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स्मृति शेष : हिंदुस्तानी संगीत के आकाश पर दमकते रहेंगे गिरिजा देवी के सुर

बनारस घराने की प्रख्यात गायिका गिरिजा देवी ने सिर्फ संगीत की साधना ही नहीं की गायकों की कई पीढ़ियों का निर्माण भी किया

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स्मृति शेष : हिंदुस्तानी संगीत के आकाश पर दमकते रहेंगे गिरिजा देवी के सुर

आम तौर पर गायक एक क्षेत्र विशेष चुनता है जैसे शास्त्रीय, सुगम संगीत या लोक संगीत और उसमें भी ध्रुपद, खयाल, ठुमरी, गजल, भजन वगैरह या फिर कोई खास लोक गायन शैली...लेकिन गिरिजा देवी की गायकी इन सीमाओं में कभी नहीं बंधी. वे शुद्ध शास्त्रीय संगीत में निष्णात थीं तो सुगम संगीत में भी उन्हें महारत था. इतना ही नहीं, वे लोक संगीत को तो खास पहचान देने वाली गायिका थीं. हिंदुस्तानी संगीत के विशाल आकाश पर उनके स्वर हर जगह दमकते रहे. यही कारण है कि वे आम कलाकारों से कहीं ऊपर प्रतिष्ठित थीं. उनके शिष्य भी गायकी की सभी विधाओं में हैं.

गिरिजा देवी का मंगलवार को रात में करीब पौने नौ बजे कोलकाता में निधन हो गया और इसके साथ कलाकारों के शहर बनारस का एक सितारा टूट गया. ध्रुपद, खयाल, टप्पा, तराना, सदरा और लोक संगीत में होरी, चैती, कजरी, झूला, दादरा और भजन गायकी से संगीत रसिकों के दिलों पर राज करने वालीं गिरिजा देवी ने भारतीय संगीत जगत को अपना पूरा जीवन समर्पित किया. जब वे कजरी और झूला गाती थीं तो सुरों का सावन यूं बरसता था कि रसिक श्रोता उसमें भीगे बिना नहीं रह सकते थे. चाहे होरी हो या चैती या फिर दादरा, उनकी गायकी हमेशा लोक संगीत की पारंपरिक मिठास को पुनर्परिभाषित करती रही. लोक संगीत की इन शैलियों से आम श्रोताओं को परिचित कराने इन्हें लोकप्रिय बनाने में गिरिजा देवी का योगदान कभी भुलाया नहीं जा सकेगा.

एक तरफ जहां जन-जन में गाया और सुना जाने वाला लोक संगीत है तो दूसरी तरफ शास्त्रीय संगीत, गिरिजा देवी संगीत के हर फन में माहिर थीं. आदि संगीत ध्रुपद से वे नाद ब्रम्ह की आराधना करते हुए सुरों के समंदर में डूबी होती थीं तो खयाल गायकी में उम्दा लयकारी से सुनने वालों को झूमने पर मजबूर कर देती थीं.  


गिरिजा देवी को 'ठुमरी क्वीन' कहा जाता था. बनारस में 8 मई 1929 को जन्मीं गिरिजा देवी के पिता रामदेव राय जमींदार थे. वे हारमोनियम बजाते थे. गिरिजा देवी को वास्तव में पिता से ही संगीत की विरासत मिली. आजादी के पहले के जमाने में एक जमींदार की बेटी का गायन सीखना इतना आसान नहीं था. लेकिन पिता के संरक्षण के कारण ही वे संगीत सीख पाईं और आगे बढ़ने की हिम्मत जुटा पाईं. गायक और सारंगी वादक सरजू प्रसाद मिश्रा से पांच साल की उम्र में उन्होंने खयाल और टप्पा गायन सीखना शुरू कर दिया था. उन्होंने आगे जाकर गुरु श्रीचंद मिश्रा से संगीत की विभिन्न शैलियां सीखीं. शास्त्रीय संगीत के सेनिया और बनारस घराने की खास गायकी उनकी पहचान थी. संगीत जगत में योगदान के लिए उनको सन 1972 में पद्मश्री, 1989 में पद्मभूषण और वर्ष 2016 में पद्म विभूषण से सम्मानित किया गया.

गिरिजा देवी ने सिर्फ संगीत की साधना ही नहीं की गायकों की कई पीढ़ियों का निर्माण भी किया. राजन मिश्र, साजन मिश्र, मालिनी अवस्थी, शुभा मुद्गल, सुनंदा शर्मा जैसे न जाने कितने शिष्य-शिष्याएं हैं जो गिरिजा देवी और बनारस घराने की गायकी की परंपरा को विस्तार दे रहे हैं. इस संगीत साधिका के सुर कभी अपना ओज नहीं खोएंगे..उनके शिष्यों के जरिए परंपरा का आरोह-अवरोह अगली पीढ़ियों तक जाएगा. महान गायिका गिरिजा देवी की स्मृति को श्रद्धांजलि..

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सूर्यकांत पाठक Khabar.ndtv.com के डिप्टी एडिटर हैं.

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