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सीन दर सीन समीचीन समीक्षा

इस गीत के तीनों वर्ज़न को शोधार्थी कुमार ने ध्यान से देखा और सुना है. किसी में एक अंतरा कम है तो किसी में दूसरा अंतरा ग़ायब है. तीनों वर्ज़न में नायिका रंजीता कौर उदास प्रवृत्ति की लगती हैं.

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सीन दर सीन समीचीन समीक्षा
गीतवेत्ताओं को प्रस्तुत गीत के यू ट्यूब में तीन तीन वर्ज़न मिले हैं. गीतवेत्ता पुरातत्ववेत्ताओं के अनुज हैं. ऐसा प्रतीत होता है कि निर्देशक सांगल पूरी फ़िल्म में इसी गाने को फ़िल्माते रह गए. फ़िल्म की कहानी बच ही गई है जिसे लेकर दूसरी फ़िल्म बनाने की बात सामने आ सकती है. शोध जारी है. 1980 में आई आप तो ऐसे न थे फ़िल्म के इस गाने की सामयिक और समीचीन समीक्षा बेहद ज़रूरी है.

इस गीत के तीनों वर्ज़न को शोधार्थी कुमार ने ध्यान से देखा और सुना है. किसी में एक अंतरा कम है तो किसी में दूसरा अंतरा ग़ायब है. तीनों वर्ज़न में नायिका रंजीता कौर उदास प्रवृत्ति की लगती हैं. पार्टी हो या पार्क दोनों जगहों पर रंजीता अनमने ढंग से तैयार होकर आती हैं. इसलिए पार्टी में उनके परिधान आउट ऑफ प्लेस लगता हैं. वो भी कारण हो सकता है उदासी का. मगर मूल कारण उनके मन का बंटा होना लगता है. रंजीता राज और दीपक लेकर भ्रमित हैं. दीपक के साथ होती हैं तो राज को मिस करती हैं, राज के साथ होती हैं तो दीपक को मिस करती हैं. जैसे व्हाट्स अप के ज़माने में मन कुछ और होता है और प्रोफाइल की डीपी की तस्वीर कुछ और होती है_

पहले वर्ज़न में रंजीता नेहरू पार्क में गई हैं. उसी पार्क में जहां यूट्यूब में राज के साथ इसी गाने का एक दूसरा वर्ज़न मिलता है. इस गाने का भाव बता रहा है कि राज उनकी ज़िंदगी में इस क़दर शामिल हो गया है कि दीपक के लिए रास्ता ही नहीं बचता है. फिर भी खुल कर तो कहती हैं कि अब दीपक के आने का टाइम है और राज के जाने का. इस वर्ज़न में रंजीता के गुलाबी सैंडल का क्लोज़ अप अच्छा नहीं लगा. सैंडल की बेल्ट ठीक से बंधी नहीं लगी. रंजीता को इस पार्क में राज की याद आ रही है. उन्हें हर फूल और पेड़ में राज ही दिखते हैं. यहां तो वे दीपक के साथ आने की सोच भी नहीं सकती. दीपक में भी राज नज़र आने लगेंगे. जो भी है गाने के इस छोटे से अंतरे के बहाने उदास रंजीता कम से कम पार्क में टहल तो आती हैं. शायद मन अच्छा हुआ होगा.

हरेक फूल किसी याद सा महकता है
तेरे ख़्याल से जागी हुई फ़िज़ाएं हैं
ये सब्ज़ पेड़ें हैं या प्यार की दुआएं हैं
तू पास हो कि नहीं फिर भी तू मुकाबिल है
जहां भी जाऊं ये लगता है तेरी महफ़िल है

यूट्यूब में इस गाने का जो दूसरा वर्ज़न मिला है वो उसी पार्क का है जहां रंजीता अकेले इस गाने को गा रही हैं. दूसरा वर्ज़न पहले फिल्माया गया होगा मगर शोधार्थी कुमार की समीक्षा में बाद में आया है. प्रस्तुत गाने में रंजीता तो ठीक से बैठी हैं. मगर राज इस तरह से बैठे हैं जैसे देख रहे हों रंजीता को और चिंता हो रही हो कि कहीं पतलून न फट जाए. ख़ैर वे जल्दी उठ जाते हैं और रंजीता को लेकर चलने लगते हैं. इस गाने में भी रंजीता उदास हैं. संयमित हैं. हल्का मुस्कुराती हैं. तभी राज कंधे पर टेप रिकार्डर उठा लेते हैं. दर्शक को शक होता है कि रेडियो बज रहा है या राज गा रहे हैं. गाने के एक सीन में राज रंजीता को एक हाथ से गले लगाते हैं मगर दूसरे हाथ से टेप रिकार्डर कंधे पर उठाए हुए हैं. आज के प्रेमी की तरह. दामन के एक हिस्से में प्रेमिका और दूसरे हिस्से में स्मार्टफोन. सेल्फी लेने की आदिम मुद्रा की पहचान इस सीन से की जा सकती है. राज ख़ुश हैं. उन्हें रंजीता के आने से हर चीज़ अपनी जगह पर लगती है. ऐसा लगता है कि वे पार्क में भी अपने घर की कल्पना कर रहे हैं कि प्यार के बाद ये घर संभाल देगी.

ये आसमान ये बादल ये रास्ते ये हवा
हरेक चीज़ है अपनी जगह ठिकाने से
कई दिनों से शिकायत नहीं ज़माने से
ये ज़िंदगी है सफ़र तू सफ़र की मंज़िल है
जहां भी जाऊं ये लगता है तेरी महफ़िल है
तू इस तरह से मेरी ज़िंदगी में शामिल है

अचानक से एक सीन में राज स्लो मोशन में दौड़ते आते हैं. मुझे लगता है कि किसी गड्ढे में कूद जाएंगे मगर जल्दी ही ज़मीन पर आ जाते हैं. उधर रंजीता भी अपने शरारे को संभाले स्लो मोशन में दौड़ती आती हैं. दोनों गाने में नायिका के लिबास में गुलाबी रंग की निरंतरता बनी हुई है.

हिन्दी सिनेमा का नायक बहुत जल्दी में रहता है. नितांत एकांत के क्षणों में भी सुहागरात के सेट की कल्पना करने लगता है. बीच पार्क में रात की रानी के फूलों की माला लटक आती है. राज रंजीता को घूंघट पहना कर देखते हैं कि दुल्हन के रूप में जमेगी कि नहीं. ऐसे प्रेमी को रंजीता छोड़ ही देती तो अच्छा रहता. कम से कम दीपक के साथ पार्क की जगह पार्टी में डांस करने का मौका तो मिलता.

हरेक शै है मोहब्त के नूर से रौशन
ये रौशनी जो न हो ज़िंदगी अधूरी है
रहे वफा में कोई हमसफ़र ज़रूरी है
ये रास्ता कहीं तन्हा कटे तो मुश्किल है
जहां भी जाऊं ये लगता है तेरी महफिल है

शोधार्थी कुमार को रहे वफ़ा में कोई हमसफ़र ज़रूरी है पंक्ति से एतराज़ है. राज कमिटमेंट मांग रहे हैं. निष्ठा की शर्त रख रहे हैं. प्रेम की शुरुआत शर्त से नहीं होती. तभी रंजीता उदास हैं कि ये प्यार तो करता है मगर कमिटमेंट क्यों मांग रहा है. वफ़ा में रहना ही क्यों ज़रूरी है प्रेम में रहने के लिए. पुराने ख़्याल का नायक है. नारीवाद पूर्व युग का नायक है. तभी पार्टी वाला वर्ज़न शुरू होता है.

गाने की शुरुआत शानदार डांस से होती है. इस शैली का नृत्य कई हिन्दी गानों में देखा गया है. गीतवेत्ताओं के अनुसार निर्देशक ने अपने गाने के तीसरे वर्ज़न को नया बनाने के लिए दूसरे गानों से आइडिया चुराते हैं. एक गाने को तीन बार शूट करेंगे तो आइडिया कम पड़ ही जाएगा.

ख़ैर टैप डांस हो रहा है. राज बब्बर अचानक भकुआ जाते हैं. जैसे संडे की न्यूज़ अगले मंडे को मिली है. अब इसी गाने को दीपक गाते हैं तो रस डाल देते हैं. एकांत के गाने को महफ़िल मोड में बदल देते हैं. रंजीता यहां भी भ्रमित और उदास लगती हैं. नर्तकी बिना बात के बीच में नृत्य किए जा रही है. सारा मामला राज, रंजीता और दीपक के बीच का है. वो किसी कोण से सीन में है ही नहीं, बस कैमरे में आ जाती है.
तेरे बग़ैर जहां में कोई कमी सी थी
भटक रही थी जवानी अंधेरी राहों में
सुकून दिल को मिला आके तेरी बाहों में
मैं एक खोई हुई मौज तू साहिल है
जहां भी जाऊं ये लगता है तेरी महफिल है

राज का चेहरा देखने लायक है. इस बार राज के चेहरे की दुनिया उजड़ जाती है. उनके चेहरे का भाव बताता है कि इसी सीन में राज फिल्म छोड़ कर यूपी कांग्रेस का अध्यक्ष बनने का फैसला कर लेते हैं. जब असफ़ल ही रहना है तो सीन में क्यों, सियासत में क्यों नहीं. राज का दिमाग़ घूम रहा है कि रंजीता तो उनकी ज़िंदगी में शामिल थी, दीपक की लाइफ में कब शामिल हो गई. शायद यही जीवन है. यही पॉलिटिक्स है. एक की कमी पूरी होती है तो दूसरी की हो जाती है.

इस गाने में समाज की क्रूरता का प्रमाण मिलता है. जिस गाने को सुनकर राज, दीपक और रंजीता की ज़िंदगी हिल गई है, उस गाने को वो सिर्फ म्यूज़िक समझते हैं. राज यहां रंजीता की बेवफाई को गेस कर रहे हैं और बाकी लोग डांस कर रहे हैं. जिसने जिसे पकड़ लिया है, उसे छोड़ नहीं रहा है. अपना अपना डांस किए जा रहे हैं. दीपक आज के ज़माने के प्रेमी हैं. उन्हें सिर्फ फ्रेम में अपनी तस्वीर चाहिए. रंजीता साथ नहीं है, उदास है फिर भी डांस वांस करके चले गए. वहीं राज अभी तक इसी चक्कर में पड़े हैं कि आप तो ऐसे न थे!

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नोट- इस गाने को देखें. आपकी प्रतिक्रिया चाहिए कि सीन दर सीन समीचीन समीक्षा कैसी लगी. मैं हर हफ्ते शोधार्थी कुमार की भूमिका में हाज़िर होना चाहता हूं. ये मेरा पुराना शौक है कि वीडियो की लाइव कमेंट्री करूं.

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण) : इस आलेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी विचार हैं. इस आलेख में दी गई किसी भी सूचना की सटीकता, संपूर्णता, व्यावहारिकता अथवा सच्चाई के प्रति NDTV उत्तरदायी नहीं है. इस आलेख में सभी सूचनाएं ज्यों की त्यों प्रस्तुत की गई हैं. इस आलेख में दी गई कोई भी सूचना अथवा तथ्य अथवा व्यक्त किए गए विचार NDTV के नहीं हैं, तथा NDTV उनके लिए किसी भी प्रकार से उत्तरदायी नहीं है.


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