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कितना बड़ा है 2022 तक सबको पक्के मकान का वादा

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कितना बड़ा है 2022 तक सबको पक्के मकान का वादा

प्रतीकात्मक फोटो

केंद्र सरकार ने गांवों में सभी के लिए पक्के मकान बनाने के वादे को पूरा करने की अपनी योजना का ऐलान किया है। मौजूदा सरकार के 2014 के चुनावी वादों में एक वादा यह भी किया गया था। बाकी तमाम बड़े वादों की तरह यह वादा भी दो साल से सरकार के गले पड़ा हुआ था। पिछले साल शहरी इलाकों में झुग्गी झोपडि़यों को पक्के मकान में तब्दील करने का ऐलान हुआ था। गांवों के लिए ऐलान अब हुआ है। हालांकि मौजूदा सरकार को तीसरा आम बजट पेश हुए अभी महीना भर भी नहीं गुजरा है। अगर संजीदगी से कुछ किया जाना था, तो क्या बजट में बाकायदा प्रावधान की बात नहीं की जानी थी। होगी, जरूर कोई अड़चन होगी। आइए देखें क्या हो सकती है?

पैसे की कमी के अलावा और क्या
छह लाख गांवों में इस भारीभरकम काम के लिए सिर्फ 81 हजार 975 करोड़ की मंजूरी की बात कही गई है। यह रकम कहां से आएगी? वैसे कहा गया है कि अगले आम बजटों में प्रावधान किया जाएगा। बिना ज्यादा प्रचार के अंदरूनी फैसले की बात यह भी है कि इस काम के लिए काफी रकम का प्रावधान मनरेगा के तय पैसे से किया जाएगा। सिर्फ 82 हजार करोड़ की रकम से ज्यादा कुछ होता नहीं दिखता सो रुपए में 40 पैसे राज्य सरकारों से लगवाए जाने की शर्त जोड़ी गई। दरअसल केंद्र सरकार पहले से ही इन मकानों के लिए अपनी ओर से मदद का भरोसा देती है। मकान गांव वाले ही बनवाते हैं यानी गांव वालों को भी अपनी ओर से खर्चा पहले भी करना पड़ता था और अब भी करना पड़ेगा।


पहले का मतलब यह कि पूर्व में यह योजना "इंदिरा आवास योजना के नाम" से चालू थी। हां, वह अब तक एक पक्के मकान के लिए 70 हजार की मदद वाली थी। नए ऐलान में यह रकम एक लाख 20 हजार कर दी गई। मकान का आकार 20 मीटर से बढ़ाकर 25 मीटर हो गया। पहले की इंदिरा आवास योजना में एक रुपए में केंद्र की तरफसे 75 पैसे और राज्यों की तरफ से 25 पैसे लगाने का नियम था। लेकिन नई योजना में केद्र की मदद 75 से  घटकर 60 और राज्यों का अंशदान 25 से बढ़ाकर 40 पैसे हो गया। नई सरकार की नए नाम वाली योजना का प्रचार करते समय इस बारे में ज्यादा बताया नहीं गया है। अब सवाल आता है 2022 तक सभी को पक्के मकान देने के वादे के आकार का। आइए इसे अभी से देख लें।

देश की आबादी का अंदाजा नहीं
अच्छे से अच्छे जानकार देश की मौजूदा आबादी 125 करोड़ बताते हैं। चूंकि 2011 की जनगणना में आबादी 121 करोड़ थी। सो, आज का यह आंकड़ा 125 करोड़ के आसपास लगता जरूर है लेकिन थोड़ा सा हिसाब लगाएं तो इसमें सनसनीखेज घपला पकड़ा जाता है। मसलन हमारी जनसंख्या वृद्धिदर 1.76 फीसदी  है। इस लिहाज से हमारी जनसंख्या आज 131 करोड़ पार कर चुकी है। गांव और शहर को अलग-अलग देखें तो गांव की आबादी के मामले में  तीन करोड़  की गलती या घपला गिनने में ही हो जाता है।

2021 में जब अगली जनगणना के आंकड़े आएंगे तो हमारी आबादी 140 करोड़ होगी यानी अपने आज के अनुमान से 10 करोड़ ज्यादा। आजादी के बाद से आज तक गांवों में पानी बिजली, स्वास्स्थ्य, शिक्षा और आवास योजनाएं जनसंख्या की इस अनदेखी की ही शिकार होती रही हैं। गांव के लिए हम जो हिसाब लगाते हैं उसमें गलती या बेईमानी का आकार चार गुना दिख रहा है।   

शहरों से दुगनी है गांव की आबादी
2011 में कुल 121 करोड़ आबादी में 83 करोड़ लोग गांव में थे। यानी आजादी के बाद से हमेशा की तरह 70 फीसदी। यानी शहर की तुलना में गांव में दुगने नागरिक रहते हैं। अगला वास्तविक आंकड़ा 2021 में मिलेगा। वैसे आज 2016 का अंदाजा यह है कि 91 करोड़ लोग गांव में रहते हैं। यानी गांव में लगभग 18 करोड़ परिवार। मुश्किल यह है कि हमारी दिलचस्पी सांख्यिकी में बिल्कुल नही बचीं है। सरकारी आंकड़ों का पिछले दस सालों से इतना मजाक उड़ाया जा रहा है कि यह साबित कर दिया गया है कि आंकड़े मतलब झूठ। लेकिन क्या आंकडों को देखे बगैर कोई योजना बन सकती है।

नई सरकार ने आते ही सबसे पहला काम यही किया कि योजना आयोग की छुटटी कर दी। वैसे उसकी जगह उसका नया नाम नीति आयोग रखा गया है। लेकिन नीति तय करने के लिए भी इतने लंबे-चौड़े देश को आंकड़ों के बगैर एक नजर में देखा नहीं जा सकता। आइए, देखते हैं कि 18 करोड़ ग्रामीण परिवारों के लिए पक्के मकान देने के चुनावी वादे को पूरा करने के लिए नई सरकार ने किस योजना का एलान किया है। और लगे हाथ यह देखते हैं कि सभी गांव वालों को पक्का मकान बनाकर देने की योजना में कितने मकान बनवाने पड़ेगे।

गांव में 18 करोड़ परिवारों में कितने कच्चे मकान?
ग्रामीण अर्थव्यवस्था का हिसाब रखने की फुर्सत हमें नहीं मिलती। संघीय ढांचे वाली व्यवस्था में सारा कामधाम राज्यों के जिम्मे है। एक भी ऐसा राज्य नहीं है जो आज इतना आत्मनिर्भर हो कि अपने सभी नागरिकों को रोटी, कपड़ा, मकान देने का वायदा पूरा कर पाए। रोटी और कपड़ा तो जैसे-तैसे मुहैया हुए दिखाए जाते हैं। ये मकान ही था जो हमें परेशान करता था। यह हर नागरिक की जिंदगी में सबसे खर्चीला काम होता है।

इसीलिए आज भी गांव में तीन चौथाई यानी 75 फीसदी मकान कच्चे या अधकचरे या बिना दरवाजे की झोपड़ी जैसे दिखते हैं। इस हिसाब से इस समय कम से कम 13 करोड़ पक्के मकानों के बनवाने की जरूरत है। यह आंकड़ा सिर्फ आज के लिए है। अगर 2022 तक बढ़ी आबादी के हिसाब से गांवों में सबके पास पक्के मकान  का सपना देखें तो यह आंकड़ा 15 करोड़ का होगा। अब देखिए योजना क्या है?

जरूरत 15 करोड़ मकानों की
केंद्रीय मंत्रिमंडल ने जिस योजना को मंजूरी दी है, उसमें 2022 तक सिर्फ दो करोड़ 95 लाख मकानों की बात है जबकि  जरूरत 15 करोड़ की है। यानी सैद्धांतिक रूप से 2022 में योजना के पूरे होने के बाद भी 12 करोड़ ग्रामीण परिवार कच्चे या अधकचरे या झोपड़ी में ही रहते दिखेंगे। तब भी हालत जस की तस दिखेगी। हां, यह अलग बात है कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था में अपने आप कोई चमत्कार हो जाए कि गांव के लोग अपने पैसे से ही पक्के मकान बना लें। हमारे हिसाब से आज यानी सन 2016 में 13 करोड़ ग्रामीण परिवार कच्चे या झोपड़ीनुमा मकानों में रह रहे हैं।

यानी हर गांव में सिर्फ पांच या छह मकान की ही योजना
बड़े जोरशोर से सरकारी ऐलान तीन करोड़ पक्के मकानों का है। लेकिन यह ऐलान 2022 तक की है। जबकि मौजूदा सरकार को जनता की तरफ से दिया कार्यकाल सिर्फ तीन साल ही और बचा है। इसीलिए नए नीतिकारों ने यह नुक्ता जोड़ा होगा कि इस सरकार के बाकी बचे तीन साल में एक करोड़ मकानों की ही योजना का ऐलान किया जाए। इसका मतलब हुआ कि बाकी दो करोड़ मकान अगली बार चुनकर आई  सरकार बनवाएगी। यानी मौजूदा सरकार तीन साल तक हर साल 33 लाख मकान बनवाने की ही बात कह रही है।

देश के छह लाख गांवों में बांटें तो 33 लाख का मतलब हर गांव में सिर्फ पांच या छह मकान ही बन पाएंगे। औसतन तीन हजार परिवारों के भरे-पूरे गांवों में ये हर साल पांच छह मकान गांव में बदलाव दिखाने के लिए दिखेंगे भी?  इससे भी बड़ी शर्त यह कि मुफलिस राज्य सरकारें  40 फीसदी मदद कर पाएं और बुरी तरह से बेहाल गांव के लोग भी अपनी तरफ से खर्च करने की हैसियत में में आ पाएं।

बहरहाल, आगे क्या होता है या नहीं हो पाता है, ये बाद की बात है। हां, नई सरकार की तरफ से सभी को पक्का मकान देने का एक बड़ा वादा पूरा करने का प्रचार तो हो ही गया है...।

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- सुधीर जैन वरिष्ठ पत्रकार और अपराधशास्‍त्री हैं
 
डिस्क्लेमर (अस्वीकरण) : इस आलेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी विचार हैं। इस आलेख में दी गई किसी भी सूचना की सटीकता, संपूर्णता, व्यावहारिकता अथवा सच्चाई के प्रति एनडीटीवी उत्तरदायी नहीं है। इस आलेख में सभी सूचनाएं ज्यों की त्यों प्रस्तुत की गई हैं। इस आलेख में दी गई कोई भी सूचना अथवा तथ्य अथवा व्यक्त किए गए विचार एनडीटीवी के नहीं हैं, तथा एनडीटीवी उनके लिए किसी भी प्रकार से उत्तरदायी नहीं है।
    

 



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