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आखिर किसकी रक्षा करती हैं हमारी अदालतें...?

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आखिर किसकी रक्षा करती हैं हमारी अदालतें...?

नरोदा पाटिया नरसंहार का दोषी सुरेश रिचर्ड...

यदि मैं आपसे कहूं कि जनता और एक दोषी करार दिए जा चुके बलात्कारी में से चुनाव करने के लिए कहे जाने पर अदालतों ने बलात्कारी का बचाव करने को तरजीह दी, तो आप कहेंगे कि यह मेरी कपोलकल्पना है... लेकिन काश, इस बार सच इतना अजीब न होता... अजीब इसलिए, क्योंकि यह मेरी व्यक्तिगत सुरक्षा पर भी सीधे-सीधे असर डालता है... खैर, मैं सीधे मुद्दे की बात पर आती हूं...

28 फरवरी, 2002 को सुरेश रिचर्ड नामक एक शख्स खून की प्यासी हो उठी उस भीड़ का हिस्सा था, जो अहमदाबाद के नरोदा पाटिया इलाके में हमलावर हुई घूम रही थी... उस दिन उसने भी कुछ लोगों को जान से मारा, महिलाओं के साथ बलात्कार किया, और एक गर्भवती महिला के भीतर से उसके भ्रूण को खींचकर बाहर निकालने में मदद करने के बाद उस अजन्मे बच्चे की मां के साथ बलात्कार कर उसकी हत्या कर दी... बाद में वर्ष 2012 में उसे इन सभी अपराधों के लिए दोषी करार दिया गया, और जेल में डाल दिया गया, जहां वह 31 साल कैद की सज़ा काट रहा है... लेकिन हमारे मुल्क में कैदियों को साल में एक बार जेल से बाहर आने के लिए दो हफ्ते या कहीं-कहीं एक महीने की छुट्टी भी मंज़ूर की जाती है, ताकि वह परिवार के साथ वक्त बिता सके, और न टाले जा सकने वाले ज़रूरी काम निपटा सके... इस पैरोल पर सभी अन्य कैदियों की तरह सुरेश जैसे अपराधियों का भी अख्तियार होता है... बिल्कुल उसी तरह, जैसे स्कूल में पढ़ने वाले बच्चों को गर्मियों में छुट्टी दी जाती है... लेकिन सुरेश के मामले में उसे पैरोल के लिए अर्ज़ी देनी होती है, और फिर गुजरात हाईकोर्ट मामले की समीक्षा कर तय करती है कि उसे बाहर आने देना सुरक्षित होगा या नहीं... अगर कोर्ट यह निर्णय करती है कि उसे बाहर आने देना सुरक्षित है, वह इलाके के पुलिस थाने को एक कोर्ट ऑर्डर भेजती है, ताकि 'ज़रूरत पड़ने पर' पुलिस अतिरिक्त निगरानी रख सके...

यह 'ज़रूरत पड़ने पर' वाली बात यहां काफी अहम है, क्योंकि सुरेश ऐसा शख्स है, जो अपने भीतर मौजूद हिंसा पर फख्र महसूस करता है, और उसके बारे में बात करते हुए सिर ऊंचा रखता है... उसने वर्ष 2002 में किए अपने अपराधों के बारे में एक पत्रकार (जिसके बारे में उसे लगथा था कि वह भी उसी भीड़ का हिस्सा था) के सामने डींगें हांकीं... सुरेश को पता नहीं था कि उसकी बातें रिकॉर्ड की जा रही हैं, सो, उसने पत्रकार से कहा, "मैंने 2002 में मुस्लिम औरतों के साथ तब तक बलात्कार किया, जब तक उनका कीमा न बन गया..."


खैर, कोर्ट को अधिकार है कि वह तय कर सके कि ऐसे शख्स को कभी-कभार अपने परिवार से मिलने और ज़रूरी काम निपटाने का हक है... सो, जुलाई, 2015 में कोर्ट से उसे पैरोल दे दिया गया... सुरेश ने उस वक्त का इस्तेमाल अपनी पत्नी के साथ बलात्कार करने में बिताया... कम से कम उसकी पत्नी ने तो कोर्ट को यही बताया है... सुरेश ने उसके हाथों को उसकी पीठ के पीछे बांध दिया, ज़बरदस्ती की, और उसके हाथों को सिगरेट से दागा... उसने यौन उत्पीड़न, हिंसा का मामला दर्ज करवाया है, और तलाक की अर्ज़ी भी दी है... पैरोल अवधि के दौरान सुरेश के व्यवहार की रोशनी में मामले को गंभीरता से लेते हुए कोर्ट ने अगली बार आवेदन करने पर उसकी मांग को खारिज कर दिया... यह अक्टूबर, 2015 में हुआ... लेकिन जनवरी, 2016 में सुरेश ने फिर पैरोल के लिए अर्ज़ी दी... इस बार उसने कोर्ट से कहा, उसकी बेटी लापता हो गई है, और उसे तलाश करने के लिए उसे दो हफ्ते का वक्त चाहिए... मंज़ूरी मिल गई... उस दौरान सुरेश और उस जैसे अन्य लोगों के बारे में लिख रही एक पत्रकार के तौर पर मैंने तय किया कि उससे मुलाकात की कोशिश करूं, और देखूं कि वह मुझसे बात करने के लिए तैयार होता है या नहीं... वह आगे को झपटा, मेरे चेहरे पर मारना शुरू कर दिया, और मारता रहा, जब तक मेरी आंख से खून न बहने लगा... उसके बाद उसने मुझे खींचा और घसीटते हुए नज़दीक की एक दीवार पर दे मारा, और मेरे सिर से बालों का एक गुच्छा जड़ से उखाड़ लेने के बाद दबोचकर लातों से मारता गया, मारता गया... मुझे कतई उम्मीद नहीं रही थी कि मैं वहां से ज़िन्दा निकल पाऊंगी, लेकिन फिर सौभाग्य से सुरेश के बेटे को मुझ पर तरस आ गया, और वहां खड़े लगभग 100 तमाशबीनों में से दो-तीन की मदद से उसने सुरेश को खींचकर मुझसे दूर किया... मैं भाग निकली... और मैंने खुद भी कोर्ट में केस दर्ज करवा दिया... सुरेश का पैरोल रद्द कर दिया गया, और उसे वापस जेल जाना पड़ा... पुलिस में स्पेशल ऑपरेशन्स ग्रुप के प्रमुख पीसी सोलंकी ने प्रेस कॉन्फ्रेंस बुलाई और कहा कि अहमदाबाद और गुजरात के लोगों को असुरक्षित महसूस नहीं करना चाहिए... सुरेश का पैरोल रद्द कर दिया गया है, और उसे आइंदा भी पैरोल नहीं दिया जाएगा... सिस्टम काम करता है, और यह मामूली गड़बड़ी थी...

उसके बाद से सुरेश की पैरोल के लिए दी गई अर्ज़ियां खारिज होती रहीं... 29 नवंबर तक... कल रात... मैं खाना खाने बाहर आई हुई थी, जब सुरेश की पूर्व पत्नी ने मुझे बताया कि वह फिर पैरोल पर बाहर आ गया है... सुरेश ने पूर्व पत्नी के भाई को फोन किया था और मिलने के लिए कहा था... बहुत अच्छे... एक शख्स, जो अपनी ही पत्नी से बलात्कार करता है, पैरोल पर आज़ाद हो जाता है, और उसे डराकर रख देता है... सिर्फ इसलिए, क्योंकि वह ऐसा कर सकता है... कोर्ट ने उसकी पैरोल मंज़ूर कैसे कर ली...? मुझे भी जानना था, लेकिन कोर्ट की ख़बरें कवर करने वाला हर वह रिपोर्टर या हर वह पुलिस अधिकारी, जिससे मैंने संपर्क किया, इस बारे में कुछ नहीं जानता था... वह एडिशनल कमिश्नर भी कुछ नहीं जानते थे, जो मुझे पर हुए हमले के केस के इंचार्ज रह चुके थे... कमिश्नर भी कुछ नहीं जानते थे, जो कभी उस इलाके के प्रभारी रह चुके थे... मुझे बताया गया, "जहां सुरेश रहता है, वहां के पुलिस स्टेशन को कोई कोर्ट ऑर्डर नहीं भेजा गया है, सो, हम नहीं जानते कि वह पैरोल पर बाहर आ गया है या नहीं..."

आखिरकार, जिस सरदारनगर इलाके में सुरेश रहता है, वहां के पुलिस स्टेशन प्रभारी से मेरा संपर्क हो गया, और मैंने गुहार की, "क्या आप किसी कॉन्स्टेबल को सुरेश के घर भेज सकते हैं, और बता सकते हैं कि क्या वह सचमुच पैरोल पर बाहर आ गया है...?" मुझे अपने लिए भी सुरक्षा के इंतज़ाम करने थे, और उसकी पूर्व पत्नी को भी सूचना देनी थी... पिछली बार जब वह पैरोल पर बाहर आया था, वही दिन, जब मुझ पर हमला किया गया था, मुझे किसी भगोड़े की तरह छिपकर रहना पड़ा था... अनजानी जगह पर, जब तक पुलिस ने मुझे पक्की जानकारी नहीं दे दी थी कि उसका पैरोल रद्द कर दिया गया है... कम से कम मेरे पास किसी भी वक्त अहमदाबाद छोड़कर चले जाने का विकल्प तो मौजूद था, लेकिन उसकी पूर्व पत्नी क्या करे...? अगली बार जब सुरेश जेल से बाहर आएगा, उसे कौन बचाएगा...?

मैंने पुलिस अधिकारी से कहा, "देखिए, मुझे अपना सामान बांधकर भाग जाना होगा, तो मुझे पता होना चाहिए... सो, क्या आप किसी को उसके घर की तरफ भेजेंगे...?"

पुलिस वाला भला था... उसने किसी को भेजा, और कुछ ही मिनट बाद मुझे फोन किया, "जी हां, मैडम... वह पैरोल पर बाहर आ चुका है... मेरा कॉन्स्टेबल इस वक्त उसके साथ ही है... वह अपने घर में है, और 14 दिन के लिए बाहर आया है..."

अब इस कहानी का बेहद 'दिलचस्प' पहलू पढ़िए... मैंने पूछा, "वह कब बाहर आया, 14 दिन में से कितने दिन बीत चुके हैं, औऱ कितने बाकी हैं...?"

जवाब मिला, "वह मुझे नहीं मालूम, मैडम, क्योंकि कोई काग़ज़ी कार्यवाही नहीं हुई है... हाईकोर्ट ने हमें उसका पैरोल ऑर्डर नहीं भेजा है... सो, हमें पता ही नहीं था कि वह बाहर आ चुका है, या किसने और कब उसका पैरोल मंज़ूर किया..."

सो, 2002 में महिलाओं से बलात्कार करने और उन्हें मार डालने की डींगें हांकने वाला शख्स पैरोल पर बाहर आता है, और उसका इस्तेमाल अपनी पत्नी के साथ बलात्कार करने में करता है... अगली बार फिर उसे पैरोल मिल जाता है, और इस बार वह एक पत्रकार पर हमला करता है... अब वह फिर जेल से बाहर है, और पुलिस के मुताबिक, इस बार कोर्ट ने ख़बर तक नहीं दी... पुलिस को भी सुरेश की 'छमाही छुट्टियों' के बारे में तभी पता चला, जब उसकी पिछली दोनों 'छुट्टियों' के दौरान 'शिकार' बनी दो महिलाओं ने उन्हें बताया...

...और इसी के साथ मैं वहीं पहुंच गई हूं, जहां से मैंने यह आलेख लिखना शुरू किया था... सवाल यह है कि हमारी अदालतें किसकी रक्षा करती हैं...? जनता की, या दोषी करार दिए जा चुके अपराधियों की...? आपको इनके जवाब चाहिए...? जजों से जाकर सवाल कीजिए... लेकिन पहले, यह पता करना होगा कि जज था कौन, क्योंकि इस बार अभी तक काग़ज़ी कार्यवाही हुई ही नहीं है... आप सभी को शुभकामनाएं... मैं तो अपना सामान बांध रही हूं, और सुरेश की पूर्व पत्नी भी... और हां, कहने की ज़रूरत नहीं है कि हमारा कोई फॉरवर्डिंग एड्रेस भी नहीं है...

रेवती लाल स्वतंत्र पत्रकार और फिल्मकार हैं... वर्तमान में वह गुजरात में रहती है, जहां वह वर्ष 2002 के दंगों के गुनाहगारों पर किताब लिख रही हैं...

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