NDTV Khabar

प्राइम टाइम इंट्रो : क्या सभी स्कूलों में एक ही किताब होनी चाहिए?

746 Shares
ईमेल करें
टिप्पणियां
प्राइम टाइम इंट्रो : क्या सभी स्कूलों में एक ही किताब होनी चाहिए?

प्रतीकात्मक चित्र

स्कूलों पर जनसुनवाई आज भी जारी है. गुजरात सरकार ने तो बकायदा कानून बनाकर नर्सरी से लेकर सीनियर सेकेंडरी स्कूलों में अधिकतम फीस की सीमा तय कर दी है. दिल्ली सरकार ने भी फीस तय करने के लिए नियामक संस्था बनाने की पहल की है मगर मंज़ूरी नहीं मिली है. यूपी सरकार के भीतर भी स्कूलों की फीस को लेकर सक्रियता दिख रही है. इंदौर में माता-पिता संघ ने एक फेसबुक पेज बनाया है. इस पेज पर लिखा है कि अगर आप स्कूलों की मनमानी से परेशान हैं और सरकार को उसकी ज़िम्मेदारी का अहसास दिलाना चाहते हैं तो इंदौर पेरेंट्स एसोसिएशन इस लड़ाई में आपके साथ है. आप आगे आइये. हमें बस सरकार को अहसास कराना होगा कि अब बस हुआ, स्कूलों से सांठगांठ बंद करो और जो फीस रेगुलेशन का कानून तैयार होकर मुख्यमंत्री जी की टेबल पर दबा पड़ा है, उसे जल्द से जल्द लागू करें.

आठ साल पहले मध्यप्रदेश सरकार ने एक ड्राफ्ट तैयार किया था. इंटरनेट में सर्च किया तो पता चला कि सरकार जल्दी कानून बनाने की सोच रही है. इन सब बातों से लग रहा है कि आने वाले दिनों में सरकारें इस मामले में भी कार्रवाई कर जनता में अपनी छवि बनाएंगी. भले ही अब तक पब्लिक की लड़ाई का नतीजा नहीं निकल रहा था, मगर ये सारी घटनाएं बता रही हैं कि कुछ हो सकता है. प्राइम टाइम की जनसुनवाई में सिर्फ माता-पिता का पक्ष रखेंगे. स्कूल और सरकार के प्रतिनिधि शुरुआती चरण में नहीं होंगे, इसलिए अनुरोध है कि बिना स्कूलों का नाम लिये और व्यक्तिगत आरोप लगाए अपनी बात कहें. समस्या बतायें ताकि सरकारों को लगे कि इस मामले में जनता कितनी परेशान है. कई बार परेशान माता-पिता बढ़ा-चढ़ा कर बोल देते हैं मगर फिर भी इन परेशान आत्माओं की पुकार सुनी जानी चाहिए. बेशक कई प्राइवेट स्कूल हैं जिन्होंने अच्छे मूल्य और शिक्षा का मानदंड कायम किये हैं. शायद इन्हीं अच्छे स्कूलों के नाम और ब्रांडिंग का फायदा उठाकर दूसरे पब्लिक स्कूल माता-पिता का शोषण कर रहे हैं. इसलिए चंद अच्छे प्राइवेट स्कूलों का लाभ उनके नाम पर या उनके बहाने प्राइवेट स्कूलों को दुकान बनाकर चला रहे लोगों को नहीं मिलना चाहिए.

गुरुवार को ग़ाज़ियाबाद ज़िला मुख्यालय के सामने अभिभावकों ने फीस वृद्धि को लेकर प्रदर्शन किया है. कई स्कूलों के अभिभावक इसमें शामिल हुए. हंगामा होता देख पुलिस ने भी मामले को संभालने की कोशिश की लेकिन लोग शांत नहीं हुए. ज़िलाधिकारी ने अभिभावकों के पैनल से मुलाकात की और कहा कि अगर स्कूल नहीं माने तो उनकी एन ओ सी कैंसिल कर दी जाएगी. एन ओ सी मतलब अनापत्ति प्रमाण पत्र. हमारे सहयोगी पिंटू तोमर ने बताया कि 12 स्कूलों के ख़िलाफ़ प्रशासन को शिकायत मिली है. प्रशासन ने कुछ स्कूलों को नोटिस भी भेजा है. जो स्कूल इस नोटिस का जवाब नहीं देगा, उनकी मान्यता समाप्त करने की सिफारिश की जाएगी. ये सिफारिश सीबीएसई से की जाएगी क्योंकि मान्यता के बारे में फैसला सीबीएसई ही लेता है. स्कूलों के बाहर होने वाला प्रदर्शन अब ज़िला मुख्यालय के बाहर पहुंच रहा है.

कानपुर में भी सेल्स टैक्स विभाग ने एक स्कूल में छापा मारा है. स्कूल पर यूनिफार्म और किताबें अधिक दाम पर बेचने के आरोप थे. हमने सेल्स टैक्स अधिकारी से बात की, उन्होंने बताया कि स्कूल के गोदाम में किताबें और नोट बुक मिली हैं, किताबों पर दाम लिखे थे लेकिन नोटबुक पर दाम नहीं लिखे थे. तो क्या स्कूल अपनी तरह से दाम चिपका कर मनमानी करना चाहता था.

आज की जनसुनवाई में हम किताबों को लेकर चर्चा करेंगे. हम आज की जनसुनवाई को किताबों की क़ीमतों पर केंद्रित रखना चाहेंगे. ज़्यादातर मां-बाप की शिकायत है कि स्कूल अपने भीतर की दुकान या बाहर की तय दुकान से ही किताब ख़रीदने के लिए मजबूर करते हैं. टाइम्स आफ इंडिया की 16 फरवरी 2017 की एक रिपोर्ट है. केंद्रीय मानव संसाधन मंत्री प्रकाश जावड़ेकर की अध्यक्षता में एक समीक्षा बैठक हुई थी. उसमें यह तय हुआ था कि सीबीएसई के स्कूलों को 2017-18 के सत्रों से एन सी ई आर टी की किताबों को अनिवार्य रूप से पढ़ाना होगा.  कई स्कूल और माता- पिता ने शिकायत की थी कि एन सी आई आरटी की किताबें उपलब्ध नहीं होती हैं. माता-पिता का कहना है कि एन सी ई आर टी की किताबें न होने के कारण प्राइवेट किताबें महंगे दाम पर बेची जाती हैं.

सीबीएसई की वेबसाइट पर 23 फरवरी 2017 का एक सर्कुलर है जिसमें लिखा है कि सीबीएसई मान्यता प्राप्त सभी स्कूलों से गुज़ारिश करती है कि जहां तक हो सके एन सी ई आर टी की किताबों का ही इस्तमाल करें. हमने आज की चर्चा के लिए एन सी ई आर टी की किताब की कीमत को न्यूनतम पैमाना बनाया है, फिर देखने का प्रयास किया है कि एक क्लास की एन सी ई आर टी की किताब और दूसरे प्रकाशनों की किताब की कीमतों में कितना फर्क है.

हमने नौवीं क्लास की गणित की किताब ली. एनसीईआरटी की किताब 130 रु की है. आरडी शर्मा ( धनपत राय पब्लिकेशंस ) की किताब 345 रुपये की है. आरएस अग्रवाल, वी अग्रवाल की किताब 392 रुपये की है. एमएल अग्रवाल (अविचल पब्लिकेशंस) की किताब 340 रुपये की है. यानी एन सी ई आर टी की जगह दूसरी किताब लेने पर छात्रों को 215 से 262 रुपये अधिक की कीमत की किताब ख़रीदनी पड़ती है. आठवीं क्लास (गणित) की एनसीईआरटी 50 रुपये में आती है. आरडी शर्मा ( धनपत राय पब्लिकेशंस) 385 रुपये,
आरएस अग्रवाल - 250 रुपये, ऑल इन वन मैथमेटिक्स - अरिहंत पब्लिकेशंस 295 रुपये, सिस्टमैटिक मैथमेटिक्स (सुल्तान चंद पब्लिकेशंस) 285 रुपये. यानी एन सी ई आर टी की किताब न हो तो छात्र को दूसरी किताब के लिए 200 से 335 रुपये अधिक देने पड़ेंगे. छठी क्लास (अंग्रेज़ी). एनसीईआरटी की Honeycomb - 50 रुपये, Full marks - English - 260 रुपये, ऑल इन वन - इंग्लिश - 225 रुपये.

यही नहीं हमें पता चला कि छात्र पुरानी किताब का इस्तमाल न करे इसके लिए हर साल नई-नई तरकीब निकाली जाती है. पुरानी किताब बेकार हो जाए इसलिए नई किताब में एक नया चैप्टर जोड़ दिया जाता है. हर साल पुराने प्रकाशक बदल दिये जाते हैं ताकि छात्र नई किताब लेने पर मजबूर हों. स्कूल के भीतर की दुकान से किताब ख़रीदने के लिए मजबूर किया जाता है. बाहर की दुकान होती है तो वो भी स्कूल ही तय करता है कि कहां से लेनी है. कई जगहों पर इस तरह की दुकानें रसीद भी नहीं देतीं, रजिस्टर में नोट कर लेती हैं.

कई स्कूलों ने तो अपनी किताबें छापनी शुरू कर दी है. वे प्रकाशक भी बन गए हैं. और भी दूसरे तरीके हैं तो प्लीज़ हमें बताइये. हम इस जनसुनवाई में शामिल करेंगे. एक सज्जन ने बताया कि हमें तो सैलरी मिलती है एक महीने की, लेकिन स्कूल को तीन महीने की फीस देनी होती है. तीन-तीन महीने की एकमुश्त फीस कहां से कोई दे. वैसे भारत के ज़्यादातर माता-पिता मज़े-मज़े में दे रहे हैं, लेकिन जो आवाज़ उठा रहे हैं उन्हें सुनकर लग रहा है कि तकलीफ तो है.

कल हमने आपको बताया था कि लखनऊ में एक स्कूल है जो पत्रकारों को चालीस फीसदी का डिस्काउंट देता है. आज हमारे एक मित्र ने बताया कि नोएडा में अथॉरिटी के कर्मचारियों के बच्चों को फीस न के बराबर लगती है या अच्छा खासा डिस्काउंट मिलता है. मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को इसकी जांच करानी चाहिए. अगर सही है तो पत्रकारों को मिलने वाली सुविधा भी बंद हो और कर्मचारियों को छूट भी क्योंकि इसी वजह से जब माता-पिता शिकायत करते हैं तो अथॉरिटी में सुनवाई नहीं होती. आज हमारा फोकस स्कूली किताबों पर है, फिर भी एक सज्जन ने बताया कि उनके बच्चे का एडमिशन हुआ तो चार महीने की फीस के साथ 50,000 रुपये दिये. बाद में खाना देने के नाम पर छह हज़ार रुपये मांगे गए, मगर रसीद नहीं दी गई. कहीं ऐसा तो नहीं कि स्कूलों के भीतर काला धन पैदा किया जा रहा है. यूपी के एक स्कूल में जनरेटर मेंटेनेंस फीस लिया जाता है. केजी क्लास के बच्चे के लिए मैगज़ीन फीस ली जाती है.

ट्रांसपोर्ट और यूनिफॉर्म का मसला भी काफी बड़ा है लेकिन उस पर जनसुनवाई किसी और दिन होगी. एक-एक कर समझना होगा कि हो क्या रहा है. हमने स्कूलों का नाम लेने से मना किया है, क्योंकि फिर वो वकीलों के ज़रिये सक्रिय हो जाते हैं, अपना पक्ष रखने के नाम पर इन आरोपों को खारिज कर देते हैं. उनकी भी बारी आएगी, लेकिन पहले हम माता-पिता की पीड़ा सुनेंगे, फिर अलग से उन्हें भी मौका देंगे.


Hindi News से जुड़े अन्य अपडेट लगातार हासिल करने के लिए हमें फेसबुक और गूगल प्लस पर ज्वॉइन करें, ट्विटर पर फॉलो करे...

Advertisement