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कौन है किसानों की लगातार खुदकुशी का ज़िम्मेदार...?

अगर सरकार अब भी नहीं जागी, तो किसानी छोड़ने वालों की कतार बढ़ती जाएगी... देश के लिए अनाज पैदा करने वाले किसान का अपना कटोरा खाली हो, तो देश का पेट बहुत दिन तक नहीं भरा रह सकता...

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कौन है किसानों की लगातार खुदकुशी का ज़िम्मेदार...?
हाल के दिनों में ख़बरों में किसानों के कर्ज़ माफी की ख़बरें हावी रहीं... महाराष्ट्र से लेकर मध्य प्रदेश और पंजाब में किसानों के आंदोलनों ने सरकारों को झुकाया, लेकिन अगर कर्ज़ माफी समस्या का हल होता, तो आएदिन किसानों की खुदकुशी की ख़बरें सुर्खियां नहीं बनतीं... देश के लिए अनाज, फल, सब्ज़ी उगाने वाले किसान अगर खून के आंसू रो रहे हैं, मौत को गले लगा रहे हैं, तो ज़िम्मेदार सरकार ही नहीं, वह तंत्र भी है, जिसने फसलों के दाम से लेकर सप्लाई तक पर शिकंजा कस रखा है...

मौत को गले लगाने वाला किसान सिर्फ कर्ज़ से नहीं मरता, उसे मारने वाला वह सिस्टम है, जो फसल खराब होने पर उसे निचोड़ लेता है और बंपर फसल होने पर लागत तक नसीब नहीं होने देता... यानी, दोनों तरफ से मार किसान पर ही पड़ती है... बंपर फसल के चलते पंजाब में आलू खेतों में पड़ा-पड़ा सड़ रहा है... इसे मंडियों या कोल्ड स्टोरेज तक पहुंचाने की लागत जोड़ दें, तो लागत निकलनी तो दूर, घाटा अलग से किसानों की पेशानी पर बल पैदा कर देता है... किसान की लागत पांच रुपये प्रति किलो से कम नहीं है और बाज़ार में बैठे आढ़ती और बिचौलिये दो रुपये किलो से ज़्यादा देने को तैयार नहीं... विडम्बना देखिए कि यही आलू दिल्ली, मुंबई और अन्य शहरों के बाज़ार में 15 से 20 रुपये किलो की दर से बिक रहा है... यानी, किसानों के हाथ खाली और उपभोक्ता की जेब पर डाका... किसान से उपभोक्ता तक पहुंचते-पहुंचते छह से सात तरह के बिचौलियों से गुज़रने वाली फसल का दाम 900 गुना तक बढ़ गया... किसान लाखों के कर्ज़ के चलते जान ले रहे हैं, लेकिन बिचौलिये चांदी काट रहे हैं... यह हाल देश में समृद्ध खेती के लिए मशहूर रहे पंजाब का है और यह किसानों की समस्या का सिर्फ एक पहलू है...

ऐसा नहीं है कि सरकार अनजान है... सरकार ने कोल्ड स्टोरेज और भंडारण के ज़रूरी इंतज़ाम किए होते तो हज़ारों टन प्याज़ मध्य प्रदेश में पानी में पड़े-पड़े खराब नहीं होता... किसानों से आठ रुपये किलो की दर से खरीदे प्याज़ को सरकार दो से तीन रुपये किलो की दर से नीलाम कर रही है कारोबारियों को...

ऐसा इसलिए कि प्याज़ की बंपर फसल को रखने के लिए ज़रूरी गोदाम नहीं हैं... इससे सरकारी खज़ाने को 500 करोड़ से ज्यादा की चपत लगने की आशंका है... इसके सीधे मायने हैं जनता के टैक्स के पैसे की बर्बादी... बदइंतज़ामी और हालात बदलने की इच्छाशक्ति का नमूना हैं ये हालात... हाल में किसान आंदोलन की आंच में जले मध्य प्रदेश में वादों को झड़ी लगा दी, लेकिन किसानों की आत्महत्याएं थम नहीं रहीं... बीते 24 दिन में 46 से ज्यादा किसान आत्महत्या कर चुके हैं... इनमें से 10 तो मुख्यमंत्री के गृह जिले सीहोर से हैं... एक अनुमान के मुताबिक बीते 16 साल में मध्य प्रदेश में 21,000 किसान जान दे चुके हैं... नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो के आंकड़े बताते हैं कि इनमें कर्ज़ के बोझ के साथ-साथ फसल का सही कीमत पर न बिक पाना, फसल बर्बाद होने से लेकर गरीबी और ज़मीनी विवाद जैसे कई कारण हैं... पिछले साल भी प्याज़ से बर्बाद हुए किसानों ने मालवा के इलाके में सड़कों पर प्याज़ फेंक दिया था... प्याज़ के आंसू क्या होते हैं, यह कोई इन किसानों से पूछे...

प्याज़ के आंसू अगर किसानों को रुला रहे हैं, तो दूसरी तरफ खरीदार भी इस बंपर फसल का कोई फायदा नहीं ले पा रहे... दिल्ली समेत कई बड़े शहरों में रिटेल में प्याज़ 15 से 20 रुपये किलो की दर से बिक रहा है... यानी, बिचौलियों का तंत्र अपनी जेबें भर रहा है... यह स्थिति भी नई नहीं है... हर बार बंपर फसल में किसानों को ऐसी मार से दो-चार होना पड़ता है... मध्य प्रदेश प्याज़ का दूसरा सबसे बड़ा उत्पादक राज्य है, और पहले नंबर पर महाराष्ट्र है... पिछले साल सितंबर में 8,000 टन प्याज़ बर्बाद हो गया... यह सरकारी नीतियों की नाकामी नहीं, तो और क्या है कि साल दर साल कभी गेहूं, कभी दलहन, कभी प्याज़ या आलू - बंपर फसल होने पर बदइंतज़ामी के चलते एक बड़ी खेप बर्बाद हो जाती है... दूसरी तरफ सस्ता इम्पोर्ट और इम्पोर्ट ड्यूटी अलग किसानों की कमर तोड़ रहे हैं... सरकार ने दालों के दाम चढ़ने पर दालों का जमकर आयात किया... अरहर को ही लें, तो घरेलू बाज़ार में पिछले वित्त वर्ष में उत्पादन 80 फीसदी तक बढ़ा, लेकिन बाहर के देशों से दालों का आयात नहीं रोका गया... नतीजा - कई जगह किसानों को अपनी उपज न्यूनतम समर्थन मूल्य से भी कम कीमत पर बेचनी पड़ी...

अगर सरकार अब भी नहीं जागी, तो किसानी छोड़ने वालों की कतार बढ़ती जाएगी... देश के लिए अनाज पैदा करने वाले किसान का अपना कटोरा खाली हो, तो देश का पेट बहुत दिन तक नहीं भरा रह सकता... बाहर से मंगाकर हम भले ही थाली भर लें, लेकिन इससे हम अपनी खाद्य ज़रूरतों के लिए दूसरों पर निर्भरता बढ़ा नहीं रहे...? नोटबंदी, जीएसटी समेत कई बड़े और कड़े फैसले करने वाली इस सरकार के पास क्या खेती की तस्वीर संवारने के लिए कोई खाका है या किसान अब भी कर्ज़, बिचौलिया तंत्र और उदासीन सरकारी नीतियों की चक्की में पिसने के लिए मजबूर रहेगा...

ऋचा जैन कालरा NDTV इंडिया में प्रिंसिपल एंकर तथा एसोसिएट एडिटर हैं...

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण) : इस आलेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी विचार हैं. इस आलेख में दी गई किसी भी सूचना की सटीकता, संपूर्णता, व्यावहारिकता अथवा सच्चाई के प्रति NDTV उत्तरदायी नहीं है. इस आलेख में सभी सूचनाएं ज्यों की त्यों प्रस्तुत की गई हैं. इस आलेख में दी गई कोई भी सूचना अथवा तथ्य अथवा व्यक्त किए गए विचार NDTV के नहीं हैं, तथा NDTV उनके लिए किसी भी प्रकार से उत्तरदायी नहीं है.



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