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12 राज्यों में भीषण सूखा : सोचें और सहेजें पानी को!

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12 राज्यों में भीषण सूखा : सोचें और सहेजें पानी को!

प्रतीकात्‍मक तस्‍वीर

आजाद भारत के इतिहास में सबसे खराब सूखा है इस बार। जब दक्षिण एशिया में बांधों के विशेषज्ञ हिमांशु ठक्‍कर ने कहा भी कि... 'तो इस बार पानी की किल्लत की भयावह स्‍थि‍ति कुछ समझ में आयी।' सुप्रीम कोर्ट भी सूखे को लेकर चिंतित है। उसने लगातार केंद्र के ढीले रवैये को लेकर सवाल उठाए। यहां तक पूछा कि सूखे की हालत को लेकर आप गम्भीर हैं भी या नहीं।

कोर्ट ने कहा कि सूखे का प्रभाव 12 राज्यों में है और 10 राज्य सूखाग्रस्त हैं। सुप्रीम कोर्ट ने इस पर सुनवाई के दौरान केंद्र सरकर और राज्य सरकारों को फटकार लगाई। हरियाणा, बिहार और गुजरात को भी खरी-खरी सुनाई कि जब कम बारिश से किसान जूझ रहे हैं तो सही तथ्य पेश क्यों नहीं करते और खुद को सूखाग्रस्त घोषित करते? कोर्ट ने कहा कि इस मामले में पीने का पानी, पशु, फसल से लेकर कई अहम मुद्दे हैं जिन पर केंद्र को जवाब दे।

सूखे की मार की खबरें देशभर से आ रही हैं। महाराष्ट्र के कई इलाकों में पानी के लिए घंटों से लगी लम्बी कतारें लग रही हैं। ठाणे और आसपास के इलाकों में हर हफ़्ते 60 घंटे पानी की कटौती शुरू हो गई है। बच्चे स्कूल से जल्दी आ रहे हैं पानी भरने में मदद करने के लिए। महाराष्ट्र के औरंगाबाद में भी पानी की भारी किल्लत है। अब पानी के लिए झगड़े होने लगे हैं। ग्रामीण इलाकों में 2015 में ही 3,228 किसानों ने महाराष्ट्र में आत्महत्या की। मराठवाड़ा में पिछले 4 सालों से पानी की किल्लत है। पानी बंटने की जगहों पर धारा 144 लागू है।


मध्यप्रदेश के टीकमगढ़ में पानी की सुरक्षा के लिए बंदूकधारी सुरक्षा गार्डों की तैनाती की गई है। पानी की चोरी रोकने के लिए जामनी नदी पर ये लोग 24 घंटे पहरेदारी कर रहे हैं। पिछले तीन सालों से बुंदेलखंड में पानी की भारी किल्लत है जिसके इलाके उत्तर प्रदेश में भी आते हैं। चोरी रोकने लिए नगरपालिका ने सुरक्षा गार्ड तैनात किए हैं। बान्दा में से हर 10 में से 7 परिवार पलायन कर रहे है। पूर्वी उत्तर प्रदेश में देवरिया अपने भूजल के लिये जाना जाता था। 10 साल पहले तक यहां पानी 20 फीट की गहराई में मिल जाता था और अब 140 फीट पर मिल रहा है। बुन्देलखंड के कुछ इलाकों में तो इस बार रब्‍बी की फसल बोई ही नहीं गई। कृषि उत्पाद आधे हो गये हैं। उड़ीसा में किसानों ने सार्वजनिक तटबंधों को तोड़ कर अपनी फसलों को सींच रहे हैं।
 
कर्नाटक में कृष्णा सागर बांध सूख चुका है जिससे बेंगलुरु समेत कई इलाकों में पानी का संकट गहरा रहा है। केंद्रीय जल आयोग की साप्ताहिक रिपोर्ट के अनुसार देश भर के 91 बड़े जलाशयों में पानी का स्तर पिछले 10 सालों में सबसे कम है, 29 प्रतिशत से भी कम। उनकी देशभर के जलाशयों पर रिपोर्ट के अनुसार पूर्व के जलाशयों में 44%, मध्य भारत के इलाकों में 36%, दक्षिण भारत में 20%, पश्चिमी इलाकों में 26% और उत्तर के जलाशयों में 27% पानी है। सवाल सूखाग्रत राज्यों को कम फंड को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं। जहां महाराष्ट्र को अब तक राहत खर्च का सिर्फ 25 प्रतिशत दिया गया है, वहीं मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश, उड़ीसा, तेलंगाना को 8 प्रतिशत, छत्तीसगढ़ को 24 प्रतिशत दिया गया है।
 
केन्द्र ने सुप्रीम कोर्ट को बताया कि मनरेगा के तहत वो एक हफ्ते में 11,030 करोड़ राज्य सरकारों को देगी। 7983 करोड़ महनताना बकाया है। ....2723 करोड़ 10 सूखा प्रभावित राज्यों में मनरेगा के तहत काम करने वाले मजदूरों के लिए 50 दिन का अतिरिक्त काम दिया जायेगा। बकाया 3686 करोड़ का भी है जो मनरेगा के लिए प्रयोग में लाये गये सामान का है। सवाल मनरेगा के तहत कम काम देना और वेतन में देरी पर भी उठ रहे हैं। 2015-16 में मनरेगा के तहत औसतन 47.8 दिन काम दिया गया, जबकि प्रावधान 100 दिन का है। 100 दिन का काम देश भर में सिर्फ 4.8 प्रतिशत ही दिया गया। उत्तर प्रदेश में 2 प्रतिशत, छत्तीसगढ में 3.7 प्रतिशत, मध्य प्रदेश में 4.5 प्रतिशत, उड़ीसा में 4.6 प्रतिशत, कर्नाटक में 5.5 प्रतिशत। हालांकि महाराष्ट्र में में 12.2 प्रतिशत, तेलगाना में 7.3 प्रतिशत, आंध्र प्रदेश में 8 और झारखण्ड में 8.2 प्रतिशत दिया गया। काम भी इतना कम और उस पर मेहनताना भी देरी से, समझ सकते हैं कि क्या हालत हो रही है हमारे ग्रामीण भारत में रह रहे लोगों की। न पैसा न पानी, इस स्थिति से निवारण के लिए युद्ध स्तर पर पानी को सहेजने की ज़रुरत है.....सोचें और सहेजें पानी को!

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(निधि कुलपति एनडीटीवी इंडिया में सीनियर एडिटर हैं)

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण) : इस आलेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी विचार हैं। इस आलेख में दी गई किसी भी सूचना की सटीकता, संपूर्णता, व्यावहारिकता अथवा सच्चाई के प्रति एनडीटीवी उत्तरदायी नहीं है। इस आलेख में सभी सूचनाएं ज्यों की त्यों प्रस्तुत की गई हैं। इस आलेख में दी गई कोई भी सूचना अथवा तथ्य अथवा व्यक्त किए गए विचार एनडीटीवी के नहीं हैं, तथा एनडीटीवी उनके लिए किसी भी प्रकार से उत्तरदायी नहीं है।



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