कोरोनावायरस लॉकडाउन के दौरान 'एसेन्शियल आइटम' होने का एहसास

सम्पूर्ण लॉकडाउन की स्थिति में भी प्रजातंत्र के चौथे स्तंभ का काम रुकता नहीं. आपदा के समय आम जन तक सूचना का सही प्रसार बेहद अहम हो जाता है. यह अलग बात है कि आज के दौर में लोकतंत्र के सभी चार खंभों की विश्वसनीयता वेंटिलेटर पर है.

कोरोनावायरस लॉकडाउन के दौरान 'एसेन्शियल आइटम' होने का एहसास

दोपहर के ढाई बजा चाहते हैं. दफ्तर के लिए घर से निकल रहा हूं. क़दम बोझिल हैं और मन सशंकित. साथ में ज़िम्मेवारी का भी एहसास है. चंद पेशे ऐसे हैं, जिनमें कर्फ़्यू या आपदा के हालात में भी काम करना होता है. यहां काम कभी नहीं रुकता. बल्कि परिस्थितियां असामान्य हों, तो व्यस्तता और बढ़ जाती है. दूसरों से अलग ज़िंदगी कई बार कचोटती है. अक्सर जब दुनिया जश्न मना रही होती है, तो उसमें शामिल नहीं हो पाना खलता है. ग़मज़दा दुनिया के साथ दो बूंद आंसू बहाने की भी फ़ुर्सत नसीब नहीं होती. ख़ैर, पेशा खुद चुना है, तो शिकायत की गुंजाइश नहीं होनी चाहिए. हौसला इस बात से मिलता है कि कल शायद कोई एक आकर कहेगा - "शुक्रिया, उस वक़्त साथ खड़े होने के लिए..."

सम्पूर्ण लॉकडाउन की स्थिति में भी प्रजातंत्र के चौथे स्तंभ का काम रुकता नहीं. आपदा के समय आम जन तक सूचना का सही प्रसार बेहद अहम हो जाता है. यह अलग बात है कि आज के दौर में लोकतंत्र के सभी चार खंभों की विश्वसनीयता वेंटिलेटर पर है. इनमें सबसे नाज़ुक स्थिति सूचना-तंत्र की है. आज दर्शकों और पाठकों के सामने एक बड़ी चुनौती आ खड़ी हुई है. तमाम प्रश्नचिह्नों के बीच घिरे मीडिया में उन्हें अपने लिए सही ख़बर ढूंढना है. अगर आप इसमें नाकाम रहते हैं, तो ख़बरों की आड़ लेकर निहित स्वार्थ और विचारधाराएं आपके दिलोदिमाग़ में घुसकर घर बना लेती हैं. फिर आप उस विचारधारा की कठपुतली बन कर रह जाते हैं. सोचिएगा, फ़िलहाल मुझे सोच से निकलना होगा और घर से भी.

संपूर्ण 'लॉकडाउन' में भी 'अप' रखना था

लिफ़्ट की शून्य बटन को अंगुली की नोक से दबाता हूं. शून्य की शून्यता डरा रही है. कहीं उस शून्य में वह सूक्ष्म और अदृश्य दुश्मन तो नहीं, जिसने पूरी दुनिया को अपनी गिरफ़्त में ले रखा है. चौथी मंज़िल से शून्य तक पहुंचने में एलीवेटर को मानो आज वक़्त ही नहीं लगा. ख़ामोशी ने पूरी सोसाइटी को अपनी आग़ोश में ले रखा था. आसमान में बादल सूर्य की रोशनी को रोक माहौल को मातमी बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ना चाह रहे थे. मगर शुक्र था कि हवा घटाओं के मंसूबों पर पानी फेरने में लगी थी. बग़ल की सोसाइटी की बाल्कनी से आ रही विंड चाइम की आवाज़ और चिड़ियों की चहचहाहट आज कुछ ज़्यादा ही तेज़ थी. सड़क पर पेड़ से गिर रहे पत्ते हवा के साथ अठखेलियां कर रहे थे.

कार के लॉक की आवाज़ शर्मिंदा कर रही थी. कोई कटाक्ष नज़र देख न ले कि यह कमबख़्त घर से बाहर निकल रहा है. नज़रें चुराते कार में दाखिल हुआ और सबसे पहले सेनेटाइजर से हाथ साफ किया. सोसाइटी का ऑटोमैटिक बूम बार बंद था. गेट लॉक कर दिया गया था. शुक्र था कि गार्ड ने बिना किसी भाव के फ़्लैट नंबर, फोन नंबर, नाम और बाहर जाने का मक़सद पूछ गेट खोल दिया. कई ढीठ लोग बिना किसी ठोस उद्देश्य के बाहर निकल रहे हैं और इतने बेगैरत हैं कि बाहर जाने का कारण 'तफरी करना' लिखा जाते हैं. ऐसे असामाजिक तत्व उनके लिए मुश्किलें बढ़ा जाते हैं, जिन्हें सचमुच ज़रूरी काम से जाना होता है.

सड़क पर सन्नाटे ने डेरा डाल रखा था. सुबह व्हॉट्सऐप पर GIP मॉल के बाहर नीलगाय आने का वीडियो देख चुका था. दुनिया के कई हिस्सों में जंगली जानवरों के शहर में घुस आने की ख़बरें आ रही हैं. इंसान क़ैद में है और जानवर बाहर अपनी छीनी गई ज़मीन पर क़ब्ज़ा कर रहे हैं. मगर इंसान के क़रीब रहने वाले कुत्ते ख़ुश नहीं नज़र आए. आवारा कुत्तों के सामने खाने की समस्या आ गई है.

घर से दफ्तर की दूरी क़रीब 21 किलोमीटर है. नोएडा-ग्रेटर नोएडा एक्सप्रेस वे बिलकुल खाली था. खाली सड़क होने के बावजूद पैर एक्सलेरेटर को दबाना नहीं चाहते थे. इक्का-दुक्का नज़र आ रही गाड़ियां भी फ़र्राटे नहीं लगा रही थी. इस उदासी से अच्छा तो वह ट्रैफिक है, जिसका हम रोना रोते रहते हैं. इंसानों के लिए तन्हाई से बड़ी सज़ा शायद कुछ नहीं. फ़िल्म सिटी के क़रीब राष्ट्रीय प्रेरणा स्थल के पास सूनी सड़क पर लाल फूल बिखरे हुए थे. ख़ूबसूरत, मगर उदास. आम दिन में कब के कुचल दिए गए होते.

ख़्यालों में खोए कब DND, यानी दिल्ली-नोएडा डायरेक्ट के नाके पर पहुंच गया, पता ही नहीं चला. उत्तर प्रदेश और दिल्ली की सीमा पर दिल्ली पुलिस के जवान मुस्तैदी से हर एक की जांच-पड़ताल कर रहे थे. कइयों को तो उन्होंने वहीं से वापस मुड़वा दिया. कार पर प्रेस का स्टीकर लगे रहने के बावजूद उन्होंने आई-कार्ड चेक किया.

DND बिलकुल खाली था. यमुना में ज़्यादा पानी नज़र आया. अमूमन इस मौसम में यमुना में इतना पानी तो नहीं होता. पानी साफ नज़र आया. आज नदी के पानी में ठहराव भी नहीं था. एक अविरल बहाव दिखा. मन ने कहा - अरे, दो दिन में नदी इतनी साफ थोड़ी हो जाएगी. तुम्हारा भ्रम है. मगर दो दिन बाद सोशल मीडिया पर यमुना और गंगा के स्वच्छ होने के वीडियो वायरल होने लगे. ज़ाहिर है, नदियों को साफ करने का वर्षों से चल रहा मिशन ढकोसला है. टैक्स के पैसे को हड़पने की सोची-समझी बड़ी साज़िश है. अगर औद्योगिक प्रदूषण बंद कर दिया जाए, तो नदियां बहुत हद तक खुद ही अपने को साफ कर लेंगी.

क़रीब दो किलोमीटर बाद एक और बैरिकेडिंग लगी हुई थी. वहां भी वही सब दोहराया गया. पुलिस वाले ने दूर से ही आई-कार्ड देखकर जाने का इशारा कर दिया. शायद आई-कार्ड हाथ में लेकर जोखिम नहीं लेना चाहता था.

ट्रैफिक नहीं होने के कारण सड़कों की इज़्ज़त की बखिया भी उधड़ रही थी. कई जगह से DND टूट रहा है. सड़क की सेहत ठीक नहीं है. गाड़ियों की भीड़ में यह छिप जाता है. दरअसल, इस सड़क का फ़िलहाल कोई माई-बाप नहीं है. टोल वसूलने के लिए नोएडा टोल ब्रिज कंपनी लिमिटेड सुप्रीम कोर्ट में मुकदमा लड़ रही है.

नोएडा सेक्टर 93 से ग्रेटर कैलाश पार्ट 1 स्थित दफ्तर जाने में एक रेड लाइट मिलती है, वह भी ऑफिस से आधा किलोमीटर पहले. सिग्नल पर एक गाड़ी रुकी हुई थी. सन्नाटे के बावजूद रेड लाइट पर दिल्ली वालों का रुकना थोड़ा हैरान करता है. एक और कार आई, वह भी रुक गई. दिल्ली सुधर गई है या सुधरे ही लोग सड़कों पर निकल रहे हैं...! दिलवालों की दिल्ली कई बार चौंका जाती है.

दफ्तर के पहले पांचवी बैरिकेडिंग को पार करने में कोई परेशानी नहीं हुई. उन्हें शायद मालूम था कि हम कहां जा रहे हैं. दफ्तर की पार्किंग में कभी जगह नहीं मिलती थी. कॉम्प्लेक्स की सारी दुकानें बंद थीं, लिहाज़ा पार्किंग में जगह की क़िल्लत नहीं थी. गेट पर गार्ड ने हैंड सेनेटाइज़ कराया और टेम्परेचर चेक किया. एकाध सहयोगी ऐसे भी थे, जिन्हें तापमान नॉर्मल आने के लिए आधे-आधे घंटे तक इंतज़ार करना पड़ता है. जब तक तापमान सामान्य नहीं हो जाता, उन्हें बाहर ही रुकना पड़ता है. खैर, मेरे साथ अब तक ऐसा नहीं हुआ है.

लॉकडाउन के बाद दफ्तर मे पहला दिन था. फ़र्स्ट फ़्लोर सील था. यहां सुबह की शिफ़्ट में काम होता है. फिर सेनेटाइज़ कर फ़्लोर को सील कर दिया जाता है. शाम की शिफ़्ट दूसरे फ़्लोर से होती है. रिपोर्टर को ऑफिस आने की इजाज़त नहीं है. उन्हें फ़ील्ड से ही रिपोर्ट फ़ाइल कर घर लौटना होता है. सारे प्रेस कॉन्फ़्रेंस की फ़ीड भी इलेक्ट्रॉनिकली मिल रही है. लिहाज़ा, प्रेस कॉन्फ़्रेंस में रिपोर्टर नहीं जा रहे हैं. स्टूडियो गेस्ट को भी ऑफिस आने की मनाही है. स्काइप या फिर लाइव-यू के ज़रिये वे चर्चा में शामिल हो रहे हैं. ऑनलाइन की पूरी टीम वर्क फ्रॉम होम कर रही है. दफ्तर में उन्हीं 25-30 लोगों को आने की इजाज़त है, जिनके बिना बिलकुल काम नहीं चल सकता. आप सोच रहे होंगे कि स्पोर्ट्स वालों का भला क्या काम...! स्पोर्ट्स की ख़बरें तो आम चुनाव के समय से ही आखिरी सांसें गिन रही हैं. ज़िंदगी भर स्पोर्ट्स की रिपोर्टिंग करने वाले अब दूसरी बीट पर काम करना सीख रहे हैं. इस बार IPL होता, तो स्पोर्ट्स बुलेटिन शुरू हो सकता था. कई स्पॉन्सर दिलचस्पी दिखा रहे थे. IPL इस साल अब शायद ही हो पाए. बहरहाल, स्थिति अभूतपूर्व है. लॉकडाउन को आज़ादी के बाद की सबसे बड़ी घटना कहा जा सकता है. कम से कम हमारी पीढ़ी की यह सबसे बड़ी बात तो ज़रूर है, भले ही अभी हमें इसकी विकरालता का पूरी तरह एहसास नहीं हो पाया है. मुझे इसलिए दफ्तर आना पड़ रहा है, क्योंकि दिन के आखिरी बुलेटिन की एंकरिंग की ज़िम्मेदारी दी गई है.

ऑफिस पहुंचते ही सीधा वॉशरूम जाना होता है. न्यूज़रूम में जाने से पहले कपड़े बदलने होते हैं. घर से पहनकर आए कपड़े पहनकर न्यूज़रूम में नहीं आ सकते. हाईजीन बनाए रखने की सख़्त हिदायत है. हर घंटे पर घंटी बजती है. हर स्टाफ़ को अपना हाथ सेनेटाइज़ करना होता है. HR बाक़ायदा CCTV कैमरों से निगरानी रख रहा है. न्यूज़रूम में एक मीटर का फ़ासला बनाए रखना होता है. एक कुर्सी छोड़कर लोगों को बैठना होता है. हालांकि तमाम एहतियात के बावजूद जोखिम तो है ही. दुनिया लॉकडाउन में है और आपको दफ्तर आना पड़ रहा है. दफ्तर में शांति तो है, लेकिन शहर की मनहूसियत और घर की घुटन से थोड़ी राहत मिलती है.

दफ्तर के पास की तमाम दुकानें बंद हैं, सिर्फ दवा की एक दुकान खुलती है, वह भी चंद घंटों के लिए. दफ्तर से निकलकर तफ़री भी नहीं कर सकते. जितनी बार नीचे उतरते हैं, हर बार टेम्परेचर चेक होता है और हाथ सेनेटाइज़ करने होते हैं. जब सब कुछ बंद है, तो कोई नीचे जाता भी नहीं. दफ्तर का कैन्टीन तक बंद है. शुक्र है, एक बार दफ्तर की ओर से चाय और बिस्किट का प्रबंध है.

रात के 11:30 बजे दफ्तर से फ़ारिग़ हुआ. तब तक दो-चार लोग बचे हुए थे. हाउसकीपिंग स्टाफ़ फ़्लोर को सेनेटाइज़ करने के लिए तैयार था. उन्हें बस हमारे जाने का इंतज़ार था. मेकअप वग़ैरह छुड़ाकर वापसी का सफ़र शुरू हुआ. दफ्तर के नज़दीक दो बार सघन चेकिंग से गुज़रना पड़ा. DND नाके पर पुलिस वाले ने गुज़ारिश की कि उनकी ख़बर भी कभी दिखा दें. कहने लगा, बिना किसी सुरक्षा उपकरण के उन्हें चेकिंग करनी पड़ती है. लगातार 14-15 घंटे ड्यूटी करनी पड़ रही है.

रात में भी सड़क पर सन्नाटा नहीं था. रास्ते में सैकड़ों मज़दूर परिवार पैदल चलते नज़र आए. मन व्यथित हो गया. ये क्यों इस तरह घरों के लिए निकल पड़े हैं...? कैसे ये हज़ारों किलोमीटर का सफ़र तय कर पाएंगे...? तस्वीरों में देखा बंटवारे का दृश्य दिमाग में कौंधने लगा. किसी जानकार की राय थी कि पहले 10 दिन के लॉकडाउन की घोषणा की जानी चाहिए थी. फिर 10-10 दिन कर बढ़ाते जाते, तो शायद कामगारों में अफरा-तफरी नहीं फैलती.

नोएडा-ग्रेटर नोएडा एक्सप्रेस वे पर भी कामगारों का पलायन जारी था. इस बीच बारिश शुरू हो गई. भीगते हुए लोगों की मदद भी नहीं कर पाने की स्थिति में था. यह भी हिम्मत नहीं थी कि कुछ को लिफ़्ट देकर उनमें से कुछ का सफ़र थोड़ा छोटा कर पाऊं. दिल भर आया, लेकिन डर और स्वार्थ आड़े आ गया. कहीं इनसे मुझे कोरोना न हो जाए...! बहरहाल, विवश चुपचाप आगे बढ़ गया.

गेट पर गार्ड ने विनम्रता से नमस्कार कर टेम्परेचर लिया और हाथ सेनेटाइज़ कर अंदर जाने दिया. सोसाइटी सो चुकी थी. कोई देख न ले, यही आशंका लिए लिफ़्ट में दाखिल हो गया. बैग और जूते बालकनी में और खुद सीधे वॉशरूम में. गर्म पानी से स्नान वायरस को मार नहीं सकता, लेकिन किया भी क्या जाए.

आधी रात के बाद डिनर से पहले फ़ेसबुक देखने की ग़लती कर बैठा. एक NRI की टिप्पणी से पारा चढ़ गया. फ़ेसबुक पहले देख लेता, तो बढ़े हुए तापमान के साथ गार्ड गेट पर ही रोक लेता.

एक बाद मुझे समझ नहीं आती, देश छोड़कर पैसा जोड़ने विदेश गए इन NRI ने ही देशभक्ति का सारा ठेका ले रखा है...? सात समुंदर पार से इनकी देशभक्ति इतनी हुंकार क्यों मारती है.

मैंने फ़ेसबुक पर लिखा था - "केंद्र सरकार विदेश से भारतीयों को ले आई... बिहार और उत्तर प्रदेश सरकार अपने लोगों को क्यों नहीं घर पहुंचा सकती...? सबको सड़कों पर मरने के लिए छोड़ दिया है..."

इस पर स्वयंभू NRI देशभक्त कटाक्ष करता है - "आलोचना करने में इतनी ऊर्जा ख़र्च करने की बजाय उन लोगों के लिए कुछ कर लेते... ऑनलाइन फ़ंड जुटाने का अभियान चला लेते..." वग़ैरह-वग़ैरह.

कैसी बात कर रहा था वह...? उस सज्जन को ज़मीनी हक़ीक़त का रत्ती भर भी एहसास नहीं था. पलायन में लगे कामगारों को तत्काल मदद की ज़रूरत थी. लॉकडाउन में, और जिस पैमाने पर पलायन हो रहा था, उसमें सरकार का तंत्र ही मदद कर सकता था. जब तुरंत मदद की ज़रूरत हो, तो कोई कैसे ऑनलाइन फंड जुटाने की सलाह दे सकता था. सोशल मीडिया पर हांकना और बकवास करना देशभक्ति नहीं है, बल्कि जिसे जो काम मिला हुआ है, उसे कर्तव्यनिष्ठ होकर निर्वहन करना देश के प्रति सच्चा सम्मान है. पूरी दुनिया घरों में बंद है और हम अपनी और अपने परिवार की जान जोखिम में डालकर दफ्तर जा रहे हैं और देश छोड़कर भागे यह सज्जन पाठ पढ़ा रहे हैं. उस दिन सामने होता, तो बत्तीसी नहीं बचती. ग़ुस्सा सातवें आसमान पर था. मतलब सरकार तक सूचना भी नहीं पहुंचाई जाए...? ग़लतियों की ओर ध्यान भी नहीं दिलाया जाए...? सवाल पूछना तो सबसे बड़ा गुनाह हो गया है. शुक्र है कि बात सरकार तक पहुंची, सरकारें जगीं और रास्ते पर भटक रहे मज़दूरों को किसी तरह घर पहुंचाया. आधी रात को डिनर से पहले उन्हें फेसबुक पर करारा जवाब दिया और फ़्रेंड लिस्ट से बाहर किया, वरना खाना गले से नीचे नहीं उतरता.

संजय किशोर NDTV इंडिया के खेल डेस्क पर डिप्टी एडिटर हैं...

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