NDTV Khabar

प्राइम टाइम इंट्रो : दयाल सिंह सांध्य कॉलेज का नाम बदलने पर बवाल

आप किसी भी पार्टी की कोई भी सरकार ले लीजिए, उनकी सरकार के बीस साल ले लीजिए या दस साल ले लीजिए, हर जगह कॉलेजों की हालत ख़राब मिलेगी.

388 Shares
ईमेल करें
टिप्पणियां
प्राइम टाइम इंट्रो : दयाल सिंह सांध्य कॉलेज का नाम बदलने पर बवाल
यूनिवर्सिटी सीरीज़ का 26वां अंक आपको ले चलेगा दिल्ली विश्वविद्यालय के दयाल सिंह कॉलेज. दयाल सिंह मजीठिया कौन थे, ये जानने के लिए हमने Hey प्रकाशन से छपी उनकी जीवनी The Life And Times Of Dayal Singh Majithia मंगाई तो उस किताब कि पहली पंक्ति इसी बात से शुरू होती है कि सरदार दयाल सिंह मजीठिया भारतीय उपमहाद्वीप में पैदा हुए शायद इकलौते शख्स हैं जिनकी जीवनी भारत और पाकिस्तान दोनों सरकारों ने प्रकाशित की है. दिल्ली के लोधी रोड पर स्थित दयाल सिंह कॉलेज को बीस सालों से देख रहा हूं मगर ध्यान ही नहीं गया कि दयाल सिंह मजीठिया कौन हैं. पंजाब के शेर महाराजा रंजीत सिंह के ख़ानदान से जुड़े रहे हैं. शाही परिवार के होने के बाद भी दयाल सिंह ने अपने जीवन में दूसरा रास्ता चुना. दयाल सिंह ने एक ऐसे आंदोलन का नेतृत्व किया जिसके नतीजे में 1882 में पंजाब यूनिवर्सिटी मिली. आज पंजाब यूनिवर्सिटी की भी हालत बहुत अच्छी नहीं है और उनके नाम पर बने दिल्ली के इस कॉलेज की हालत भी बहुत अच्छी नहीं है. जब 1884 में मद्रास में थियोसोफिकल सोसायटी ऑफ इंडिया की बैठक में दयाल सिंह मजीठिया भी थे, जिसमें भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना का निर्णय लिया गया था.

199 रुपये की यह किताब दयाल सिंह मजीठिया की जीवनी के लाजवाब किस्से बताती है. पंजाब नेशनल बैंक तो अपने घरों के आसपास आपने देखा ही होगा, उस बैंक के पहले और आजीवन चेयरमैन रहे. पंजाब नेशनल बैंक भारतीयों के द्वारा चलाया जाने वाला पहला बैंक था. जिस समय उनकी हैसियत के अमीर गुरुद्वारा, मंदिर बना रहे थे, दयाल सिंह मजीठिया बैंक बना रहे थे, यूनिवर्सिटी बना रहे थे, कांग्रेस की स्थापना करने वालों में शामिल हो रहे थे, एक अख़बार द ट्रिब्यून कायम कर रहे थे जो 125 साल से अधिक समय से हमारे बीच आज तक चला आ रहा है. अपनी सारी कमाई पूंजी दान कर एक ट्रस्ट बना दिया ताकि कॉलेज, लाइब्रेरी और अखबार चलता रहे. मशहूर चित्रकार अमृता शेरगिल भी इन्हीं के ख़ानदान की रही हैं, जिनके नाम पर दयाल सिंह कॉलेज से ही थोड़ी दूरी पर अमृता शेरगिल मार्ग है. रजवाड़ा, जागीरें छोड़कर दयाल सिंह बिजनेस की दुनिया में आ गए. लाहौर में अंग्रेजों के बैरक की जमीन खरीद कर उनके अफसरों के लिए मकान बनाया. 1898 में मरने से पहले लाहौर में उनकी काफी संपत्ति हो गई थी. उनके जीवन काल में बंगाल में ब्रह्मों समाज का काफी ज़ोर थे, दयाल सिंह उसके असर में आए और ब्रह्मों समाज का भी काफी प्रसार किया. ट्रिब्यून अख़बार निकालने का किस्सा भी इस किताब में ख़ूब है. कोलकाता में अमृत बाज़ार पत्रिका, मद्रास में हिन्दू और लाहौर में दि ट्रिब्यून. तीन धुरी बन गए राष्ट्रवादी प्रेस के. तब लाहौर में अंग्रेज़ी बोलने वाले भी बहुत कम थे, फिर भी दयाल सिंह अपने इरादे से पीछे नहीं हटे. 1906 से यह अख़बार दैनिक हो गया. अंग्रेज़ों के लिए भारतीय मत का प्रतिनिधि बन गया. इस अखबार ने सामाजिक सुधार और आज़ादी की लड़ाई में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई.

दयाल सिंह मजीठीया ने अपने संपादकों के काम में कभी दखल नहीं दिया. उन्हें अपने जीवनकाल में जब मानहानि का सामना करना पड़ा तब जांच के दौरान सारे गवाहों ने इस बात की पुष्टि भी की कि दयाल सिंह मजीठीया कभी संपादक के काम में दखल नहीं देते थे. दि ट्रिब्यून अख़बार अंग्रेज़ी हुकूमत के दौर में सत्ता विरोधी तेवरों के लिए मशहूर हो गया था. 1893 के लाहौर कांग्रेस के अधिवेशन की ख़बरों को जमकर छापा गया जिससे ब्रिटिश हुकूमत की नज़र टेढ़ी हो गई. लाहौर के गवर्नमेंट कॉलेज के प्रिंसिपल ने कॉलेज की लाइब्रेरी में ट्रिब्यून पर रोक लगा दी थी. कांग्रेस के संस्थापक एओ ह्यूम के लंदन लौट जाने पर उन्होंने ट्रिब्यून में जो विदाई लेख लिखा था, वो पढ़ने लायक है. इस व्यक्ति के जीवन का एक-एक लम्हा शानदार है. पहला भारतीय बैंक पंजाब में कायम हुआ था. 19 मई, 1894 को लाहौर के अनारकली मार्केट में इसका दफ्तर कायम हुआ. पंजाब नेशनल बैंक के इतिहास में लिखा है कि बंगाली, पारसी ने पंजाबी के साथ बैंक बनाया जो सच्चे मायने में भारतीय था.

20वीं सदी के भारत ने जो बदलाव देखे, उसकी बुनियाद सरदार दयाल सिंह मजीठिया जैसे लोग रख रहे थे. 1898 में दयाल सिंह मजीठिया की मौत हो गई. उनका इतना परिचय न दिया जाता तो दिल्ली के दयाल सिंह सांध्य कॉलेज का नाम बदल कर वंदे मातरम करने के फैसले का मर्म समझ नहीं आता. वैसे केरल के एर्नाकुलम में 1965 से मिशनरी कॉलेज चल रहा है जिसका नाम भारत माता कॉलेज है. वंदे मातरम कॉलेज होने में भी कोई दिक्कत नहीं है, मगर दयाल सिंह मजीठिया के योगदान का ख़्याल किया जा सकता था. चेयरमैन कहते हैं कि एक साथ दो कॉलेज एक नाम से नहीं चल सकते. लेकिन एक कैंपस में एक साथ दो कॉलेज चलाने के भी क्या तुक हैं. दिल्ली में ईवनिंग कॉलेजों ने विभाजन के बाद आए लोगों को बहुत सहारा दिया है. वे दिन में काम करते रहे और शाम को पढ़ाई. पिछले तीन साल से सांध्य कॉलेज को सुबह लाने की प्रक्रिया चल रही है. सबसे पहले देशबंधु कॉलेज सांध्य को सुबह लाकर उसका नाम रामानुजम कॉलेज किया गया. विधायक मंजीत सिंह सिरसा कहते हैं कि नाम नहीं बदला जा सकता है, प्रबंधन समिति के चेयरमैन अमिताभ सिन्हा कहते हैं कि नाम बदला जा सकता है. सिरसा का कहना है कि जब दिल्ली यूनिवर्सिटी ने इस कॉलेज को टेकओवर किया था तब समझौता पत्र में लिखा था कि नाम दयाल सिंह कॉलेज ही रहेगा.

अभी तक अकाली दल के बड़े नेताओं ने नहीं बोला है. क्या बादल परिवार सिरसा के इन सवालों का साथ देगा. नाम बदलने के मसले को लेकर जिनता विरोध नहीं है, उतना दो पाली के कॉलेज का एक साथ किए जाने को लेकर विरोध हो रहा है. शिक्षक भी सवाल उठा रहे हैं और छात्र भी. वैसे एक दयाल सिंह कॉलेज पाकिस्तान के लाहौर में भी है, जिसका नाम अभी तक नहीं बदला गया है.

आप किसी भी पार्टी की कोई भी सरकार ले लीजिए, उनकी सरकार के बीस साल ले लीजिए या दस साल ले लीजिए, हर जगह कॉलेजों की हालत ख़राब मिलेगी. हैरानी है कि छात्रों और शिक्षकों ने इसे कभी व्यापक समस्या के रूप में नहीं देखा. दयाल सिंह कॉलेज के छात्र बुनियादी सुविधाओं को लेकर मुखर हो रहे हैं. दयाल सिंह कॉलेज कम स्पेस में चलने वाला वाकई सबसे बड़ा कॉलेज है. 11 एकड़ का भी कैंपस नहीं है मगर सुबह की पाली में यहां 6000 बच्चे पढ़ते हैं. शाम की पाली में 3000 छात्र पढ़ते हैं. छात्रों का कहना है कि दोनों पाली मिला देने से एक कैंपस में एक वक्त में 9000 छात्र हो जाएंगे.

दूसरी मंज़िल पर छोटे-छोटे कमरे बनाकर क्लास चल रहे हैं. इस तरह के सात आठ कमरे हैं. आठ बेंच हैं जिसमें बहुत से बहुत बीस छात्र आ सकते हैं, पूरी क्लास भी इसमें नहीं आ सकती है. छात्र बाहर खड़े होकर लेक्चर सुन रहे होते हैं. इस क्लास रूम का पंखा मत देखिए. उम्मीदों से लबालब होकर बीस पूड़ी खा लेंगे. आम तौर पर इनका इस्तमाल ट्यूटोरियल के लिए होता है जिसमें 15-20 बच्चे होते हैं. मगर जगह की इतनी कमी है कि कभी-कभी इन छोटे कमरे में भी जनरल क्लास अलॉट कर दिया जाता है, जिसमें 70 से 100 छात्र होते हैं. वैसी स्थिति में छात्रों को बाहर खड़े रहना पड़ता है.

भूगोल की प्रयोगशाला इतनी छोटी है, क्लास में 70-80 छात्र होते हैं मगर यहां 30 से अधिक के बैठने की जगह नहीं है. इसी कमरे के कोने में मेज़ लगा लैब अस्सिटेंट का कमरा बनाया गया है. लैब के अंदर फाइलें रखने के लिए दराज़ की जगह नहीं है. इन्हें सीढ़ियों की जगह रखा गया है. ज़ाहिर है उनके आने जाने की जगह संकरी होती होगी जो सुरक्षा के लिहाज़ से काफी ख़तरनाक है.

कॉलेज के बेसमेंट में क्लास रूम आधा स्टोर रूम है और आधा क्लास रूम है. स्टोर रूम वाले हिस्से में परीक्षा के पर्चे बिखरे पड़े हैं. यहां दरवाज़ा लगाने की जगह नहीं, आलमीरा से दीवार बनाई गई है मगर दूसरी क्लास से टीचर की आवाज़ यहां आती रहती है. हमने जिस वक्त शूटिंग की उस वक्त छात्र नहीं थे, वर्ना हमें बताया गया कि जब कॉलेज खुला होता है तो इस कॉरिडोर में पांव धरने की जगह नहीं होती है. दयाल सिंह कॉलेज के नाम बदलने को लेकर भावुक होने वाले भी देर से जागे हैं. उन्हें कभी अपनी भावुकता का इस्तेमाल इस कॉलेज का हाल बदलने के लिए भी करना चाहिए था. दिल्ली विश्वविदयालय ने लगातार इस कॉलेज को नज़रअंदाज़ किया है. 6000 छात्रों के लिए यहां 255 टीचर हैं. परमानेंट करीब 166 हैं, बाकी 90 एडहॉक हैं. शाम की पाली में 85-90 ही टीचर हैं. ईवनिंग कॉलेज में परमानेंट से ज़्यादा अस्थायी शिक्षक हैं. एडहॉक शिक्षकों की समस्या पर किसी का ध्यान नहीं जाता है. शिक्षकों के लिए स्टाफ रूम काफी छोटा है. एक साथ 100 शिक्षक भी नहीं बैठ सकते हैं. अगली क्लास की तैयारी यहां की भीड़ में क्या होती होगी आप समझ सकते हैं. हम शिक्षकों को ये सुविधा देंगे और चाहेंगे कि वे हमें वर्ल्ड क्लास कॉलेज बनाकर दे दें. भीमकाय अटेंडेंस रजिस्टर को ढोना भी आफत का काम है, उसे रखने के लिए भी शिक्षकों के पास अपनी आलमारी तक नहीं है. किताबें भी घर से ढोकर लानी होती है. लॉकर की हालत देखकर आप समझ सकते हैं कि क्या होता होगा. शिक्षकों के शौचालय की भीतर से तो स्थिति ठीक है मगर संख्या के हिसाब से बहुत कम है. स्टाफ रूम के भीतर ही शौचालय बने हुए हैं. किसी शिक्षक के पास अपना कोई स्पेस नहीं है. इंग्लिश विभाग को अलग से एक छोटा सा कमरा दिया गया है. उसमें आठ लोग भी साथ नहीं बैठ सकते, जबकि इंग्लिश डिपार्टमेंट में 21 शिक्षक हैं.

इस बात में दम है कि दयाल सिंह कॉलेज की बुनियादी सुविधाओं पर भारी बोझ पहले से ही है और दो पाली मिला देने से यह दबाव और बढ़ेगा. शाम की पाली के कॉलेज के लिए अलग से इमारत बन रही है मगर पूरी नहीं हुई है. छात्रों और शिक्षकों का कहना है कि ऐसी स्थिति में मारा-मारी की नौबत आ जाएगी. पहले ही यहां ऑडिटोरियम और सेमिनार रूम में भी क्लास चलती है. 6000 छात्रों के लिए जो ऑडिटोरियम है उसमें मात्र 186 छात्र ही बैठ सकते हैं. खेल का मैदान भी छोटा हो गया, क्योंकि कुछ ज़मीन मेट्रो में चली गई. 2008 में आंदोलन के बाद भारत सरकार के शहरी विकास मंत्रालय ने बगल में ज़मीन देने का वादा किया था मगर नहीं किया. खेल के मामले में दयाल सिंह कॉलेज की धूम है, मगर अब उस पर असर पड़ रहा है. सुबह की पाली के प्रिंसिपल का कहना है कि प्रति छात्र बुनियादी ढांचे के हिसाब से दयाल सिंह कॉलेज दिल्ली यूनिवर्सिटी का सबसे ख़राब कॉलेज है.

आम तौर पर कॉलेजों में चेयरमैन के लिए कमरा नहीं होता है. इस कॉलेज के कांफ्रेंस रूम में चेयरमैन ने अपने लिए कमरा बना लिया है और नेम प्लेट लगा है. दिल्ली यूनिवर्सिटी में पहली बार किसी चेयरमैन के लिए कॉलेज में कमरा बना है. जिस कॉलेज में सेमिनार रूम में क्लास चलता हो वहां के कांफ्रेंस रूम को चेयरमैन के ऑफिस में बदल दिया गया है. प्रबंधन समिति के अध्यक्ष अमिताभ सिन्हा बीजेपी के सदस्य हैं और वकील भी हैं. उनका कहना है इस कॉलेज में प्रिंसिपल और शिक्षकों के बीच झगड़ा होता रहता है. शिक्षक प्रिंसिपल के कमरे में जाना नहीं चाहते इसलिए अपना कमरा बनाया है. जब वे नहीं होते हैं तो कांफ्रेंस हो सकती है. लेकिन शिक्षकों का कहना है कि ये सही नहीं है. हर कॉलेज में शिक्षक और प्रिंसिपल के बीच थोड़ा बहुत विवाद होता है, मगर इस स्तर का नहीं होता कि उसे सुलझाने के लिए चेयरमैन को कॉलेज में अपना दफ्तर बनाना पड़े. कालेज के सूत्रों से पता चला कि कांफ्रेंस रूम का इस्तेमाल हुआ करता था, मतलब अब यह दफ्तर के रूप में ही काम आ रहा है. अमिताभ का यह भी कहना है कि शाम की पाली के छात्रों के हितों का भी ध्यान रखना होगा. शाम की पाली के कॉलेज की साख नहीं होती है इसलिए उन्हें नौकरी नहीं मिल पा रही थी. वैसे कोई यह बता देता कि किस मॉर्निंग के कॉलेज के छात्रों को कितनी नौकरियां मिलती हैं तो एडमिशन लेने में छात्रों के लिए भी सुविधा हो जाती.

सुबह और शाम वालों की बात में दम है. इसका समाधान निकालना होगा मगर छात्रों के सवालों को वंदे मातरम के नाम की बहस में नहीं उलझाना चाहिए. क्लास रूम तो हो, पढ़ाने के लिए शिक्षक तो आ जाएं.


Hindi News से जुड़े अन्य अपडेट लगातार हासिल करने के लिए हमें फेसबुक और गूगल प्लस पर ज्वॉइन करें, ट्विटर पर फॉलो करे...

Advertisement