बड़े नेताओं ने अच्छी तरह सोच लिया होगा कि सरकार गिराकर वहां राष्ट्रपति शासन लगने से उसका झंझट कम नहीं हो जाएगा. राज्यपाल का शासन केंद्र सरकार के शासन जैसा ही माना जाता है, और फिर जम्मू-कश्मीर के मामले में राज्यपाल के सामने हर दिन ही एक चुनौती बनकर खड़ा होगा. ऊपर से राज्यपाल शासन हटाकर जल्दी चुनाव कराने का दबाव भी बना रहेगा. अगर बीच में कोई नया समीकरण नहीं बना, तो ज़्यादा आसार यही हैं कि जम्मू-कश्मीर विधानसभा चुनाव अब लोकसभा चुनाव के साथ ही करवाने पड़ेंगे, और अगर ऐसा हुआ, तो BJP के लिए यह बहुत बड़ी चुनौती साबित होगी.

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सुधीर जैन वरिष्ठ पत्रकार और अपराधशास्‍त्री हैं...

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण) : इस आलेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी विचार हैं. इस आलेख में दी गई किसी भी सूचना की सटीकता, संपूर्णता, व्यावहारिकता अथवा सच्चाई के प्रति NDTV उत्तरदायी नहीं है. इस आलेख में सभी सूचनाएं ज्यों की त्यों प्रस्तुत की गई हैं. इस आलेख में दी गई कोई भी सूचना अथवा तथ्य अथवा व्यक्त किए गए विचार NDTV के नहीं हैं, तथा NDTV उनके लिए किसी भी प्रकार से उत्तरदायी नहीं है.


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