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फुटबॉल बन गई गोरखपुर की जिम्मेदारी

अपने बचाव में सरकार ने जो-जो कहा क्या वह वही नहीं है जो वह हर मामले में करती है. भले ही सबकुछ पहले जैसा ही हो रहा हो फिर भी इसमें एक नई बात है.

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फुटबॉल बन गई गोरखपुर की जिम्मेदारी
नई दिल्ली:

गोरखपुर कांड में बच्चों के मरने के बाद सरकार अपने गुनाह को नकारती जा रही है. लेकिन उसे अपनी छवि की चिंता जरूर परेशान करती रही. अपने बचाव में सरकार ने जो जो कहा क्या वह वही नहीं है जो वह हर मामले में करती है. भले ही सबकुछ पहले जैसा ही हो रहा हो फिर भी इसमें एक नई बात है. वह ये कि यूपी में सरकार नई नई है. और ऐसी सरकार है जो भारी भरकम वायदों नारों और पुरानी सरकार की छीछालेदर करती हुई सत्ता में आई है. इसीलिए गोरखपुर कांड के तमाम पहलुओं में एक यह पहलू देखने की दरकार है कि इसमें सरकार कहां कटघरे में है.

कौन उठाए ऐसी शर्मिंदगी
यह शर्मिंदगी किस किस के लिए है? शासन की या प्रशासन की या प्रबंधन के लिए? जब भी कोई अफे दफे होती है, शासन पल्ला झाड़कर प्रशासन पर जांच बैठाने की बात करने लगता है. और प्रशासन अपने को सरकार से कम नहीं मानता. प्रशासन इसका ठीकरा प्रबंधन पर फोड़ता है. पिछले दो दिन से इस कांड में क्या यही नहीं हो रहा है?

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शासन
शासन यानी यूपी सरकार इस कांड में अपनी तरफ से हुई लापरवाही के आरोप को पूरा ज़ोर लगाकर नकार रहा है. वैसे स्वतंत्र भारत का राजनीतिक इतिहास रहा है कि सरकारें कभी भी अपनी कमी या भूल या जानबूझ कर हुए काम के लिए खुद पर लगे आरोप को नहीं स्वीकारतीं. वैसे कुछ उदाहरण हैं मसलन एक टेन दुर्घटना के लिए रेल मंत्री बिना मांगे ही नैतिक आधार पर इस्तीफा दे दिया करते थे. उसके बाद जनता खुद यह कहने लगती थी कि इसमें मंत्री का क्या दोष? सरकार का इकबाल उसकी बेगुनाही की वकालत से नहीं उसके नैतिक बोध से बुलंद होता था. आजादी के अब तक के इतिहास में राजनीतिक प्रायश्चित की भाषा कम से कम यह तो थी ही कि शासन अपने मातहत प्रशासन की ग़लती को अपनी ग़लती मान लेता था. लेकिन इधर प्रशासन के खिलाफ शासन की भाषा ऐसी दिखने लगी है कि जैसे प्रशासन उसका अपना अंग ही नहीं है. क्या यह एक प्रत्यक्ष तथ्य नहीं है कि किसी मुख्य मंत्री या प्रधान मंत्री के आते ही छांट छांट कर प्रशासकों को बदला जाता है. प्रशासकों को ही क्या उसके नीचे हर स्तर पर चपरासी और अर्दली तक कोई भी नई सरकार अपनी पसंद अपनी ज़रूरत के लिहाज़ से बदलती है. इसका तर्क यही है कि हर अच्छे बुरे की जवाबदेही सरकार की है सो उसे अपने माकूल अफसर और कर्मचारी चाहिए. लेकिन गोरखपुर कांड ने एक नया चलन पैदा किया है कि प्रशासन के गुनाह को शासन अब अपना गुनाह नहीं मानता.

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प्रशासन
कुछ वर्षों में स्वास्थ्य सेवा के प्रशासन की शक्ल तेजी से बदली है. अब मेडि‍कल प्रोफेशनल की बजाए ठेठ प्राशसन को तरजीह है. सचिवालय में तो नौकरशाह ही बैठते हैं लेकिन अब स्वास्थ्य महानिदेशालय में मेडिकल प्रोफेशनल के अलावा ठेठ नौकरशाहों को बैठाया जाने लगा. यानी मेडीकल प्रोफेशनल तो प्रबंधक की भूमिका में आते ही जा रहे थे. अब प्रशासन भी प्रबंधक बनता चला जा रहा है. ऐसा प्रबंधक जो अपने मालिक यानी शासक की इच्छा या जरूरत के अलावा एक इंच बात भी शासन के सामने नहीं बोल पाता. कहने वाले विद्वान तो आजकल उन्हें पॉलिटिकल एजेंट के अलावा और कुछ नहीं मानते. छोटे छोटे भुगतान के लिए और छोटे छोटे सप्लाई ऑर्डर के लिए ये प्रशासक खुद फैसले ले सकें इसकी गुंजाइश ही घटती चली गई. और हद ये है कि शासन की इच्छा या ज़रूरत के दबाव में लिए फैसलों को मज़बूरी में प्रशासकों को यह मानना पड़ता है कि ये उनके खु़द के फैसले हैं. प्रशासन की ऐसी विवशता को क्या यह नहीं मान लेना चाहिए कि प्रशासन का हर काम शासन का ही काम है.

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प्रबंधन
गोरखपुर कांड में अगर मेडि‍कल कॉलेज के प्रिंसिपल के काम का अंदाजा करें तो वे एक प्रबंधक के अलावा और क्या काम कर पा रहे होंगे. पहले मेडीकल कॉलेज का प्रिंसिपल आमतौर पर किसी विभाग के वरिष्ठ प्रोफेसर को बनाया जाता था. बाद में ये नियुक्तियां राजनीतिक इच्छा से होने लगीं. बदलाव के लक्षण बता रहे हैं कि वह दिन दूर नहीं जब मेडिकल कॉलेज के शीर्ष पदों पर भी राजनीतिक नियुक्तियां होने लगें. बहुत पीछे जा कर देखें तो प्रदेश में सिंचाई या सार्वजनिक निर्माण या स्वास्थ्य का सचिव कोई आईसीएस या आईएएस नहीं बल्कि संबधित क्षेत्र का विशेषज्ञ हुआ करता था. बाद में ऐसा होने लगा कि अब शीर्ष पद वाले स्वास्थ्य महानिदेशक की हैसियत तक एक महाप्रबंधक से ज्यादा नहीं बची. महाप्रबंधक को तो फिर भी स्वतंत्र निर्णय लेने की छूट होती है लेकिन उसके लिए तो एक प्रबंधक या उप प्रबंधक की तरह छोटा मोटा फैसला लेने की गुंजाइश नहीं बची. तो फिर मेडीकल कॉलेज के प्रिंसिपल की क्या हैसियत बची होगी इसका अंदाजा लगाना मुश्किल नहीं है. बहरहाल गोरखपुर कांड में ऐसे प्रशासकनुमा प्रबंधकों को जवाबदेही के कटघरे में हम कैसे खड़ा कर पाएंगे.

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यानी मुश्किल है ज़िम्मेदारी तय होना
गोरखपुर कांड में सरकार की जवाबदेही सुनिश्चित करना लगभग उतना बड़ा और मुश्किल काम है जितना बड़ा काम पूरी दूनिया में भ्रष्टाचार खत्म करना माना जाता है. गोरखपुर कांड में सरकार खुद को कितना भी बेगुनाह बताए लेकिन वह चिंतित तो दिखती है. इस कांड को एक मुद्दे की तरह अपने आप ही मर जाने के लिए नहीं छोड़ा गया. चिंता क्यों न हो क्योंकि लोकतांत्रिक सरकार के सामने अपनी जन हितैशी छवि को बनाना, बनाए रखना यानी छवि की रक्षा करने का काम सातों दिन चैबीसों घंटे रहता है. गोरखपुर कांड सरकार की छवि को इतना ज्यादा नुकसान पहुंच गया है कि यूपी के स्वास्थ्य मंत्री लाख कहते रहें कि गोरखपुर में इस अस्पताल में अगस्त के महीने में इतने बच्चे तो हर साल मर जाते हैं, फिर भी इस उपाय से इस छवि नाशक कांड का प्रतिकार हो नहीं पाएगा. क्योंकि ऑक्सीज़न के बग़ैर साठ से ज्या़दा बच्चों के दम घुटकर मरने की खबरों ने जनमानस को हिला दिया है. इधर स्वास्थ्य मंत्री ने इस कांड को एक सामान्य घटना में तब्दील करने की कोशिश की है. सो अब जिम्मेदारी तय करने की बात ही बहुत पीछे चली गई है.
        
सुधीर जैन वरिष्ठ पत्रकार और अपराधशास्‍त्री हैं...

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