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सुधीर जैन : इस बार बजट के तराजू पर होंगे गांव और शहर

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सुधीर जैन : इस बार बजट के तराजू पर होंगे गांव और शहर

प्रतीकात्मक तस्वीर

बजट का खाका बनकर तैयार हो गया होगा। बजट पेश होने में सिर्फ तीन हफ्ते ही बचे हैं। इस लंबे चौड़े दस्तावेज में तथ्यों और आंकड़ों में किसी गलती को ठीक करने के लिए बहुत सारे अफसरों की निगाह से गुजरना पडता है। प्रूफ रीडिंग और छपाई का काम भी वक्त मांगता है। वैसे इस बार बजट बनाने के काम की हलचल बहुत देर से दिखाई दी। केंद्रीय वित्त मंत्री प्रदेशों के वित्त मंत्रियों से 6 फरवरी तक मुलाकात की रस्म निभा पाए। इसी आधार पर यह अटकल लगाई जा सकती है कि वित्त मंत्रालय को हिसाब लगाकर यह दस्तावेज पेश करने में मुश्किल आ रही होगी। बहुत संभव है कि अभी भी तय हो रहा हो कि अगले साल के लिए किस मद में कितना खर्च करें। खासतौर पर देश में खेती बाड़ी की बुरी हालत, गांवों में बढ़ती बेरोजगारी, वैश्विक मंदी के बीच पस्त पड़े देसी उद्योग धंधे और शहरों में शिक्षित-प्रशीक्षित बेरोजगार युवाओं की बढ़ चुकी भारी भरकम भीड़ इस बार के बजट बनाने में सबसे बड़ी चुनौतियां हैं।

संयोग से एक आसानी भी है इस बार
अब से पहले हर सरकार के सामने कच्चे तेल के दाम सबसे बड़ी मुश्किल के तौर पर होते थे। डीजल पेट्रोल के दाम तय करना किसी भी सरकार के लिए बड़ा सरदर्द होता था। इस साल कुछ अंतरराष्ट्रीय कारकों से और कुछ मंदी के दुर्योग से कच्चे तेल के दाम इतने नीचे गिर पड़े हैं कि इस बार मौजूदा सरकार को बड़ी आसानी है। इस मद की अच्छी खासी रकम सरकार के पास आई है और बेशक बजट का काम आसान हुआ है। लाखों करोड़ की इस बचत को डीजल पेट्रोल के दाम घटाने की बजाए आधुनिक तरीकों से सड़क बनाने जैसे काम पर लगाया गया। यानी, आधारभूत ढांचे के एक भारी भरकम काम पर तेल का पैसा लगा लिया गया। बेशक इससे बजट पर बोझ कुछ कम हो गया है।


सुशासन के दावों की परख का मौका
टूजी थ्रीजी के आवंटन, कोयला खदानों के आवंटन और सुशासन के दूसरे उपायों से राजस्व बढाने के दावों की परीक्षा की घड़ी आने वाली है। बजट पेश होने का पर्व खास मौका होता है। इस मौके पर अगर मगर का इस्तेमाल आसान नहीं होता। लिहाजा इस दस्तावेज में शब्द नहीं, आंकड़े पेश करने पड़ेंगे कि बजट का आकार कितना बढ़ा। अगर सुशासन के दावों को सही मान कर चलें तो इस बार बुरी से बुरी हालत में भी बजट के आकार में 35 से 50 फीसद बढ़ोतरी हो जानी चाहिए। यानी, छह से लेकर आठ लाख करोड़ रुपए की बढ़त अनुमानित है। अब सवाल यह उठता है कि इसे कहां कहां कितना कितना खर्च किया जाना चाहिए। कृषि के लिए कितनी रकम दें? स्मार्ट सिटी के लिए कितना दें और हाई वे को कितना? जल प्रबंधन परियोजनाओं के लिए कितनी रकम रखें और मनरेगा के लिए कितनी? और फिर साल भर के भीतर ही बढ़ गए डेढ़ से दो करोड़ बेरोजगारों को काम धंधे पर लगाने के काम पर कितना खर्च करें?

सबसे पहले खेती किसानी पर ध्यान जाएगा ही...
देश की माली हालत कितनी भी पुख्ता साबित की जाए लेकिन इस बात से तो कोई इनकार कर ही नहीं सकता कि देश के किसान बेहाल हैं।  सबसे पुख्ता सबूत है कि देश का दो तिहाई भाग गांव या किसान ही है। छोटे किसानों और खेतिहर मजदूरों को खाने के लाले पड़ रहे हैं। जाहिर है कि यह सुझाव सभी को सही लगेगा कि अचानक बदहाल हुए गांव की हालत को इमरजेंसी मानकर बजट में देखा जाए। किसानों के लिए किया भी कुछ इस तरह से जाए कि उनकी दशा सुधारने का फौरी इंतजाम दिखाई दे। और, अगर गांव की दशा की बजाए उनकी दिशा बदलने की बात की गई तो वैसा करना उनका दिल बहलाने से ज्यादा और कुछ नहीं होगा। वैसे मौजूदा सरकार ने मनरेगा को पहले पूर्ववर्ती सरकार की नाकामी का स्मारक जरूर कह दिया था लेकिन अच्छी बात यह है कि अब उसके महत्व को मान लिया है। यानी, मौजूदा सरकार के पास यह एक ऐसा मद है कि अगर वह चाहे तो बजट के जरिए देश के सभी गांवों में मजदूरों के लिए काम भेज सकती है। इधर खाद्य सुरक्षा की बड़ी कानूनी जिम्मेदारी सरकार को निभाना ही है।
 
उद्योग जगत इस बार भी दबाव डालेगा
मौजूदा सरकार के सत्ता में आने के पहले से ही सहूलियत पाने की सबसे ज्यादा उम्मीद उद्योग जगत ही लगाए बैठा है। सरकार पर दबाव डालने की सबसे बड़ी हैसियत भी उसी की है। सरकार के कौशल की परख इसी मामले में होनी है। इस बार उद्योग जगत को खुलेआम करों में छूट देना आसान नहीं होगा। वैसे बजट में इस तरह के उपाय भी होते हैं कि किसी तबके को अप्रत्यक्ष रूप से संतुष्ट किया जा सकता है। मुश्किल हालात में संभावना इसी उपाय को अपनाने की दिखती है।
 
स्मार्ट सिटी और बुलेट ट्रेन वगैरह छूटेंगी कैसे?
इन मामलों में सरकार का उत्साह और महत्त्वाकांक्षाएं इतनी ज्यादा प्रचारित हो चुकी हैं कि उन्हें टालने से एक तबके की तरफ से तंज और आलोचनाएं होने लगेंगी। यहां पर सरकार दशा की बजाए दिशा वाली बात का सहारा ले सकती है। पीपीपी, एफडीआई, देशी निजी क्षेत्र और ऐसे कई उपायों की बात कहकर इन्हें उम्मीद पर टिकाए रखा जा सकता है।

देश में साफ सफाई की योजना भी तो बाकी है...
देश में साफ सफाई रखने का पहाड़ सा काम केंद्र सरकार ने बैठे बिठाए अपने जिम्मे ले लिया था। साल भर तक भारी भरकम प्रचार के जरिए देशभर में यह बात चलाई जाती रही। अब बजट में इसके लिए कुछ खर्चे का इंतजाम करना पड़ेगा। लेकिन 700 से ज्यादा जिले, पांच हजार से ज्यादा नगर कस्बों और छह लाख से ज्यादा गांवों में साफ सफाई के काम के लिए केंद सरकार अपनी तरफ से कम से कम भी किसी खर्चे का एलान करना चाहे तो पाचं लाख करोड़ से कम नहीं बैठेगा। फिलहाल यह केंद्र सरकार के बूते की बात नहीं दिखती। हां, सांकेतिक रूप से दस पांच हजार करोड़ का कोई कोष बनाकर अपनी बात टिकाए रखने का काम ही फिलहाल हो सकता है।   

आर्थिक वृद्धि की थ्योरी जोखिम में डाल सकती है इस बार
पूरे आसार हैं कि सरकारी अर्थशास्त्री इस बार भी मानेंगे नहीं और सरकार को यही सलाह दे रहे होंगे कि उपलब्धियां दिखाने के लिए आर्थिक वृद्धि का सिद्धांत बता दिया जाए। लेकिन मुश्किल यह है कि पूर्ववर्ती सरकार को बेदखल करने का काम करते समय इस थ्योरी के खिलाफ इतनी जागरुकता बढाई जा चुकी है कि औसत विद्यार्थी भी इसे जॉबलैस ग्रोथ यानी बिना रोजगार वाली आर्थिक वृद्धि बोलने लगेगा। यानी, यह सिद्धांत कितना भी सही हो लेकिन कम से कम इस बार तो आसानी से काम में नहीं ला जाया पाएगा। मजबूरी में इसी से काम चलाना पड़े तो बात अलग है।

मंदी का तर्क ही काम आएगा क्या?
अपनी मजबूरियां बताने के लिए वैश्विक मंदी सबसे मजबूत तर्क हो सकता है। लेकिन यह नहीं भूलना चाहिए कि 2008 और 2009 की वैश्विक मंदी को गुजरे एक दशक भी नहीं हुआ है। मनमोहन सरकार ने उस दौर में हालात से जिस तरीके से निपटा था, वे उपाय हमारे सामने अब विकल्प के रूप में है। तब महंगाई के आरोपों को सह लिया गया था। लेकिन आफत जब दोबारा आती है तो बिल्कुल उसी शक्ल में नहीं आती। नए हालात भी बदले हुए हैं। बेरोजगारी इस साल कई गुनी तीव्रता के साथ बढ़कर डरा रही है। इन बेरोजगारों को देश की माली हालत कुछ और सुधर जाने की दिलासा देकर टरकाया नहीं जा सकता। हां, स्टार्टअप वगैरह से खुद रोजगार पैदा कर लेने का तर्क दिया जा सकता है।

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रिजर्व बैंक के गवर्नर ज्यादा गंभीर नजर आए...   
बहरहाल बजट को लेकर मौजूदा सरकार की नवीनतम भाव भंगिमाएं ही हमारे अनुमान का आधार हैं। हाल ही में रिजर्व बैंक के गवर्नर और वित्तमंत्री के बयानों पर गौर करें तो आर्थिक परिस्थितियों को दोनों कुछ अलग अलग अंदाज से देख रहे हैं। यहां हमें गवर्नर की बात पर ज्यादा गौर करना चाहिए क्योंकि वे आर्थिक मामलों के प्रशिक्षित ज्ञाता है। गोपनीय और जटिल सांख्यिकी की जानकारी भी उन्हें ही ज्यादा है। गुजरे हफ्ते के उनके बयानों को सुनकर अंदाजा लगाया जा सकता है कि आर्थिक मामले में ज्यादा खुशफहमी का कारण हमारे पास मौजूद नहीं है। खासतौर पर बैंकों के दिए कर्ज की वापसी न होने से चार पांच लाख करोड़ की रकम बटटे खाते में जा चुकी है। यानी, बैंकों को भी बजट से सहारे की जरूरत पड़ेगी। लिहाजा अच्छा हो कि बजट के पहले ही ये बातें लोगों के बीच डाल दी जाएं कि मौजूदा हालात में हमारी प्राथमिकताओं की सीमा क्या है। वरना, अचानक जनता का दिल टूटने से या मोह भंग होने से किसी भी सरकार की छवि खराब होने के खतरे ज्यादा पैदा हो जाते हैं।

- सुधीर जैन वरिष्ठ पत्रकार और अपराधशास्‍त्री हैं
 
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