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दार्जीलिंग में क्यों तेज़ हुई अलग राज्य की गूंज

गोरखाओं की अलग राज्य की मांग आज़ादी से भी ज़्यादा पुरानी है. ममता बनर्जी ने सत्ता में आने के बाद स्वायत्त काउंसिल के ज़रिए गोरखा आंदोलन को शांत करने की कोशिश की लेकिन अब ये मांग फिर से सिर उठा रही है.

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दार्जीलिंग में क्यों तेज़ हुई अलग राज्य की गूंज

दार्जिलिंग में तैनात सेना के जवान.

दार्जीलिंग की वादियां आजकल हिंसा विरोध प्रदर्शन और अशांति से गूंज रही है. बंगाली भाषा को अनिवार्य किए जाने के नाम पर गोरखा जनमुक्ति मोर्चा ने अलग गोरखालैंड राज्य की मांग को हवा दी है. गोरखाओं की अलग राज्य की मांग आज़ादी से भी ज़्यादा पुरानी है. ममता बनर्जी ने सत्ता में आने के बाद स्वायत्त काउंसिल के ज़रिए गोरखा आंदोलन को शांत करने की कोशिश की लेकिन अब ये मांग फिर से सिर उठा रही है. इस आग को चिंगारी मिली है ममता सरकार के उस फैसले से जहां पहली से दसवीं क्लास तक सभी स्कूलों में बंगाली भाषा को अनिवार्य कर दिया गया है. गोरखा जनमुक्ति मोर्चा बंगाली भाषा के विरोध के ज़रिए अलग राज्य की मांग के लिए आंदोलन तेज़ करना चाहता है.

दार्जीलिंग में सत्ता में भागीदार बनाए गए गोरखा जनमुक्ति मोर्चा ने फिर से आंदोलन की राह पकड़ ली है. इसके पीछे अलग राज्य की ललक तो है ही लेकिन इसे राज्य में सत्ता और राजनीति के समीकरण के ज़रिए से भी समझने की ज़रूरत है. बीजेपी का साथी जनमुक्ति मोर्चा तृणमूल की सत्ता वाली सरकार के साथ कैसे हो सकता है. आज बंगाल में वर्चस्व की लड़ाई में आमने सामने हैं बीजेपी और तृणमूल कांग्रेस. सत्ता की जंग में बीजेपी ने विपक्ष की जगह सीपीएम से छीन ली है. बीजेपी का साथ देने वाले बिमल गुरूंग के इस मोर्चे ने गोरखालैंड टेरीटोरियल एडमिनिस्ट्रेशन छोड़ने का इशारा किया है. ज़ाहिर है बीजेपी इस आंदोलन को फिर से हवा दे रही है लेकिन अलग गोरखालैंड राज्य बनाने पर किसी सरकार ने हिम्मत नहीं दिखाई. बीजेपी के लिए ये ममता को चुनौती हो सकती है लेकिन ममता बैनर्जी इसे खूब समझती है और राजनीति के किसी मंझे हुए खिलाड़ी की तरह वो इससे साम दाम दंडभेद के ज़रिए निपटेगीं. वो खुद दार्जीलिंग पहुंची और गोरखा जनमुक्ति मोर्चे के आंदोलन के चलते हुए हिंसक प्रदर्शन से मुकाबले के लिए सेना बुला ली. सेना ने फ्लैगमार्च किया है. बिमल गुरूंग की अगुवाई वाले इस आंदोलन को दबाने के लिए ममता ने शुक्रवार को बुलाए बंद को गैरकानूनी बताते हुए सभी सरकारी कर्मचारियों को आज दार्जीलिंग के दफ्तरों में रिपोर्ट करने को कहा.

ममता ने दार्जीलिंग को चलाने वाले गोरखालैंड टेरीटोरियल एडमिनिस्ट्रेशन के खर्चे का ऑडिट करने का एलान किया है जिससे मोर्चे की त्यौरियां चढ़ी हुई हैं. ममता की ही अगुवाई में साल 2011 में बिमल गुरूंग की अगुवाई वाले मोर्चे के साथ एक बड़ा समझौता हुआ जिसके बाद यहां के मामले में मोर्चे को गोरखालैंड टेरीटोरियल एडमिनिस्ट्रेशन के तहत कई अधिकार मिले. लेकिन तब से लेकर अब तक गंगा में बहुत पानी बह चुका है और गुरूंग और ममता का राजनीतिक मोहभंग हो चुका है. 2014 में गोरखा जनमुक्ति मोर्चा ने बीजेपी का साथ दिया. तब से लेकर अब तक बीजेपी ने मुख्य विपक्ष की जगह सीपीएम से छीनने और तृणमूल को चुनौती देने के चलते अगले चुनाव में सत्ता में दावेदारी का दावा ठोका है. 

इस रस्साकसी में पिसता हैं आम गोरखा जिसके लिए अलग राज्य की मांग के अरमान को अभी तक राजनीतिक तौर पर जमकर भुनाया गया है. गोरखाओं की अलग राज्य की मांग आज़ादी से भी पुरानी है. अंग्रेज़ों ने दार्जीलिंग को सिक्किम से छीना, कब्ज़ा जमाया और आज़ादी के बाद इसका बंगाल राज्य में विलय किया गया, लेकिन सांस्कृतिक, भाषाई और यहां तक की राजनीतिक तौर पर बंगाल और दार्जीलिंग में समानता, कहीं नहीं है. गोरखा अपनी देसी पहचान, खान पान, पहनावे से लेकर संस्कृति हर चीज़ में खुद को बंगाल से अलग मानते हैं. इसी लिए बंगाली भाषा को स्कूलों में अनिवार्य करने को लेकर गोरखाओं की भावनाएं भड़की हुई हैं. 

दार्जीलिंग की वादियों से हर साल होने वाले हज़ारों करोड़ के चाय के कारोबार और पर्यटन से होने वाली मोटी आय कोलकाता को दार्जीलिंग का मोह छोड़ने नहीं देती. बंगाल की राजीनति के 2 परस्पर विरोधी धुर, ममता और लेफ्ट दोनों ही अलग गोरखा राज्य की मांग के खिलाफ रहे हैं. भले ही राज्य सरकार की भूमिका अलग राज्य के गठन में सीमित हो मामला केंद्र से जुड़ा है लेकिन बंगाल को नाराज़ कर कोई भी केंद्र सरकार इतना बड़ा जोखिम नहीं लेना चाहेगी. बांग्लादेश के साथ रिश्तों में कोलकाता की अहमियत को देखते हुए बंगाल के मत को नज़रअंदाज करना राजनीतिक तौर पर मुफीद नहीं है. तीस्ता जल बंटवारे पर ममता के अड़ियल रुख के चलते भारत बांग्लादेश के बीच इस पर अमल नहीं हो पाया.

अलग राज्य के आंदोलन के लिए भाषाई दादागिरी का हवाला देने वाले गोरखा ममता के उस जवाब को नज़रअंदाज़ कर रहे हैं जिसमें पहाड़ी इलाकों में बंगाली को अनिवार्य नहीं करने की छूट का हवाला दिया गया है. भाषा एक ऐसी नब्ज़ है जिसने दक्षिण से लेकर कई राज्यों में आंदोलनों को हवा दी. इसी को बैसाखी बना गोरखा जनमुक्ति मोर्चा इस सीढ़ी को चढ़ने की जुगत में है जिससे ममता बैनर्जी ने उन्हें 2011 में स्वायत्त काउंसिल की रेवड़ी दे कर उतार दिया था. राजनीति की चक्की में पिस रही अलग राज्य की मांग आगे भी पूरी होगी इसकी संभावना निकट भविष्य में बेहद कम है.

ऋचा जैन कालरा NDTV इंडिया में प्रिंसिपल एंकर तथा एसोसिएट एडिटर हैं...

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण) : इस आलेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी विचार हैं. इस आलेख में दी गई किसी भी सूचना की सटीकता, संपूर्णता, व्यावहारिकता अथवा सच्चाई के प्रति NDTV उत्तरदायी नहीं है. इस आलेख में सभी सूचनाएं ज्यों की त्यों प्रस्तुत की गई हैं. इस आलेख में दी गई कोई भी सूचना अथवा तथ्य अथवा व्यक्त किए गए विचार NDTV के नहीं हैं, तथा NDTV उनके लिए किसी भी प्रकार से उत्तरदायी नहीं है.



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