Listen to the latest songs, only on JioSaavn.com
NDTV Khabar

देश की माली हालत को लेकर ऊहापोह में तो नहीं है सरकार...?

 Share
ईमेल करें
टिप्पणियां
देश की माली हालत को लेकर ऊहापोह में तो नहीं है सरकार...?

आखिर मंदी का अनौपचारिक ऐलान अपने देश में भी होने लगा। गुरुवार को शेयर बाज़ार गिरते-गिरते दहशत की हालत तक पहुंच गए। एक ही दिन में निवेशकों के तीन लाख करोड़ रुपये उड़ गए। अगले दिन बाज़ार कुछ चढ़ने की बजाए फिर गिरने लगा है। अब जिनका कारोबार उम्मीदें बंधाने से ही चलता है, वे इसका कोई न कोई तर्क आसानी से दे देंगे, लेकिन कारोबार में उतार-चढ़ाव को 'स्वाभाविक' बताने वाले इन लोगों को बताया जा सकता है कि पिछले एक साल में निवेशकों को अपनी पूंजी कम से कम 15 फीसदी बढ़ने की 'जायज़' उम्मीद थी, लेकिन बढ़ने की बजाए उनकी रकम 25 फीसदी घट गई।

वैसे, शेयर बाज़ार में देश के औसत नागरिक भाग नहीं लेते, लेकिन देश का कारोबार इन्हीं निवेशकों के पैसे से चलता है, इसीलिए शेयर बाज़ार को एक मायने में देश की माली हालत का सूचकांक भी समझा जाता है। सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि देश के मुश्किल माली हालात में सरकार का रुख साफ समझ में नहीं आ रहा है।

बजट पेश होने का महीना है यह...
शेयर बाज़ार की यह हालत कोई एक दिन की ही बात नहीं है। इस हफ्ते के शुरू से ही रोज बाज़ार गिर रहा था। एक महीने का रुख देखें तो 10 फीसदी गिरा। 11 महीनों को देखें तो यह गिरावट 23 फीसदी है। विश्लेषक लगातार उम्मीद बंधाते रहे। गुरुवार को एक साथ 800 अंकों की गिरावट के कारणों पर विश्लेषक रटे-रटाए कारण ही बोलते रहे। हालांकि शाम तक उन्हें भी कहना पड़ा कि अंतरराष्ट्रीय कारणों के अलावा देश के सरकारी बैंकों की हालत पता चलने से भी निवेशकों में दहशत फैली। यहां गौर करने लायक सबसे खास बात यह है कि यह बजट पेश होने का महीना है। यानी यह अंदेशा क्यों नहीं जताया जा सकता कि बजट की दिशा मोड़ने के आसान तर्क मिल गए हैं।


बैंकों की चिंताजनक हालत...
बैंकों की पतली हालत आने वाले समय में बड़े खतरे का सायरन बजा रही है। उनकी बहुत बड़ी रकम बट्टेखाते में चली गई है, जिसे वे अपनी तकनीकी भाषा में एनपीए, यानी वसूली नहीं हो पाने वाला कर्ज़ कहते हैं। पूरे आसार हैं कि इस बजट में बैंकों को सहारा देने की बातें उठनी शुरू हो जाएंगी। रिज़र्व बैंक के गवर्नर ने तो बैंकों की ऐसी दशा पर बेहोशी की दवा तक का ज़िक्र कर दिया है। ज़ाहिर है, आने वाले हफ्ते में देश के गांव, किसान, खेती-सिंचाई के लिए पानी, खेतिहर मजदूरों के लिए रोज़गार जैसे ज़रूरी कामों की बातें कम होने का माहौल बनता जा रहा है।

दोगुने हाईवे और सस्ते मकानों की योजनाओं के ऐलान का मतलब...
बजट पेश होने के महीने में अचानक बड़ी-बड़ी योजनाओं की याद दिलाने का क्या मतलब निकाला जा सकता है...? इसी हफ्ते सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्री नितिन गडकरी ने कहा कि हमारी सरकार हाईवे वाली सड़कें बढ़ाकर दोगुनी करने वाली है। जहां भोजन-पानी के न्यूनतम प्रबंध के लिए पैसे का रोना रोया जाता रहा हो, वहां एक खास किस्म का इतना बड़ा लक्ष्य हासिल करने के लिए क्या-क्या नहीं करना पड़ेगा। अगले ही दिन उन्होंने देश की 30 फीसदी आबादी को पांच लाख रुपये वाले मकान बनाकर देने की योजना बताई। इसमें कोई शक नहीं कि सुनने में यह बात भी बड़ी आकर्षक है, लेकिन इसके लिए भी पैसे के इंतज़ाम की बात उठेगी। देश के 30 फीसदी परिवारों की हैसियत भी क्या बैंकों से कर्ज़ दिलाकर बनाई जा सकती है। और फिर अभी साफ-साफ हमें यह पता नहीं है कि जिन-जिन प्रदेशों में सस्ते मकान या कमज़ोर तबके के लोगों के लिए मकान बनाए गए, उनकी स्थिति क्या है। चलिए, आगे-पीछे केंद्र सरकार की ऐसी योजनाओं का खाका भी जानने का मौका मिलेगा। तभी पता चलेगा कि सरकार पांच लाख रुपये वाला मकान किस जगह बनाकर देगी, और पैसे का इंतजाम किससे करवाएगी।

स्मार्ट सिटी में कचरे के प्रबंधन की चिंता का ऐलान...
इसी हफ्ते केंद्रीय मंत्री प्रकाश जावड़ेकर ने कचरा प्रबंधन के नियमन की सूचना दी। गनीमत है, उन्होंने प्रधानमंत्री की तरह पूरे देश में ही कचरा प्रबंधन के काम को नहीं जोड़ लिया, और सिर्फ स्मार्ट सिटी तक ही सीमित रखा। लेकिन बजट के महीने में इसका ज़िक्र हमें अटकलें लगाने का मौका तो देता ही है कि ठोस कचरा प्रबंधन के भारी खर्चे वाले काम को भी छोड़ा नहीं जा रहा है। यह वैसा काम है, जिसके लिए एक से बढ़कर एक प्रौद्योगिकविदों ने पिछले 25 सालों में एक से एक नायाब तरीके सुझाए, लेकिन सभी इतने खर्चीले थे कि हर बार सरकार की हैसियत से बाहर के निकले।

ईमानदारी से प्राथमिकताएं देखने की ज़रूरत...
निवेशकों की हालत, बैंकों की हालत, किसानों की बदहाली, विदेशी निवेश आने का इंतज़ार करते-करते पूरा साल गुज़र जाना, भारतीय रुपये की कीमत दिन-ब-दिन सनसनीखेज़ तौर पर घटते जाना, मंदी की आहट के बाद अब उसके ऐलान की तैयारियां होने लगना क्या संकट में घिरने के सबूत नहीं हैं। दिन-दूनी-रात-चौगुनी रफ्तार से बेरोज़गारों की भीड़ बढ़ते जाना, थोड़ी-सी कम बारिश में पूरे देश में अनाज और दालों के उत्पादन में कमी के अंदेशे जताए जाना ऐसे हालात हैं, जब सरकार को एक बार ईमानदारी और इत्मीनान से बैठकर देश की प्राथमिकताओं को तय कर लेना चाहिए।

टिप्पणियां

सुधीर जैन वरिष्ठ पत्रकार और अपराधशास्‍त्री हैं...

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण) : इस आलेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी विचार हैं। इस आलेख में दी गई किसी भी सूचना की सटीकता, संपूर्णता, व्यावहारिकता अथवा सच्चाई के प्रति एनडीटीवी उत्तरदायी नहीं है। इस आलेख में सभी सूचनाएं ज्यों की त्यों प्रस्तुत की गई हैं। इस आलेख में दी गई कोई भी सूचना अथवा तथ्य अथवा व्यक्त किए गए विचार एनडीटीवी के नहीं हैं, तथा एनडीटीवी उनके लिए किसी भी प्रकार से उत्तरदायी नहीं है।



दिल्ली चुनाव (Elections 2020) के LIVE चुनाव परिणाम, यानी Delhi Election Results 2020 (दिल्ली इलेक्शन रिजल्ट 2020) तथा Hindi News से जुड़े अन्य अपडेट लगातार हासिल करने के लिए हमें फेसबुक पर लाइक और ट्विटर पर फॉलो करें.


 Share
(यह भी पढ़ें)... शाहीनबाग के प्रदर्शनकारियों ने अमित शाह पर लगाया वादाखिलाफी का आरोप, गृह मंत्री के घर का घेराव करने की चेतावनी

Advertisement