नदियों को जोड़ने के दिलचस्प पहलू

नदियों को जोड़ने के दिलचस्प पहलू

प्रतीकात्मक तस्वीर

दिल्ली के कॉन्स्टीट्यूशन क्लब में शनिवार को नदियों को आपस में जोड़ने के बारे में बात हुई. इस कार्यक्रम में लोगों को यह कहकर बुलाया गया था कि आएं और अपनी बात रखें कि नदियों को जोड़ा जाना ठीक रहेगा या नहीं. इस आयोजन में नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ हाइड्रोलॉजी के प्रोफेसर शरद जैन को नदी जोड़ के विभिन्न पहलुओं के बारे में बताना था. उन्हें यह सिद्ध करना था कि यह काम किया जाना ठीक रहेगा. दूसरी तरफ बांधों और ऐसी योजनाओं को ठीक न मानने वाले सामाजिक कार्यकर्ता हिमांशु ठक्कर को बोलना था. ठक्कर इन मामलों के तकनीकी जानकार भी हैं. लेकिन ठक्कर इस कार्यक्रम में नहीं आए या आ नहीं पाए.

उनकी गैर मौजूदगी में अन्य सामाजिक कार्यकर्ताओं और अन्य भागीदारों ने नदी जोड़ के नुकसान के बारे में हल्का फुल्का बोला. हालांकि कार्यक्रम के अंत में मुख्य अतिथि जल संसाधन मंत्री उमा भारती ने कार्यक्रम के सहभागियों को यह कहकर चौंका दिया कि देश में जल संकट के हालात शोचनीय है लिहाजा नदियों को जोड़ने की योजना जरूरी है. इस तरह से यह संकेत मिला कि केंद्र सरकार इस योजना को लागू करने का इरादा पहले ही बना चुकी है. ये अलग बात है कि अभी इस बारे में सार्वजनिक तौर पर पर्याप्त सोच विचार हो नहीं पाया है. यानी जब पता चलेगा कि नदियों को जोड़ने के काम पर कितना खर्च होगा और उससे कितना फायदा होगा तो हमें लगातार सोचने को मजबूर होना ही पड़ेगा.

उमा भारती ने क्या कहा...
केंद्रीय जल संसाधन मंत्री ने अपने लंबे भाषण में बुंदेलखंड की करुण और भयावह स्थिति का तर्क देते हुए बुंदेलखंड की दो नदियों केन और बेतवा को जोड़ने की योजना को आगे बढ़ाने का लगभग एलान ही कर दिया. लेकिन इस बात पर उपस्थित सहभागियों की तालियां नहीं सुनाई दीं. इस दौरान सभागार में सन्नाटा था जबकि बुंदेलखंड से पलायन करके दिल्ली आ रहे लोगों की व्यथा कथा सुनाने के बाद जब उन्होंने यह कहा कि केन और बेतवा को जोड़े जाने के बाद बुंदेलखंड लहलहा उठेगा और सब दुख दूर हो जाएंगे तब जरूर सबने जोर से तालियां बजाईं. इसी कार्यक्रम में केंदीय मंत्री ने यह भी बताया कि जिस दिन यह योजना का काम शुरू होगा, उसके बाद सात साल में यह योजना पूरी हो जाएगी. उन्होंने यह नहीं बताया कि यह योजना शुरू कबसे होगी. इसी बात की चर्चा कार्यक्रम खत्म होने के बाद श्रोताओं के बीच होती रही.

पक्ष में क्या बोला गया...
नदी जोड़ योजना के पक्ष में बोलने के लिए नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ हाइड्रोलॉजी के प्रोफेसर शरद जैन को बुलाया गया था. उन्होंने अपनी लंबी चैड़ी प्रस्तुति में लगभग सिद्ध कर दिया कि निकट भविष्य में देश में जिस तरह का जल संकट आता दिख रहा है उसके हिसाब से नदियों को आपस में जोड़ने के अलावा कोई दूसरा अच्छा उपाय दिख नहीं रहा है. कार्यक्रम में जिन दूसरे वक्ताओं ने इस योजना के पक्ष में बोला उसमें एक जानदार बात यह भी सुनाई दी कि बहुत बड़ी समस्या का समाधान भी बहुत बड़ा सा ही होगा. उनका इशारा यह रहा होगा कि छोटे छोटे तालाबों में बारिश का पानी रोककर रखने से बात उतनी बनेगी नहीं.

प्रस्तावित योजना के विपक्ष में ये बात हुई...
विपक्ष में बोलने वाले वक्ता हिमांशु ठक्कर तो आए नहीं सो मजबूरी में इसका जिम्मा सामाजिक कार्यकर्ताओं ने उठाया. इस भारी भरकम योजना से पर्यावरण को नुकसान, लंबी चौड़ी जमीन का डूबना और वन्यजीवों पर संकट जैसे मुददों का ही जिक्र हो पाया. इस योजना का विरोध करने वाले ज्यादातर कार्यकर्ता वे ही थे जो देश में छोटे छोटे तालाबों में पानी भरकर रखने को जल संकट का समाधान मानते हैं. जल प्रबंधन की भारी भरकम योजनाओं के विरोध में हमेशा से बोली जाने वाली इस बात का भी जिक्र आया कि इस योजना से एक एकड़ की सिंचाई का इंतजाम करने पर एक लाख रुपए खर्च बैठ रहा है. इतने खर्चे में तो तालाबों के जरिए कई एकड़ में सिंचाई का इंतजाम किया जा सकता है.

पक्ष में बोलने वाले ये बात नहीं कर पाए...
पक्ष में बात करने वालों के पास बड़े बांधों की उपयोगिता को सिद्ध करने के और भी पचासियों तर्क हो सकते थे. लेकिन पिछले तीस साल से बांधों का स्वयंसेवी संगठन इतना विरोध कर चुके हैं कि आमतौर पर इसके खिलाफ माहौल बनाया जा चुका है. सो नदी जोड़ योजना की बात करते समय बांधों की बात करना खतरे से खाली नहीं समझा गया होगा. जबकि हकीकत यह है कि कोई भी नदी जोड़ योजना बिना बड़े बांध बनाए बन नहीं सकती. यहां यह बात बताई जा सकती है देश में 37 नदियों को शामिल करते हुए कुल 30 नदी जोड़ परियोजनाओं का प्रस्ताव है. हकीकत यह भी है कि इन परियोजनाओं में एक सौ बड़े बांध बनाने का प्रस्ताव है.

पक्ष में बोलने वाले यह तर्क भी नहीं रख पाए कि छोटे तालाबों की योजना इसलिए कारगर नहीं है क्योंकि समस्या यह है कि देश के एक भूभाग पर पानी ज्यादा बरसता है और दूसरी जगह कम. यानी उनकी सारी बातों का लब्बोलुआब यह था कि एक भू भाग से दूसरे भाग की तरफ पानी भेजने से ज्यादा बुद्धिमत्तापूर्ण और कोई दूसरा उपाय हो ही नहीं सकता.

विपक्ष में बोलने वाले यह नहीं कह पाए...
विपक्ष में खड़े लोग हमेशा से पर्यावरण का तर्क ही देते आए हैं. उनके इस तर्क के काट के तौर पर यह कहा जाता रहा है कि ज्यादा विकास के लिए थोड़ा बहुत पर्यावरण का नुकसान तो झेलना ही पड़ेगा. मानव जगत को कितना फायदा होगा और वन्यजीव जगत को कितना नुकसान होगा इसका सही सही यानी तथ्यपरक हिसाब लगाने में किसी की दिलचस्पी है नहीं. हालांकि याद आता है कि टिहरी बांध के विरोध के समय पूना यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर विजय परांजपे ने ऐसा एक काम किया था. उन्होंने लाभ लागत के हिसाब से टिहरी को घाटे का सौदा साबित किया था. लेकिन तब बड़े बांध के पक्षधर यह साबित कर ले गए थे कि कुल मिलाकर यह काम फायदेमंद होगा. फिर भी अभी तक यह पक्के तौर पर तय हो नहीं पाया है लेकिन अब जब यह बात खुल गई है कि नदी जोड़ परियोजना बड़े बांधों की ही परियोजना है तो उसके पक्ष में बोलने वाले लोग इस समय यह अध्ययन तो करवा ही सकते हैं कि टिहरी बांध पिछले तीस साल में कितना फायदेमंद या नुकसानदेह रहा. अकेला टिहरी ही क्या, आजादी के बाद बनाए गए दूसरे बड़े बांधों की समीक्षा भी क्या इस समय नहीं होनी चाहिए. इसी तरह देवास माडल के जरिए यह जाना जा सकता है कि पूरे देश के लिए तालाबों का काम कितना व्यावहार्य है.

बड़ा लोचा कहां है...
पक्ष और विपक्ष के लोगों के अपने अपने पूर्वाग्रह हो सकते हैं. उनके अपने अपने निजी हितों के आरोप प्रत्यारोपों का शोर भी हो सकता है. लेकिन नदी जोड़ परियोजना में सबसे बड़ा लोचा खर्चे का है. अब तक इस योजना की तीस परियोजना पर कम से कम खर्चे का जो हिसाब लगा है, वह पांच लाख 60 हजार करोड़ रुपए है. हालांकि यह अनुमान 2005 का है. अब तक का अनुभव यह है कि खर्चा हमारे शुरुआती अनुमान से दुगना हो जाता है. अकेली केन बेतवा परियोजना ही 17 हजार करोड़ की है. हमें यह भी देखते चलना चाहिए कि नई सरकार ने पचासों लोकलुभावन विकास की योजनाओं के जो एलान कर रखे हैं उसके खर्चे के लिए तो इंतजाम हो नहीं पा रहा है. तो फिर इतनी भारी भरकम योजना के लिए कहां से पैसे का जुगाड़ किया जाएगा? यानी इस संवाद कार्यक्रम में खर्चे के इस पहलू पर भी बातें होनी चाहिए थीं. वरना कहीं बाद में यह पता न चले कि लोगों को उम्मीद पर टिकाए रखने के लिए ये बाते सिर्फ बातें ही हैं.

यह बात कहना इसलिए जरूरी है क्योंकि नदी जोड़ो परियोजना की बात पहली बार सार्वजनिक तौर पर 14 अगस्त 2005 में राष्ट्रपति के भाषण में सुनी गई थी. तबसे आज तक हुआ क्या है और क्या नहीं हो पाया, इसकी चर्चा लगे हाथ होनी चाहिए थी. और यह बात भी कि आखिर यह काम अब तक शुरू क्यों नहीं हो पाया. फिलहाल अनुमान लगाकर कहा जा सकता है कि कुछ करने के लिए सबसे पहले पैसों की जरूरत पड़ती है.

सुधीर जैन वरिष्ठ पत्रकार और अपराधशास्‍त्री हैं...

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